रविवार, सितंबर 10, 2017

आपका ऑपरेशन शुरू होने वाला है — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना



विपश्यना — सत्येंद्र प्रताप सिंह — संस्मरण: पार्ट 2

आप भी गजब ही ढा रहे हैं। क्या झमाझम माहौल है। नयनाभिराम। आप हैं कि इनको फैक्टरी का मजदूर या स्कूली बच्चा बना देना चाह रहे हैं, जहां सब एक ही तरह के हों, एक ही हांके पर चल पड़ें। एक ही हांके पर उठें-बैठें। वह थोड़ा सा झेंप से गए, लेकिन उन्होंने फिर कोई प्रतिकार नहीं किया। शायद उन्हें अहसास हो गया हो कि माहौल खूबसूरत, खुशनुमा और रंग बिरंगा ही बेहतर होता है।





सुबह सबेरे हम इगतपुरी स्टेशन पहुंच गए। जैसा कि देश के हर इलाके में होता है, स्टेशन से निकलते ही ऑटो रिक्शा वाले यात्रियों को दौड़ा लेते हैं, वहां भी हुआ। एक ऑटो चालक ने हमें इगतपुरी स्थित ‘विपश्यना विश्व विद्यापीठ’ पहुंचा दिया।

विद्यापीठ के गेट पर स्थित गार्डों ने अंदर जाने दिया। बाएं हाथ की ओर कार्यालय और दाहिने हाथ की ओर रेन-वाटर हार्वेस्टिंग के लिए तालाब और पहाड़। प्राकृतिक सौंदर्य की छंटा पहली बार नजर आई, क्योंकि बारिश की वजह से ऑटो पर पर्दे लगे हुए थे। वहां धम्म सेवक मिले। उन्होंने हाथ जोड़कर अभिवादन किया। विद्यापीठ में बने आवास की ओर ले गए। उन्होंने कहा कि जो बेड खाली हो, वहां अपना सामान रखें, फ्रेश हो लें। उसके बाद नाश्ता कर लें।

आवास डॉर्मेट्री की तरह था। करीब 20 बेड लगे हुए और एक या दो बेड के बीच एक दीवार। लगातार बारिश होने की वजह से डॉर्मेट्री में सिलन की बदबू आ रही थी। उसमें दो टॉयलेट और दो बाथरूम थे। मुझे थोड़ा सा असहज महसूस हुआ कि इसमें 10 रात कैसे काटी जा सकती है? मुझे ब्रश करने में ही 20 मिनट लग जाते हैं। शौचालय जाना, नहाना। अंतर्वस्त्र धुलना। कुल मिलाकर डॉर्मेट्री में अजीब फीलिंग हुई। फिर भी एक बिस्तर पर सामान जमाने के बाद नहाया, जंघिया बनियान साफ किया।

तब तक बुलावा आ गया कि नए आए लोग कार्यालय में पहुंचें। सामान छोड़कर कार्यालय में जाने लगे। धम्म सेवक ने कहा कि सामान भी ले चलना है। भीगी जंघिया-बनियान और तौलिया आदि बैग में पैक किया। इस बीच घर से फोन आया कि क्या स्थिति है, पहुंच गए क्या। मैंने कहा, कुछ खास नहीं। पहुंच गया हूं। ठीक ही है। और थोड़ी वार्ता के बाद झोला-झंटा उठाकर कार्यालय की ओर बढ़ चले।

कार्यालय एक घंटे बाद खुला। वहां धम्म सेवक तैनात थे। उन्होंने सामान जमा कराया। उसके बाद पंजीकरण की पुष्टि की गई। पंजीकरण पुष्ट होने के बाद कहा गया कि आपके पास मोबाइल, पठन पाठन सामग्री, गंडा ताबीज, कंठी माला, जेवर गहने जो भी हों उसे उतारें और जमा करा दें। 300 रुपये छोड़कर पूरे पैसे, क्रेडिट व डेबिट कार्ड भी जमा करा लिए गए। उसी समय आवास भी आवंटित हो गया।

