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कहानी: ज़ख्म - डॉ. रश्मि | Hindi Story 'Zakhm' By Dr Rashmi

नव॰ 26, 2013

ज़ख्म 

- डॉ. रश्मि

कैसा है यह द्वंद्व, समझ ही नहीं पा रही हूँ........... एक तरफ ‘तुम’ हो.....तो दूसरी तरफ है ‘वो’। प्रेम के ये दोनों सिरे मुझे मज़बूती से अपनी ओर खींच रहे हैं... और मैं लाचार-सी, असहाय दोनों ओर बारी-बारी से खिंचती जा रही हूँ। अपने भीतर एक अजीब खींच-तान महसूस कर रही हूँ। मुझे खुद क्या चाहिए, समझ ही नहीं पा रही हूँ। जब एक डोर मुझे अपनी ओर खींचती है तो दूसरी डोर और कसने लग जाती है......मेरा दम घुटने लगा है। कभी ख्याल आता है कि एक सिरा कसके पकड़ कर दूसरा झटक दूं, लेकिन नहीं झटक पाती। जब-जब मन में क्षोभ और पीड़ा अपना ज्वार पकड़ती है तो यही जी चाहता है कि तुम्हारे प्रेम के सिरे को थामें आगे बढ़ती चली जाऊं पर, न जाने क्यों कुछ ही समय में उसके प्यार की डोर मुझे अपनी ओर बरबस खींचने लगती है। ‘तुम’ ओर ‘वो’ मुझे बारी-बारी से अपनी ओर खींचते हो और मैं कठपुतली के समान दोनों में बँटी चली जाती हूँ । मुझे आज भी याद है वो दिन जब तुम मुझे पहली बार मिले थे। मैं गणित में कमज़ोर थी ओर मुझे गणित पढ़ाने के लिए तुम चुने गए। तुम बहुत शरीफ़ और संकोची स्वभाव के थे। तुम्हारा यही स्वभाव मेरे माता-पिता के मन को भी भाया और उन्हें ये राहत भी दे गया कि उनकी बेटी की इज्ज़त को तुमसे कोई ख़तरा नहीं है। मगर फिर भी वे अपनी तरफ से पूरी सावधानी रखते …….वे हम पर निगाह बनाए रखते थे, इस बात का अहसास भी मुझे बाद में हुआ वर्ना मैं तो उम्र के जिस पड़ाव में थी वह बेहद खुशनुमा उम्र थी और मैं इन सबसे बेखबर थी। मेरी अल्हड़ उम्र और बड़े-बड़े ख्वाब... मैं दुनिया पर छा जाना चाहती थी... अपने परों को पसार कर उड़ जाना चाहती थी। मेरी महत्वाकांक्षा के परों को मेरे पिता अक्सर लाड़ से सहला दिया करते और मुझमें नई उड़ान के लिए नया जोश भर देते। वे मुझे किसी ऊंचे पद पर देखना चाहते थे। किन्तु माँ कहती कि इतना उड़ना ठीक नहीं लड़कियों के लिए, आखिर पराए घर जाना है। ‘पराया घर....’ कभी समझ नहीं पाई इसके मायने। अगर वो पराया ही है तो क्यों जाना उस घर में... अपना घर खुद ही बना लूंगी मैं। मेरे पिता के हाथों की सहलाहट माँ की समझाइश के आगे जीत जाती। परन्तु अगले ही पल मेरी उम्र की विडम्बना, कि माँ की समझाइश और पराए घर का ख्वाब मुझ पर हावी होने लगता।

       किशोरावस्था की उम्र लाड़ और ममता, जोश और सपने... इन सबको थामें बड़े तेज प्रवाह-सी बढ़ती जा रही थी। तब भी ऐसा ही दोहरा खिंचाव था जीवन में, जैसा कि आज है। एक ओर थे पिता के दिखाए स्वप्न और अपने पैरों पर खड़े होने की लालसा, खानदान को कुछ कर दिखाने की महत्वाकांक्षा... तो दूसरी ओर माँ का सपना... पराये घर जाकर उसे संवारने और खानदान का नाम रौशन करने की तमन्ना। मैं कभी पिता के ख्वाब पूरा करना चाहती तो कभी माँ की तमन्ना। मैं इन दोनों सिरों को थामें... खिंचती-खिंचती-सी उम्र की दहलीज पर चलती जा रही थी। अब तो मेरी अल्हड़ उम्र की खूबसूरती भी अपना जादू सब पर चलाने लगी थी। मैं चंचल स्वभाव की ऐसी हँसमुख और बुद्धिमान लड़की की तरह परिवार में गढ़ी गई थी कि बिना किसी के हाथ लगाए भी हर मिलने वाले के दिल और दिमाग में उतर जाने का माद्दा रखती थी। आज भी याद है कि जो भी मुझसे मिलता, प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। बच्चों में बच्चा बन जाना और बड़ों में समझदारी दिखाना मेरे नैसर्गिक गुणों में से था। बुजुर्गों के बीच तो ऐसे बोलती जैसे जहां-भर की बुज़ुर्गियत तो बस मेरे ही भीतर है। इसके लिए मुझे कुछ अलग मशक्कत करने की ज़रुरत नहीं पड़ी। जहाँ दो घड़ी बैठ जाती, वहीँ अपना प्रभाव और खुशबू छोड़ जाती......वैसे ये हुनर तो आज भी मुझमें है। इन्हीं गुणों के कारण ही तो तुम मेरे जीवन में खिंचे चले आए थे।

