शिवमूर्ति — कुच्ची का कानून — भाग 2— अविस्मरणीय कहानी #कुच्ची


यह तो कहो कि अभी काकी जिन्दा हैं। न होतीं तो कौन रात के अंधेरे में अपनी औरत को काका का पैर दबाने के लिए भेज देता, कोई ठिकाना है। कौन कब बूढ़े को रातोंरात बोलेरो में बैठा कर ले उड़े। 
शिवमूर्ति की अविस्मरणीय कहानी — #कुच्ची का कानून

कुच्ची का कानून 

(भाग - २)

शिवमूर्ति



कुच्ची का कानून

बजरंगी की लाश चिता पर रखने के साथ ही किसी चोर दरवाजे से बनवारी के मन में यह बात आयी थी कि अब बजरंगी की खेतीबारी, घरदुआर पर उसी का हक है। खून के रिश्ते में सबसे नजदीक वही ठहरता है। जगेसर, रमेसर दो सगे भाई। जगेसर से वह और रमेसर से बजरंगी। उसे आज से ही काका काकी का विश्वास हासिल करना होगा। पूरे चार बीघे की खेती है। चार बीघे का लालच कम नहीं होता। जमीन की कीमत पिछले पांच छः साल में किस तरह आसमान पर चढ़ी है इसे क्या किसी को बताने की जरूरत है। यह तो कहो कि अभी काकी जिन्दा हैं। न होतीं तो कौन रात के अंधेरे में अपनी औरत को काका का पैर दबाने के लिए भेज देता, कोई ठिकाना है। कौन कब बूढ़े को रातोंरात बोलेरो में बैठा कर ले उड़े। तहसील ले जाकर खुद को वारिस दर्ज करा ले या घरबार, खेतीबारी की रजिस्ट्री करा ले, कोई ठिकाना है। जालिया लोगों के गिरोह मोटर साइकिल पर इन दिनों गांव-गांव घूम रहे हैं। किसकी खतौनी लगा कर दस पांच लाख का लोन ले उड़ें कोई ठिकाना है। बूढ़े, अशक्त, नावल्द या विधवा, तो उनके लिए नरम चारा हैं। पकड़ में भी आ गये, मुकदमेबाजी भी हो गयी तो उन्हें चिन्ता नहीं। मुकदमे का फैसला होने के पहले वे बूढ़े, विधवाएं बैकुंठधाम चले जायेंगे। इसलिए न सिर्फ काका काकी के खाने पीने का बढ़िया इंतजाम करना है बल्कि उनकी चौकीदारी भी करनी है। कौन उनके घर आ जा रहा है, इस पर नजर रखनी होगी। उसने अपनी सुलछनी को अच्छी तरह समझा दिया है कि सुबह शाम जाकर हालचाल लेती रहे। क्रियाकर्म का खर्चवर्च भले काका ने किया लेकिन दौड़धूप का सारा काम उसी ने संभाला। यह औरत पता नहीं क्यों अब अपना रास्ता नहीं लेती, वरना वह काका काकी को अपने चौके में ही खिलाने लगता। बाप तो विदा कराने आया ही था। गांव की औरतें राह का रोड़ा बन गयीं। काकी को भी उसी समय दांती लगनी थी। बेटा मरा तो नहीं लगी दांती और पतोह जाने लगी तो दांती लग गयी। उसने सुलछनी को भी सहेज दिया है कि जितनी जल्दी हो सके इस औरत के लिए दूसरा घर वर खोजने में अपने भाइयों को लगा दे।

इस औरत के जाते ही वह सबसे पहले काका को तहसील ले जाकर खतौनी में अपनी वरासत दर्ज करायेगा। फिर दोनों को लेकर उधर से ही चारों धाम की यात्रा पर निकल जायेगा। इस साल बजरंगी दोनों लोगों को भेजने ही वाला था। कहूंगा बजरंगी नहीं है तो क्या? मैं कोई गैर हूं। मैं भी तो बेटा ही हूं। सिर्फ खर्चा नहीं दूंगा साथ-साथ चलूंगा भी। सगे बेटे से बढ़ कर सेवा करूंगा।

कहते हैं बदरीनाथ का रास्ता इतना बीहड़ है कि कब कौन किस खड्ड में समा गया कुछ पता नहीं चल सकता। सीधे पातालपुरी पहुंचता है गिरने वाला। पहले के जमाने में तो जाने वाला अपना अच्छत, चावल, छीट परोर जाता था, यानी घर परिवार से अंतिम विदा लेकर। लौट आये तो ठीक, नहीं तो जै सियाराम। रोते पीटते लौट कर दोनों का किरियाकरम कायदे से निपटा देना होगा बस।

