अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika

अनामिका कवियत्री Anamika Poet

स्त्रियाँ

पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है कागज
बच्चों की फटी कॉपियों का
चनाजोरगरम के लिफाफे बनाने के पहले!

देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद!

सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुँसी हुई बस में!

भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के
दुख की तरह!
एक दिन हमने कहा
हम भी इंसान हैं
हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बीए के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन!

देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग!

सुनो हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा!

इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफवाहें
चीख़ती हुई चीं-चीं
‘दुश्चरित्र महिलाएँ, दुश्चरित्र
महिलाएँ
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली-फैली
अगरधत्त जंगली लताएँ!
खाती-पीती, सुख से ऊबी
और बेकार बेचैन, आवारा महिलाओं का ही
शगल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ...।

फिर ये उन्होंने थोड़े ही लिखी हैं’
(कनखियाँ, इशारे, फिर कनखी)

बाकी कहानी बस कनखी है।

हे परमपिताओ,
   परमपुरुषो
   बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!


WOMEN

We were read
like the torn pages of children’s notebooks
made into cones to hold warm chanajorgaram

We were looked at
the way grumpily, you squint at your wristwatch
after the alarm goes off in the morning.

We were listened to
distractedly
the way film songs assail your ears
spilling from cheap cassettes on a crowded bus

They sensed us
the way you sense the sufferings of a distant relative
One day we said
we’re human too.
Read us carefully
one letter at a time
they way after your BA,  you’d read a job ad.

Look at us
the way, shivering,
you’d  gaze at the flames of a distant fire
Listen to us
as you would  the unstruck music of the void
and understand the way you’d understand a newly-learned language

The moment they heard this
from an invisible branch suspended in limbo
like a swam of gnats
wild rumors went screeching
  “Women without character
   wild vines draining the sap
   from their hosts
   well-fed,  bored with affluence
   these women
   pointlessly on edge

   indulging in the luxury of writing
   these stories and poems  —
   not even their own,”
               They said, amused.

The rest of the stories dismissed with a wink


Hey, Blessed Fathers
you blessed men
spare us
spare us
this sort
of attention.


Translation: Arlene Zide and Anamika

बेजगह

   “अपनी जगह से गिरकर
   कहीं के नहीं रहते
   केश, औरतें और नाखून”
अन्वय करते थे किसी श्लोक का ऐसे
हमारे संस्कृत टीचर।
और मारे डर के जम जाती थीं
हम लड़कियाँ
अपनी जगह पर!

जगह? जगह क्या होती है?
यह, वैसे, जान लिया था हमने
अपनी पहली कक्षा में ही!
याद था हमें एक-एक अक्षर
आरम्भिक पाठों का
   “राम, पाठशाला जा!
   राधा, खाना पका!
   राम, आ बताशा खा!
   राधा, झाड़ू लगा!
   भैया अब सोएगा,
   जाकर बिस्तर बिछा!
   अहा, नया घर है!
   राम, देख, यह तेरा कमरा है!
“और मेरा?”
   “ओ पगली,
   लड़कियाँ हवा, धूप, मिट्टी होती हैं
   उनका कोई घर नहीं होता!”

जिनका कोई घर नहीं होता
उनकी होती है भला कौन-सी जगह?
कौन-सी जगह होती है ऐसी
जो छूट जाने पर
औरत हो जाती है
कटे हुए नाखूनों,
कंघी में फँसकर बाहर आए केशों-सी
एकदम से बुहार दी जाने वाली?

घर छूटे, दर छूटे, छूट गए लोग-बाग,
कुछ प्रश्न पीछे पड़े थे, वे भी छूटे!
छूटती गई जगहें।

परम्परा से छूटकर बस यह लगता है-
किसी बड़े क्लासिक से
पासकोर्स बीए के प्रश्नपत्र पर छिटकी
छोटी-सी पंक्ति हूँ-
चाहती नहीं लेकिन
कोई करने बैठे
मेरी व्याख्या सप्रसंग!

सारे सन्दर्भों के पार
मुश्किल से उड़कर पहुँची हूँ,
ऐसे ही समझी-पढ़ी जाऊँ
जेसे अधूरा अभंग!*
*तुकाराम के ‘अभंग’ मन में थे।

WITHOUT A PLACE

This is how the shloka goes —
    women, nails and hair
    once they’ve fallen
    just can’t be put back in place
said our Sanskrit teacher.