        पहली बार ही मिली थी तुमसे और तुम पर भी मेरी चंचलता का असर हो गया था। जबकि तुम धीर-गंभीर स्वभाव वाले विचारशील लोगों में शुमार किये जाते थे........और मैं.....मैं ऐसे धीर-गंभीर चरित्रों से बड़ा भय खाती थी। फिर भी न जाने कैसे तुम्हारी इसी गंभीरता और धैर्य ने बड़े ही धैर्य के साथ मेरे ह्रदय में एक गंभीर स्थान बना लिया। हम अक्सर मिलने लगे। तुम कोई गंभीर बात कहते और मैं खिलखिलाकर हँस देती......तुम हैरान! पूछते-

        ‘प्रिया, तुम इतनी निश्छलता से कैसे हँस लेती हो? मैं तुमसे इतने गंभीर विषय पर बात कर रहा हूँ और तुम इस पर भी खिलखिला रही हो। क्या मेरे ये गहरे विचार तुम्हारे भीतर कोई चोट नहीं करते?’

       मैं कुछ न कहती....बस, अपनी गलती मान तुम्हारी चोटों को प्यार से सहला देती। शायद तुम्हारी चोटों को सालों से किसी ने सहलाया न था, इसीलिए मेरे हाथ रखते ही तुम पिघल गए। इतने सख्त स्वभाव वाले...धीर-गंभीर तुम, मेरे आगे अपनी सारी चोटों को खोलकर बैठ गए। मैं भी बड़े जतन से तुम्हारे उन एक-एक ज़ख्मों को सहला-सहलाकर अपने प्यार का मरहम देने लगी। तुम्हारे घाव धीरे-धीरे जाने लगे.....तुम हँसना सीख रहे थे...फिर खुलकर हँसने लगे। तुम हँसते तो मेरे भीतर मंदिर की सैकड़ों घंटियाँ एक साथ बज उठतीं। खुद पर इतराने लगती, मानों किसी देवता को हँसना सिखा दिया हो......मानो तुम इस संसार के लिए कोई वरदान हो और ईश्वर ने उसे ज़िन्दा रखने का जिम्मा मुझे सौंप दिया हो। लेकिन पता नहीं क्यों अब मुझे कभी-कभी अपने पंखों का बोझ बढ़ता-सा लगता। यूँ लगता कि अब उन्हें फैलाउंगी तो उड़ना तो दूर फुदक भी न पाऊँगी। मैं तुम्हारे प्रेम के आकर्षण में खिंची चली जा रही थी। तुम्हारी आँखों में अपने लिए चाहत खोजने लगी। तुमसे गणित सीखते सीखते प्रेम का गणित जोड़ बैठी। धीरे धीरे मेरी महत्वाकांक्षाएं अपना आकार खोने लगीं और प्रेम के आकार ने विस्तार लेना शुरू कर दिया। अब मैं न किसी कैरियर की चिंता करती और न ही अच्छी डिविज़न लाने की परवाह। अनजाने ही अपने तय किये लक्ष्यों को भूलती जा रही थी। वो ऐसा दौर था जब न पिता के सपने याद आ रहे थे और न ही माँ की ख्वाहिशें दिख रहीं थीं। मैं अपने जिन पंखों को पसार कर उड़ने का ख्वाब देखती थी वे कहीं बिसर गए थे और अब कुछ याद रह गया था तो बस तुम और तुम्हारा प्यार। मैं सही थी....कुछ ही दिनों में मैं तुम्हारी चाहत बन बैठी खुद के भविष्य के लिए तय किए गए लक्ष्यों को खुद ही भुला बैठी। अपनी आँखों में तुम्हारे ख़्वाब सजाने लगी। कभी अपने चेहरे पर तुम्हारी आँखें खोजती तो कभी अपनी हथेली में तुम्हारा नाम लिखती। किताबों के अक्षरों में भी तुम्हारा चेहरा ही नज़र आता। तुम मुझे हर वक्त उदास लगते और मैं तुम्हे अपने स्नेह से जिंदा करती जा रही थी। धीरे-धीरे पिता का सपना ढहने लगा और माँ की तमन्ना अधिक बलवती हुई। तुम्हारे ज़ख्मों को सहलाते-सहलाते तुम्हारे घर को सँवार बैठी, तुम्हारी दुल्हन बन बैठी......