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तू है युगावतार (कवितायेँ) - रश्मि चतुर्वेदी

अप्रैल 29, 2013

रश्मि चतुर्वेदी

कवितायेँ

poetess rashmi chaturvedi shabdankan kavita कवियत्री रश्मि चतुर्वेदी शब्दांकन कविता कवितायेँ    वाराणसी की रश्मि चतुर्वेदी ने संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से संस्कृत में स्नाकोत्तर करने के पश्चात कुछ साल अध्यापन का कार्य किया| विगत कुछ वर्षो से "स्किल डेवेलपमेंट प्रोग्राम" के अंतर्गत युवाओं को रोज़गार के अवसर प्राप्त करने में मदद कर रही है| इस कार्यक्रम के द्वारा वे कामकाज़ी युवाओं को भी बेहतर भविष्य की संभावनाओं से अवगत कराती हैं|

   एक कवयित्री होने के अलावा रश्मि चतुर्वेदी अपने लेखन से समय समय पर समाज में होने वाली कुरीतियों पर भी प्रकाश डालती रहती हैं| उनके लेखन में सौम्यता और दृढ़ता का संतुलन मिलता है| रश्मि की चेतना गंभीर, मार्मिक और संवेदनशील है| वे रोज़गार की जानकारियों से संबंधित एक पत्रिका का संपादन भी करती हैं|

प्यार की कशिश
बात निकली है जो दिल से
poetess rashmi chaturvedi shabdankan kavita प्यार की कशिश कवियत्री रश्मि चतुर्वेदी शब्दांकन कविता कवितायेँ उसे बताने मे क्या जाए
जो कशिश है तेरी आँखों मे
वो भुलाने से ना भुलाए !

तेरे होठों पे जो  बिखरी  है
तबस्सुम की कलियाँ
तुम चाहो छुपाना पर
वो मोती सा बिखर जाए !

तनिक पास आ जाओ साहिब
तेरी पलकों को चूंम लूँ
इस पल के इंतजार मे
सदियो ना लग जाए !

घर

चार दीवारों से घिरा हुआ
poetess rashmi chaturvedi shabdankan kavita कवियत्री रश्मि चतुर्वेदी शब्दांकन कविता कवितायेँ घर इंट पत्थरों से बना हुआ
प्यार के फूल से सज़ा हुआ
एक गाँठ से बँधा हुआ |

तिनका तिनका जोड़ के बनता
इसमे माँ का प्यार बसता
भाई बहन का प्यार झलकता
आपस मे सबका प्यार  पनपता |

कहीं भी हो ये याद आता है
हमको अपने पास बुलाता
हम पर अपनी खुशियाँ लुटाता
दिन भर की थकान मिटाता |

रूखी सुखी खाकर हम
ठंडा पानी पी कर हम
सो जाते इसकी छाँव मे हम
भूल जाते सारे रंजो गम हम |

विलय योग

अपने मिलन की मधुरिम बेला मे
poetess rashmi chaturvedi shabdankan kavita विलय योग कवियत्री रश्मि चतुर्वेदी शब्दांकन कविता कवितायेँ विरह वियोगिनी ना आ जाए,
घबराती हूँ , बिफर जाती हूँ
उसके पदागमन् से सिहर जाती हूँ
कंपित स्वर से शब्द निकलता
कहीं योग वियोग ना बन जाए |

जैसे - जैसे पल पास आए
विलय का आता योग, ये हाय !!
बेचैनी से दिल घबराए
धड़कनों पे अब ना ज़ोर चले
उफ़ ! ये प्रतिपल बढ़ती जाए !!

आह !! बरसों के बाद ये पहर आई
जीवन ने मेरे ली अंगड़ाई
क्षणिक ना हो खुशियों की घड़ी
कितने प्रतीक्षा के बाद मिली
इस मधुर मिलन की मधुर कड़ी !!


जीवन तृष्णा

मदमाती मस्त तरंगो से
poetess rashmi chaturvedi shabdankan kavita जीवन तृष्णा कवियत्री रश्मि चतुर्वेदी शब्दांकन कविता कवितायेँ
है कैसी निकली ये ज्वाला
उद्वेलित करती है तन-मन
बुझता नही ये अंगारा 

यह भरा हुआ है चाहत से
प्रतिपल ये प्रेरित करता 
साँसों मे कामना भरता
विष रूपी अमृत का प्याला 

आह ! कितनी पीड़ा 
नस-नस नागिन सा डसता
फिर भी व्याकुल मन फँसता
जो भी ये कराए वो करता 

तू है युगावतार 

ऐ पथिक तू पथ पर चलता चल
poetess rashmi chaturvedi shabdankan kavita तू है युगावतार कवियत्री रश्मि चतुर्वेदी शब्दांकन कविता कवितायेँ तनिक भी ना तू विचलित हो
ऐ पथिक तू पथ पर चलता चल|

राहों में काँटे भी होगें
राहें पथरीली भी होगीं
पर तनिक भी ना तू विचलित हो
ऐ पथिक तू पथ पर चलता चल|
घनघोर अंधेरे भी होंगे
हर ओर सियापे भी होंगे
पर तनिक भी ना तू भयभीत हो
ऐ पथिक तू पथ पर चलता चल|

तू युग का युगावतार बन
तू जन जन का संताप हर
पर तनिक भी ना तू भ्रमित हो
ऐ पथिक तू पथ पर चलता चल|

तू अर्जुन बन लक्ष्य भेदन कर
तू कृष्ण बन संबोधन कर
बन साम्यवाद का प्रथम प्रचारक
ऐ पथिक तू पथ पर चलता चल|

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