Frozen in place out of fear
we girls held on tight to our seats.
                    Place, what is this ‘place’?
We were shown our place
in the first grade.
We remembered our elementary school lessons
    Ram, go to school, son,
    Radha, go and cook pakora!
    Ram, sip sugar syrup,
    Radha, bring your broom!
    Ram, bedtime, school tomorrow
    Radha, go and make the bed for brother.
    Aha! This is your new house
    Look Ram! Here’s your room
                           “And mine?”
    Oh, little loony!
       Girls are wind, the sun and the good earth  
       They have no homes
           “Those who don’t have a home,
                  where do they belong?”

Which is the place from where we fall
become clipped nails, fallen hair trapped in combs,
fit only to be swept away
Houses left behind, paths left behind
people were left behind
questions chasing us, too left behind
Leaving behind tradition,
it seems to me I’m as out of context
as a short line
from a great classic
scribbled on a  BA examination paper


But I don’t want
somebody to sit down and
analyse me
to pigeonhole me
At long last, beyond all contexts
with real difficulty
I’ve gotten here


Let me be hummed
like an abhang,
unfinished.


Translation: Arlene Zide and Anamika

चकमक पत्थर

जब-तब वह मुझे टकरा जाता है।
दो चकमक पत्थर हैं शायद हम
लगातार टकराने से
हमारे बीच चिनकता है
आग का संक्षिप्त हस्ताक्षर
बस एक इनिशियल

जैसा कि विड्राअल फार्म पर
करना होता है
कट-कुट होते ही।

क्यों होती है इमसे इतनी कट-कुट आखिर?
क्या खाते में कुछ बचा ही नहीं है?
खाता और उसका?

उसका खाता बस इतना है
वह खाता है
धूँधर माता की कसम
और धन्धे की
‘पेट में नहीं एक दाना गया है
अगरबत्तियाँ ले लो-दस की दो!’

इस नन्हें सौदागर सिन्दबाद से कोई
कहे भी तो क्या और कैसे?
बीच समुन्दर में उलटा है इसका जहाज।
अबाबील की चोच में लटके-लटके

और कितनी दूर उड़ना होगा इसको
इस जनसमुद्र की दहाड़ रही लहरों पर?
वह मेरे बच्चे से भी कुछ छोटा ही है।
एक दिन फ्लाईओवर के नीचे मुझको दीखा
मस्ती में गोल-गोल दौड़ता हुआ।

‘ओए, की गल है?
अकेले-अकेले ये क्या खा रहा है?’ मैंने जब पूछा,
एक मिनट को वह रुका, बोला हँसकर
‘कहते हैं इसको ईरानी पुलाव।
सुबह-सुबह होटल के पिछवाड़े बँटता है!
खाने पर पेट जोर से दुखता है,
लेकिन भरा हो तो दुखने का क्या है!
तीस बार गोल-गोल दौड़ो
फिर मजे में थककर सो जाओ!
खाना है ईरानी पुलाव?’

सत्रह बरस का प्रतियोगी परीक्षार्थी

दूध जब उतरता है पहले-पहले, बेटा,
छातियों में माँ की
झुरझुरी जगती है पूरे बदन में!
उस दूध का स्वाद अच्छा नहीं होता,
पर डॉक्टर कहते हैं उसको चुभलाकर पी जाए बच्चा
तो सात प्रकोपों में भी जी जाए बच्चा!
उस दूध की तरह होता है, बेटे
पहली विफलता का स्वाद!

भग्नमनोरथ भी तो रथ ही है
भागीरथी जानते थे, जानता था कर्ण,
जानते थे राजा ब्रूस मकड़जाले वाले
और तुम भी जान जाओगे
कुछ होने से कुछ नहीं होता,
कुछ खोने से कुछ नहीं खोता!
पूर्णविराम कल्पना है,
निष्काम होने की कामना
भी आखिर तो कामना है!

सिलसिले टूटते नहीं, रास्ते छूटते नहीं।
पाँव से लिपटकर रह जाते हैं एक लतर की तरह
जूते उतारो घर आकर तो मोजे में तिनके मिलेंगे लतर के!
तुम्हें एक अजब तरह की दुनिया
दी है विरासत में
हो सके तो माफ कर देना!

फूल के चटकने की आवाज़ यहाँ किसी को भी
सुनाई नहीं देती,
कोई नहीं देखता कैसे श्रम, कैसे कौशल से
एक-एक पंखुड़ी खुली थी!

यह फल की मंडी है, बेटा,
सफल-विफल लोग खड़े हैं क्यारियों में!
चाहती थी तुम्हें मिलती ऐसी दुनिया
जहाँ क्यारियों में अँटा-बँटा, फटा-चिटा
मिलता नहीं यों किसी का वजूद!

