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रवीन्द्र कालिया, क्या - क्या याद करूँ - उमेश चौहान

जन॰ 19, 2016

रवीन्द्र कालिया, क्या - क्या याद करूँ - उमेश चौहान #शब्दांकन

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क्या - क्या याद करूँ
उमेश चौहान

सहसा यह विश्वास ही नहीं हो रहा कि कहानी व उपन्यास लेखन की दुनिया के साठोत्तरी पीढ़ी के प्रकाश - स्तम्भ, श्रेष्ठ संपादक, नए रचनाकारों के लिए अप्रतिम प्रेरणा - स्रोत, दोस्तों के लिए जान छिड़कने वाले, विनोदी स्वभाव के बल पर रोते हुए को भी हँसा देने वाले, हर समय, हर महफ़िल में जीवंतता से भरे नज़र आने वाले और भी न जाने क्या - क्या, मेरे परम प्रिय लेखक व सम्मानित मित्र रवीन्द्र कालिया अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन इस दुखद सचाई को झुठलाया भी नहीं जा सकता कि हमें अब उनकी स्मृतियों के साथ ही जीना होगा। उनसे मिलना, उनके साथ कुछ देर भी बातचीत करना मन को तरोताजा कर देता था। लगभग दो साल पहले जब वे गंभीर रूप से बीमार थे, तब भी वे विनोद व रस से भरे ही नज़र आते थे। मैं जब भी उनसे मिलता था तो बातचीत का दायरा बहुत फैला हुआ होता था। कभी मुंबई व धर्मयुग के ज़माने की बातें होतीं, कभी इलाहाबाद या कोलकाता की। कभी ज्ञानपीठ की अंदरूनी बातें, कभी साहित्यिक दुनिया की उठापठक की बातें, कभी अखिलेश, विभूति नारायण राय जैसे अंतरंग मित्रों की बातें, कभी पुरस्कारों की मारामारी की बातें। कभी - कभी सरकार की कार्य - प्रणाली की, नज़दीकी राजनेताओं की बातें भी होती। हाँ, राजेन्द्र यादव जी की तरह का स्त्री विमर्श कभी नहीं होता था। कालिया जी के पास मैंने अक्सर युवा पीढ़ी के अनेक लेखकों व कवियों को आते - जाते व आत्मीयता से बतियाते देखा था। वे उन्हें हमेशा प्रोत्साहित करते रहते थे और पत्रिका व पुस्तक - प्रकाशन दोनों ही मामलों में उन्हें खूब स्पेस देते थे।

मैं वर्ष 2003 में पहरी बार सरकारी तैनाती पर दिल्ली आया। धीरे - धीरे यहाँ की साहित्यिक दुनिया के लोगों से मेल - मुलाकातें बढ़ीं। राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, महेश दर्पण आदि से पहले की नजदीकियाँ थीं। चित्रा मुद्गल रिश्तेदार ही थीं और अवध जी केरल - भ्रमण के समय मेरे घर भी पधार चुके थे। इसलिए मेरे लिए दिल्ली के साहित्यिक समाज से जुड़ना कोई कठिन काम नहीं था। दायरा क्रमश: बड़ा होता गया। कभी दरियागंज में राजेन्द्र यादव जी के दफ़्तर में महफ़िल जुट जाती थी, कभी ललवानी जी के घर पर, कभी शिवनारायण सिंह ‘अनिवेद’ के घर पर, कभी इंडिया इंटरनेशल सेन्टर में। उसी बीच रवीन्द्र कालिया जी भी दिल्ली आ गए थे। लेकिन मेरी उनसे मुलाकात होने में वक्त लगा। मुझे स्मरण है कि मैं पहली बार उनसे घर लखनऊ से आए कथाकार मित्र अखिलेश के साथ गया था। कालिया जी के जीवन्त स्वभाव का और ममता जी की स्नेहमयी मेहमाननवाज़ी के प्रति कायल होने के लिए वह एक मुलाकात काफी थी। उसके बाद तो उनसे मिलने का कोई मौका मैं छोड़ता ही नहीं था। लंच के समय अपने ऑफिस से निकलकर मैं प्राय: उनसे मिलने भारतीय ज्ञानपीठ के दफ़्तर में पहुँच जाया करता था। उनके मिलनसार व्यक्तित्व की सबसे बड़ी निशानी यह थी कि वे मेरे पहुँचते ही अपना सारा काम बंद करके स्टॉफ के लोगों को लंच के बाद आने के लिए कहकर अपने कक्ष से विदा कर देते थे और फिर आराम से बैठकर बातें करते थे। उनके साथ ऐसी मुलाकातों में चाय या काफी की चुस्कियों पर बिताया गया एक - एक लम्हा मुझे लंबे समय तक याद आता रहेगा। कालिया जी से जुड़े रोचक प्रसंगों को याद करूँ तो पूरी किताब ही बन जायगी। उनकी यादें नित्य तरोताजा रखने वाले तमाम मजेदार वाकये हैं। कुछ सार्वजनिक किए जाने लायक हैं, कुछ नितान्त निजी श्रेणी के।

भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक के तौर पर उनकी प्रशासनिक व आयोजन - क्षमता से कौन प्रभावित नहीं हुआ होगा? उन्होंने कुछ ही वर्षों में ज्ञानपीठ पुरस्कारों का सारा बैकलॉग दूर कर दिया। पुरस्कारों के कार्यक्रम संबन्धित भाषायी क्षेत्रों में आयोजित कराकर उन्होंने ज्ञानपीठ को लोकप्रिय बनाने का अद्भुत कार्य किया। मुझे याद है कि जब वर्ष 2010 में मलयालम के कवि श्री ओ. एन. वी. कुरुप्प को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का निर्णय हुआ तब मैं दिल्ली में केरल सरकार के रेजीडेन्ट कमिश्नर के पद पर तैनात था। कालिया जी का मेरे पास फोन आया। बोले, "कुरुप्प जी की इच्छा है कि उन्हें यह पुरस्कार प्रधानमंत्री जी के हाथों उनके अपने लोगों के बीच ही मिले और इसके लिए प्रधानमंत्री को केरल आमंत्रित किया जाय।" उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रधानमंत्री जी को तिरुवनन्तपुरम जाकर श्री कुरुप्प को पुरस्कार देने के लिए आमंत्रित भी कर लिया है। केरल में उन दिनों वाम मोर्चे की सरकार थी और वहाँ के संस्कृति व शिक्षा मंत्री श्री एम. ए. बेबी श्री कुरुप्प को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने के अवसर को सप्ताह भर चलने वाले एक व्यापक साहित्यिक जन - अभियान के रूप में आयोजित करना चाह रहे थे। केरल के मुख्यमंत्री ने भी अपनी तरफ से उक्त कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री जी को आमंत्रित कर लिया। मैंने भी रेजीडेन्ट कमिश्नर के रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय में जरूरी पैरवी की। अंतत: प्रधानमंत्री जी का केरल जाने का कार्यक्रम निर्धारित हो गया। कालिया जी की यह भी योजना थी कि प्रधानमंत्री जी द्वारा ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने के बाद अगले ही दिन तिरुवनन्तपुरम में मलयालम के वयोवृद्ध कवि अक्कित्तम अच्युतन नम्बूदिरी जी को मूर्ति देवी पुरस्कार भी दे दिया जाय, जिसका निर्णय भारतीय ज्ञानपीठ पहले ही ले चुका था। कालिया जी की इच्छा थी कि मैं भी उनकी मदद के लिए इन मौकों पर तिरुवनन्तपुरम में मौजूद रहूँ। मैंने वैसा ही किया।

उमेश चौहान 

पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में
शिक्षा एवं अनुभव: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम. ए. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)। वर्ष 1986 से भारतीय प्रशासनिक सेवा (केरल कैडर) में कार्यरत। वर्तमान में नई दिल्ली में भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप में तैनात।

साहित्यिक गतिविधियाँ: 

विद्यार्थी - काल से ही हिन्दी तथा अवधी में लेखन। हिन्दी व मलयालम की विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं व समाचार - पत्रों में समय - समय पर कविताएँ, कहानियाँ व लेख प्रकाशित.

प्रकाशित पुस्तकें:

कविता - संग्रह: ‘गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी’ (प्रेम - गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), ‘दाना चुगते मुरगे’ - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएँ’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009), ‘जिन्हें डर नहीं लगता’ - शिल्पायन, दिल्ली (2009) एवं ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), ‘चुनी हुई कविताएँ’ - अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद (2015),

लेख - संग्रह: 'सृजन, समाज और संस्कृति' - साहित्य भंडार, इलाहाबाद (2014), 'भारत में खाद्य - सुरक्षा एवं कृषि' -  शिल्पायन, दिल्ली (2014) व ‘हिन्दी साहित्य : कुछ ताक - झाँक’ - सान्निध्य बुक्स, दिल्ली (2016)
संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013).

