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बीजेपी के वोट कम हो रहे हैं, #खतरे_की_घंटी — पुण्य प्रसून बाजपेयी @ppbajpai

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क्या बैंकों का घाटा। एनपीए की रकम। बट्टा खाते में डालने का सच सबकुछ चुनावी लोकतंत्र से जा जुड़ा है जहां पार्टी के पास पैसा होना चाहिये। खूब रुपया होगा तो प्रचार में कोई कमी नहीं आयेगी।

— पुण्य प्रसून बाजपेयी

चेहरा, संगठन, रईसी सब कुछ है पर वोट नहीं?

वोट कम हो रहे है पर नोट कम नहीं हो रहे। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में बीजेपी के पास फंडिंग से 10 अरब 34 करोड़ 27 लाख रुपये (10,34,27,00,000)  आ गया। 

2019 की तरफ बढ़ते कदम बताने लगे हैं कि बीजेपी अपने बूते सत्ता में आ नहीं पायेगी।
कैराना, भंडारा–गोदिया, फूलपुर, गोरखपुर, अलवर, अजमेर, गुरुदासपुर, रतलाम। तो 8 सीट बीजेपी 2014 के बाद हार चुकी है। और शिमोगा-बेल्लरी लोकसभा सीट खाली पड़ी हैं। जहां जल्द ही उपचुनाव होंगे। तो 2014 में 282 से घटकर 272 पर आ गये। यानी लोकसभा के जादुई आंकड़े पर बीजेपी की सुई फिलहाल आ खड़ी हुई है। यानी 2019 की तरफ बढ़ते कदम बताने लगे हैं कि बीजेपी अपने बूते सत्ता में आ नहीं पायेगी। तो उसे सहयोगी चाहिये। पर साथ खड़ी शिवसेना के सुर बताते है कि सबसे पुराना गठबंधन ही साथ रहना नहीं चाहता। तो क्या बीजेपी के लिये क्या ये खतरे की घंटी है कि 2019 का रास्ता बिना सहयोगियों के बनेगा नहीं। और सहयोगी ही गुस्से में है। मसलन नीतीश कुमार विशेष राज्य के मुद्दे पर नाराज हैं। रामविलास पासवान दलित मुद्दे पर गुस्से में हैं। दलित मुद्दे से लेकर दिल्ली के दलित बीजेपी संसाद उदितराज से लेकर यूपी के पांच बीजेपी सांसद तक नाराज है।
तो क्या 2019 का रास्ता बीजेपी ने खुद अपने लिये ही मुश्किल भरा बना लिया है क्योंकि हिन्दुत्व का राग लिये वह मुस्लिम को अपना वोटर तक नहीं मानती।
तो दलित के सामने बीजेपी अगड़ी और हिन्दू पार्टी हैं।


और इन हालातों के बीच नया संदेश कैराना से लेकर गोदिया-भंडारा से निकला है। कैराना में गन्ना किसानों का सवाल भी था और एनकाउंटर में मारे जा रहे जाटों को लेकर भी है। सुंदर सिंह भाटी मारे गये। जो जाटो को लगा उनकी दबंगई पर भी हमला है। फिर ठाकुरवाद यूपी में इस तरह छाया है कि ऊंची जातियों में भी टकराव है। और महाराष्ट्र में शिवसेना भी टकरायी और गोदिया भंडारा में पटेल-पटोले एक साथ आ गये। तो क्या सिर्फ मोदी मोदी के नारे से काम चल जायेगा

संयोग से जिन कॉरपोरेट हाउस ने राजनीतिक दलों को चुनावी फंडिंग की या राजनीतिक दलों के खातों में दान दिया। उनमें से अधिकतर बैंकों से लोन लेकर ना लौटा पाने के हालातों में आ चुके है। 

बाकी सभी को भ्रष्ट कहकर मोदी सत्ता ने इसी परसेप्शन को बनाया कि वह ईमानदार हैं
या ये कहें कि यही वह शोर है जो नेता को लोकप्रिय चमकदार बनाता है। और पीछे दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी है। संघ के स्वयंसेवकों की फौज है। तो फिर 2019 मुश्किल क्यों होगा। तो जिस बीजेपी के पास देश का सबसे चमकदार- सबसे लोकप्रिय चेहरा है। जिसका कोई विकल्प नहीं। और जो बीजेपी 10 करोड़ पार सदस्यों के साथ देश में सबसे बड़ा संगठन खड़ा कर चुकी है। कायदे से उसे तो हार मिलनी ही नहीं चाहिये। फिर एक के बाद एक चुनाव में हार क्यों मिल रही है। तो क्या 2014 की चमकदार धारणा 2018 में ही बदलने लगी है। और 2019 की तरफ बढ़ते कदम अभी से ये बताने लगे हैं कि संगठन या चेहरे के आसरे चुनाव लड़े ज़रूर जाते है। पर जीतने के लिये जो परसेप्शन होना चाहिये। वह परसेप्शन अगर जनता के बीच खत्म हो जाये तो फिर इंदिरा गांधी हो या राजीव गांधी या फिर अटल बिहारी वाजपेयी चमक काम देती नहीं है। कार्यकर्ता संगठन मायने रखता नहीं। क्योंकि इंदिरा गांधी तो नायिका थी। राजीव गांधी के पास तो दो-तिहाई बहुमत था। और अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता के वक्त ‘शाइनिंग इंडिया’ था। सब तो धरा का धरा रह गया। पर परसेप्शन बदल क्यों रहा है। जब मोदी फर्राटे से भाषण देते है। अमित शाह पन्ना प्रमुख तक के सांगठनिक ढांचे को खड़ा कर चुके है। और बीजेपी के पास फंड की भी कोई कमी नहीं है। और बाकी सभी को भ्रष्ट कहकर मोदी सत्ता ने इसी परसेप्शन को बनाया कि वह ईमानदार हैं। तो मोदी को ईमानदार कहने वालों के जेहन में ये सवाल तो है कि — आखिर 2014 में सबसे करप्ट राबर्ट वाड्रा को 2018 तक भी कोई छू क्यों नहीं पाया। फिर बीजेपी का परसेप्शन सिर्फ पुराने अक्स भर का नहीं है।  —  चुनाव जीतने के लिये दागी विपक्ष के नेताओं को साथ लेना भी गजब की सोशल इंजीनियरिंग रही। मुकुल राय हो या नारायण राणे या फिर स्वामी प्रसाद मोर्य।  — बीजेपी ने इन्हे साथ लेने में कोई हिचक नहीं दिखायी। और परसेप्शन बदलता है तो गोदिया के बीजेपी सांसद नाना पटोले ने किसान के नाम पर बीजेपी छोड़ी। कुमारस्वामी ने भविष्य पर दांव लगाया और कांग्रेस के साथ खड़े हो गये। और संयोग देखिये  —



जिस पालघर से बीजेपी जीती वहाँ पर भी बीजेपी के उम्मीदवार पूर्व कांग्रेसी सरकार में मंत्री रहे हुये है। दरअसल सच तो यही है कि बीजेपी के वोट कम हो रहे हैं। और बारीक लकीर को पकड़ियेगा तो जिस चकाचौंध की लकीर को 2014 में बीजेपी ने जीत के लिये और जीत के बाद खिंचा उसका लाभ उसे मिला है।  —
मसलन वोट कम हो रहे है पर नोट कम नहीं हो रहे।
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में बीजेपी के पास फंडिंग से 10अरब 34करोड़ 27लाख रुपये (10,34,27,00,000)  आ गया। और देश की बाकी सभी पार्टियों के पास यानी कांग्रेस समेत 38 राजनीतिक दलो के पास फंडिंग हुई 8अरब 45करोड़ 93लाख रुपये (8,45,93,00,000) । यानी बीजेपी को लोकसभा में बहुमत मिला। राज्य दर राज्य बीजेपी को जीत मिलती चली गई तो देश के तमाम राजनीतिक दलो को मिलाकर हुई कमाई से भी दो अरब रुपये ज्यादा बीजेपी के फंड में आ गये। तो चुनावी जीत-हार से इतर तीन सवालों का जवाब खोजिये  — 
       पहला, जो सत्ता में है उसे खूब फंड मिलता है?
       दूसरा, फंड देने वाले रुपये के बदले क्या चाहते होंगे?
       तीसरा, इतना पैसा राजनीतिक दल करते क्या है?
...यानी हर चुनाव के बाद जब चुनाव आयोग ये बताता है कि उसने बांटे जा रहे सौ करोड़ जब्त कर लिये या कहीं हजार करोड़ जब्त हुये तो 2014 के बाद से देश में औसत नोटों की जब्ती हर चुनाव में 300 करोड़ तक आ बैठती है। यानी तीन अरब रुपये। वोटरों को बांटने के लिये अलग-अलग राजनीतिक निकले और जब्त हो गये। तो अगला सवाल है कि
      जो रुपया जब्त नहीं हुआ वह कितना होगा?
...और उससे आगे का सवाल जो सुप्रीम कोर्ट ने ही उठाया कि
      जो नोटों को बांटते हुये या ले जाते हुये पकड़े गये उन लोगों के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं होती?
      सजा क्यों नहीं मिलती?

पर असल सवाल है कि 2014 के बाद से चुनाव का मतलब कैसे धनबल हो गया है। यह चुनावी प्रचार के खर्च के आंकड़ों से भी समझा जा सकता है। कॉरपोरेट समूह की राजनीति फंडिंग और बैंकों से कॉरपोरेट समूह को कर्ज यानी एनपीए में तबदील होती रकम क्या ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें भारतीय लोकतंत्र फंस चुका है। क्योंकि संयोग से जिन कॉरपोरेट हाउस ने राजनीतिक दलों को चुनावी फंडिंग की या राजनीतिक दलों के खातों में दान दिया। उनमें से अधिकतर बैंकों से लोन लेकर ना लौटा पाने के हालातों में आ चुके है।
  — बैंकों के घाटे को पूरा करने के लिये दो लाख करोड़ से ज्यादा सरकार दे चुकी है।



तो क्या बैंकों का घाटाएनपीए की रकमबट्टा खाते में डालने का सच सबकुछ चुनावी लोकतंत्र से जा जुड़ा है जहां पार्टी के पास पैसा होना चाहिये। खूब रुपया होगा तो प्रचार में कोई कमी नहीं आयेगी। यानी चुनाव के वक्त सबसे महंगा लोकतंत्र सबसे रईस हो जाता है। क्योंकि सबसे ज्यादा काला-सफेद धन चुनाव के मौके पर बाजार में आता है।
और ध्यान दीजिये तो 2019 के चुनावी बरस में कदम रखने की शुरुआत हो चुकी है तो मोदी सरकार के चौथा बरस पूरा होते ही राज्य सरकारों ने अपना खजाना खोल दिया है। धुआंधार विज्ञापन हर राज्य सरकार केंद्र के पक्ष में यह कहते हुए दे रही है कि मोदी सरकार की योजनाओं ने गरीब की जिंदगी बदल दी।
  — दूसरी तरफ कॉरपोरेट बीजेपी के साथ है ही। बीजेपी को 53 फीसदी चंदा सिर्फ दो दानदाताओं से मिला। सत्या इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ने 251 करोड़ रुपए। भद्रम जनहित शालिका ट्रस्ट ने 30 करोड़ रुपए चंदे में दिए।
दरअसल सत्या इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट में दो दर्जन से ज्यादा कॉरपोरेट है। भारती एयरटेल से लेकर डीएलएफ और इनओक्स या टोरेन्ट से लेकर जेके टायर या ओरियन्ट सीमेंट या गुजरात पेट्रोकैमिकल तक। 

राजनीतिक दलो को तमाम कॉरपोरेट राजनीतिक फंड देकर कौन सा मुनाफा बनाते कमाते है
ऐसा नहीं है कि इस ट्रस्ट ने सिर्फ बीजेपी को फंड दिया। कांग्रेस को भी 15 करोड़ 90 लाख रुपये दिये। यानी ये ना लगे कि कॉरपोरेट बीजेपी के सामने नतमस्तक है तो कांग्रेस को भी चंद रुपये दे दिये गये। पर सवाल तो यही है कि राजनीतिक दलो को तमाम कॉरपोरेट राजनीतिक फंड देकर कौन सा मुनाफा बनाते कमाते है। और जो फंड नहीं देता क्या उसका नुकसान उसे भुगतना पड़ता है या फिर जिसकी सत्ता रहे उसके अनुकूल हर कॉरपोरेट को चलना पड़ता है। तो आखिरी सवाल...
क्या बीजेपी ने चाहे-अनचाहे विपक्ष के लिये ऐसे हालात बना दिये है जहां वह बिना फंड के काम करना सीखे? और कैराना में विपक्ष की एकजुटता ने देश की सबसे रईस पार्टी को मात दे दी। यहीं से आखिरी सवाल है कि क्या 2019  को लेकर 2014 का परसेप्शन इतना बदल रहा है कि अब कॉरपोरेट भी फंडिंग शिफ्ट करेगा?

पढ़ें: बीजेपी के लिये खतरे की घंटी — पुण्य प्रसून बाजपेयी 


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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