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सी–सॉ : प्रबोध कुमार के कथा प्रदेश में - शर्मिला जालान | Probodh Kumar's book review by Sharmila Jalan

आज 8 जनवरी को प्रबोध कुमार, प्रेमचंद के नाती, अमृतराय के भांजे, बेबी हालदार के मेंटर के जन्मदिन पर प्रिय कथाकार शर्मिला जालान की उनके कहानी संग्रह  'सी–सॉ' की आत्मीय समीक्षा। 





मुझे उन बिजली के खंभों के लिए भी दुख था जो मेरी प्रतीक्षा में उदास खड़े रहेंगे।

सी–सॉ : प्रबोध कुमार के कथा प्रदेश में 

समीक्षा 

शर्मिला जालान


प्रबोध कुमार को एन्थ्रोपोलॉजिस्ट के रूप में लोग ज्यादा जानते हैं, पर उन्होंने भारतीय कथा–परम्परा में अपनी लगभग पचास कहानियों और एक उपन्यास—‘निरीहों की दुनिया’ का अवदान देकर, अपने तरह का अनुपम गद्य रचा है, कुछ विलक्षण कथा तत्त्वों का समावेश किया है। उन्होंने सिर्फ कहानियाँ और उपन्यास ही नहीं लिखे समीक्षा, संस्मरण, पत्र भी लिखे और बांग्ला से हिंदी में कविता, आत्मकथा के अनुवाद का भी बहुत काम किया। उनके पत्रों में उनके कथाकार और अनुवादक रूप से भिन्न उनके व्यक्ति और लेखक से परिचय होता है।

उनकी कहानियाँ पाँचवे और छठे दशक में कई साहित्यिक पत्रिकाओं—‘वसुधा’, ‘कल्पना’, ‘कृति’, ‘समवेत’, ‘राष्ट्रवाणी’, ‘कहानी’ आदि में छपी थीं। प्रबोध कुमार का साहित्यिक जीवन प्राइवेट–सा साहित्यिक जीवन भी कहा जा सकता है। वे निराकांक्षी रहे। अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने पर कभी नहीं सोचा। अंग्रेजी और बांग्ला साहित्य के गहरे पाठक रहे। शरत बाबू (शरतचंद्र) के साहित्य पर उनकी अपनी तरह की अंतर्दृष्टि रही।

समय-समय पर हिन्दू अख़बार में समाज और सत्ता में हो रही चीजों पर अपनी असहमती दर्ज करते हुए अंग्रेजी में पत्र लिखे और वे छपे भी। उनके युवा उत्साही प्रकाशक मित्र संजय भारती (रोशनाई प्रकाशन, काँचरापाड़ा, पश्चिम बंगाल) यदि उनके संग्रह ‘सी-सा’ और ‘निरीहों की दुनिया’ को प्रकाशित नहीं करते तो उनकी किताब हिंदी जगत के लिए अनुपलब्ध रहती। उपन्यास ‘निरीहों की दुनिया’ में प्रतीक एवं बिम्ब के द्वारा हाशिए और वंचित समाज की पीड़ा एवं संघर्ष को महसूस किया जा सकता है।

यहाँ हम उनके कथाकार रूप पर बात करते हुए ‘सी-सॉ’ संग्रह की कहानियों पर चर्चा करेंगे। ‘सी-सॉ’ उनका पहला कहानी संग्रह है और 2013 में ‘रोशनाई प्रकाशन’ से आया था। इस संग्रह में 92-94 पृष्ठों में दस छोटी-छोटी कहानियाँ हैं, जो दिलचस्प पठनीय और उल्लेखनीय हैं। कहानी संग्रह के प्रारंभ में प्रबोध कुमार के साहित्य एवं शैली के बारे बताया है। वे किस कारण से हिंदी साहित्य में विशिष्ट हैं यह भी सुचिंतित ढ़ंग से विधिवत प्रस्तुत किया है। संग्रह की भूमिका में कमलेश साठ के दशक में हिंदी कहानियों में हो रहे नए आविष्कारों एवं उसमें प्रबोध कुमार की भूमिका पर चर्चा करते हैं। कमलेश अपनी भूमिका ‘कैवल्य का संगीत’ शीर्षक में कहते हैं – “पाँचवे और छठे दशक में इलाहाबाद हिंदी साहित्य का केंद्र था। वहाँ कहानी की चर्चा ज्यादा होती थी। नए कहानी लेखक एक तरह से हिंदी के कथा साहित्य को प्रौढ़ बना रहे थे। अब ऐसे दर्जनों कथाकार एक साथ लिखने लगे थे जिनकी कहानियो को हम हर दृष्टि से प्रौढ़ कह सकते थे। इनकी कहानियो में आख्यान परिपक्वता के साथ-साथ गद्य और भाषा का महत्व था। क्षीण कथावस्तु होने पर भी पाठक गद्य की रोचकता के प्रति आकृष्ट होता था। ऐसे ही कहानीकारों में प्रबोध कुमार थे।”