आवास आवंटन, सामान जमा करने, कपड़े की धुलाई के लिए 300 रुपये जमा करने के बाद 11 बज चुके थे। खाने का वक्त था। एक बहुत बड़े हॉल, जिसमें करीब 400 लोगों के एक साथ बैठकर खाने के लिए कुर्सियां लगी हुई थीं, वहां हम लोगों ने खाना खाया। खाना सेल्फ सर्विस थी। भिंडी की मसालेदार सूखी सब्जी, एक रसदार सब्जी, दाल, घी लगी रोटियां और चावल। साथ में छाछ। खाना तो बेहद स्वादिष्ट लगा। यही खाना खाने की आदत सी होने की वजह से बड़ी खुशी हुई कि बगैर मिर्च मसाले वाला ऐसा खाना यहां दे रहे हैं, जिसे मैं आसानी से खा सकता हूं।

Photo from Meena Schaldenbrand's blog
खाने के बाद झोला लेकर आवास तलाशने के लिए निकल पड़े। आवास बहुत देर तक तलाशना पड़ा। वह कार्यालय से सबसे दूर स्थित आवास था। कार्यालय की पहाड़ी से करीब आधे किलोमीटर उतरकर नीचे जाने पर बना था। उन कमरों के बाद केले की खेती थी, जो शायद विपश्यना विद्यापीठ की ही थी। दूसरी ओर नंगे पहाड़ थे। बारिश होने की वजह से उन पर कुछ हरियाली लौटी थी। हिमालय के पहाड़ी इलाके के विपरीत वेस्टर्न घाट का यह पहाड़ नंगा सा था। उस पर पेंड़ पौधे नहीं थे। बारिश की वजह से कुछ घास फूस टाइप हरियाली थी।

मैं आवंटित कमरे में पहुंचा। इत्तेफाक से वह एक कमरे का सेट था, जिससे अटैच टॉयलेट-वाशरूम थे। यह देखकर थोड़ी खुशी हुई कि डॉर्मेट्री की तुलना में यह शानदार है। गजब की राहत मिली। वाशरूम का दरवाजा खोलते ही एक जोर का भभका आया। वह संभवतः विशुद्ध रूप से बगैर किसी केमिकल्स या रूम फ्रेशनर के बगैर, टट्टी की गंध से वाशरूम में पैदा हुई बदबू थी। उसमें कोई एयर फ्रेशनर नहीं था। कोई केमिकल भी नहीं था। दरवाजे पर निर्देश लिखे हुए थे कि कमरा छोड़ने से पहले शौचालय व कमरे की सफाई करके जाएं। जो भी मेरे पहले रहे होंगे, निश्चित रूप से उन्होंने अच्छी सफाई की थी। हां, यह अहसास जरूर मिला कि अगर शौचालय को साफ करने में केमिकल्स का इस्तेमाल न किया जाए, शौचालय में एयर फ्रेशनर न लगाया जाए तो उसकी स्वाभाविक बदबू कैसी हो सकती है।

कमरे में बैग रखकर ट्रेन में मिले अपने विपश्यी साथी के साथ मैं घंटी वाली घड़ी लेने निकल गया। वेबसाइट से पता चला था कि सुबह सबेरे उठना होता है। ऐसे में जगने के लिए घंटी वाली घड़ी ले आएं। साथ ही ताला, छाता, रेनकोट, नहाने का साबुन, कंघी इत्यादि जैसी छोटी छोटी चीजें ले जानी थीं। पत्नी ने जाने के पहले बैग में सारी चीजें सजा दी थीं। घंटी वाली घड़ी नहीं थी। उसे खरीदना था।

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हम लोग करीब 2 किलोमीटर पैदल चलकर विपश्यना विद्यापीठ से बाहर मोहल्ले में आए। वहां कुछ दुकानें थीं। दोपहर होने की वजह से सिर्फ एक दुकान खुली थी। वहां दुकानदार भी विपश्यना केंद्र की जरूरतों को समझते हैं। इसकी वजह से वे पानी की बोतल, घंटी वाली घड़ी, छाता, साबुन, हैंडवाश, मॉस्कीटो क्रीम वगैरा रखते हैं। मैंने घड़ी खरीद ली। उसी बीच तेज बारिश शुरू हो गई। छतरी लगाकर विपश्यना केंद्र के गेट तक आए। गेट में घुसते ही एक खूबसूरत सी गैलरी है, जहां बुद्ध के प्रारंभिक जीवन से लेकर मृत्यु व तमाम राजाओं, सेठों, अंगुलिमाल वगैरा-वगैरा के हृदय परिवर्तन संबंधी कहानियों के बारे में सचित्र जानकारी दी गई है। पूर्णतया वातानुकूलित इस हॉल में पगोडा, उसके शून्यागार और विपश्यना के बारे में डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई जाती है। डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद पता चला कि मंदिर की तरह आकार वाली जो आकृति बनी है, वह स्तूप और म्यामार की वास्तु का मिला जुला रूप है, जिसे पगोडा कहते हैं। पगोडा में शून्यागार होते हैं, जहां बैठकर साधक लोग ध्यान करते हैं।

डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद हम अंदर बढ़े तो दाईं ओर खूबसूरत पार्क बना हुआ है। हालांकि पार्क की खूबसूरती दूर से ही देखने को मिली। उस समय भी बारिश हो रही थी और पार्क को बंद कर दिया गया था। एक बोर्ड पर सूचना लगी हुई थी कि लंबे समय से लगातार बारिश के कारण सड़क व पत्थरों पर फिसलन बढ़ गई है। बुद्ध पार्क में प्रवेश रोक दिया गया है।

कमरे पर लौटे तो पता चला कि घड़ी चल ही नहीं रही है। बड़ी मुसीबत यह कि बारिश में दो किलोमीटर पैदल चलकर जाना। वहां घड़ी वापस करना या नई घड़ी खरीदना और फिर लौटकर आना। लेकिन सुबह 4 बजे तपस्या करने के लिए उठना था और शाम 5 बजे के बाद साधकों को विपश्यना केंद्र से 11 दिन बाहर जाने की मनाही होने वाली थी, इसलिए फिर भागते हुए घड़ी लेने पहुंच गया। संदेह था कि दुकानदार घड़ी बदलेगा, लेकिन उसने बड़ी शालीनता से न सिर्फ घड़ी बदलकर दी, बल्कि कई बार अफसोस भी जताया कि आपको बदलने आना पड़ा। वहां से आकर मैं कमरे पर सो गया।

शाम 5 बजे नाश्ता मिलने वाला था। 5 बजे के नाश्ते में दक्षिण भारतीय सूजी का नमकीन हलवा मिला। वह भी खाने में टेस्टी लगा। उसके अलावा दूध था। दूध भी इच्छानुसार पीने की छूट थी तो मैंने हल्दी मिलाकर दो गिलास दूध पी लिया। फिर इंतजार करने लगे कि आगे क्या होने वाला है। माउथ पब्लिसिटी से ही पता चला कि इसी हॉल में रुकने पर आगे के लिए कुछ निर्देश मिलने वाला है।

मुंबई से आए एक विपश्यी साधक ने यह बताया। उन्हें भी किसी ने बताया ही था। उनको मैंने कहा कि अगर निर्देश नहीं देते हैं, तब भी अच्छा है। अब नाश्ता कर ही लिया है। इसके बाद खाना मिलने वाला नहीं है। चुपचाप चलकर कमरे में सो जाएंगे। मुंबई वाले साधक भी नए नए थे। हम लोग जहां खड़े हुए, सामने महिलाओं के लिए पंजीकरण का कार्यालय था। एक से बढ़कर एक महिलाएं जुटी थीं। एक तो अपने बाल कई रंगों में रंगे हुए एक्सट्रा मॉडर्न दिखी। तमाम लड़कियां रग्ड जींस, स्टाइलिश चश्मे पहने नजर आ रही थीं। कुछ लड़कियां ऐसी भी लगीं, जो अपने ब्वाय फ्रेंड, पति, मित्र के साथ आई हैं। हालांकि उनमें से कुछ 40 पार वाली भी लग रही थीं और इक्का दुक्का बूढ़ी भी। मुंबई के विपश्यी को रहा न गया। उन्होंने सुझाव दिया कि यहां लोग तपस्या करने आते हैं। ड्रेस कोड होना चाहिए। मैं उनका इशारा समझ गया। मैंने प्रतिकार करते हुए कहा आप भी गजब ही ढा रहे हैं। क्या झमाझम माहौल है। नयनाभिराम। आप हैं कि इनको फैक्टरी का मजदूर या स्कूली बच्चा बना देना चाह रहे हैं, जहां सब एक ही तरह के हों, एक ही हांके पर चल पड़ें। एक ही हांके पर उठें-बैठें। वह थोड़ा सा झेंप से गए, लेकिन उन्होंने फिर कोई प्रतिकार नहीं किया। शायद उन्हें अहसास हो गया हो कि माहौल खूबसूरत, खुशनुमा और रंग बिरंगा ही बेहतर होता है। या कुछ और। उन्होंने कोई नकारात्मक या सकारात्मक टिप्पणी नहीं की।