पुरस्कार: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट (केरल) द्वारा ‘अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009), इफ्को, नई दिल्ली द्वारा ‘राजभाषा सम्मान’ (2011), राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त मेमोरियल ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा कविता संग्रह 'जनतंत्र का अभिमन्यु' के लिए ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार’ (2014-15), रेवान्त पत्रिका, लखनऊ द्वारा ‘रेवान्त मुक्तिबोध साहित्य सम्मान 2015’ के लिए चयनित, राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उ प्र द्वारा वर्ष 2015-16 के लिए कविता संग्रह 'जनतंत्र का अभिमन्यु' के लिए 'सुब्रमह्यम भारती पुरस्कार' हेतु चयनित।

सम्पर्क:
सी - II / 195, सत्य मार्ग,
चाणक्यपुरी,
नई दिल्ली - 110021
मो. नं.: +91-8826262223
ई - मेल: umeshkschauhan@gmail.com


कालिया जी के नेतृत्व में दोनों ही कार्यक्रमों का वहाँ बड़ा सफल आयोजन हुआ। शायद यह पहला मौका था जब किसी प्रधानमंत्री ने दिल्ली से बाहर जाकर ज्ञानपीठ पुरस्कार वितरित किया था। विचारधारा के वैरुध्य के कारण अक्कित्तम जी वाले कार्यक्रम के लिए केरल सरकार की मदद शुष्क थी, यहाँ तक कि उन्होंने छपे - छपाए निमंत्रण - पत्र तक नहीं बँटवाए थे। प्रधानमंत्री जी के कार्यक्रम से निपटने बाद कालिया जी अगले दिन के कार्यक्रम की सफलता को लेकर बहुत चिन्तित दिखे। मेरा स्थानीय साहित्य - प्रेमियों से करीबी संपर्क था। हमने एस. एम. एस. पर ही उस कार्यक्रम के लिए पर्याप्त संख्या साहित्य - प्रेमी लोगों को जुटाया। श्री एम. टी. वासुदेवन नायर व ओ. एन. वी. जैसे ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेताओं की उपस्थिति ने उस कार्यक्रम को भी खूब आकर्षक बना दिया। केरल के मंत्री मुँह दिखाने के लिए आए और भाषण देकर पुरस्कार वितरण के पहले ही अन्यत्र किसी व्यवस्तता का बहाना बनाकर चलते बने। लेकिन जब कालिया जी ने ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित व आधुनिक मलयालम के महान लेखक श्री एम टी वासुदेवन नायर से अक्कित्तम जी को मूर्ति देवी पुरस्कार दिलवाने जाने की घोषणा की, तब जिस तरह से एम टी ने अक्कित्तम को अपना साहित्यिक गुरू बताते हुए, उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेते हुए उन्हें पुरस्कार प्रदान किया वह सभी के हृदय को छू गया और औरे उस सारे तनाव को भी धो गया जो केरल के मंत्री जी के व्यवहार से वहाँ पैदा हो गया था। एक दिन पहले ही ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ओ एन वी ही नहीं, वहाँ उपस्थित सारे लेखकों व कवियों का समूह उस दिन केरल की साहित्यिक व वैचारिक विविधता के बीच अन्तर्प्रवाहित होने वाली सदाशयता व समरसता के साक्षी बना।  

कालिया जी मित्रों पर जान छिड़कते थे, इसलिए उनका कोई भी मित्र उनकी किसी भी बात को कभी टाल नहीं सकता था। एक बार एक नए साहित्यिक पुरस्कार के लिए हिन्दी के एक सुपरिचित कवि का चयन हुआ। एक पुरस्कार - योजना के आयोजक एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी थे। साहित्य से उनका जुड़ाव इतना ही था कि उनके परिवार ने उनकी विदुषी स्वर्गीया माताजी के नाम पर यह पुरस्कार प्रारम्भ करने का निर्णय लिया था। वे हिन्दी साहित्य की दुनिया की खटर - पटर से अनभिज्ञ थे। उन्होंने उस कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए पूर्व नौकरशाह रहे एक बड़े नामचीन कवि को आमंत्रित कर लिया। बस फिर क्या था, कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति के विरोध में कालिया जी के कुछ नजदीकी लोगों ने तलवारें खींच लीं। स्वयं चयनित कवि ने पुरस्कार लेने के लिए आने से मना कर दिया। उस वरिष्ठ अधिकारी ने मुझे फोन किया और अनजाने में गले आ पड़ी उस मुसीबत का हल निकालने का अनुरोध किया। मैंने कालिया जी से बात की और उन्हें वस्तुस्थिति समझाई। वे तुरन्त समझ गए कि आयोजकों ने साहित्य - जगत की खेमेबाज़ी के प्रति अनभिज्ञता होने के कारण ही वह निर्णय लिया था। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि अगले दिन तक सब ठीक हो जाएगा, वे लोग कार्यक्रम की तैयारी करें। उन्होंने संबन्धित मित्रों से बात की और तनी हुई तलवारें अगले ही दिन म्यान में वापस हो गईं। उस परिवार के बदनामी से बचने और उक्त कार्यक्रम के निर्विघ्न संपन्न होने का पूरा श्रेय कालिया जी को ही था, यह रहस्य केवल कुछ ही लोगों को ज्ञात हुआ।