हर फूल अपनी तरह से सुन्दर है
प्रतियोगिता के परे जाती है
हरेक सुन्दरता!

और ‘भगवद्गीता’ का वह फल?
वह तो भतृहरि के आम की तरह
राजा से रानी, रानी से मन्त्री,
मन्त्री से गणिका, गणिका से फिर राजा के पास
टहलता हुआ आ तो जाएगा
रोम-रोम की आँखें खोलता हुआ!
पसिनाई पीठ पर तुम्हारी
चकत्ते पड़े हैं
खटिया की रस्सियों के!
ऐसे ही पड़ते हैं शादी में
हल्दी के छापे,
पर शादी की सुनकर भड़कोगे तुम!

कल रात बिजली नहीं थी।
मोमबत्ती की भी डूब गई लौ
तो किताब बन्द की तुमने
और अँधेरे में
चीजों से टकराते
हड़बड़-दड़बड़ आकर बोले
‘माँ, भूख लगी है!’

इस सनातन वाक्य में
एक स्प्रिंग है लगा,
कितनी भी हो आलसी माँ,
वह उठ बैठती है
और फिर कनस्तर खड़कते हैं
जैसे खड़कती है सुपली
दीवाली की रात
जब गाती हैं घर की औरतें
हर कमरे में सुपली खड़कातीं
‘लक्ष्मी पइसे, दरिद्दर भागे, दरिद्दर भागे, दरिद्दर भागे!’
दारिद्रय नहीं भागता, भाग जाती है नींद मगर।
तरह-तरह के अपडर
निश्शंक फर्श पर टहलते मिल जाते हैं,
कैटवाक पर निकला मिलता है भूरा छुछूँदर!

छुछूँदर के सिर में चमेली का तेल
या भैंस के आगे बजती हुई बीन
या दुनिया की सारी चीजें बेतालमेल
ब्रह्ममुहर्त के कुछ देर पहले की झपकी के
एक दुःस्वप्न में टहल आती है,
और भला हो ईंटो की लॉरी का
कि उसकी हड़हड़-गड़गड़ से
दुःस्वप्न जाता है टूट,
खुल जाती हैं आँखें,
कहता है बेटा,
‘माँ, ये दुख क्यों होता है,
इसका करें क्या?’
सूखी हुई छातियाँ मेरी
दूध से नहीं लेकिन उसके पसीने से तर हैं!
मैं महामाया नहीं हूँ, ये बुद्ध नहीं है,
लेकिन यह प्रश्न तो है ही जहाँ का तहाँ, जस का तस!

एक पुरानी लोरी में
स्पैनिश की टेक थी
‘के सेरा-सेरा... वाटेवर विल बी, विल बी...
ये मत पूछो कल क्या होगा, जो भी होगा, अच्छा होगा!’

मैं बेसुरा गाती हूँ, वह हँसने लगता है
‘बस, ममा, बस आगे याद है मुझे!’
रात के तीसरे पहर की ये मुक्त हँसी
झड़ रही है पत्तों पर
ओस की तरह!
आगे की चिन्ता से परेशान उसके पिता
नींद में ही मुस्का देते हैं धीरे से!
उत्सव है उनका ये मुस्काना
सुपरसीरियस घर में!

एक औरत का पहला राजकीय प्रवास

वह होटल के कमरे में दाखिल हुई!
अपने अकेलेपन से उसने
बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया!
कमरे में अँधेरा था।
घुप्प अँधेरा था कुएँ का
उसके भीतर भी!

सारी दीवारें टटोलीं अँधेरे में,
लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था!
पूरा खुला था दरवाजा,
बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था!
सामने से गुजरा जो ‘बेयरा’ तो
आर्त्तभाव से उसे देखा!
उसने उलझन समझी और
बाहर खड़े-ही-खड़े
दरवाजा बन्द कर दिया!

जैसे ही दरवाजा बन्द हुआ,
बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल!
“भला बन्द होने से रोशनी का क्या है रिश्ता?”
उसने सोचा।
डनलप पर लेटी
चटाई चुभी घर की
अन्दर कहीं-रीढ़ के भीतर!

तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत?
सात गलीचों के भीतर भी
उसको चुभ जाता है
कोई मटरदाना
आदिम स्मृतियों का?

पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था,
पर उसने बाँची टेलिफोन तालिका
और जानना चाहा
अन्तर्राष्ट्रीय दूरभाष का
ठीक-ठाक खर्चा।
फिर अपने सब डॉलर खर्च करके
उसने किए तीन अलग-अलग कॉल!
सबसे पहले अपने बच्चे से कहा
“हलो-हलो, बेटे
पैकिंग के वक्त... सूटकेस में ही तुम ऊँघ गए थे कैसे...
सबसे ज्यादा याद आ रही है तुम्हारी
तुम हो मेरे सबसे प्यारे!”

अन्तिम दोनों पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहीं
ऑफिस में खिन्न बैठ अंट-शंट सोचते अपने प्रिय से,
फिर चौके में चिन्तित, बर्तन खटकती अपनी माँ से!
...अब उसकी हुई गिरफ्तारी।

पेशी हुई खुदा के सामने
कि इसी एक जुबाँ से उसने
तीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा
“सबसे ज्यादा तुम हो प्यारे!” यह तो सरासर धोखा
सबसे ज्यादा माने सबसे ज्यादा!
लेकिन ख़ुदा ने कलम रख दी,
और कहा “औरत है, उसने यह गलत नहीं कहा।”

पतिव्रता

जैसे कि अंग्रेजी राज में सूरज नहीं डूबा था,
इनके घर में भी लगातार
दकदक करती थी
एक चिलचिलाहट।
स्वामी जहाँ नहीं भी होते थे
होते थे उनके वहाँ पंजे,
मुहर, तौलिए, डंडे,
स्टैंप-पेपर, चप्पल-जूते,
हिचकियाँ-डकारें-खर्राटे
और त्यौरियाँ-धमकियाँ-गालियाँ खचाखच।
घर में घुसते ही
ज़ोर से दहाड़ते थे मालिक और एक ही डाँट पर
एकदम पट्ट
लेट जाती थीं वे
दम साधकर,
जैसे कि भालू के आते ही
लेट गया था
रूसी लोककथा का आदमी
सोचता हुआ कि मर लेते हैं कुछ देर,
मरे हुए को भालू और नहीं मारेगा।
एक दिन किसी ने कहा
‘कह गए हैं जूलियस सीजर
कि बहादुर मरता है केवल एक बार,
कायर ही करते हैं,
बार-बार मरने का कारबार।

जब तुमने ऐसी कुछ गलती नहीं की,
फिर तुम यों मरी हुई बनकर क्यों लेटी?’
तबसे उन्हें आने लगी शरम-सी
रोज़-रोज़ मरने में...
एक बार शरमातीं, लेकिन फिर कुछ सोचकर
मर ही जातीं,
मरती हुई सोचतीं
‘चिडि़या ही होना था तो शुतुर्मुर्ग क्यों हुई मैं,
सूंघनी ही थी तो कोई लाड़ली नाक मुझे सूंघती
यह क्या कि सूंघा तो सांप।’
और कुछ दिन बीते तो किसी ने उनको पढ़ाई
...गांधी जी की जीवनी,
सत्याग्रह का कुछ ऐसा प्रभाव हुआ,
बेवजह टिटने के प्रतिकार में वे
लम्बे-लम्बे अनशन रखने लगीं।
चार-पांच-सात शाम खटतीं वे निराहार
कि कोई आकर मना ले,
फिर एक रात
गिन्न-गिन्न नाचता माथा
पकड़े-पकड़े जा पहुँचतीं वे चौके तक
और धीरे-धीरे खुद काढ़कर
खातीं बासी रोटियाँ
थोड़ा-सा लेकर उधार नमक आँखों का।
तो, सखियो, ऐसा था कलियुग में जीवन
पतिव्रता का...
आगे कथा
सती के ही मुख से
सती की व्यथा
‘नहीं जानती कि ये क्या हो गया है,
गुस्सा नहीं आता।
मन मुलायम रहता है
जैसे कि बरसात के बाद
मिट्टी मुलायम हो जाती है कच्चे-रस्ते की!
काम बहुत रहता है इनको।
ठीक नहीं रहती तबीयत भी।
अब छाती में इतना जोर कहाँ
चिल्लाएँ, झिड़कें या पीटें ही बेचारे!
धीरे-धीरे मैं भी हो ही गई पालतू।
बीमार से रगड़ा क्या, झगड़ा क्या,
मैंने साध ली क्षमा।
मीठे लगते हैं खर्राटे भी इनके।
धीमे-धीमे ही कुछ गाते हैं
अपने खर्राटों में ये।
कान लगाकर सुनती रहती हूँ
शायद मुझे दी हो सपनों में आवाज़।
कोई गुपचुप बात मेरे लिए दबा रखी हो
इतने बरसों से अपने मन में
कोई ऐसी बात
जो रोज़ इतने दिन
ये कान सुनने को तरसे...
कोई ऐसी बात जिससे बदल जाए
जीवन का नक्शा,
रेती पर झम-झम-झमक-झम कुछ बरसे...!’