उनकी कहानियों में एक प्रशिक्षित एन्थ्रोपोलॉजिस्ट द्वारा अपने आस-पास के संसार और जन-जीवन का सूक्ष्म अवलोकन नजर आता है। उनकी रचनाएँ साहित्य एवं मानवविज्ञान और नृतत्शास्त्र के बीच, पुल की तरह हैं, जो सिर्फ दो विधाओं को जोड़ती ही नहीं है बल्कि दोनों का संगम कर यथार्थ को देखने की एक अलग दृष्टि प्रदान करती है। उनकी कहानियाँ आदर्शवादी नहीं है। बल्कि ये कथाएँ अपनी विरल भाषा के माध्यम से आधुनिक मनुष्य की लगभग उपहासजनक ट्रेजेडी और विडम्बना को पूरी निर्ममता से जांचती है।

छोटे-छोटे, मितव्ययी, आकर्षक वाक्यों में रची उनकी कहानियाँ सघन मानवीय अनुभूतियों की कहानियाँ हैं जो गहरी संवेदना को पकड़ने के लिए अपनी तरह से भाषा का संधान करती है। पात्रों के भीतर नए विचार आते हैं और आती हैं नई-नई स्मृतियाँ। इन कहानियों के पात्र अनिश्चिता और असमर्थता, स्थिरता और अस्थिरता के भाव संसार में रहते हैं और यही बात इन कहानियों को अर्थ प्रदान करती है गरिमामय बनाती है। इन कहानियों में आते हुए भौतिक ब्योरें और विवरण अगर निकाल दिए जाएँ तो कहानी बेजान हो जाएगी। ये डिटेल्स कहानी के तत्त्व में रचे बसे हैं और कहानी को अपनी तरह, मौलिक ढंग से से जीवन और संसार से जोड़ते हैं—इसको एक उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है—

“मुझे उन बिजली के खंभों के लिए भी दुख था जो मेरी प्रतीक्षा में उदास खड़े रहेंगे।” (सुख)

उनकी कहानियों पर बात करते हुए कुछ बिम्ब सामने आते हैं। पहला बिम्ब जिसमें बच्चे, बचपन, और स्मृतियाँ आती हैं तो दूसरे में कैशोर्य, युवा उम्र के राग विराग और तीसरे में वरिष्ठ उम्र की स्त्री का अकेलापन आता है। इन बिम्बों को इन उद्धरणों के माध्यम से समझा जा सकता है। नीचे लिखे जा रहे उद्धरणों का उद्देश्य प्रबोध कुमार के कथा संसार को समझने का अपने तईं प्रयास है।

पहला बिम्ब

“सी-सॉ पर बैठा, खाकी हाफ पैंट के ऊपर सफ़ेद कमीज डाले आठ-नौ साल का एक लड़का रबर की हरी गेंद लिए बड़ी देर से सड़क की ओर देख रहा था। थोड़ी दूर पर चार–पाँच बच्चे मिलकर बारी-बारी से झूला झूल रहे थे।”

“तुम यहाँ खड़े क्या कर रहे हो? “बूढ़े ने अपनी सफ़ेद पुतलियाँ सिकोड़ते पूछा, “लड़कों में जाकर क्यों नहीं खेलते?”