यानि तुम्हारी मेमसाहब बन गई। तुम मुझे प्यार से मेमसाहब कहकर पुकारते और मैं चहकती रहती। मेरे दिन तुमसे शुरू होकर पसरते और मेरी रातें तुम पर ही ख़त्म होकर सिमट जातीं। मैं ‘तुममय’ ही होती चली गई। जो घर कभी ‘पराए-घर’ की तरह सपने में पल रहा था वह तीन कमरों के किराए के घर की शक्ल में ‘अपना घर’ बन बैठा। तुम्हारे साथ मेरे दिन-रात बीतने लगे। जीवन सुनहरे ख्वाब-सा लगने लगा। लगता, जैसे कि हमारी दुनिया कोई स्वप्निल लोक है जिसमें तुम कोई जादुग़र हो और मैं तुम्हारी परी। जीवन स्वर्णिम हो गया था। न तुमसे आगे मेरी कोई दुनिया थी, न ही तुम्हारे पीछे मेरा कोई वज़ूद। जीवन ठहरा-ठहरा-सा था किन्तु महक रहा था। पहले मैं अपनी महत्वाकांक्षाओं के पर संवारती रहती थी, पर अब सारी आकांक्षाओं को पीछे छोड़कर तुम्हारी परी बन चुकी थी। धीरे-धीरे समय बीता...और बीता.....सहसा एहसास हुआ कि मेरे परी-पंख भी मुरझाने लगे हैं। तुम्हारे पुराने से पुराने ज़ख्म भी अब मुझे नज़र नहीं आते थे, शायद वे भर चुके थे। तुमने बड़े करीने से मेरे आगे अपने वे ज़ख्म फैलाए थे और मैंने भी बड़े सलीक़े से अपने प्यार को उन पर रिसा-रिसा कर उन्हें ऊपर तक भर दिया था। ......लेकिन कहते हैं न कि, ज़ख्म भर जाते हैं पर निशान रह जाते हैं। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। तुम्हारे ज़ख्म भरते तो जा रहे थे किन्तु निशान छोड़ते जा रहे थे..... फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि वे निशान मेरे दिल पर छोड़ते जा रहे थे।.....शायद इसलिए कि मैंने इतने दिल से जो सहलाए थे। तुमने इतने समय में यह भी ध्यान न दिया कि मेरी हँसी रुकती जा रही है। तुमने क्या, मैंने भी ध्यान न दिया था। मैं तुम्हारे ज़ख्मों को सहलाने और तुम्हारी हँसी को जगाने में इतनी डूबती गई कि पता ही नहीं चला कि कब अपनी हँसी खो बैठी। अब मैं अपनी खिलखिलाहट को भी भूलती जा रही थी। घर में कभी-कभी कुछ गूंजता तो तुम्हारी हँसी.....कभी कहीं कुछ बिखरा मिलता तो तुम्हारा दर्द। मैं हमेशा की तरह तुम्हारी हँसी और दर्द सहेजती-समेटती रही। पता ही नहीं चला कि कब, कैसे मेरे सीने में दफ़न तुम्हारे ज़ख्मों के निशान एक-एक करके खुलने लगे और मुझे टीसने लगे। तुम अब भी अपने ज़ख्मों का ही इलाज करवाना जानते थे। तुम्हें औरों के ज़ख्मों से कोई वास्ता न था। जब कभी मैं दिल के दर्द से......मन की चोटों से रो पड़ती तो तुम उन्हें सहला तो देते पर उस दौरान तुम्हारे भीतर एक बेचैनी-सी रहती। तुम अपने ज़ख्मों से इतने आजिज आ चुके थे कि तुम अब किसी के भी ज़ख्म देखना नहीं चाहते थे। तुम अपने भीतर इतना दर्द घोंट चुके थे कि अब दूसरों को दर्द में देख वहां से भाग खड़े होते थे। तुम दर्द से घबराने लगे थे, शायद। ज़ख्म तुम्हें डराते थे। पर मैं भी क्या करती....हमेशा हँसने-खिलखिलाने वाली मैं, तुम्हारे दर्द को सहलाते-सहलाते खुद भी उस दर्द में सराबोर हो चुकी थी। ऐसा नहीं था कि तुम्हें मेरी पीर का कोई अंदाजा नहीं था.....तुम्हें खूब अंदाज़ा था बल्कि तुम तो कभी-कभी मेरी पीड़ा देखकर तड़प भी उठते थे। बस....तुममें ज़ख्मों से निपटने का हौसला न था.....उन्हें छूने का साहस न था। शायद इसीलिए तुम अपने ज़ख्मों को भी न भर पाए थे। ऐसे में तुम मेरे ज़ख्मों को कैसे सहलाते....कैसे उनकी जलन मिटाते? तुम मुझे हँसता-खिलखिलाता लाए थे, अब मुझे उदास देख मुझसे कतराने लगते। धीरे-धीरे तुम मुझसे डरने भी लगे कि कहीं मैं तुम्हारे आगे अपने ज़ख्म खोलकर न बैठ जाऊं। परन्तु मैंने ऐसा कुछ न किया। तुम्हारे ही दिए ज़ख्म थे वे.....तुम्हारे आगे क्या पसारती।