वृद्धाएँ धरती की नमक हैं

‘कपड़ा है देह’... ‘जीर्णाणि वस्त्राणि’... वाला
यह श्लोक ‘गीता’ का, सुना था कभी बहुत बचपन में
पापा के पेट पर
पट्ट लेटे-लेटे!

सन्दर्भ यह है कि
दादाजी गुजर गए थे,
रो रहे थे पापा धीरे-धीरे
और हल्की हिचकियों से
हिल जाता था जो कभी पेट उनका,
मुझको हिचकोले का आनन्द आता था,
हालाँकि डरी हुई थी मैं यों सबके एकाएक रो पड़ने से,
बहुत चकित थी कि जो कभी नहीं रोते थे,
केवल रुलाते थे,
वे सब भी आज रो रहे हैं बुक्का फाड़े,
डरी हुई-सहमी हुई थी
तभी तो यों चिपकी थी पापा से
पसीने से तर उनके बनियान की तरह
जो शायद फटी भी हुई थी।


समझा रहा था कोई उनको
‘क्यों रो रहे कि
यह देह कपड़ा है,
फटा हुआ कपड़ा बदल देती है आत्मा तो
इसमें रोना क्या, धोना क्या!’

मैं क्या समझी, क्या नहीं समझी
अब कुछ भी याद नहीं,

अब बस इतना जानती हूँ ‘जीर्णाणि-वस्त्राणि’ के नाम पर
कपड़े जब तार-तार होने लगते हैं,
बढ़ जाती है उनकी उपयोगिता!

फटे हुए बनियान बन जाते हैं झाड़न
और पुराने तौलिए पोंछे का कपड़ा।
फटी हुई साडि़याँ दुपट्टे बन जाती हैं,
बन जाती हैं बच्चों की फलिया।
धोती के कोरों का अच्छा बनता है इजारबन्द,
कहीं-न-कहीं सबसे मिल जाता है उनका तार-छन्द
जो फटकर तार-तार हो जाते हैं
सार्वजनिक बन जाती है जिनकी निजता!

वृद्धाएँ धरती का नमक हैं,
किसी ने कहा था!

जो घर में हो कोई वृद्धा
खाना ज्यादा अच्छा पकता है,
पर्दे-पेटीकोट और पायजामे भी दर्जी और रफ़ूगरों के
मुहताज नहीं रहते,

सजा-धजा रहता है घर का हर कमरा,
बच्चे ज्यादा अच्छा पलते हैं,
उनकी नन्ही-मुन्नी उल्टियाँ सँभालती
जगती हैं वे रात-भर,
उनके ही संग-साथ से भाषा में बच्चों की
आ जाती है एक अजब कौंध
मुहावरों, मिथकों, लोकोक्तियों,
लोकगीतों, लोकगाथाओं और कथा-समयकों की।
उनके ही दम से
अतल कूप खुद जाते हैं बच्चों के मन में
आदिम स्मृतियों के।
घुल जाती हैं बच्चों के सपनों में
हिमालय-विमालय की अतल कन्दराओं की
दिव्यवर्णी-दिव्यगन्धी जड़ी-बूटियाँ और फूल-वूल!

रहती हैं वृद्धाएँ घर में रहती हैं
लेकिन ऐसे जैसे अपने होने की खातिर हों क्षमाप्रार्थी

लोगों के आते ही बैठक से उठ जाती,
छुप-छुपकर रहती हैं छाया-सी, माया-सी!
पति-पत्नी जब भी लड़ते हैं उनको लेकर
कि तुम्हारी माँ ने दिया क्या, किया क्या

कुछ देर वे करती हैं अनसुना,
कोशिश करती हैं कुछ पढ़ने की,
बाद में टहलने लगती हैं,
और सोचती हैं बेचैनी से ‘गाँव गए बहुत दिन हो गए!’

