कि जलवा दिखाने को जी चाहता है — वंदना राग


असली सच तो वह है जो शराब की कंपनी के सूडो-विज्ञापन में दिखता है 'मैन विल बी मैन' यानि 'आदमी अपनी जात से नहीं जायेगा'!... जायेगा ?
वंदना राग के चिंतन, लेखन  और व्यवहार  में जो 'एकरूपता'  है, दरअसल वही कुंजी है, उस बंधन को खोलने की जिससे भारत के स्त्रीपुरुष समाज को पितृसत्तात्मकता ने क़ैद किया हुआ है।

भरत तिवारी


कि जलवा दिखाने को जी चाहता है — वंदना राग



औरतों के सचों के कस्टोडियन के रूप में सामाजिक चौकीदारों की भरमार हो गयी है 

— वंदना राग

आज इस “पोस्ट ट्रूथ “ यानि एक सच के अलावा अनेक बनावटी सचों के निर्माण के युग में, क्या आधी आबादी (औरतों) के सच की कोई एक ईमानदार परिभाषा हो सकती है? क्या हम स्वीकार कर पाएंगे की इक्कीसवीं सदी में भी पहले की अपेक्षा उस आधी आबादी की स्थितियों में बहुत कम और लगभग बेतरतीब ढंग का फर्क आया है? चूँकि अभी भी इंडिया और भारत के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में बड़ा फर्क है इसीलिए उस आधी आबादी के जीवन स्तरों और सबलीकरण की परिभाषाओं में भी बड़ा फ़र्क है और यह एक ऐसा असहज करने वाला सच है जिसे स्वीकार करना आसन नहीं। लिहाज़ा औरतों के सचों के कस्टोडियन के रूप में सामाजिक चौकीदारों की भरमार हो गयी है। ये वो लोग हैं जो औरतों के चरित्र और बात व्यहवार के बारे में पलक झपकते ही उदगार प्रकट करते हैं और वह भी इतने अधिकार के साथ की आप दंग हो जाते हैं।

गौर करने वाली बात अब यह है कि क्या सत्तर के दशक के बाद सूरतेहाल बदल गया ? और यदि हाँ तो कितना?


इतनी सारी बातों के बीच एक बात –-यह औरत की पवित्रता और उसकी पाकीज़गी का मसला जो बार बार उठता है उसके मूल में औरत के ऊपर एक खास तरह के व्यहवार का दबाब और उसपर नियंत्रण ही तो है। और नियंत्रण करने की प्रवृत्ति ही पितृसत्ता की मूल प्रवृत्ति है। इस सच से सब बावस्ता हैं लेकिन इसे बहुत खुल कर और खोल कर बोलने वाले कम हैं।

आज भी बलात्कार की दोषी औरतें मानी जाती हैं क्यूंकि वे तथाकथित रूप से बलात्कारी को उसके कुकृत्य के लिए निमंत्रण देने वाली होती हैं। 

अब बात करें इस पवित्रता और पकीज़गी की जिससे औरत के चरित्र को आँका जाता है। आपको याद होगा और यदि नहीं याद तो youtube पर चले जाएँ और तलाशें, सत्तर के दशक में पाकीज़ा नाम की एक फिल्म आई थी। जो एक तावायफ़ पर थी । भले ही वह एक काल्पनिक कहानी पर बनी फिल्म थी,लेकिन उसमे नायिका मीना कुमारी के किरदार पर “पाकीज़ा” होने का बड़ा दबाव था। त्रासदी यह थी की नायक को उसके पेशे से कोई आपत्ति नहीं थी वह उससे मोहब्बत करता था और उसे हर हालत में अपनाने को तैयार था, लेकिन समाज के तानों और खुद की अपने पेशे को लेकर कुंठा के चलते नायिका नायक को निकाह के बीच छोड़ कर भाग जाती है। चारों ओर हवा में पाकीज़ा शब्द फ़ैल जाता है।

भारतीय औरत को बार-बार फिल्मों जैसे मनोरंजन के माध्यम में भी छूट लेने की इजाज़त नहीं रही है और त्रेता युग की सीता की तरह अपनी पवित्रता की परीक्षा देनी पड़ी है। 