“पार्क में ताला नहीं पड़ता था। न ही रात को पहरा देनेवाला वहाँ कोई था। श्याम चाहता तो रात भर फिसलता रह सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।” (सी-सॉ)

“पिछली गर्मियों में मीरा के पिता ने उन्हें तैरना सिखाया था। सुबह होते ही दोनों अपनी तूम्बियां सहेज तैयार हो जाते। ...तैरते समय उनके नौसिखिये हाथ-पैरों से बहुत पानी छिटकता जिनका आसपास नहाते लोग बुरा मानते। ...कुछ दिन हुए एक मढिया बनी थी। वहाँ से वे पानी में फेंकने के लिए पत्थर की चीपों के छोटे-छोटे टुकड़े इकट्ठे करते” (सुख)

दूसरा बिम्ब

“सफ़र में साथ तो मिल रहा था लेकिन मैंने अकेले जाना ही ठीक समझा।” (सफ़र)

“एक रात घर लौट मैंने देखा कि वही शीशा टेढ़े-मेढ़े ढंग से फिर टूट गया है। कबूतर वारड्रोब के ऊपर रखे संदूक के आसपास टहल रहा है। सावधानी से बंद कर मैं सीटी बजता कपड़े बदलने लगा।” (कबूतर)

“बाथरूम में जा, मैंने शीशे में अपना चेहरा देखा। इस दुनिया में सजग रहते–रहते वह कुछ ऐसा हो गया था की उसे फिर से भोला बनाना केवल उसी के लिए संभव होता, जिसे प्रसाधन–कला में कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हों।”( कबूतर)

“आज मैं तीसरे दर्जे में जा रहा हूँ तो तुमने झकझोर कर मुझे जगा दिया। क्यों जगाया तुमने मुझे? पेरिस में हम न जाने क्या-क्या करते? बकवास बंद करो। टिकट दिखाओ” (क्षोभ)

“किसी ने धोखे में या बदमाशी में मुझे बंद कर दिया तो मैं क्या कर सकता था लेकिन सुमंगला को यह समझा सकना असम्भव था। मुझे उन बिजली के खंभों के लिए भी दुःख था जो मेरी प्रतीक्षा में उदास खड़े रहेंगे। मेरे कमरे से चौराहे तक रास्ते में पांच खंभे पड़ते थे जिन्हें मैं बारी-बारी से छूता जाता था। कभी भूल कर कोई खंभा छूट गया तो मैं फिर लौटकर उसे छूता। कमरे के बाहर रखे गमलों के साथ भो मेरा यही व्यवहार था। पौधों को पानी देते समय मैं उस गमलों को भी हमेशा याद रखता जिसमें गुलदाउदी का ठूँठ भर बाकी रह गया था। मैं जानता था कि वह ठूँठ अब पनपेगा नहीं फिर भी उसे यह सोच पानी दे देता था कि यदि नहीं दूँगा तो उसे दुख होगा” (इच्छा)

“मैं कुछ ग्राहकों से बात कर रहा था, तभी डोरा आई। ....माँ की प्रेस्क्रिप्शन मुझे दे, वह पास रखे स्टूल पर बैठ गई / वह बहुत थकी लग रही थी।” (आखेट)

तीसरा बिम्ब

“अपने जन्मदिन पर खुश होना उसने बरसों पहले छोड़ दिया था। पति जीवित था तो ढलती उम्र में भी जन्मदिन बचपन के वे सुख उसे दे जाते जो केकों और मोमबत्तियों और फूलों से जुड़े होते। उसने बहुत विरुचि से उन शीशियों को देखा जिनकी संख्या उसकी कमजोरी जैसी रोज बढ़ रही थी।” (मोह)

इन कहानियों को दो भागों में बाँट कर पढ़ा जा सकता है। एक, बच्चे की, बचपन की, स्मृतियों की कहानियाँ तो दूसरा, कैशोर्य, युवा उम्र के राग विराग और वरिष्ठ उम्र के अकेलेपन की कहानियाँ।

इन कहानियों के चरित्र अत्यंत सामान्य हैं। मध्यवर्गीय। चरित्र के साथ-साथ कथा का सारा वितान, सारा परिदृश्य सामान्य है और यहाँ हमें भाषा के सहारे सामान्य की अलक्षित बातें, किस्से को समझने की कोशिश करना है।

इन कहानियों में पात्रों, घटना और प्रसंगों की रचना में जबलपुर का भेड़ाघाट, कस्बे, दवा की दुकान, पार्क, लेवेल क्रासिंग और ट्रेन में सफ़र करता युवक, होटल, कमरे, तालाब और पहाड़ आदि आते हैं।

इन कहानियों के नायक अक्सर पुरुष हैं। युवा पुरुष सफ़र में हैं और एकाकीपन का राग कम और ज्यादा लगभग सभी कहानियों में बज रहा है।

ये पात्र और नायक ऐसे समय से उपजे पात्र हैं जब समाजवादी और मार्क्सवादी दिशाहीन हो चुके थे। युवा वर्ग के सामने कोई रास्ता कोई विकल्प साफ़ नहीं था।