उनके बस यह सोचने-भर से
जादू से घर में सब हो जाता है ठीक-ठाक,
सब कहते हैं, ‘अरे, अभी कहाँ जाओगी,

अभी तो हमें जाना है बाहर, बच्चों को रखेगा कौन?’
कपड़ों की छाती जब फटती है
बढ़ जाती है उनकी उपयोगिता।


दलाईलामा

दलाईलामा लगातार हँसते हुए
सम्बोधित कर रहे थे
एक बड़ी जनसभा!
दुभाषिया बहुत गम्भीर था।
उसको हँसने की फुर्सत ही नहीं थी!
अंग्रेजी के जाल में सावधानी से
पकड़ रहा था तिब्बती भाषा की तितलियाँ
जो लामा के फूल जैसे होंठों से उड़ती-उड़ती
कभी तिब्बती बच्चों के कान पर बैठ जाती थीं
कभी उनकी माँओ के चमकीले परिधानों पर
जो उनकी शादी के जोड़े थे शायद!
(गिने-चुने आयोजनों पर निकलते थे,
फिर भी किनारों से फटने लगे थे!
वैसे, चमक उन पर
खूब महीन ज़री के काम की
अभी बरकरार थी
बूढ़ी आँखों में उम्मीद की इक टिमक जितनी!)
आर्य सत्य समझा रहे थे दलाई लामा!
कुछ कहते-कहते जो हाथ उठाया
उनकी बाईं बाँह पर मुझको दीखा
बचपन में कभी पड़ा चेचक का टीका: ऐकिक नियम के सवालों के
‘थेयरफोर’ की शकल का।
और फिर सहसा ही कौंधा
‘अरे-अरे, यह ऐसी बातें करने वाला
इसी लोक का है, इस युग का है और
आदमी है!’
मेरे बिल्कुल सामने
प्रवचन-मग्न बाबा के कन्धों पर बैठे
इस गुलथुल बच्चे की तरह कभी
गुटुर-गुटुर दूध पिया होगा उन्होंने
खुद दुधपिलाई उठाकर,
खुद पोंछ ली होगी नाक कभी स्वेटर से
माँ को कहीं काम में मग्न पाकर!
क्या जानते हैं हम तिब्बत के बारे में
दलाई, राहुल सांकृत्यायन और रेनपोचे, मानेस्ट्री,
चाउमीन, सस्ते स्वेटर-चप्पल, चीन, बरफ,
खोई आँखें, भोले चेहरे और वफादार कुत्ते!
आर्य सत्य क्या करता होगा
चिन्दी-चिन्दी बिखरे जीवन के
अनार्य सत्यों का?
सच्चाई की भी क्या होती है श्रेणियाँ?
अलग-अलग होती है जातियाँ
सच्चाई की भी?
ऊपर परम सत्य,
नीचे फिर और क्षुद्र सच्चाइयाँः
भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी, मोह-क्रूरता,
प्रेम और नफरत
सचमुच क्या होते हैं ये सत्य क्षुद्रतर?
दलाई, आप ही बताएँ
ऊँची-नीची होती हैं क्या
सत्य-मेखलाएँ
जैसे पर्वत-शृंखलाएँ?
मैं तो किसी छोटे-से सच की
गहरी गुफा में रहूँगी,
कभी-कभी मिलने आऊँगी, दलाई तो
बाकी बड़े सत्य तब ही समझूँगी!

DALAI LAMA

The Dalai Lama continues to laugh
addressing
a large audience.

The interpreter is super-serious
has no time for laughter
The English was like a net
the Tibetan words butterflies,
flew from the flower-petal lips of the Dalai Lama
sometimes to sit on the ears of the Tibetan kids
sometimes on the gold-flecked robes,
maybe the wedding dresses
of the Tibetan women
taken out only on special occasions
but worn away at the hems
this bit of sparkle left
like the trace of light  in aged eyes.

The Dalai Lama was expounding
the Four Noble Truths of Buddhism
He raised his arm and
like three little dots of ‘therefore’
there were the marks of childhood vaccination
peeping through his ochre robe.
They whispered:
   Aha, someone is talking about such high principles
            but is from this very world
            this very epoch
            and he’s just a  man.

Right in front of me, rapt, a grandfather
on his shoulder  a chubby little boy and his gurgling bottle
wiping his running nose
on grandpa’s sweater —
He must have been like that  —
the Dalai Lama
What do we know of Tibet  —
Rahul Sanknityayan or Rinpoches
monasteries and chow mein
cheap sweaters and sandals, China,
snow, lost eyes, round faces and faithful Lhasa Apso pups.

How do those noble truths
connect with
such random bits,
the ignoble truths of life?

Does truth too have hierarchies?
A caste system?  —
Brahmin truths at the top
and then the Shudra  truths at the bottom?

Hunger and
thirst
heat and cold
attachment and cruelties
Love and hate  —
are these truths really lower?

Dalai Lama, you tell me, please:
if the truth is like these mountain ranges —
high and low.
I prefer living in the deep cave of a small truth
occasionally coming to you
to learn the nobler truths of life.