        अब मैंने तय किया कि अपने जीवन को फिर एक बार व्यवस्थित करुँगी और मैंने खुद को एक रूटीन में ढालना शुरू किया। मेरे उस रूटीन में शामिल हुआ रोज़ शाम को पास के बगीचे में जाना.....अनजान बच्चों की किलकारी में खुद की खोई हँसी को खोजना......महकते फूलों में अपनी पुरानी खुशबू को पाना...पर समय बीतता गया और कुछ भी वापस न मिला। मैं रोज़ वहां जाती...उदास और बैचैन। गुलाब को घंटों निहारती पर दिल में कांटे खरोंचे मारने लगते। बच्चों के झूलों को प्यार से देखती तो भीतर अतल में दिल डूबने लगता। मेरा वहाँ किसी भी चीज़ में दिल ही न लगता था, पर फिर भी मैं वहाँ रोज़ जाती रही। अचानक... एक शाम मेरे पास वाले झूले से झूलते-झूलते एक बच्ची मेरे नज़दीक गिर पड़ी। मैंने उसे उठाया और प्यार से उसके सर को सहलाना शुरू किया। मेरी बेचैन आँखें आसपास उसके माता-पिता को खोजने में लगी हुई थीं। तभी मैंने एक सभ्य और सौम्य पुरुष को इस ओर आते देखा। बच्ची का सर मेरे दोनों वक्षों से सटा था और मैं उस बच्ची को अपनी हथेली से सहला रही थी। ‘वो’ मेरे......नहीं ....अपनी बच्ची के नज़दीक आ रहा था। पास आते ही पहचानते देर न लगी....’वो’ समीर था....मेरे स्कूल का साथी.....समीर.....आज मेरे सामने खड़ा था। वह अपनी बेटी के रोने की आवाज़ सुनकर जिस तेज़ी से इस ओर बढ़ा था, अपनी बेटी को मेरे आलिंगन में देख पास आकर उसी तेज़ी से रुक भी गया था, मानों उसे अपनी बेटी बड़े महफूज़ हाथों में नज़र आ रही हो। उसकी बच्ची भी उसी की तरह हँसमुख और बहादुर थी। कुछ ही देर में सब दर्द भूल हँसती हुई, झूलों पर खेलने चल दी। समीर भी तो ऐसा ही था....स्कूल में, हर चीज़ में आगे रहता। हारना तो जैसे उसने सीखा ही न था। पूरे स्कूल का यह हीरो कॉलेज जाकर भी छा गया था। हमारा स्कूल का साथ कॉलेज में भी बना रहा। मैं जब भी उदास होती, उसके पास जाकर बैठ जाती। वह मेरी हर हरक़त से वाकिफ़ था। मैं कब खुश हूँ.....कब उदास.....कब मुझे कुछ चाहिए....सब कुछ मेरे बिना कहे ही पढ़ लेता.......कभी-कभी तो दूर बैठा आँखों से ही बांच जाता। कभी-कभी मैं भी उससे कहती-

        ‘समीर, तुम तो जादूगर हो। मेरे मन की इतनी सारी बातें बिना कहे कैसे जान जाते हो? मुझे भी सिखा दो न ... फिर देखना, मैं भी तुम्हें कभी उदास नहीं होने दूँगी।’ वो कहता-

        ‘प्रिया, तुम्हें पता नहीं कि तुम तो मुझसे भी बड़ी जादूगरनी हो। ये तुम्हारी आँखों का ही तो जादू है कि वो बड़े ही सलीके से तुम्हारे मन की बातें मुझे बता देती हैं।’

