शुक्रवार, सितंबर 08, 2017

#विपश्यना, एक संस्मरण — सत्येंद्र प्रताप सिंह



विपश्यना — सत्येंद्र प्रताप सिंह — संस्मरण

हम दुखी इसलिए हैं क्योंकि हम सुखद और दुखद संवेदनाओं के प्रति जाने बगैर प्रतिक्रिया देते हैं। विपश्यना में संवेदना के स्तर पर ही सुख या दुख की जानकारी हासिल करने की कला सिखाई जाती है। 






विपश्यना ध्यान की एक प्रक्रिया है। इसमें मनुष्य को उसके शरीर के विभिन्न अंगों में होने वाली हरकतों, संवेदनाओं का अहसास कराया जाता है। ऐसा माना जाता है कि शरीर अनगिनत परमाणुओं से बना हुआ है। इन परमाणुओं में कुछ न कुछ हरकतें लगातार होती रहती हैं। सेकंड के हजारवें हिस्से या उससे कम समय में भी मानव शरीर में मौजूद परमाणुओं में हरकतें होती हैं। विपश्यना में इस बात पर जोर होता है कि शरीर के परमाणुओं में होने वाली हरकतों को तटस्थ भाव से महसूस किया जाए। चाहे वह अनुभूति अच्छी हो या बुरी। उस अनुभूति को तटस्थ भाव, द्रष्टा भाव से देखा जाए और उसे महसूस किया जाए। उसे भोक्ता भाव से न देखा जाए। बौद्ध विद्वान और म्यामार से विपश्यना को भारत लाने वाले सत्य नारायण गोयनका के मुताबिक यही वह प्रक्रिया थी, जिससे गौतम बुद्ध को सुख और दुख से मुक्ति मिली। विपश्यना की यह तरकीब बहुत पुरानी है, जिसे बुद्ध ने खोजा था। यह भारत की धरती से विलुप्त हो गई थी, लेकिन म्यामार में कुछ लोग पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहे थे। गोयनका ने वहां जाकर विपश्यना सीखी और भारत में उसके प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाई। इस तपस्या का मकसद दुखों से छुटकारा पाना है। हम दुखी इसलिए हैं क्योंकि हम सुखद और दुखद संवेदनाओं के प्रति जाने बगैर प्रतिक्रिया देते हैं। विपश्यना में संवेदना के स्तर पर ही सुख या दुख की जानकारी हासिल करने की कला सिखाई जाती है।  इच्छा के मुताबिक या इच्छा के विपरीत होने पर मन में विकार आता है। इसका असर सांसों पर पड़ता है और सामान्यतया सांस तेज हो जाती है। साथ ही शरीर में भी अच्छी या बुरी संवेदना पैदा होती है। इसी अच्छी या बुरी संवेदना के मुताबिक हम प्रतिक्रिया दे देते हैं। अगर इन संवेदनाओं के प्रति सचेत रहा जाए तो संतुलित प्रतिक्रिया होगी और दुखों से राहत मिल सकती है। विपश्यना का मुख्य केंद्र “विपश्यना विश्व विद्यापीठ” मुंबई से करीब 150 किलोमीटर दूर इगतपुरी में है। इसके अलावा देश-विदेश में इसके करीब 100 केंद्र हैं, जहां विपश्यना सिखाया जाता है।

महाराष्ट्र के नासिक जिले का सुरम्य पहाड़ी इलाका है इगतपुरी। इंटरनेट से ढेर सारी जानकारियां मिलती हैं। वहां कैमल हिल्स, वैतरणा झरना, अशोका फाल, डरना डैम, करोली घाट, मदनगढ़ पहाड़ी आदि हैं। मॉनसून का सीजन इगतपुरी घूमने के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। यहां की खूबसूरती के बारे में पढ़ने के बाद इगतपुरी खींचने लगा। मन बना कि प्रकृति की गोद में बैठकर दिल्ली के कचर-पचर से दूर शांति से वक्त बिताया जाए।




दरअसल कार्यालय में एक रोज चर्चा हुई विपश्यना की। विपश्यना उस रोज इतना ही समझ में आया कि 10 दिन ध्यान कराया जाता है। उस दौरान किसी को किसी से बोलना नहीं होता है। साथ ही यह भी कि यह बुद्धिस्टों का केंद्र है। बुद्ध के अनुयाइयों ने इसे विकसित किया है। थोड़ा आकर्षण होने पर गूगल बाबा से जानकारी जुटाने लगा कि इगतपुरी कहां है। इंटरनेट पर देखने पर पता चला कि विपश्यना के लिए अगस्त की बुकिंग खुली हुई है। अब इससे बेहतर मौका मुझे न लगा कि भारत के पश्चिमी घाट की जिस पहाड़ी को मॉनसून सत्र में सबसे खूबसूरत बताया जा रहा है, विपश्यना के बहाने उसी वक्त वहां जाने का मौका मिल सकता है।