  जब पीछे मुड़ उस समाज को देखने की कोशिश करती हूँ तो यह बात दिल में चुभती सी ठहर जाती है कि एक आज़ाद मुल्क के पोस्ट कोलोनियल (अंग्रेजों के शाशित और छोड़े) समाज में औरतों को लेकर ये कैसे सच गढ़े गए ? औरतों के ऊपर, उनके शरीर को लेकर, उनकी मर्ज़ी को लेकर समाज क्रूर और इतना संवेदनहीन क्यूँ बना रहा ? कुछ पढ़े लिखे घरों में अलबत्ता लड़कियों को पढ़ने–लिखने, कैरियर चुनने की, मर्ज़ी से शादी करने की आज़ादी ज़रूर थी लेकिन बाकी के मध्यमवर्गीय समाज और वंचित समाज की औरतों के सिलसिले में  इस तरह की चिंताएं भारतीय समाज से नदारद थीं। लिहाज़ा इन तत्वों को अपने जीवन में शामिल करने में इन तबकों की औरतों को और कई साल लग गए। गौर करने वाली बात अब यह है कि क्या सत्तर के दशक के बाद सूरतेहाल बदल गया ? और यदि हाँ तो कितना?

अस्सी के दशक में बनने वाली फिल्मों में भी, तवायफों पर आधारित फिल्मे तो बनी ही होंगी और आधुनिकता बोध के दावे भी हुए होंगे, जिसके तहत नायिका ने शॉर्ट्स, हॉट पैन्ट्स और पश्चिम की तर्ज़ पर कपडे पहने, अंग्रेजी में हाय हेल्लो किया, फैक्ट्री की मालिक भी रही, नौकरी भी करती रही लेकिन जब उसके चरित्र की बात फिल्मों में या उसके बाहर भी चलती है तो उसे “गंगाजल की तरह पवित्र है“ कर बरी किया जाता रहा है और इसी मूल्य को श्रेष्ठ मूल्य ठहराया जाता रहा है।

इसका सीधा मतलब है कि भारतीय औरत को बार-बार फिल्मों जैसे मनोरंजन के माध्यम में भी छूट लेने की इजाज़त नहीं रही है और त्रेता युग की सीता की तरह अपनी पवित्रता की परीक्षा देनी पड़ी है। सच तो यह है कि यह हमारी सामाजिक सांस्कृतिक विरासत रही है और किसी भी धर्म से जुडी भारतीय औरतों को गाहे बगाहे ऐसी बातों से गुज़ारना पड़ा है।

हम अपनी भाषा पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि आदमियों को ज़लील करने वाली जितनी गालियाँ हैं सबके मूल में औरत पर प्रयुक्त, उसके अंगों को ले अपमान सूचक शब्द ही गालियाँ हैं।

इसी तरह समाज के बड़े प्रतिशत मर्द नेता, अभिनेता, साहित्यकार, दुकानदार, व्यवसायी, शिक्षक, डाक्टर, इंजिनियर, रिक्शाचालक, वार्ड बॉय, चपरासी या रसूखदार किसान, जो एक ही चोले में पिता, भाई, पुत्र, दादा, नाना भी होते हैं, कभी भी औरतों के साथ हादसे होने पर अपने वर्ग को दोषी नहीं ठहराते हैं। उलटे लड़कियों/औरतों के कपड़े और चाल चलन को दोष दिया जाता है। आज भी बलात्कार की दोषी औरतें मानी जाती हैं क्यूंकि वे तथाकथित रूप से बलात्कारी को उसके कुकृत्य के लिए निमंत्रण देने वाली होती हैं। यह दुखद नहीं तो और क्या है कि निर्भया काण्ड के बाद भी इस देश के मर्दों की यही मानसिकता है और कानून के हाथ अभी भी इतने लम्बे नहीं हो पायें हैं की वे न सिर्फ ऐसी घटनाओं की रोकथाम कर पायें बल्कि घटना होने पर औरत के पक्ष में शीघ्र न्याय की व्यवस्था कर दें।

यह दलील दी जा सकती है कि शहरों में कुछ कार्यवाही हो रही है लेकिन कस्बों और गाँव में औरतें अभी भी बहुत सारी जानकारियों से महरूम हैं । उन्हें अपने हकों की जानकारी भी नहीं है। लिहाज़ा वे उसी पुरातन विचारधारा के अनुसार पलती बढती हैं और अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं और सपनों का गला घोंटती रहती हैं। सरकारी योजनायें भी उन्ही पुरातन विचारधाराओं को एक तरह से समर्थन देती हैं एक ओर “बेटी बचाओ“ योजना जहाँ भ्रूण हत्या रोकने की पहल करती हैं वही 18 वर्ष की लड़कियों का सरकार द्वारा शादी का खर्च वहन करना लड़की के गृहणी वाले पारंपरिक रूप को ही प्रश्रय देता है। इस पर योजनाकारों को और अधिक विचार करने की ज़रूरत है।

अब सवाल उठता है कि समाज में औरतों को बराबरी का दर्ज़ा कैसे मिले? उनके बारे में युगों से पैठे दुराग्रहों, पूर्वाग्रहों को सामाजिक मानसिकता से कैसे दूर किया जाये? सांस्कृतिक विरासत के रूप में उनका कैसे परिष्कार हो कि वे अपने पारंपरिक रोल से इतर जाकर समाज में अपना योगदान कर सकें।

अखबार, टीवी, सोशल मीडिया, साहित्य और सिनेमा तो यह काम किसी तरह करते ही हैं लेकिन ज़रूरत है उसे और व्यापक और स्थानीय बनाने की ।

मसलन यदि यह शहरी वंचित बस्ती की औरत है या गाँव की तथाकथित उच्च कुल की औरत, वह परदे में रहने वाली मध्यवर्गीय औरत है या कॉलेज में पढने वाली छात्रा, सबकी समस्याएं अलग किस्म की होंगी, और उनके समाधान भी अलग, उन्हें ही हाईलाइट करने की ज़रूरत है। साथ ही औरतों के आसपास रहने वाले लड़कों, मर्दों को औरतों की इन समस्याओं के प्रति शिक्षित करने की ज़रूरत है।

सच तो यह है, कि समाज को चलाने के लिए दोनों की ज़रूरत होती है। मर्द औरत के इस संघर्ष में उसका मित्र है और हो सकता है। आज यह मित्रता की बयार कुछ धीमे ही सही बहने तो लगी है, यह एक सच है, जैसे यह भी एक सच है, जो हालिया प्रदर्शित फिल्म “अनारकली ऑफ आरा“ में दिखलाया गया है। सत्तर के दशक की तवायफ यहाँ वंचित वर्ग की गाँव जवार की नाचने वाली ही है। कलाकार होते होते रह जाने की कहानी कहती। गाँव और शहर के रसूखदारों की दृष्टि और भाषा तो अभी भी वही है। औरत के शरीर को खेलने की वास्तु समझने वाली मानसिकता अभी भी है। लेकिन औरत अब अपनी झिझक तोड़ रही है। उसकी भाषा बदल रही है। सत्तर के दशक की मीना कुमारी अपने बारे में अपशब्द सुन भाग कर छिप जाती है और 2017 की स्वरा भास्कर, चाकू सी चीरने वाली आवाज़ और भाषा में कह डालती है “सती सावित्री तो हम भी नहीं लेकिन किसी को भी अपनी मर्ज़ी से ही हाथ लगाने देंगे।”

यह संघर्ष का नया नैरेटिव है जिसके पैदा होने से गालियों का दंश खोखला हो जाता है। आर्थिक सबलीकरण से एक कदम आगे बढ़ शरीर पर / और देह शरीर के इस्तेमाल का निर्णय औरत खुद लेना चाहती है । यह एक चेतावनी भी है — शरीर की पाकीज़गी नष्ट करने की धमकी का अब मायने बदल जायेगा, क्यूंकि वह एक मुद्दा नहीं रहा।

यह सबसे बड़ा सच है कि भारतीय औरत का शरीर एक करेंसी है जिससे पितृसत्तात्मक राजनीति अपना खेल जमाये रखती है। लेकिन धीरे से औरत अपनी उसी करेंसी को अपने पाले में लाकर खेल के नियम बदल रही है।

और अब अंत में,

  यह  सब  यूँही  नहीं  कहा

     जो    कहा    सच   कहा

       सच  के  हक  में  कहा

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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