        उसकी उन बातों में डूब जाने का दिल करता लेकिन तुरंत ही पिता का सपना और अपने लक्ष्य याद आ जाते। याद आ जातीं वे सभी महत्वाकाक्षाएं....अपना करियर बनाने और जीवन में कुछ बनने का.....पंख पसार के उड़ने का....जहांन नापने का और मैं उसकी सारी बातों को बड़ी ढिठाई से अपने दिलो-दिमाग से बाहर निकाल देती और खुद को पढाई में डुबो देती। फिर कुछ समय बाद ‘वो’ अपने परिवार के साथ दूसरे शहर चला गया और बदल गया बहुत कुछ। समीर के क़रीब रहने पर एक मादक-मृदुल बयार मुझे सहला जाती थी पर मैं खुद को बहने से रोक लेती थी लेकिन अब उसके चले जाने से वह प्रथम आकर्षण भी जाता रहा। मैंने खुद को पूरी तरह से अपनी पढ़ाई, कैरियर और लक्ष्यों को पाने की दिशा में लगा दिया। मेरे पास मेरा लक्ष्य था, सपना था, मेरी उड़ान थी। मैं अपने परों को ही संवारती रहती और उसकी उन्मुक्त हँसी को भूल-सी गई।

       अचानक वही हँसी मेरे कानों में घुल गई और मैं अपनी चेतना से बाहर आ गई। देखा तो वह सामने खड़ा हँस रहा था। अब उसके चेहरे पर कहीं भी चिंता नज़र नहीं आ रही थी, वह अपनी बच्ची को और बच्चों के बीच फिर-से हँसता-खेलता देख निश्चिन्त हो गया था। वह मेरे पास बैठते हुए बोला-

        ‘प्रिया, तुम तो साड़ी में मम्मी लग रही हो।’

        ‘तो!!! तुम भी तो मूछों वाले पापा बन गए हो समीर ।’

       .... और हम दोनों जोर से खिलखिला दिए। तभी अचानक कोई जादू-सा हुआ और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपनी हँसी की उन स्वर-लहरियों में उसके साथ डूबते-उतराते अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में पहुँच गई होऊँ और मेरे पास बैठा है वही हंसता-खिलखिलाता समीर.....वक्त जैसे पीछे लौट गया....बहुत पीछे कॉलेज में, समीर के पास.... सहसा मैंने ध्यान दिया कि अब पैरों के नीचे की घास कुछ और ही ज्यादा हरी लग रही थी। तलवों से सहलाया तो और दिनों से कहीं ज्यादा मुलायम भी जान पड़ी। अब हम लगभग रोज़ मिलने लगे। रोज़ शाम को हमारे वहां मिलने और खिलखिलाने से वह और हरी, और मुलायम होती जा रही थी। अचानक लगा कि गुलाबों की महक भी लौट आई है। उसके कांटें न जाने कहाँ जा छिपे थे या शायद उगने से ही शर्मिंदा हो रहे थे। बच्चों की किलकारियों में हमारी खिलखिलाहट भी घुलने लगी थी। वो सचमुच का जादूगर था। तभी तो मेरे दिल पर लगे तुम्हारे ज़ख्मों के सारे निशान धीरे-धीरे उसके सामने खुलने लगे। ज़ख्मों के वो निशान उसके आगे रिस रहे थे.... उसके आगे असहाय पड़े रो रहे थे और वह जादूगर की तरह उन्हें प्यार से सहला-सहलाकर मिटाता जा रहा था। धीरे-धीरे ‘वो’ मुझे जीवन देने लगा। क्या विडम्बना थी कि मैं तुम्हें जीवन दे रही थी और वो मुझे। .....या शायद, अब वो मुझे अमृत दे रहा था, तभी मैं तुम्हें जीवन दे पा रही थी। तुम हमेशा की तरह असहाय शिशु की मानिंद अपने ज़ख्मों को मेरे आगे रखते रहे और मैं उन्हें सहलाकर तुम्हें जीवन देती रही लेकिन सांझ ढले तुम्हारे ज़ख्मों के निशान समीर के आगे धर देती और वह उन पर अपना अमृत छिड़क देता। समीर ने कभी मेरे आगे अपने प्रेम का इज़हार न किया, हमें इसकी ज़रुरत भी न थी। हम दोनों साथ हँस रहे थे....एक बार फिर जी रहे थे। जो कभी अनकहा रह गया था, उसे आँखों से कह रहे थे ।

        ‘सुनो समीर, हमारी जोड़ी तो कमाल की है, हमें आँखों से बोलना भी आता है और पढ़ना भी आता है। एक-से ऐसे दो लोग आसानी से नहीं मिलते।’

        ‘हाँ प्रिया, ऊपर वाले ने भी हमें डर-डर के मिलाया होगा। हमें एक दूसरे से कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं है.....ये काम तो हमारी आँखें ही बखूबी कर देती हैं।’