Translation:  Arlene Zide and Anamika




बेरोजगार

किसी कॉलसेण्टर के
घचर-पचर-सा रतजगा जीवन
क्या जाने कब बन्द हो जाए!
इन दिनों पढ़ता हूँ बस पुरातन लिपियाँ
सिन्धु घाटी सभ्यता की पुरातन लिपि
पढ़ लेता हूँ थोड़ी-थोड़ी!
हर भाषा है दर्द की भाषा
जबसे समझने लगा हूँ
चाहे जिस भाषा में लिखी हो
मैं बाँच सकता हूँ चिट्ठी!
अपने अनन्त खालीपन में
यही एक काम किया मैंने
हर तरह के दर्द की डगमग
स्वरलिपियाँ सीखीं!
मुझमें भी एक आग है
लिखती है तो कुछ-कुछ
हवा के फटे टुकड़े पर
और फिर उसको मचोड़ कर
डालती है सूखी खटिया के नीचे!
ये टुकड़े खोलकर कभी-कभी
माँ पढ़ती है
और फिर चश्मे पर जम जाती
है धुंध।
यही एक बिन्दु है जहाँ आग मेरी
हो जाती है पानी-पानी।
ये मेरे बँधे हुए हाथ हैं अधीर।
ये कुछ करना चाहते हैं।
इनमें है अभी बहुत जांगर,
ये पहाड़ खोदकर बहा सकते हैं
दूध की धारा।
इनको नहीं होती चिन्ता
कि होगा क्या जो पहाड़ खोदे पे
निकलेगी चुहिया।
खुरदुरे और बहुत ठंडे हैं
ये मेरे बँधे हुए हाथ
चुनी नहीं इन्होंने झरबेरियाँ अब तक
बुहारी नहीं कभी झुक कर
अपनी धरती की मिठास
आखिरी कण तक।
कभी कोई पैबंदवाला दुपट्टा
फैला ही नहीं सामने इनके
झरबेरियाँ माँगता हँसकर।
चाँद अब उतना पीला भी तो नहीं रहा
उसके पीलेपन पर पर्त पड़ गई है
धूसर-धूसर!
उतनी तो चीकट नहीं होती
चीमड़ से चीमड़ बनिये की बही।
अनब्याही दीदी के रूप की तरह
धीरे-धीरे ढल रही धूप
भी उतनी धूसर, उतनी ही थकी हुई।
ऐ तितली, बोलो तो
कितना है दूर रास्ता
आखिरी आह से
एक अनन्त चाह का?
‘चाहिए’ किस चिडि़या का नाम है?
यह कभी यह
तुम्हारे आँगन में उतरी है?
बैठी है हाथों पर?
फिर कैसे कहते हैं लोग-
हाथ की एक चिडि़या
झुरमुट की दो चिडि़यों से बेहतर।
मलता हुआ हाथ
सोचता हूँ अक्सर-
क्या मेरे ये हाथ हैं
दो चकमक पत्थर?

UNEMPLOYED

These days I’m reading only ancient scripts
Can manage to make out even the Harappan script
Every language is a language of pain
ever since I understood
I could read a message even
in the most obscure of languages
In my own infinite emptiness
this is the only thing I’ve done
I’ve learned the tottering notation of music
in every tone of pain
There’s a fire in me
to write something on pages of the wind
and then crumple them  up and toss them under the broken charpoy
Unfolding these crumpled scraps,
my mother reads them
and her glasses  fog up
This is where my fire gets transformed into water.

My bound hands are restless
they want to do something
There’s strength in them still.
Milk, they can draw from the breasts of the mountain
What if only a mouse turns up
when you’ve dug it all up?

My bound hands are rough and cold —
they’ve never had the chance to sweep up the sweetness of the earth
Never has a tattered dupatta been spread out in these hands
and laughingly begged those berries.

The moon is no longer that pale
There’s a layer of dirt on its yellowness
it‘s as grungy as the grayed pages of a miserly bania’s ledger
The sunlight slowly fading,
like the tired dusty beauty of an unwed elder sister

Hey, butterfly, tell me
how far is the last sigh from infinite desire.
This ‘should’, what kind of a bird is this?
Has it ever alighted in your courtyard?
perched on your hand?
So how can they say
a bird in the hand is worth more
than two in the bush?

Wringing my hands, I often wonder
are my hands like two flints
will they ever trigger  fire?
I never get a wink of sleep
My life is the chaos at a call-centre
that might close down any moment, who knows?