बहुतेरी कहानियाँ—कबूतर, आखेट, स्वाद, क्षोभ, इच्छा, सफ़र ‘मैं’ से शुरु होती है। ‘मैं’ अकेला है। ‘मैं’ का कोई नाम नहीं है।

आखेट कहानी में एकालाप, संलाप, वार्तालाप के द्वारा एक किशोर लड़की के डर, चाहना, अँधेरे और तसल्ली को, युवा मन के अकेलेपन को परिपक्वता के साथ साधा गया है। पुरुष स्त्री के परस्पर आकर्षण-विकर्षण, विश्वास, अविश्वास, सुख और दुःख, आनंद और अवसाद, चिंता, चाहना के जटिल पारस्परिक रूप आते हैं। दो लोगों के बीच बनते, पनपते भंगुर रिश्ते आते हैं। यह सब होता है नैसर्गिक प्रांजल भाषा के द्वारा। पानी की तरह बहता हुआ गद्य। भाषा कथा में कर्म है। भाषा की स्थानिक, कालिक और वर्तमान स्थिति है। शब्द मामूली हैं, वाक्य साधारण हैं पर प्रभाव मारक है। अनुभव की भाषा है जो दृश्यात्मक भी है और नाट्यात्मक भी और जो गद्य के भीतर आलोक और अँधेरे दोनों को व्यक्त करती है। ‘आखेट’ कहानी पढ़कर भुवनेश्वर की ‘भेड़िये’ याद आती है।

रोमानी आकर्षण, जंगली लालसा को, ‘स्वाद’ और ‘इच्छा’ कहानी की आतंरिक बुनावट में पढ़ा सकता है। युवा मन पर पडनेवाले चिर परिचित ऐन्द्रिक दवाब को पकड़ा जा सकता है। जिनकी ध्वनियाँ, अन्तर्ध्वनियां और अंडरटोन हैं। इन कहानियों में छोटे कलेवर में मानव मन के छोटे-छोटे फलक को रचने की साध है। छोट-छोटी बातों से कथा संसार बनता बढ़ता और रचा जाता है जो अंत में कई मर्म छोड़ जाता है और हम कथाकार की सधी हुई कलम, भाषा का हुनर, भाषा पर टिकने, झुकने और एकाग्र होने को तथा उनकी कलात्मक अंतरदृष्टियों से परिचित होते हैं। यहाँ इन कहानियों में भाषा स्वयं कथानक है, वह स्वयं बोलती है—चरित्र के बोलने में ही, पर उसके बोलने के पार जाती हुई। भाषा अंगी है, रस है, ध्वनि है, चरित्र घटनाएँ, वातावरण आदि उसके अंग हैं, अलंकार हैं।

प्रबोध कुमार के नायक युवा हैं, अकेले हैं और ‘सफ़र’ कहानी में प्रिया को देखते हैं। चरित्र वाचाल है खूब बोलता है क्योंकि उत्तम पुरुष एकवचन में पात्र की सृष्टि हुई है। ‘प्लाट’ एकदम क्षीण है। यह भी कह सकते हैं कि ‘प्लाट’ अपने आप में चरितनायक है। पर उसमें कोई चारित्रिक विलक्षणता नहीं है। बल्कि एक अनुभव है सामान्य सा कि उसके सपने में प्रिया आई है। ज्यादातर हमें वही चीज अपनी तरफ खींचती हैं जिनमें थोडा आतंक, थोडा रहस्य छिपा हो। आगे क्या होगा वाला भाव छुपा हो। सफर में, सपने, में प्रिया को देखना और पेरिस का मजा लेना और टिकट चेकर का बार-बार कहना ‘टिकट दो’ एक इबारत की तरह उभरता जाता है। भाषा यहाँ अपनी कहानी कह रही है और उसकी व्यंजनाएँ कहीं अधिक मुखर है। सफर में, सपने, में प्रिया को देखना और पेरिस का मजा लेना मरीचिका है और वह भंगुर भाव संसार तिरोहित हो जाता है सामने दिखाई देता है टिकट चेकर जो लगातार कह रहा है टिकट दिखाओ। उनकी भाषा युवा नायक के एकाकीपन को ढकने का धोखा नहीं करती। ये कहानियाँ पहली बार में प्रेम कहानियाँ लगती हैं पर दूसरी बार में क्षणिक रोमानी लगाव की मरीचिका, भंगुर भाव संसार को हमारे सामने खोल देती है। सामने नजर आता है बियाबान और जंगल।