संपादक के तौर पर भी उनके निर्णय त्वरित और अद्भुत होते थे। एक दिन लंच के आसपास वे अपने कार्यालय में डॉ. अजय तिवारी के साथ बैठे थे। अचानक मैं भी पहुँच गया। बात चली कि ‘नया ज्ञानोदय’ का अगला अंक हिन्दी के साल भर के सर्वाधिक चर्चित उपन्यासों व कहानियों पर केन्द्रित होगा, जिसमें चयनित उपन्यासों के अंश व चयनित कहानियों के साथ - साथ उन पर एक - एक समीक्षात्मक लेख भी होगा। मैंने देखा चयनित उपन्यासों में संजीव का उपन्यास ‘रह गईं दिशाएँ इसी पार’ भी था। मेरे मुँह से निकल गया कि उस पर तो मैंने एक समीक्षात्मक कविता लिखी है। कालिया ने कहा, उसे अभी सुनाओ। मैंने वह कविता पढ़ी। उसमें उस उपन्यास की विषय - वस्तु व उसके ट्रीटमेन्ट  की तीखी आलोचना थी। कालिया ने तत्काल निर्णय लिया कि इसे हम उक्त अंक में दो पेज बढ़ाकर सेन्टर स्प्रेड करेंगे, क्योंकि यह काफी हलचल पैदा करेगी। मैं उनके इस निर्णय से खुश भी था और आश्चर्यचकित भी। डॉ. अजय तिवारी मंद - मंद मुस्करा रहे थे। मुझे एक ही बात की चिन्ता थी कि वह कविता तो मैं संजीव को पढ़वा चुका था, लेकिन ज्यादा लोगों को उसके बारे में पता नहीं था। अत: यदि वह इस तरह से हाइलाइट होकर नया ज्ञानोदय में छपेगी तो संजीव को बुरा न लगे। खैर, जब मैं वहाँ से लौट रहा था तभी कालिया जी का फोन आया और उन्होंने बताया कि सोच - विचार करने के बाद अंत में निर्णय यह हुआ है कि उक्त अंक में पहले से निर्धारित समीक्षा ही छापी जाय और मेरी समीक्षात्मक कविता को अगले अंक में प्रमुखता से छापा जाय। यह बात मुझे राहत देने वाली थी और कालिया जी की अद्भुत संपादकीय सूझबूझ व निर्णय - क्षमता की परिचायक भी।

ज्ञानपीठ के निदेशक व ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक के रूप में रवीन्द्र कालिया जी निरन्तर मुझ पर मेहरबान रहते थे। मेरी कविताओं व मलयालम से अनूदित रचनाओं को वे बीच - बीच में मँगाकर ‘नया ज्ञानोदय’ में छापते रहते थे, क्योंकि वे जानते थे कि मैं बिना माँगे अपनी रचनाएँ कहीं छपने के लिए नहीं भेजता था। कालिया जी के आग्रह पर ही मलयालम के महाकवि अक्कित्तम अच्युतन नम्बूदिरी की कविताओं का मेरा अनुवाद - संग्रह ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ से 2009 में ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएँ’ शीर्षक से छपा और उन्हीं की विशेष रुचि के कारण ही वर्ष 2012 में उसका द्वितीय पेपरबैक संस्करण भी आ गया। मेरा चौथा और अब तक का आखिरी कविता - संग्रह ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ भी वर्ष 2012 में भारतीय ज्ञानपीठ से ही छपा। स्पष्ट है कि उनका इस दुनिया से जाना मेरे लिए एक अपूरणीय क्षति है और मेरे जैसे अधेड़ उम्र के लोगों के लिए ही नहीं, उन तमाम युवा रचनाकारों के लिए भी, जिनके लिए कालिया जी ने भारतीय ज्ञानपीठ में तरह - तरह की योजनाएँ शुरू कीं और उन्हें पल्लवित - पुष्पित होने के लिए एक उर्वर ज़मीन दी।

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