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होरी आत्महत्या करना चाहता है - प्रेम भरद्वाज | Prem Bhardwaj on India & Suicides

मई 3, 2015

सुंदर सिर्फ बगीचा नहीं, संसार भी होना चाहिए

प्रेम भरद्वाज 

आओ कि आत्महत्या करें!
  
लाश वह चीज है जो संघर्ष के बाद बच रहती है उसमें सहेजी हुई रहती है: एक पिचकी थाली
एक चीकट कंघी और देह के अंदर की टूट
सिर्फ एक चीख बाहर आती है जो कि दरअसल
एक अंदरूनी मामला है और अभी शोध् का विषय है...

"रघुवीर सहाय"


देश का सबसे बड़ा सम्मान ‘भारत रत्न’ तब दिया जाता है, जब वह विभूति मर चुकी होती है या जिंदा रहने की तमाम जुंबिशों से जुदा हो गई होती है। 

वक्त का चमगादड़ हमारे भीतर उलटा लटका हुआ है और हम अंधेरे-उजाले में फर्क करना भूल गए है। अच्छे-बुरे के मिटते अंतर के इस दौर में हत्या और आत्महत्या के बीच भी दूरी लगातार घटती जा रही है। संवेदना और सत्ता की दूरी इस बार हमने कदमों से नापी जो महज 12 कदम थी। यह फासला दिल और दिमाग के बीच का भी है जो इससे भी कम डेढ़ बित्ता है। जिंदगी जब नाटक लगने लगे और नाटक को जिंदगी साबित किया जा रहा हो तब वही होता है जो राजधनी दिल्ली में हुआ। एक दरख्त था। जिस पर किसान ने लटककर फांसी लगा ली। एक मंच था। जहां पर किसानों के दुःख-दर्द को लेकर भाषण चल रहा था। मीडिया था जो किसान को आत्महत्या करते हुए टी.वी. चैनल्स पर लाइव दिखा रहा था। भीड़ थी जो खुद को किसानों का हमदर्द मानकर वहां इकट्ठा हुई थी। किसान का मरना लोगों के लिए रोमांच, मीडिया के लिए ब्रेकिंग न्यूज और सियासत के लिए बहस का विषय बन गया।



ईश्वर करे कोई लेखक न बने - प्रेम भारद्वाज | Prem Bhardwaj's Editorial

उसी भीड़ में एक ‘भावुक’ टाइप का आदमी भी था। उसके झोले में किताब थी। प्रेमचंद का उपन्यास ‘गोदान’। किताब के पन्नों से वह बाहर आ गया। वह प्रेमचंद को ढूंढ़ रहा था, यह पूछने के लिए, ‘यह कैसी हुकूमत है, कैसा वक्त, कि मर रहे आदमी को नहीं बचाया जा रहा। उसे मरने दिया जाता है। आज के किसानों का दर्द तो हमसे भी ज्यादा बड़ा है। लिखो इनका दर्द।’ होरी परेशान था। प्रेमचंद मिल नहीं रहे थे। लेखक मर जाते हैं। पात्र जिंदा रहते हैं। वे पन्नों से बाहर निकलते हैं। बैचेन होते हैं। बदलते वक्त को महसूसते हैं और फिर अपने रचनाकार को ढूंढ़ते हैं। ठीक उसी तरह जैसे बच्चा घायल, भूखा, बीमार होने पर मां की गोद ढूंढ़ता है, जो दुनिया की अंतिम सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद पनाहगाह है? मोहब्बत बहुत कुछ होती होगी। लेकिन सबसे पहले वह मरहम होती है। यह दीगर बात है कि अक्सर जख्म का सबब भी यही मोहब्बत बनती है।