सहसा एक ख्याल ने उसके बदन में झुरझुरी पैदा कर दी। कहीं इस औरत की कोख में बजरंगी का अंश न ठहर गया हो? तब? आखिर दो महीने हो गये, यह जाती क्यों नहीं? इसके बाप ने लौट कर खबर नहीं ली। बिना इसके गये तो कोई ‘इस्कीम’ आगे बढ़ नहीं सकती।

वह सोचता है कि इतनी गुप्त स्कीम बनाने के पहले गांव के एकाध पिचाली लोगों का मन मुंह भी ले ले। कहीं फंसने फंसाने का खतरा हो तो उसकी काट भी खोज ली जाये। तीन चार दिन पहले बलई बाबा बुलाने आये थे। सुलछनी बता रही थी कि उनकी ट्यूबवेल ने पानी पकड़ना बंद कर दिया है। वह टाल गया था। सोच रहा था कि एकाध चक्कर और लगा लें तब जाय।


बलई बाबा खा पीकर रात के अंधेरे में दुआर से थोड़ा हट कर पाकड़ के पेड़ के नीचे मूंज की चारपायी पर बिना कुछ बिछाये लेटे हैं। नंगे बदन। पसीने से लथपथ। धोती को ऊपर तक खींच कर लंगोट की शक्ल दे दिया है। बाध पर पीठ रगड़ रगड़ कर खुजला रहे हैं। हाथ का बना बेना डुला कर मच्छर भगा रहे हैं।

— बाबा पाय लागी।

बनवारी उनका पैर छूने के साथ साथ दबाने भी लगता है।

— कौन? बनवारी। खुश रहो बेटवा। इतनी रात में?

— आप गये थे न मुझे खोजते हुए घर तक?

— हां हां बेटवा। बोरिंग पानी छोड़ रही है। घंटे भर भी चलना मुश्किल।

— कल आकर देख लेते हैं।

— लेकिन छोड़ काहे रही है?

— पाइप में लीकेज होगा या पानी का लेवल नीचे चला गया होगा। एक लेंथ पाइप लाकर डालना पड़ेगा।

— कितने की आयेगी एक लेंथ? पैसा अभी लेते जाना।

— पैसा कहीं भागा जा रहा है बाबा! पहले ठीक कर दें फिर ले लेंगे।

— बहुत अच्छा किया जो तुमने यह काम सीख लिया। घर का आदमी घर का ही होता है। नहीं तो किसके पास दौड़ कर जाते। और बताओ?

— और क्या बतायें बाबा। भगवान बड़ी विपत्ति में डाल गये। लछिमन जैसा भाई साथ छोड़ कर चला गया। सचमुच बजरंगबली की तरह आज्ञाकारी था। जहां लगा दो, जुट जाता था। उसी के बल पर मैंने बोरिंग का काम इतना फैला लिया था। समझिए दाहिना हाथ टूट गया। अब काका काकी का बोझा भी मेरी खोपड़ी पर आ गया।

— तुम्हारी खोपड़ी पर क्यों? अभी तो रमेसर दोनों प्राणी खुद टांठ हैं।

— रखवाली तो करनी होगी बाबा। पता नहीं कब कौन किधर को भरमाने लगे, बहलाने फुसलाने लगे। प्रापर्टी का मामला बहुत खतरनाक होता है, वारिस कमजोर दिखा तो जमीन फोड़ कर दस दावेदार पैदा हो जाते हैं। बुढ़ापे में बुद्धी भी बहुत आगे पीछे चलने लगती है।

— तो साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि तुम्हारी नजर अभी से रमेसर की जगह जमीन पर लग गयी है। कहने को तो कह दिया लेकिन उन्हें तुरंत महसूस हुआ कि ज्यादा कड़ी बात कह दी। सबेरे उससे ट्यूबवेल बनवाना है। ऐसे में ऐसी कड़ी बात सर्वथा नीति विरुद्ध है।

— जगह जमीन का लालच मुझे नहीं है बाबा। काका जब तक जिन्दा हैं, जोतें बोयें। लेकिन

उसके बाद तो मेरा हक बनता ही है। मैं यह तो न होने दूंगा कि कोई गैर उसके नजदीक फटके। मेरे भी तीन-तीन बेटे हैं।

— तो गैर कहां से आ जायेगा? अभी तो बजरंगी की बेवा ही मौजूद है।

— वही तो! अब उसका यहां क्या काम? दो महीने से खूंटा गाड़ कर बैठी है। जवान, जहान बिना बाल-बच्चे वाली। उसे तो खुद ही अपना रास्ता पकड़ लेना चाहिए था। अब क्या मार कर निकाला जाये तब जायेगी?