इनमें एकालाप, संलाप और संवाद के द्वारा विनोद भाव लगातार चलता रहता है पर उसमें जो विडम्बना है, नायक का अकेलापन है, वह ओझल नहीं होता। कहानी का शिल्प, भाषा की बुनावट इस यथार्थ को उतनी ही शिद्दत से व्यक्त करते हैं। इन कहानियों में जो विनोद भाव है, जो कॉमेडी है वह ट्रेजेडी लगने लगती है। कहानी पढ़ते हुए पहले तो हम मुस्कुराने लगते हैं,फिर हँसते हैं और फिर रुक कर पात्र के अकेलेपंन में उतरने लगते हैं।

कहानियों में प्रेम की उपस्थिति, प्रेम का परिवेश और पास-पड़ोस है। कुछ कहानियाँ में आभास है पवित्र प्रेम का, प्रेम से मिलने वाली तसल्ली का, तो कुछ में पुरुष मन की जटिलताओं, दुर्बलताओं को कलात्मक अंतरदृष्टि के साथ बुना गया है।

कहानी ‘कबूतर’ में रोजमर्रा जीवन की साधारण सी बात को लेकर कबूतर को कमरे से निकालने की कोशिश में बचपन की स्मृति और मासूम भाव संसार से जुड़ना कहानी को अनूठी बना देता है। इस कहानी में प्रेम की उपस्थिति तसल्ली है, भरोसा है और सही शब्दों में कहा जाये तो सहारा है। इस कहानी का प्रेम स्त्री पुरुष का प्रेम नहीं भाई बहन का प्रेम है।

‘कबूतर’ कहानी की भाषा की बानगी यहाँ देखी जा सकती है। भाषा रूप, रस, गंध, स्पर्श, के प्रति संवेदनशील है। भाषा की अपनी आवाज और उजास है। स्थितियों के प्रभाव से कवित्वपूर्ण प्रभाव उत्पन्न होता है। नायक की स्मृति के बंद दरवाजे खुलते हैं।

“कबूतर ने तभी पंख फड़फड़ाए। मैंने इस बार उसे कुछ अधिक रुचि से देखा। वह पंख उठाता तो उनके नीचे की नरम सफेदी झलक उठती। मुझे उस पर दया आई कि वह अपने रोएँ बरबाद कर रहा है। फर्श पर जितने भी रोएँ पड़े थे मैंने सब बीन लिए। मैंने सोचा मैं रोज कबूतर से रोएँ लेता रहूँगा तो कुछ दिनों में तकिया बनाने लायक हो जाएँगे। छुटपन में हम इसी तरह अमरूद के पेड़ या बिजली के खंभे पर बैठे नीलकंठ से पंख माँगा करते थे।

मैं अपनी बहिन को बहुत अधिक प्यार करता था। मैंने सोचा मैं वही गाना गाकर कबूतर से रोएँ मांगूगा जिसे हम नीलकंठ के लिए गाते थे लेकिन कोशिश करने पर भी वह याद नहीं आया। ... मेरी बहिन यहाँ होती तो मुझे अपने दिमाग पर इतना जोर न डालना पड़ता क्योंकि उसे कोई भी बात एक बार याद हो जाती तो कभी नहीं भूलती थी।

मुझे एकाएक लगा कि कबूतर को मारकर मैं अक्षम्य गलती करने जा रहा था। छड़ी एक तरफ फेंक मैं बत्ती बुझाकर लेट गया। अब अँधेरे में कबूतर चाहे जो कर सकता था। वह मेरे चेहरे पर बीट कर देता या चोंच से मेरी आँखे फोड़ डालता तब भी मैं उसका कुछ न बिगाड़ पाता। मैं बचने की कोशिश करता इसमें भी मुझे संदेह था। उस समय मैं पूरे मन से चाह रहा था कि वह मुझसे मनमाना बदला भले ही ले ले, पर कमरा छोड़ कर न जाये, नहीं तो उस अद्भुत गाने के याद आने की संभावना तक न रहेगी।” (कबूतर)