करीब 6 बजे खाना खाने वाला हॉल पूरी तरह से भर गया। कुर्सियां तो भरी ही थीं। फ्रंट गलियारे में भी लोग नीचे बैठे थे और दीवारों के पास गलियारे में भी लोग अच्छी खासी संख्या में खड़े थे। यह देखकर अनुमान लगा कि 550 के करीब लोग विपश्यना करने पहुंच गए हैं।

वहां लगे माइक से भाषण चलने लगा कि आगे क्या होगा। नियम बताए गए, जो ज्यादातर मैंने इंटरनेट पर ही पढ़ लिया था। साथ ही यह भी कहा गया कि यह बड़ा कठिन तप है। अगर आप 10 दिन नहीं ठहर सकते हैं तो अभी भी छोड़कर जा सकते हैं। हमें कोई दुख नहीं होगा। खुशी होगी कि आपने सोच समझकर निर्णय लिया है। अगर बीच में छोड़कर जाते हैं तो आपका नुकसान हो जाएगा। छोड़कर जा सकते हैं... छोड़कर जा सकते हैं... नुकसान हो जाएगा, यह धमकी टाइप ही लगी। एक ऐसी धमकी, जिसमें आदमी मजबूर हो। कुछ ऐसी धमकी, जैसे हॉस्पिटल में चिकित्सक मरीजों को देते हैं। अगर आप कभी हॉस्पिटल में कोई ऑपरेशन कराने जाते हैं तो चिकित्सक एक कागजात पर आपसे दस्तखत कराता है। उसमें लिखा रहता है कि इस आपरेशन में फलां फलां खतरे हैं और ऑपरेशन के दौरान आप टपक भी सकते हैं। उस स्थिति में मरीज के पास सिवाय वह धमकी स्वीकार कर लेने व कागज पर हस्ताक्षर कर देने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। कुछ उसी तरह से भाषण में नियम बताते समय नुकसान हो जाने की बात कही गई कि तपस्या शुरू करने के पहले सोच लें। अगर मन न बन पा रहा हो तो छोड़कर चले जाएं।

उस भाषण के टेप को चलाने वाले धम्म सेवक ने कुछ मौखिक निर्देश भी लोगों को दिए। एक व्यक्ति ने तेजी से डकार मारी तो भोजनालय में मौजूद लोगों का ध्यान उसकी ओर चला गया। सभी लोग हंसने लगे। धम्म सेवक ने कहा कि आपको कोई दिक्कत है क्या? उस व्यक्ति ने बताया कि मैं शराब बहुत पीता हूं, इसी वजह से दिक्कत है और उसी को दुरुस्त करने यहां आया हूं। धम्म सेवक ने कहा कि कोई बात नहीं, ध्यान करने वाले हॉल में इस तरह की डकार न निकालिएगा, इससे अन्य साधकों के ध्यान में व्यवधान आएगा। धम्म सेवक ने यह भी कहा कि बेहतर यह रहेगा कि आप लोग अपने कपड़े खुद साफ करने की कवायद न करें। इतनी बारिश और ह्युमिडिटी है कि कपड़ा सूख नहीं रहा है। लॉन्ड्री सेवा बहुत सस्ती है। उनके पास ड्रायर होते हैं, जिससे कपड़े सुखा दिए जाते हैं और उसके बाद दूसरे रोज प्रेस करके कपड़ा मिल जाता है। इससे मुझे व्यक्तिगत तौर पर थोड़ी राहत महसूस हुई, क्योंकि कपड़े साफ करके सुखाने की दिक्कत से मैं भली भांति वाकिफ हूं।

बहरहाल मुझे नहीं लगता कि नुकसान होने की धमकियों के कारण कोई छोड़कर गया होगा। कोई कैसे जा सकता है। ज्यादातर लोग किसी न किसी से सुनकर ही आते हैं। पूरी बात समझ में न आई हो तो ज्यादातर बातें तो जानते ही हैं कि फलां फलां काम करने हैं। फलां फलां नियम कानून हैं। इन नियम कानूनों का पालन करना है। पूरे 10 दिन तक घर परिवार, समाज व दुनिया से कटे रहना है। दिन में एक बार 11 बजे फुल खाना मिलना है। उसके अलावा सुबह में 6.30 बजे नाश्ता मिलना है और शाम को 5 बजे नाश्ता। आपके आसपास धम्म सेवक होते हैं। व्यवस्था से संबंधित कोई उलझन, दिक्कत हो तो उनसे बात करने की अनुमति होती है। अगर साधना/तपस्या से संबंधित कोई दिक्कत होती है तो हॉल में मौजूद असिस्टेंट टीचर से अपनी शंका का समाधान करना होता है। यह भी बता दिया गया कि अगर आप कोई दवा खाते हों या खानपान के लिए कुछ विशेष निर्देश हों तो अगले दिन दोपहर 12 बजे अपने असिस्टेंट टीचर को जरूर बता दें, जिससे आपको कोई असुविधा न होने पाए और किसी तकलीफ में तत्काल मदद पहुंचाई जा सके।