— अरे भाई मार कर कैसे निकालोगे? ब्याह कर आयी है। कहने के साथ बलई बाबा ने अपनी जीभ काटी—  यही आदत नहीं गयी उनकी। चाहे जितनी कड़वी हो, सही बात मुंह से निकल कर रहती है। जीभ यह भी नहीं सोचती कि किस आदमी से क्या गरज अटकी है। वे बहकी बात को संभालने की कोशिश करते हैं।

— अगर इतनी दूर की सोच रहे हो तो तुम्हीं क्यों नहीं रख लेते?

— मैं... बनवारी का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया।

— और क्या। लम्बी चौड़ी है, कमासुत है, हंसलोल और जवान है।

— लेकिन वह तो मेरी भयहू लगेगी बाबा। भयहू को तो छू भी नहीं सकते। बजरंगी मुझसे दस साल छोटा था। गोसाई जी बहुत पहले मना कर गये हैं—  अनुज बधू भगिनी सुत नारी...। पाप पड़ेगा।

— पाप तो तब पड़ेगा जब कुदृष्टि से बिलोकोगे। उसे राजी कर लो। उसका मन जीत लो। सौ बात की एक बात, पट जाये तो सब जायज है।

बनवारी का हाथ बाबा के पैरों पर तेज-तेज चलने लगता है। कुछ देर की चुप्पी के बाद फिर कहता है—  मजाक तो नहीं कर रहे हैं बाबा? ऐसा हो सकता है?

— क्यों नहीं? उसे मर्द चाहिए, मर्द मिल जायेगा। तुम्हें परापर्टी चाहिए, परापर्टी मिल जायेगी। रमेसर दोनों परानी को रोटी चाहिए, उनकी रोटी पक्की हो जायेगी। सबका उखड़ा कूल्ह बैठ जायेगा। लेकिन...

— लेकिन क्या बाबा?

— कहते हैं दो औरतों के बीच पड़ा मर्द वैसे ही जलता है जैसे देशी भठ्ठे की ईंट। धुंआ निकलने का रास्ता भी नहीं मिलता। सुलछनी तुम्हारा जीना हराम कर देगी।

बनवारी कहीं खो जाता है। देर तक खोया रहता है। फिर उठते हुए कहता है—  चलता हूं बाबा। ट्यूबेल कल शाम तक पानी देने लगेगी। परनाम।

नयी और मनमाफिक राह पाकर बनवारी का दिमाग और तेज चलने लगा है। इस इलाके में जमीन का रेट पाँच-छः हजार का विस्वा चल रहा है। चार बीघा माने पाँच-छः लाख। सुलछनी इतनी बुद्धू तो है नहीं जो हाथ आती परापर्टी को लात मारे। और मारेगी तो रहेगी कहां? अपनी जनाना का मुंह बंद करना कौन मुश्किल काम है। रोज सुबह-शाम चार डंडा पड़ेगा तो दस दिन में बोलती बंद हो जायेगी।

कुच्ची को उसने कभी भर नजर नहीं देखा। ऐसे तो रोज ही काम पर निकलते समय बजरंगी को लेने उसके दरवाजे पर जाता था। मोटरसाइकिल की आवाज सुनते ही वह खाने के डिब्वे का झोला बजरंगी को पकड़ाने के लिए घूंघट काढ़े निकलती थी। उसकी जवान देह की महक हवा के झोंके के साथ उसकी सांसों में भी समाती थी। हवा के झोंके से कभी घूंघट हिलता तो लाल होंठों के बीच उजली हंसी की झलक भी मिल जाती थी। एकाध बार आंखों की मछलियां घूंघट के पीछे कौंधी भी थीं। ...और आवाज कितनी मीठी है। बोलती है तो लगता है गा रही है। वह कल्पना की आंखों से देखने लगा—  कितनी मोटी-मोटी जंघायें। उसकी आंखों को सबसे ज्यादा पकड़ती हैं, उसकी भरी-भरी छातियां। उनका कदम-कदम पर हिलना, दलकना। बांध कर नहीं रखती। सुलछनी तो एकदम सीक सलाई है। उसका सब कुछ बहुत छोटा-छोटा है। उसके दाहिने पंजे में चुनचुनाहट होने लगी। साल भर पहले बाजार में एक गीत बजता था—  गोरिया कै जोबना खजाना, गोरी दिलदार कब होए?

कैसे कोई दिलदार बनता है?

आड़े ओटे, अंधेरे उजाले में घात लगा कर ‘पटक’ तो कभी भी सकता है, लेकिन पटाना। पटकना जितना आसान, पटाना उतना ही मुश्किल। पटाने की विद्या वह आज तक नहीं सीख पाया... और आज देखो उसी विद्या की जरूरत पड़ गयी।      
क्रमशः...


कुच्ची का कानून
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