        हमारा अनकहा प्रेम हमें महका रहा था। हम उस अनकहे प्रेम में भी आकंठ प्रेममय थे। वो मुझसे मीलों दूर होता पर मैं खुद को उसकी बाहों में कसा पाती। उसकी प्यार भरी बातें मेरे कानों में बांसुरी सी बजतीं रहतीं। मैं फिर से महकने लगी थी। आँख मूंदकर घंटों समीर के सीने पर सिर रखे उसके बगल में लेटे रहने की कल्पना करती। वह अपने लबों से मुझे चूम डालता। मुझे अपनी साँसों में से उसकी ही खुशबु आती। मैं उसकी बाहों के सख्त घेरे में कसमसाती, प्यासी बदली की तरह तड़पती और वो अपने चुम्बनों की बरसात से मेरे रोम-रोम को सराबोर कर देता .....पर फिर भी, समीर के दूर चले जाने के भय से अपनी आँखें न खोलती। मैं उसके रंग में रंगी हुई थी और वह मेरे एक एक अंग में उतर चुका था।

        मुझे अब तुम्हारे ज़ख्मों से डर न लगता, डर लगता तो उस डोर के चिटकने से जो मुझे कस रही थी। एक तरफ थे ‘तुम’ जो मुझे बेहद प्यार करते थे और मुझे अपना जीवन बना बैठे थे.... तो दूसरी तरफ था वो समीर जिसकी ओर मैं खिंचती जा रही थी और उसे अपना जीवन बना चुकी थी। तुम मुझसे कहते-

        ‘प्रिया, मुझे प्यार करो, मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए।’

        वो कहता–

        ‘प्रिया, मैं तुम्हें जहां-भर की हँसी देना चाहता हूँ, प्यार देना चाहता हूँ, बस.. बस।’

       तुम मेरा प्यार मांग रहे थे, हालांकि पति होने के नाते उस प्यार पर तुम्हारा हक़ भी था। लेकिन वह.....वह तो बस दे रहा था, सिर्फ दे रहा था बिना किसी हक़ के....बिना किसी आस के। जब तुम उदास या परेशान होते तो मुझे टटोल-टटोल कर खोजते और जब मैं अकेली पड़ती तो आँखें बंद करके भी उसे अपने सामने ही खड़ा पाती। जब तुम मुझे छूते तो मैं कसमसा जाती। क्यों छूते हो तुम बार-बार मेरा हाथ....मुझे तुम्हारी ये छुअन समीर के पास खींच ले जाती है। जब तुम मेरी आँखों में आँखे डालकर देखते तो मेरी आँखे समीर को याद कर झुक जातीं। तुम मुझे बाहों में लेकर अपना प्रेम खोजते और मैं समीर की बाँहों में समा जाने के लिए तड़प उठती। क्या विडंबना थी कि तुम्हारी जिन बाँहों में मैं कभी प्रेम के झूले झूलती थी आज उन्ही की जकडन में घुटती जा रही थी। आँख बंद करके समीर को ही जीती। अक्सर ऐसा आभास होता कि वह पीछे से मुझे आगोश में ले रहा है किन्तु तुम्हारा स्पर्श मुझे फिर कठोर धरातल पर ले आता। रात-रात भर मेरा जिस्म तुम्हारे साथ होता पर मैं खुद को समीर के कंधे पर सर रखकर लेटा पाती। तुम्हारे हाथ मेरे शरीर पर फिर रहे होते पर मेरी आत्मा समीर से लिपट-लिपटकर प्यार करती। मैं प्रेम के इस लेन-देन में बँटती जा रही थी। तुमसे मिली किरचन उसे दे आती और उससे मिला जीवन तुम्हें सौंप देती। तुम खुद को ज़िंदा रखने के लिए मुझे प्यार किये जा रहे थे.... और वह मुझे प्यार कर-करके जियाए जा रहा था। तुम्हें देते-देते जब मैं खुद में रीत जाती तब वह अपने एक स्पर्श से मुझे सराबोर कर देता।

       एक शाम मैंने उससे पूछा-

        ‘समीर, क्या तुम्हें कभी कोई चोट नहीं लगती, दर्द नहीं होता? तुम हमेशा हँस कैसे लेते हो?’