वहां बैठे लोगों को भाषण व नियम कानून बताए जाने के बाद दो ग्रुप बने। पहले ग्रुप में ज्यादातर लोग निकल गए। दूसरे ग्रुप में मेरी बारी आई। भोजनालय से बाहर निकलने के बाद धम्म सेवक ने तीन लाइनें बनवाईं। आगे आगे धम्म सेवक। उनके पीछे पीछे करीब 100 लोग। शाम ढल चुकी थी। चिड़ियों की तेज चहचहाहट साफ होने लगी थी। हम लोगों का मौन शुरू हो चुका था। थोड़ी देर जाने के बाद धम्म सेवक रुक गए। सभी लोग खड़े हो गए। धम्म सेवक ने पेशाब घर की ओर इशारा किया। जिन्हें पेशाब लगी थी, वे पेशाब करने गए। कुछ देर खड़े रहने के बाद धम्म सेवक फिर ठहर गए। वहां पानी पीने की व्यवस्था थी। तमाम लोगों ने पानी पिया।

धम्म सेवक के पीछे पीछे तीनों लाइन फिर बढ़ी। हम साधना के लिए बने हॉल के करीब पहुंच गए। धम्म सेवक ठहर गए। उनके साथ चल रही तीनों लाइनें फिर ठहर गईं। उसके बाद धम्म सेवक ने कहा कि जो पुराने साधक हैं, वे हॉल में जाए। पुराने साधक करीब 15-20 थे। वे निकलकर चले गए। उधर मुझे दूसरी ही चिंता सताए जा रही थी।  भोजनालय में बताया गया था कि जो पर्चा आपको मिला है, उसका निचला हिस्सा निकालकर अपने सीट के नीचे लगा देना है और उसी सीट पर रोजाना बैठकर आपको साधना करनी है। मैं वह पर्चा कमरे पर ही भूल आया था। मैंने धम्म सेवक से पूछा कि अब हॉल में जा रहे हैं लेकिन मेरे पास तो पर्चा नहीं है। कमरे से ले आऊं क्या। धम्म सेवक ने कहा कि अभी हॉल में चलें, अपनी सीट याद रखिएगा। सुबह साधना के लिए आने पर पर्चा लेते आइएगा और उसे आसन के नीचे लगा दीजिएगा। धम्म सेवक ने कहा कि अब 10-10 लोग दल बनाकर हॉल में जाएं। पहले 10 के दल में मैं हॉल की ओर बढ़ा। हॉल के बाहर जूता स्टैंड पर चप्पलें, पानी की बोतल और छाता रखकर हॉल में गया।

हॉल में करीब 100 आसन लगे थे। सामने से तीसरी लाइन में 26 नंबर का आसन मेरा था। सब लोग पर्चियां लगा रहे थे। बगल वाले सज्जन ने इशारा भी किया कि पर्ची लगाने की जगह यह है। मैंने उनसे कहा कि पर्ची नहीं लाया हूं तो वो शांत हो गए। मैंने आसन संख्या याद कर ली कि अब यहीं बैठना है। आसन की गद्दी मस्त की थी। वैसी गद्दी पर मैं कभी जीवन में नहीं बैठा था। चूतड़ के नीचे वाला पोर्शन ऊंचा था, जबकि पालथी मारने पर जिस पोजिशन में पैर आता था, वहां गद्दी नीची थी। नर्म, मुलायम, स्पंजी और गुलगुल गद्दी। मुझे ऐसा अहसास हुआ कि शायद यह गद्दियां सेठ जी लोगों की सुविधा के लिए बनाई गई है, जिससे तोंद नीचे लटकने में तकलीफ न हो और पैर व तोंद के बीच पर्याप्त गैप मिल सके। बहरहाल गद्दी अच्छी लगी। स्पेस इतना था कि अगर सामान्य से मोटा व्यक्ति भी हो तो आराम से बैठ सके और अगल-बगल, आगे पीछे बैठकर साधना कर रहे लोगों को कोई दिक्कत न आने पाए।