बच्चों की दुनिया को बच्चों की ही आँखों से देख पाना सरल काम नहीं है। लेखक के आस पास बच्चों की भरी पूरी समृद्ध दुनिया है जिसे उनकी ही आँखों से देखना संसार को एक अलग नजरिये से देखना है। चीजों की छाप मन पर किस तरह पड़ती है और उनको लेकर जो गहरी उत्सुकता होती है वह कहानी का कच्चा माल बनती है। इन कहानियों को पढ़कर सत्यजीत राय की ‘जाखुन छोटो छिलाम’(जब मैं छोटा था) की याद आ जाती है।

‘सुख’ कहानी में मीरा और विशु के छोटे-छोटे सुख हैं।

“मीरा के दांत जब भी टूटते, वह उन्हें चूहे के बिल में डाल देती जिससे दोबारा निकलने पर वे चूहे की दांतों की तरह सुडौल हों।

विशु ने दांत यदि खपरैल पर फेंक दिया तो नया दांत खपरे की तरह होगा।

विशु को तालाब बहुत पसंद था। उसके तीन किनारे पर शहर के मकान आकर यदि ठहर न जाते तो पानी में गिर जाते।” (सुख)

‘सी-सॉ’ बाल जीवन का चित्रण करती हुई कथाकार के सुक्ष्म पर्यवेक्षण दृष्टि का ही परिचय नहीं करवाती कहानी में आए लड़के—श्याम के अकेलेपन को भी उतनी ही शिद्दत से व्यक्त करती है।

“श्याम झूले पर खड़ा अकेला ही झूल रहा था। झूलते झूलते कभी वह लोहे की छड़ों पर चढ़ने की कोशिश करता, तो कभी उन छड़ों के चारों ओर चक्कर लगाने लगता। कभी कभी वह यों ही उत्तेजित सा हो चिल्ला पड़ता। झूला झूलने में उसकी रुचि धीरे-धीरे खत्म हो गयी।” (सी–सॉ)

संग्रह की कई कहानियाँ बाल उम्र की कहानियाँ है पर ये उस तरह से बाल साहित्य का हिस्सा नहीं है। उन्हें शायद बच्चों की कहानियाँ नहीं कहा जा सकता।

पर कुल मिलाकर प्रबोध कुमार की कहानियों में स्थितियाँ, चरित्र, पात्र, घटनाएँ, भाषा के स्तर पर तरह-तरह से घटित होती रहती हैं। कई बार मनोरंजक सा वातावरण बनता है और लेखक के अंदर का विटऔर ह्यूमर प्रकट होता है जिससे कहानियाँ दिलचस्प हो जाती हैं।

कहानियों में भाषा ही वह चीज है जिसे ठोस,संवेद्य और आयाम धर्मी कहा जा सकता है। जिससे कहानियों के अन्तरंग जगत का संज्ञान होता है। ये कहानियाँ भिन्न तरह की कहानियाँ हैं दैनंदिन जीवन का पाठ है जिसमें पाठक को अपनी संवेदना और दृष्टि का विस्तार करते हुए उतरना होगा। युवा नायक का अकेलापन अनुत्तरित सवाल है। इस तरह यह संग्रह कई तरह के अनुभवों से समृद्ध करता चलता है। हम इन्हें पढ़ते हुए पाते हैं कि ये कहानियाँ एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया को दिखाती है। ऐसी क्रिया प्रक्रिया जिसका न आरंभ है और न ही अंत।

रचनाओं में जितना उतरा जाए वे परत दर परत खुलती जाती हैं। ये एक काल और खंड से बंधी नहीं हैं। वे आज भी उतनी ही प्रभावशाली हैं जितनी तब थीं जब लिखी गयीं थी।

हिंदी साहित्य का इतिहास देखें तो पाएँगे कि बनारस में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद, इलाहाबाद में अमरकांत और प्रबोध कुमार, दिल्ली में निर्मल वर्मा और राजेंद्र यादव आदि ऐसे लेखक हुए जो एक सी समय और दौर में लिख रहे थे पर जिनकी भाषा और मुहावरे एकदम अलग थे।

इस तरह अंत में हम यह कहेंगे कि प्रबोध कुमार हिंदी के एक बिरल कथाकार हैं। उनकी कहानियों में दुहराव, बोझिलता और एकरसता नहीं है। उनकी कहानियों ने कहानी विधा को अपने ढंग से, अपनी तरह से समृद्ध किया है। भाषा उनके यहाँ साध्य भी रही और साधन भी। ये कहानियों उस तरह केएक सजग और संवेदनशील पाठकों की मांग करती है जो अपने को संस्कारित,परिष्कृत करें।

प्रबोध कुमार का परिचय -


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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