        उसने इस पर हँसते हुए मेरे गाल पर एक प्यारी-सी चपत लगाई और अगले ही पल बड़ी संजीदगी से मेरी आँखों में आखें डाल कर बोला-

        ‘होता है न प्रिया, मुझे भी दर्द होता है, मुझे भी चोट लगती है। पर मैं किसी को भी अपने ज़ख्म दिखा कर दुखी नहीं करना चाहता।’

        मैं पहली बार उसकी आखों में उतरते दर्द को देख भीतर तक सहम गयी। मुझे ऐसा लगा कि मेरे भीतर उसके दर्द को समेट लेने का साहस ही नहीं है। वह अपनी सारी चोटें मेरी झोली में डालना चाहता है और मैं उन्हें संभालने में असमर्थ और असहाय हूँ। इस समय मैं खुद को तुम्हारी जगह खड़ा महसूस कर रही थी। जिस तरह तुम मेरे ज़ख्मों के बोझ को न संभाल पाते थे उसी तरह इस वक्त मैं उसकी चोटों से भागना चाह रही थी। जिस प्रकार अपने ज़ख्मों से आजिज तुम मेरे दर्द से कतराते थे उसी प्रकार अपने ज़ख्मों के निशानों से आजिज मैं समीर की चोटों से भाग रही थी। क्या आश्चर्य था कि बड़े जतन से मैं तुम्हारे ज़ख्मों को भरती आई थी और समीर मेरे दर्द को सहलाता आया था .....लेकिन जब वही समीर आज मेरे आगे अपनी चोटों को रख रहा था तो मैं उन्हें सहलाने की बजाय उनसे भाग रही थी। हर ओर हमारा प्यार बिखरा पड़ा था और वहीँ बिखरे पड़े हमारे ज़ख्म भी तड़प रहे थे। हम सब अपने-अपने हिस्से के ज़ख्मों को एक-दूसरे के प्यार से पाटना चाहते थे...... प्यार को पाना चाहते थे, पर एक दूसरे के दर्द से भाग रहे थे, चोटों को देख आखें मूँद ले रहे थे। धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि इन दोहरे रिश्तों को जीते जीते मैं भी दो टुकड़ों में बँटती जा रही हूँ। दिन पर दिन यह डोर मुझे और कसती जा रही है। और...और....और......आज मैं बहुत घुटन महसूस कर रही हूँ और किसी एक सिरे को पूरी तरह से झटक देना चाहती हूँ। मुझे पता है कि मेरी एक झटकन मुझे ही ज़ख्म दे जाएगी। एक पूरा का पूरा जीवन.....पूरा का पूरा रिश्ता बिखेर कर रख जाएगी। पर मैं घुटती ही जा रही हूँ। लेकिन यह डोर है कि कसती ही जा रही है और घुटतीं जा रहीं हैं मेरी साँसें। तुम्हारे पास आती तो समीर मुझे बेईंतिहाँ अपनी ओर खींचता और समीर के पास जाती तो तुम्हारी डोर मेरे पैरों की जकड़न बढ़ा देती। एक तरफ तो मेरा जीवन तुमसे इस कदर जुड़ गया है कि हमारे अलग होने की सच्चाई को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा तो दूसरी तरफ मेरा मन समीर के प्रेम में इस क़दर सराबोर है कि उससे उबरना ही नहीं चाह रहा है। पर मेरे लिए ऐसे जीना अब दुश्वार हो रहा है। सच्चाई यही है कि समीर का साथ मैं कभी पा नहीं सकती और तुम्हारे साथ अब मैं जी नहीं सकती। समीर के जीवन में उसकी पत्नी है, बच्ची है। मेरे जीवन में तुम हो। हम सामाजिक तौर पर अपने-अपने रिश्तों से जुड़े हैं। मेरे ओर समीर के रिश्ते को समझने के लिए किसी के पास न तो समझ है, न जज़्बा और न ही समय। मैं उस दोराहे पर हूँ जहां से कोई भी मंजिल नज़र न आती है।

        ‘समीर, ये कौन सी राह है जिस पर हम हाथ थामे बढे चले जा रहे हैं?’

        ‘मुझे नहीं पता प्रिया।’


        ‘समीर तुम मुझे पहले ही अपना बना लेते, कहाँ थे अब तक?’


        ‘यही सब तो डेस्टनी है प्रिया, हमारे हाथ में कहाँ है कुछ!’


        ‘समीर हमारे इस रिश्ते का अंजाम क्या होगा?’


        ‘प्रिया, मत करो इतने सवाल मुझसे, मैं नहीं जानता कल क्या होगा ...पर जो भी होगा ठीक ही होगा।’