इससे पहले कि हत्या, आत्महत्या, किसान, सत्ता और इस देश में भावुक लोगों की बातें की जाएं, जरा ठहरकर बेगम अख्तर की गाई गजल की उन दो पंक्तियों को याद कर लीजिए। जब बेगम अख्तर की आवाज फिजा में रस घोल रही थी, ‘हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब/ आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया।’ उसी वक्त किसान बरसात से आजिज आकर आत्महत्या कर रहे थे। साहेबान, आप सही समझ रहे हैं। मैं बेवक्ती, बेतुकी और सिरफिरी बातें कर रहा हूं। जैसे वैशाख-जेठ के महीने में सावन-भादो। शरद पूर्णिमा की रात में लू की मार। प्रेम पथ पर चलते हुए सहसा विछोह का विस्फोट। बचपन के मासूम कंधों पर बुढ़ापे की सी बुजुर्गयत का बोझ। कुंवारे सपने का बलात्कार। और सियासत के गलियारे में संवेदना के फूल।

बचे हुए लोगों में अभी भी कुछ बचे हुए हैं जो कुछ बातों पर हैरान हो जाते हैं। जरा हाल की घटना पर नजर डालिए और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए प्लीज पाजिटिव सोचिए। मई मतलब मजदूर दिवस। ताप के प्रखर दिन। इसी मई में हाशिमपुरा दंगे में 42 मुसलमानों को पुलिस ने मारकर उनकी लाशों को बहा दिया था। ढाई दशक बाद अभी अदालत का फैसला आया है। हत्यारों को बरी कर दिया गया। बेमौसम बरसात से आहत किसानों ने हताशा में आत्महत्या की। यमन में अमन की लाशें बिछती है। कश्मीर में ‘मसर्रत’ मातमी सन्नाटों की वजह बन जाता है। उत्तराखंड में खनन माफिया के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर हमले होते हैं। देश का सबसे बड़ा सम्मान ‘भारत रत्न’ तब दिया जाता है, जब वह विभूति मर चुकी होती है या जिंदा रहने की तमाम जुंबिशों से जुदा हो गई होती है। जिस देश में हर 40 घंटे पर एक किसान खुदकुशी करता है। मुआवजे के तौर पर उसे 72 रुपए का चेक मिलता हो और यह सब देखते हुए एक प्रलयंकारी भूकंप आ जाए। ऐसे माहौल में अगर आप अपने शहर के सबसे बड़े बंगले के सुंदर पौधें-फूलों को पानी डालते, उन्हें देखते खुशी से मुस्कुरा सकते हैं तो आपको ऐसा करना ही चाहिए। आप दलील दे सकते हैं कि खूबसूरती किसे अच्छी नहीं लगती। बेशक! मगर सुंदर सिर्फ बगीचा नहीं, संसार भी होना चाहिए। खिलखिलाहट केवल फूलों में ही नहीं, उससे ज्यादा जीवन में होनी चाहिए। लेकिन ऐसा है नहीं।

मौजूदा वक्त में सब कुछ बेवक्त है। वर्तमान भविष्य की नोक पर है और भविष्य भावनाओं को रौंद रहा है। अच्छाइयां आकर्षित नहीं करतीं। वे बहुत जल्द ऊबाती है। हम छुपम-छुपाई खेलना चाहते है। लेकिन छिपने की जगह ही गायब हो गई है। कोई भी छिपकर नहीं रहना चाहता। खुद को प्रकट करने की प्रचंड इच्छा को बेखुदी कहना मुनासिब नहीं। सबसे काल्पनिक बच्चे होते हैं। अब तो बच्चों में भी बड़ा मुश्किल से बचपन मिलता है।

जो लोग मुगालते में है कि लोगों के मूल्य बड़ी तेजी के साथ बदल रहे हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि हमारा नहीं, समय का मूल्य बदल गया है। मृत्यु, संवेदना और सियासत सब एक डोंगी पर सवार है। हत्याओं का हाहाकार और लाशों के स्पर्श से सियासत अपनी पूरी रौ में आ जाती है। दुनिया के अधीकतर  नगर नदियों के किनारे बसे हैं। लेकिन सियासत के महल हमेशा से ही रक्त-नहर के किनारे बसते रहे हैं। उजड़ते रहे हैं। इन महलों में ईंटें कम मजलूमों की चीखें ज्यादा हैं। अब न राजा है, न राजमहल। प्रजा है। उसकी पीड़ा है। चीत्कारें अब भी हैं। सुनने वाला कोई नहीं है। बेदिल सत्ता तो दिनोंदिन बहरी होती जा रही है। अजीब बात है कि सियासत को साजिशों के खिलाफ सरगोशियां तो सुनाई देती हैं, दर्दमंदों की चीख-पुकार नहीं?