Translation:  Arlene Zide and Anamika

आम्रपाली

था आम्रपाली का घर
मेरी ननिहाल के उत्तर!
आज भी हर पूनो की रात
खाली कटोरा लिए हाथ
गुजरती है वैशाली के खंडहरों से
बौद्धभिक्षुणी आम्रपाली।

अगल-बगल नहीं देखती,
चलती है सीधी मानो खुद से बातें करती
शरदकाल में जैसे
(कमंडल-वमंडल बनाने की खतिर)
पकने को छोड़ दी जाती है
लतर में ही लौकी
पक रही है मेरी हर मांसपेशी,
खदर-बदर है मेरे भीतर का
हहाता हुआ सत!

सूखती-टटाती हुई
हड्डियाँ मेरी
मरे कबूतर-जैसी
इधर-उधर फेंकी हुई मुझमें
सोचती हूँ क्या वो मैं ही थी
नगरवधू-बज्जिसंघ के बाहर के लोग भी जिसकी
एक झलक को तरसते थे?
ये मेरे सन-से सफेद बाल
थे कभी भौंरे के रंग के कहते हैं लोग,
नीलमणि थीं मेरी आँखें
बेले के फूलों-सी झक सफेद दन्तपंक्तिः
खंडहर का अर्द्धध्वस्त दरवाजा हैं अब जो!
जीवन मेरा बदला, बुद्ध मिले,
बुद्ध को घर न्योतकर
अपने रथ से जब मैं लौट रही थी

कुछ तरुण लिच्छवी कुमारों के रथ से
टकरा गया मेरे रथ का
धुर से धुर, चक्के से चक्का, जुए से जुआ!
लिच्छवी कुमारों को ये अच्छा कैसे लगता,
बोले वे चीख़कर
“जे आम्रपाली, क्यों तरुण लिच्छवी कुमारों के धुर से
धुर अपना टकराती है?”

“आर्यपुत्रो, क्योंकि भिक्खुसंघ के साथ
भगवान बुद्ध ने भात के लिए मेरा निमन्त्रण किया है स्वीकार!”
“जे आम्रपाली!
सौ हजार ले और इस भात का निमन्त्रण हमें दे!”
“आयपुत्रो, यदि तुम पूरा वैशाली गणराज्य भी दोगे,
मैं यह महान भात तुम्हें नहीं देने वाली!”
मेरा यह उत्तर सुन वे लिच्छवी कुमार
चटकाने लगे उँगलियाँः
‘हाय, हम आम्रपाली से परास्त हुए तो अब चलो,
बुद्ध को जीतें!’
कोटिग्राम पहुँचे, की बुद्ध की प्रदक्षिणा,
उन्हें घर न्योता,
पर बुद्ध ने मान मेरा ही रखा
और कहा ‘रह जाएगी करुणा, रह जाएगी मैत्री,
बाकी सब ठह जाएगा...’
“तो बहा काल-नद में मेरा वैभव...
राख की इच्छामती,
राख की गंगा,
राख की कृष्णा-कावेरी,
गरम राख की ढेरी
यह काया
बहती रही
सदियों
इस तट से उस तट तक!
टिमकता रहा एक अंगारा,
तिरता रहा राख की इस नदी पर
बना-ठना

ठना-बना
तैरा लगातार!

तैरी सोने की तरी!
राख की इच्छामती!
राख की गंगा!
राख की कृष्णा-कावेरी।

झुर्रियों की पोटली में
बीज थोड़े-से सुरक्षित हैं
वो ही मैं डालती जाती हूँ
अब इधर-उधर!
गिर जाते हैं थोड़े-से बीज पत्थर पर,
चिडि़या का चुग्गा बन जाते हैं वे,
बाकी खिल जाते हैं जिधर-तिधर
चुटकी-भर हरियाली बनकर।”

सुनती हूँ मैं गौर से आम्रपाली की बातें
सोचती हूँ कि कमंडल या लौकी या बीजकोष
जो भी बने जीवन, जीवन तो जीवन है!
हरियाली ही बीज का सपना,
रस ही रसायन है!

कमंडल-वमंडल बनाने की खातिर
शरदकाल में जैसे पकने को छोड़ दी जाती है
लतर में ही लौकी
पक रही है मेरी हर मांसपेशी तो पकने दो, उससे क्या?
कितनी तो सुन्दर है
हर रूप में दुनिया!

शब्दांकन पर अनामिका की कुछ और कवितायेँ

बस्ती निज़ामुद्दीन अंक-I 

मध्यकालीन स्त्रियाँ: वो हँसी बहुत कुछ कहती थी 

दिल्ली: गली मुहल्ले की वे औरतें: 1275


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