विनोद भारदवाज संस्मरणनामा - 8 : धर्मवीर भारती | Vinod Bhardwaj on Dharmvir Bharti


धर्मवीर भारती - विनोद भारदवाज संस्मरणनामा  

#संस्मरणनामा जैसा प्रत्याशित था, खूब पढ़ा जा रहा है... विनोद जी से मैं तो कह ही रहा हूँ आप-सब भी कहें कि और संस्मरण लिखें ताकि जिंदा भाषा में [उदा० एस.पी. (सिंह) अपने खास अंदाज़ में चिल्लाया, रज़िया (#विनोद_भारद्वाज) फंस गयी गुंडों (#धर्मवीर_भारती) में] बेलौस-संस्मरण पढ़ने को मिलते रहें ... 

भरत  तिवारी
विनोद भारदवाज संस्मरणनामा - 8 : धर्मवीर भारती| Vinod Bhardwaj on Dharmvir Bharti

लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों, फिल्मकारों की दुर्लभ स्मृतियाँ

संस्मरण 8

कवि, उपन्यासकार, फिल्म और कला समीक्षक विनोद भारदवाज> का जन्म लखनऊ में हुआ था और टाइम्स ऑफ़ इंडिया की नौकरी क़े सिलसिले में तत्कालीन बॉम्बे में एक साल ट्रेनिंग क़े बाद उन्होंने दिल्ली में दिनमान और नवभारत टाइम्स में करीब 25 साल नौकरी की और अब दिल्ली में ही फ्रीलांसिंग करते हैं.कला की दुनिया पर उनका बहुचर्चित उपन्यास सेप्पुकु वाणी प्रकाशन से आया था जिसका अंग्रेजी अनुवाद हाल में हार्परकॉलिंस ने प्रकाशित किया है.इस उपन्यास त्रयी का दूसरा हिस्सा सच्चा झूठ भी वाणी से छपने की बाद हार्परकॉलिंस से ही अंग्रेजी में आ रहा है.इस त्रयी क़े  तीसरे उपन्यास एक सेक्स मरीज़ का रोगनामचा को वे आजकल लिख रहे हैं.जलता मकान और होशियारपुर इन दो कविता संग्रहों क़े अलावा उनका एक कहानी संग्रह चितेरी और कला और सिनेमा पर कई किताबें छप चुकी हैं.कविता का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार क़े अलावा आपको संस्कृति सम्मान भी मिल चुका है.वे हिंदी क़े अकेले फिल्म समीक्षक हैं जो किसी अंतर्राष्ट्रीय फिल्म जूरी में बुलाये गए.1989 में उन्हें रूस क़े लेनिनग्राद फिल्म समारोह की जूरी में चुना गया था. संस्मरणनामा में विनोद भारद्धाज चर्चित लेखकों,कलाकारों,फिल्मकारों और पत्रकारों क़े संस्मरण एक खास सिनेमाई शैली में लिख रहे हैं.इस शैली में किसी को भी उसके सम्पूर्ण जीवन और कृतित्व को ध्यान में रख कर नहीं याद किया गया है.कुछ बातें,कुछ यादें,कुछ फ्लैशबैक,कुछ रोचक प्रसंग.

संपर्क:
एफ 16 ,प्रेस एन्क्लेव ,साकेत नई दिल्ली 110017
ईमेल:bhardwajvinodk@gmail.com
विनोद भारदवाज संस्मरणनामा - 8 : धर्मवीर भारती| Vinod Bhardwaj on Dharmvir Bharti