होरी परेशान है। वह किताब के पन्नों से बाहर आकर अपने जन्मदाता प्रेमचंद को ढूंढ़ रहा है। वह वर्तमान में लगातार किसानों की दुर्दशा, उनको आत्महत्या करते देख बहुत दुखी है। भावावेग में। आप मान सकते हैं, वह अपना विवेक खो चुका है। होरी आत्महत्या करना चाहता है। इसके लिए उसको प्रेमचंद की दरकार है। क्योंकि वह व्यक्ति नहीं, पात्र है। प्रेमचंद किसान को बेबस तो दिखा सकते हैं, मगर उसे आत्महत्या करते नहीं। आत्महत्या कायरता है। पलायन हैं जीवन से। न पात्र जिंदगी होते हैं, न उनका जिया हुआ ययार्थ सच होता है, अगर ऐसा होता तो ‘ओल्ड मैन एंड द सी’ के बूढ़े मछुआरे की उत्कट जिजीविषा को गढ़ने-रचने वाले हेमिंग्वे अपने सिर में गोली मारकर खुदकुशी क्यों करते? क्रांति के गीत गाने वाले गोरख पांडेय फांसी पर क्यों झूल जाते। वाल्टर बेन्यामिन से लेकर वान गाँग तक क्यों आत्महत्या का रास्ता चुनते।

बात बेशक आपको सहन नहीं होगी। लेकिन हमारी हत्या हो जाए इससे पहले हमें खुद को खत्म कर लेना चाहिए? चंद्रशेखर भी तो हत्या से बचने के लिए आत्महत्या का मार्ग चुनते हैं। असहमति की पूरी गुंजाइश है। मगर मामला यही है कि दूसरों के हाथों यातनापूर्वक मरने से बेहतर है कि अपना काम खुद ही तमाम कर लिया जाए।

मेरे भीतर का गमजदा शख्स खुदकुशी करना चाहता है। लेकिन भीतर कोई और भी रहता है जो खुदकुशी को बार-बार रोकता है। शायद यह अकेले मेरे साथ ही नहीं है, इस दुनिया में बहुत से लोग होंगे जिनके भीतर कभी न कभी आत्महत्या करने का विचार आया होगा। इस देश तो क्या जीवन में भी कभी कुछ अंतिम रूप से समाप्त नहीं होता। कत्ल करने, गुनाह या कहें आत्महत्या करने के लिए भी हमारा देश बेहद मुफीद है।

मैनहट्न’ फिल्म का नायक एक सुबह सोचता है कि उसका जीवन क्या जीने के काबिल है, या उसे जीना छोड़ देना चाहिए। इसके बाद वह उन 10 चीजों की सूची बनाता है जो उसे खुशी दे सकती हैं। हम क्या उन चीजों के बारे में सोचते हैं जिनके कारण यह जीवन जीने के काबिल लगता है। कभी आप खुद सोचकर देखिए।

जीवन को लेकर हेमिंग्वे के मानक बहुत ऊंचे थे। लगातार वह बेहतर की खोज में रहे। एक साथ बहुत कुछ पा लेने की जिद। चार विवाह, बहुत से प्रेम। नाम और यश। फिर भी कुछ कमी-सी रही। पूर्णता चाहते थे। संभवत अपने मयार के मुताबिक पूर्णता को न पा सकने के कारण ही उन्होंने खुदकुशी का रास्ता चुना। उन्हें इस बात का भरम हो गया कि मृत्यु से पूर्णता को पा लेंगे। पाया या नहीं, यह सवाल उनके साथ ही चला गया। दुनिया में आत्महत्या का सिलसिला इसलिए भी बदस्तूर जारी है कि समय और जीवन तमाम परिवर्तनकारी पड़ावों-चैराहों से गुजरने के बाद भी अपने मूल में नहीं बदला है। पिछले डेढ़-दो दशकों में तो जीवन और समाज में कमीनापन बेलौस रूप से बढ़ रहा है। वे लोग जो जिंदगी में मृत्यु संवेदना को बचाए रखने की जिद पर खुद को तबाह कर रहे हैं, लहरों पर रंगते किसी मस्तूल की तरह जिंदगी से हर क्षण जंग लड़े रहे हैं, वही लोग आत्महत्या के करीब धकेल  दिए गए हैं ।