        वो तड़प उठा और मैं समझ गई कि रिश्तों की यह रस्साकसी सिर्फ मुझे ही नहीं कस रही बल्कि वो भी रिश्तों के इस दोहरे खिंचाव में कसता जा रहा है। रिश्तों की इस जकड़न से निकलने का कोई रास्ता सूझ ही न रहा है। जिसके साथ जी रही हूँ, वो मेरा जीवन नहीं और जिसके साथ जीना चाहती हूँ, उसके जीवन में कोई और है। अजीब कशमकश है। कल तक जो एहसास रिश्तों में प्रेम की अनुभूति करा रहे थे, अब वे विकृत होकर छल का आभास दे रहे हैं और अपराधबोध बढ़ा रहे हैं। मन-मस्तिष्क मथता जा रहा है। आज मुझे निर्णय करना ही होगा कि मैं किस ओर जाना चाहती हूँ। हमें रिश्तों की इस रस्साकसी से बाहर निकलना ही होगा। अचानक मैंने अपनी डोर के दोनों सिरों को तेज़ी से झटक दिया और स्वयं को दोनों रिश्तों से मुक्त कर लिया।.......पर क्या खुद को रिश्तों से मुक्त करना इतना आसान है?.......खासकर तब जब हमने जिए हों वो रिश्ते......पूरे मन से...। जितनी बेरुखी से मैंने तुम्हे खुद से अलग कर दिया उतनी ही बेदर्दी से खुद को समीर से भी जुदा कर दिया। जिस तरह मेरे बिना तुम्हारा जीना दुश्वार है उसी तरह समीर के बिना मेरा साँसें लेना कौन सा आसान है। अब मैं सांस तो ले पा रही हूँ किन्तु ज़बरदस्त घुटन बाकी है। मेरा दिल तो धड़क रहा है परन्तु दिल के ये रिश्ते, दिल के ही किसी कोने में जब्त हो चुके हैं ..... कहीं कोने में घायल पड़े ये रिश्ते, किसी ज़ख्म की भाँति कराह रहे हैं। अब ये ज़ख्म कभी भी न भर पाएंगे ....


डॉ . रश्मि , 'कबीर काव्य का भाषा शास्त्रीय अध्ययन' विषय में पी-एच .डी . हैं . लेखन व शिक्षण से जुड़ी वो अमर उजाला, दैनिक भास्कर, कादम्बिनी, पाखी, हंस, दैनिक ट्रिब्यून आदि सभी के साथ लघुकथाओं, कविताओं व पुस्तक समीक्षा के लिए सम्बध्ह हैं
संपर्क dr.rashmi00@gmail.com

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कहानी: दोपहर की धूप - दीप्ति दुबे | Kahani : Dopahar ki dhoop - Dipti Dubey

अरे! देखिए वो यहाँ तक कैसे पहुंच गई... उसने जल्दबाज़ी में बाथरूम का नल बंद कि…

जनता ने चरस पी हुई है – अभिसार शर्मा | Abhisar Sharma Blog #Natstitute

क्या लगता है आपको ? कि देश की जनता चरस पीए हुए है ? कि आप जो कहें वो सर्व…

मुसलमान - मीडिया का नया बकरा ― अभिसार शर्मा #AbhisarSharma

अभिसार शर्मा का व्यंग्य मुसलमान - मीडिया का नया बकरा …

गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvellous Poems

गुलज़ार की 10 बेहतरीन कविताएं! जन्मदिन मनाइए: पढ़िए नज़्म छनकती है...  गीतका…

मन्नू भंडारी: कहानी - अकेली Manu Bhandari - Hindi Kahani - Akeli

अकेली (कहानी) ~ मन्नू भंडारी सोमा बुआ बुढ़िया है।  …

कहानी "आवारा कुत्ते" - सुमन सारस्वत

रेवती ने जबरदस्ती आंखें खोलीं। वह और सोना चाहती थी। परंतु वॉर्ड के बाहर…

चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

शहर छूटा, लेकिन वो गलियां नहीं! — गीताश्री आखिर बाईजी का नाच शुर…

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani

premchand ki kahani  प्रेमचंद के फटे जूते premchand ki kahani — …

अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika …

कायरता मेरी बिरादरी के कुछ पत्रकारों की — अभिसार @abhisar_sharma

मैं सोचता हूँ के मोदीजी जब 5, 10 या 15 साल बाद देश के प्रधानमंत्री नहीं …

साल दर साल

एक साल से पढ़ी जाती हैं

कहानी "आवारा कुत्ते" - सुमन सारस्वत

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चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

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प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani

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हिंदी कहानी : उदय प्रकाश — तिरिछ | uday prakash poetry and stories

उदय प्रकाश की कहानी  तिरिछ  तिरिछ में उदय प्रकाश अपने नायक से कहल…

मन्नू भंडारी: कहानी - अकेली Manu Bhandari - Hindi Kahani - Akeli

अकेली (कहानी) ~ मन्नू भंडारी सोमा बुआ बुढ़िया है।  …

हिन्दी सिनेमा की भाषा - सुनील मिश्र

आलोचनात्मक ढंग से चर्चा में आयी अनुराग कश्यप की दो भागों में पूरी हुई फिल…

गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvellous Poems

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अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

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महादेवी वर्मा की कहानी बिबिया Mahadevi Verma Stories list in Hindi BIBIYA

बिबिया —  महादेवी वर्मा की कहानी  mahadevi verma stories list in hind…