धर्मवीर भारती धर्मयुग के ताकतवर संपादक थे. मैनेजमेंट उनसे घबराता था, स्टाफ उनसे डरता था. 1973 की पहली जनवरी को मैंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ट्रेनिंग स्कीम में अपनी नौकरी शुरू की. मैं मनोविज्ञान में एम.ए. करने के दौरान रघुवीर सहाय के कहने पर दिनमान में लिखता था.वे मुझे स्टाफ में लेना चाहते थे पर मैनेजमेंट में उनकी कम सुनी जाती थी, आखिर दिनमान, धर्मयुग की तरह कमाऊ पूत नहीं था. वे बोले, ट्रेनिंग स्कीम ज्वाइन कर लीजिये, मैं आपको अपने यहाँ बुला लूंगा. वे दिल्ली के ट्रेनिंग इंटरव्यूज में शामिल भी नहीं होते थे, लेकिन 1972 में मेरी वजह से वे इंटरव्यू में बैठे और उनकी कहानी रास्ता इधर से है इसी दिलचस्प अनुभव पर आधारित है. मुंबई के अंतिम इंटरव्यू में धर्मवीर भारती ने मुझसे एक ही सवाल पूछा, आप किसी खास जगह के लिए तो नहीं इंटरव्यू दे रहे हैं? मैंने कहा, मैं कहीं भी काम करने के लिए तैयार हूँ. यह न कहता, तो नौकरी नहीं मिलती. रवीन्द्र कालिया की धर्मयुग के खराब अनुभवों पर आधारित कहानी काला रजिस्टर उन दिनों चर्चित थी. नंदनजी बड़ी मुश्किल से दिल्ली ट्रांसफर करा पाये थे. भारती के कमरे में जाने की बात से ही स्टाफ के सदस्य डर जाते थे. सिगार की गंध से भरे उस कमरे में बेचारा ट्रेनी तो जा भी नहीं पाता था. मुझे भारती ने स्टाफ की कमी की बात कर के बीच ट्रेनिंग लेक्चर्स से ही बुला लिया. मुझे ऑफिस का सबसे रद्दी काम बिना पूछे दे दिया गया. मैंने चपरासी से भारती से मिलने की बात की तो उसने कहा वे ट्रेनी से कभी नहीं मिलते. मैंने लिखित नोट अंदर भिजवाया और भारती से कहा यह काम मेरी पसंद का नहीं है. वे बोले, इतने लोकप्रिय साप्ताहिक में ये क्या कूड़ा कचरा छपता है? मैंने कहा, यह बस मेरी पसंद का नहीं है. सबने कहा, भारती तुम्हारी नौकरी ले लेंगे. मैंने अगले दिन बीमारी की छुट्टी ले ली. कमलेश्वर भी तब मुंबई में ही थे,सारिका के संपादक. वे दिल्ली को अफ़ीमचियों का कुआँ कहते थे. भारती उन दिनों इलस्ट्रेटेड वीकली के संपादक खुशवंत सिंह से भी ज्यादा ताकतवर थे, क्रिकेट विशेषांक खूब बिकते थे. उदयन शर्मा को मेरी जगह बुला लिया गया, मैंने सोचा मैं बच गया गया. एक दिन एस. पी. सिंह और उदयन से विदा ले कर लिफ्ट की ओर जा रहा था कि भारती भी कमरे से निकल कर लिफ्ट की ओर बढे. एस.पी. अपने खास अंदाज़ में चिल्लाया, रज़िया फंस गयी गुंडों में. मैंने भारती को नमस्कार किया,वे प्यार से बोले स्वास्थय अब ठीक है न? अगले दिन मैं वापस धर्मयुग में था, इस बार काम मेरी पसंद का था. फिल्म समीक्षा, आधुनिक विचार आदि. फिर भी सबसे बोर लेकिन लोकप्रिय कॉलम साप्तहिक भविष्य का अनुवाद ट्रेनी को ही करना पड़ता था. एक साल मैंने धर्मयुग में बिताया, बड़ी मुश्किल से साल के आखिर में दिनमान में ट्रांसफर के आर्डर मिले. तब तक मैं भारती का प्रिय हो गया था, बाद में उन्होंने मेरी कवितायेँ भी छापीं. मेरी लोटे पर लिखी कविता उन्हें बहुत पसंद थी. 1980 में साहित्य एकेडेमी की ट्रेवल ग्रांट में पत्नी के साथ घूमते हुए गोवा से मुंबई आया, तो एक शाम भारती के घर मुझे स्कॉच पीने का भी सौभाग्य मिला.बरसों बाद उनके जन्मदिन, 26 दिसम्बर के दिन कुंवर नारायण, भारती, सुरेन्द्र तिवारी, सुनीता बुद्धिराजा, देवप्रिया के साथ वृन्दावन की यात्रा का भी मौका मिला. कभी देशान्तर के भारती के अनुवादों से विश्व कविता से मेरा पहला परिचय हुआ था. सूरज का सातवां घोडा भी मुझे पसंद है, किताब भी और श्याम बेनेगल की फिल्म भी. बीमारी ने भारती को बदल दिया था. पर काला रजिस्टर के कुछ दृश्य मैंने भी देखे थे. प्रूफ की गलतियों की एक मीटिंग में भारती की ज़बरदस्त डांट खा कर सब चुप थे. गणेश मंत्री ने साहस कर के कहा, मुझे भारतीजी इसमें कोई सेबोटाज दिख रहा है. भारती ने उन्हें लगभग डाँटते हुए कहा, मंत्रीजी सेबोटाज शब्द धर्मयुग में नहीं चलेगा. स्टाफ के सबसे गंभीर सदस्य मंत्रीजी चुप हो कर बैठ गए.
००००००००००००००००

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
जयश्री रॉय और प्रमोद राय को 'राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान' 2020-21
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
हिन्दी कहानी 'अज़ाब' - विजयश्री तनवीर | Vijayshree Tanveer - Hindi Story - Azab
गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvelous Poems
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
परिन्दों का लौटना: उर्मिला शिरीष की भावुक प्रेम कहानी 2025
कहानी कैसे लिखें — कहानी के तत्व — रोहिणी अग्रवाल
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani