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दिनमान की यादें - 5 "रघुवीर सहाय" — विनोद भारद्वाज | #DinmanKiYaden #Sansmaranama



फ़िलहाल,

'दिनमान की यादें' की आखिरी कड़ी में दिनमान की बातें लिखते हुए विनोद भारद्वाज जी कहते हैं "अज्ञेय और रघुवीर सहाय ने जिस तरह से जो लिखवाया वह ठीक से कभी संकलित होना चाहिए।" आशा की जानी चाहिए हिंदी से लगाव रखने वाले साधन संपन्न इस बात पर ध्यान देंगे. पहली कड़ी को आपके सामने लाते हुए जो लिखा था वह विनोद जी से और लिखने के निवेदन के साथ दोहरा रहा हूँ: विनोदजी के पास श्रेष्ठ यादों के कई दबे हुए खजाने हैं, जिनमें से वह यदाकदा कुछ मणियाँ निकालते हैं. इस दफ़ा वह अपने दिनमान के दिनों को याद करते हुए कुछ अनजानी और रोचक जानकारियां साझा कर रहे हैं... भरत एस तिवारी/शब्दांकन संपादक


दिनमान की यादें - 5 | रघुवीर सहाय

— विनोद भारद्वाज 


   चौड़ी सड़क गली पतली थी
   दिन का समय घनी बदली थी
   रामदास उस दिन उदास था
   अंत समय आ गया पास था
   उसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगी
   धीरे धीरे चला अकेले
   सोचा साथ किसी को ले ले
   फिर रह गया, सड़क पर सब थे
   सभी मौन थे सभी निहत्थे
   सभी जानते थे यह उस दिन उसकी हत्या होगी
   खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर
   दोनों हाथ पेट पर रख कर
   सधे क़दम रख कर के आए
   लोग सिमट कर आँख गड़ाए
   लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगी
   निकल गली से तब हत्यारा
   आया उसने नाम पुकारा
   हाथ तौल कर चाकू मारा
   छूटा लहू का फव्वारा
   कहा नहीं था उसने आख़िर उसकी हत्या होगी
   भीड़ ठेल कर लौट गया वह
   मरा पड़ा है रामदास यह
   देखो-देखो बार बार कह
   लोग निडर उस जगह खड़े रह
   लगे बुलाने उन्हें जिन्हें संशय था हत्या होगी

रघुवीर सहाय की यह प्रसिद्ध और बहुत अच्छी कविता है। लखनऊ में मैं जब बी ए में पढ़ रहा था, तो वहाँ कृष्ण नारायण कक्कड़ युवा लेखकों को बहुत समय देते थे। वह लगभग उनके गुरु बन जाते थे। एक बार मैंने उन्हें अपनी कुछ कविताएँ सुनाईं। उन कविताओं में लोग शब्द का कुछ जगहों पर ख़ास इस्तेमाल हुआ था। कक्कड़ साहेब ने मुझे रघुवीर सहाय का उन्हीं दिनों छपा संग्रह आत्महत्या के विरुद्ध दिखाया, बोले इसे पढ़ो। रघुवीर सहाय लोग लोग मार तमाम लोग के अद्भुत कवि हैं। इस संग्रह ने मेरी कविता की समझ ही बदल दी। 

मनोहर श्याम जोशी के दिनमान छोड़ देने के बावजूद दिनमान की टीम जिस श्रेष्ठ स्तर की थी, वह इतिहास में दुबारा कभी नहीं बन पाएगी। इसका श्रेय वात्स्यायन जी को ही जाना चाहिए।

रघुवीर सहाय लखनऊ के ही थे। उन्हीं दिनों उनके सौतेले भाई धर्मवीर का विवाह था। वह लखनऊ आए हुए थे। कक्कड़ जी की एक लखनऊ की बाढ़ से प्रेरित प्रदर्शनी चल रही थी। रघुवीर जी अपनी ऐम्बैसडर गाड़ी में दिल्ली से आए हुए थे। मैं उनके साथ प्रदर्शनी में गया। वह चित्रों को देखते हुए बोले, मुझे लगता है आज भी कला को इमोशनल हो कर ही समझा जा सकता है। 

सब से बड़ी बात यह थी कि उन्होंने अपना नया संग्रह मुझे लिख कर भेंट में दिया जो आज भी मेरी लाइब्रेरी की ख़ास किताब है। वो इतने दोस्ताना हो गए कि बोले, दिल्ली आइए तो मेरे साथ ही रुकिए। यह अलग बात है कि दिल्ली में जा कर मैंने उन्हें फ़ोन किया, तो उन्हें मुझे पहचानने में भी देर लगी। मेरा मिशन था किसी भी तरह से लघु पत्रिका आरम्भ के लिए उनसे कविता लेना। बड़ी मुश्किल से मुझे सफलता मिली, और उन्होंने अपनी हस्त-लिपि में मुझे अपनी अद्भुत कविता दी, जानना था जानना था। मुझे कुछ और करना था, कुछ और कर रहा हूँ....

उन दिनों मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान में एम कर रहा था। साइकोलिंग्विस्टिक में उन दिनों नोम चोमस्की की बहुत चर्चा थी। आज भी वह चर्चित हैं पर अपने राजनीतिक विचारों के कारण। रघुवीर सहाय ने मुझे तार भेजा उनके विचारों पर एक लेख भेजने के लिए। मेरा लेख ढिल्लड़ दिमाग़ से मुक्ति दिनमान के दो पेज में नाम सहित छापा गया। मुझे लगा, अब मैं पत्रकारिता को अपना कैरीअर बना सकता हूँ। इतने बड़े नामों के बीच बैठ कर काम करने का अवसर मिलेगा। पिता स्टेट बैंक में थे, वैसी नोट गिनने की नौकरी मेरे बस की बात नहीं थी। रघुवीर सहाय ने मुझसे कई लेख लिखवाए। एक बार दो सौ दस रुपए का चेक आया, तो मैं किताबें ख़रीद सका, इश्क़ में मेरा इम्तिहान ले रही दोस्त के लिए गिफ़्ट ख़रीद सका। सपने देखने लगा, श्रीकांत वर्मा के बग़ल में बैठ कर काम करने के। मनोहर श्याम जोशी के दिनमान छोड़ देने के बावजूद दिनमान की टीम जिस श्रेष्ठ स्तर की थी, वह इतिहास में दुबारा कभी नहीं बन पाएगी। इसका श्रेय वात्स्यायन जी को ही जाना चाहिए। 

अज्ञेय और रघुवीर सहाय ने जिस तरह से जो लिखवाया वह ठीक से कभी संकलित होना चाहिए। 

मैनज्मेंट वात्स्यायन जी के सामने झुक जाता था पर रघुवीर सहाय के भेजे काग़ज़ों की उपेक्षा करता था। वह मुझे सीधे दिनमान में लेना चाहते थे पर मुझे ट्रेनिंग प्रोग्राम से मुंबई हो कर दिनमान में आने का मौक़ा मिला, वह भी धर्मवीर भारती से लड़-झगड़ कर। भारती जी धर्मयुग में क्रिकेट विशेषांकों की पाँच लाख रेकर्ड तोड़ प्रतियाँ बेच कर मैनज्मेंट की आँखों के तारे थे। रघुवीर सहाय का दिनमान मैनज्मेंट की निगाह में चैरिटी प्रोग्राम था। मुंबई में मैंने कमलेश्वर का लेक्चर सुना था जिसमें वह दिल्ली को अफ़ीमचियों का कुआँ कह रहे थे। भारती जी ने ट्रेनिंग में मुझे समझाया, दिनमान कमाऊ पूत बिलकुल नहीं है। वहाँ कोई भविष्य नहीं है। 

उदयन शर्मा (बाद में जो रविवार का संपादक बना) और मैं मुंबई में एक ही फ़्लैट में रहते थे, वह हमेशा रोता रहता था, यार, मैं भी दिनमान में जाना चाहता हूँ। दिनमान में तरक़्क़ी और पैसे नहीं थे पर समाज में उप-संपादक का भी रुतबा था। मैं जर्मन सरकार के निमंत्रण पर उप-संपादक की हैसियत से जर्मनी जा सका। मुझसे पहले मेरी गाइड ने नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक वात्स्यायन जी को रिसीव किया था, मुझे देख कर वह यहूदी लड़की हैरान थी कि इस लड़के को किसने भेज दिया। 

रघुवीर सहाय ओमप्रकाश दीपक से आधुनिक विचार कॉलम लिखाते थे। उनके निधन के बाद वह किसी और की इस कॉलम के लिए तलाश कर रहे थे। मैंने कई साल तक दिनमान में आधुनिक जीवन और आधुनिक विचार कॉलम लिखे। रघुवीर सहाय काफ़ी आज़ादी देते थे, अपने स्टाफ़ को। काम ठीक से करो, तो जब चाहे आओ, जब चाहे जाओ। एक बार एक लेखक मित्र तुलसी रमण शिमला से आए, मैं दफ़्तर से भाग रहा था, वह बोले, जब भी मैं आता हूँ आप या तो फ़िल्म देखने जा रहे होते हैं या फ़िल्म देख कर आ रहे होते हैं। 

दिनमान में रेणु, निर्मल वर्मा जैसे लेखकों ने रिपोर्ट लिखी हैं, अकाल की और कुंभ मेले की। प्रयाग शुक्ल निराला के गाँव गढ़ाकोला गए थे, तब मैं छात्र था और उनके साथ गया था। उनकी रिपोर्ट अद्भुत थी, आदमी जैसे की कमान, बन जाता है किसान। अज्ञेय और रघुवीर सहाय ने जिस तरह से जो लिखवाया वह ठीक से कभी संकलित होना चाहिए। 

रघुवीर सहाय कमज़ोर तब होना शुरू हुए, जब एक साप्ताहिक को उन्होंने जे पी आंदोलन का लगभग एक मिशन बना दिया। नतीजा यह हुआ की इमर्जन्सी में वह परेशान रहने लगे। 

जब मैनज्मेंट ने उन्हें रविवार की मिसाल दी, तो वह खीजने लगे कि मैं दिनमान को रविवार नहीं बना सकता। विडंबना यह है की टाइम्ज़ की नौकरी छोड़ने के बाद वह रविवार में कॉलम लिखने के लिए मजबूर हो गए। 

पत्रकारिता में गौरवशाली दिनमान का इतिहास आख़िरी दस सालों में रघुवीर सहाय की ज़बरदस्ती की गई विदाई के बाद साधारण और घटिया होता चला गया। नंदन तो तब भी धर्मयुग से प्रशिक्षित थे, घनश्याम पंकज ने शुरू में गेस्ट एडिटर बना कर (मालिक समीर जैन का भी दबाव था) और बाद में ब्रॉडशीट बना कर दिनमान के स्वर्ण युग को ताम्र युग में पहुँचा दिया। अंत में ट्रेनी के रूप में काम कर रही एक लड़की ने पंकज के ख़िलाफ़ आरोप लगाए और दिनमान के सुखद इतिहास का दुखद अंत हुआ। 

आख़िरी तीन संपादकों की कहानी लिख कर कुछ हासिल नहीं होगा। वे जिस गद्दी पर बैठ गए उसके वह बिलकुल क़ाबिल नहीं थे। मैनज्मेंट 1982 में ही दिनमान बंद कर देता, तो बेहतर होता था। गरमी की एक दोपहर मैं शायद कोई फ़िल्म देख कर दफ़्तर आ रहा था, एक कार मेरे पास आ कर रुकी, नंदन जी थे। मैं बैठ गया। मुझे नहीं पता था कि वह रघुवीर सहाय की गद्दी हथिया चुके हैं। कभी दिनमान में धूमिल की ओबिट पढ़ कर वह बोले थे, जैनेंद्र कुमार की मीना कुमारी की ओबिट के बाद मैं दूसरी ओबिट से प्रभावित हुआ हूँ। 

मुझे तब दिनमान की तभी ओबिट लिख देनी चाहिए थी। रघुवीर सहाय का नारा था, The magazine that enlightens the mind. बाद में वह एक बार बोले, वह मेरे पड़ोसी थे, अब नारा होना चाहिए , The magazine that lightens the mind.

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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पढ़ें:

दिनमान की यादें:  -१-    -२-३-    -४-





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