जब सभी लोगों ने आसन जमा लिया तो दो स्लिम-ट्रिम स्मार्ट से असिस्टेंट टीचर आए। वह टीचर इसलिए लगे कि हम लोग जिस तरफ मुंह करके बैठे थे, उधर दो छोटी चौकियां लगी थीं, जो सिर्फ बैठने के आकार की थीं। उन चौकियों के पीछे पीठ टिकाने की भी व्यवस्था थी। दोनों टीचर पालथी मारकर चौकी पर बैठ गए। चौकी के बगल में एक शॉल रखी हुई थी। दोनों टीचरों ने उसे उठाकर अधखुला ही अपने पालथी आकार में बने पैरों पर जमा लिया। एक असिस्टेंट टीचर ने टेपरिकॉर्डर की ओर हाथ बढ़ाया। उसके ऊपर लगे ढक्कन को इतने धीरे से सरकाया कि कोई आवाज न आने पाए। माइक से जुड़े स्पीकर से आवाजें आने लगीं। हॉल में बैठे लोगों से प्रतिज्ञाएं कराई गईं, जिनमें हिंसा न करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, मौन रहना आदि शामिल था। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भी बताया गया कि यह कठिन तपस्या है। आपका ऑपरेशन शुरू होने वाला है। ऑपरेशन के दौरान आप खुला शरीर लेकर नहीं भाग सकते। इससे आपको ही खतरा हो सकता है। इसके अलावा सीमाएं बांध दी गई हैं। उन सीमाओं से बाहर आपको कदम नहीं रखना है, वर्ना नुकसान हो सकता है। यह सीमा बाद में जगह जगह दिखी भी। एक बोर्ड लिखा हुआ मिलता था कि 10 दिन की साधना में आए साधक इस सीमा से आगे न जाएं।

शपथ ग्रहण समारोह के बाद हम लोगों को ध्यान करने को कहा। अजीब अजीब सी आवाज स्पीकरों से निकल रही थी। कुछ पाली में, कुछ संस्कृत में ज्यादातर हिंदी और अंग्रेजी में। लेकिन हिंदी में भी जिस तरह की आवाज निकल रही थी, उस तरह आवाज निकालना किसी आम आदमी के वश की बात नहीं है। वाराणसी के शास्त्रीय संगीत का ज्ञाता भी शायद उस तरह लरजती आवाज न निकाल पाए। मेरे विचार में यही आया कि यह बात बेहतर तरीके से मधुर आवाज में भी कही जा सकती थी, लेकिन इतनी डरावनी सी मोटी सी आवाज में क्यों कहा जा रहा है? बहरहाल आवाज से परे तपस्या शुरू हो चुकी थी। उस माइक की आवाज ने बताया कि आप लोगों को क्या करना है। उस समय बताया गया कि आप अपने नाक के भीतर आती और उससे बाहर जाती सांस को महसूस करें। सांस को सिर्फ महसूस करना है। उसे न तो धीमा करना है, न तेज करना है। उस पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं करना है। उसे रोकना नहीं है। सिर्फ यह अनुभव करना है कि सांस आ रही है, सांस जा रही है। सांस लेते समय हवा ठंडी है या गरम। सांस छोड़ते समय हवा ठंडी है या गरम। वह सांस नाक और होठ के किसी विशेष हिस्से पर किस तरह महसूस हो रही है। यही करना था। मुझे सांस बिल्कुल ही महसूस नहीं हो रही थी। माइक से ही आवाज आई कि अगर महसूस न हो रही हो कि सांस कैसे आ और जा रही है तो थोड़ी देर तक, आधे मिनट के लिए सांस तेज कर लें। फिर सांस को नॉर्मल कर लें। महसूस करें कि सांस आ रही है, सांस जा रही है। उसके आने और जाने से किस तरह की संवेदना हो रही है।

यह संवेदना महसूस करते करवाते समय खत्म हुआ। वही लरजती आवाज आई। आखिर में आवाज आई भवतु सब्ब मंगलं। हम लोगों को निर्देश मिला कि आप लोग अपने आवास पर जाएं। आराम करें। टेक रेस्ट।

क्रमशः...

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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