एक रंगमंच है। जो दुनिया है। जिंदगी है। समय है। इस रंगमंच के एक अंधेरे  कोने में कुछ पात्र हैं जिनके चेहरे नहीं हैं। नाम नहीं हैं। मंजिल। चिराग। हौसला भी नहीं। वे जीने के हाथों मर रहे हैं। रोज-रोज... हर रोज। वे अब सचमुच में ही मर जाना चाहते हैं। मैं खुद को भी उसी कतार में पाता हूं। सही समझा आपने। मरना चाहता हूं। वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं? वैसे भी जब मरने और जीने में ज्यादा फर्क न बचा हो, तब किसी के साथ भी हुआ जा सकता है। कबीर ने कुछ सोचकर ही तो कहा होगा, 
‘साधो  यह जग मुर्दों का गांव।’

इससे पहले कि सत्ता-व्यवस्था हमारी हत्या कर दे। हमें इस बात के लिए मजबूर कर दे कि आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा विकल्प न बचे। उन हालातों और हत्या-आत्महत्या से बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है, हम अपनी-अपनी आत्मा की खुद ही हत्या कर डालें। ये जो जमीर है, अंतःकरण है, आत्मा है, वहीं हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है जो हमारे और  सफलता के बीच दीवार बना है। वह हमें वैचारिक, नैतिक, चरित्रावान, सैधानतिक और संवेदनशील बनाए रखता है, जिसका आज के जमाने में कोई मतलब नहीं रह गया है। जिस तरह से चवन्नी, तार और मनआर्डर और को बंद कर दिया गया, उसी तरह से इन चीजों को भी भीतर से निकालकर किसी संग्रहालय में रख देना चाहिए या उस जमीन में दफ्न  कर देना होगा जहां हम अपनी कामयाबी की गगनचुंबी इमारत बनाने वाले हैं ।

सच तो यह है कि मैं भी दुनिया में जीने आया हूं। जिंदगी को शिद्दत के साथ जीना चाहता हूं। लेकिन मेरा ‘जीना’ जिंदगी की चैहद्दी से बाहर चला गया है।

मैं आत्महत्या को जायज नहीं मानता। माना भी नहीं जा सकता। लेकिन इसका क्या किया जाए कि लगातार आत्महत्या के हालात बनते जा रहे हैं। बादल सरकार के नाटक ‘बाकी इतिहास’ में एक पात्र का प्रश्न अनुत्तरित है, ‘मेरे आत्मदाह के कारण खोजने वाले अपने आपसे पूछें कि आप आत्महत्या क्यों नहीं कर रहे।

और अंत में फिर रघुवीर सहाय की पंक्तियां:

   मैं क्या कर रहा था जब मैं मरा
   मुझसे ज्यादा तो तुम जानते लगते हो
   तुमने लिखा मैंने कहा था स्वाधिनता
   शायद मैंने कहा था बचाओ
   अब मैं मर चुका हूं
   मुझे याद नहीं कि मैंने क्या कहा था
   जब एक महान संकट से गुजर रहे हों
   पढ़े-लिखे जीवित लोग
   एक अधमरी  अपढ़ जाति के संकट को दिशा देते हुए
   तब आप समझ सकते हैं कि एक मरे हुए आदमी को
   मसखरी कितनी पसंद है
   पर तब मैं पूछूगा नहीं कि सौ मोटी गर्दनें झुकी हैं
   बुद्धि  के बोझ से
   श्रीदा  से
   कि लज्जा से... 
'पाखी' मई -2015 में प्रकाशित 
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