इंटरनेट पर विपश्यना बुकिंग के बाद घर पर उसी रोज मैंने घर पर सूचना दे दी कि मैं 10 दिन के लिए सन्यास लेने जा रहा हूं। उसी रोज भारतीय रेल के स्लीपर क्लास में आने जाने का टिकट भी करा लिया। हालांकि लंबे समय से स्लीपर में जाने की आदत नहीं है और मुंबई जैसी जगह तो फ्लाइट से जाना सबसे सहूलियत भरा होता है। लेकिन उस समय यह विचार आया कि जब 10 रोज का सन्यास लेने जा रहे हैं तो कम से कम भोग विलासिता से दूर रहा जाए। आम आदमी की तरह स्लीपर क्लास में चलने का मन बना। हां, सावधानी के लिए आने और जाने के लिए अपर बर्थ की बुकिंग ली, जिससे कि अगर ट्रेन का स्लीपर क्लास पुष्पक विमान बन चुका हो (माना जाता है कि रामचंद्र का पुष्पक विमान ऐसा था, जिसमें हमेशा एक सीट खाली रहती थी) तब भी किसी तरह ऊपर वाली बर्थ पर दुबककर बैठ सकूं। बुकिंग के करीब 3 महीने बाद विपश्यना केंद्र से कन्फर्मेशन आ गया कि आप विपश्यना करने आ सकते हैं।

यह सूचना विपश्यना के करीब एक महीने पहले मिली। मैंने कार्यालय में इसकी तिथि बताई और उसके लिए छुट्टी भी मंजूर हो गई। घर पर भी मैंने सूचना दे दी कि विपश्यना कन्फर्म हुआ और मैं अब सन्यास की ओर कदम बढ़ा चुका हूं।

पत्नी ने उसके पहले विपश्यना को कभी गंभीरता से लिया था, मुझे इसका अहसास नहीं है। कन्फर्मेशन के बाद मेरा उत्साह बढ़ गया। घर पर करीब रोजाना बताने लगा कि अब तो मैं सन्यास लेने ही वाला हूं। महज कुछ रोज बचे हुए हैं। इसी बीच एक छोटा सा व्यवधान आया। मेरे एक अहम मित्र की सगाई बीच विपश्यना में पड़ गई। उन्हें मैं मना करने की स्थिति में नहीं था। यह भी संयोग है कि विपश्यना के लिए निकलने के पहले मैंने उनसे संपर्क की कोशिश की और उन्होंने कोई रिस्पांस नहीं दिया। उसके बाद तो मैं विपश्यना के लिए पूरी तरह से मुक्त था।

जैसे जैसे दिन नजदीक आ रहे थे, मेरी खुशी बढ़ती गई। पत्नी को सुबह शाम बताने लगा कि अब मैं सन्यास लेने चला। जब 4-5 दिन ही बचे तो पत्नी के चेहरे के भाव बदलने लगे। मैं खुश था। पत्नी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। उस दौरान हम दोनों में कोई झगड़ा बवाल, तू-तू मैं-मैं भी नहीं हुआ। ऐसे में पत्नी को कुछ और असामान्य और असहज फील होने लगा कि कुछ गड़बड़ होने वाली है। विपश्यना के 3 रोज पहले उन्होंने मुझसे बड़ी देर तक बात की। कहा कि जब आप ट्रेन पकड़ने निकलेंगे तो बेटा सो रहा होगा, बिटिया तो स्कूल जा रही होगी, उससे मिल लीजिएगा। बेटे को जगाकर बता दीजिएगा कि मैं जा रहा हूं।




पत्नी का चेहरा और सूखता जा रहा था। कैंसर से उबरने के 3 साल बाद कभी ऐसा मौका नहीं आया कि पत्नी के बगैर 4 रोज भी अलग रहा होऊं। यह पहला मौका था जब मैं करीब 17 दिन के लिए घर से दूर जाने वाला था।

विपश्यना के लिए निकलने वाले दिन के एक रोज पहले रक्षा बंधन था। कई रिश्तेदार रक्षा बंधन मनाने घर पर आए। एक दशक तक साथ रहते पत्नी को यह पता चल चुका है कि किसी त्योहार में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। उसके लिए छुट्टी तो कतई नहीं बर्बाद कर सकता। लेकिन उस रक्षाबंधन को छुट्टी ले ली थी। पत्नी का शक और गहरा गया कि कुछ गड़बड़ होने वाला है। रिश्तेदारों के बीच खुश होने के बजाय उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। शाम को जब रिश्तेदार लोग जाने लगे तो मैंने रोक लिया और कहा कि आप लोग शाम को खाना खाकर निकलिएगा। यह पत्नी के लिए और आश्चर्यजनक था। वजह यह कि मैं किसी को खाने के लिए नहीं रोकता। पत्नी को यह दिव्य संदेश हमेशा देता रहता हूं कि खाने के लिए किसी का वक्त नहीं बर्बाद करना चाहिए। अगर अतिथि फ्री हो, आप फ्री हों तो आपसी समझ से खाना साथ खाया जा सकता है, वर्ना अतिथि को विदा कर देने में कोई हर्ज नहीं है।

इससे भी बड़ा आश्चर्य तब हुआ जब मैंने कहा कि कुछ मछली, मुर्गा, मटन वगैरा बनना चाहिए। खाने के बारे में भी मैं पत्नी को हमेशा ज्ञान देता हूं कि सादा खाना बेहतर होता है। अगर कोई अतिथि आए तो दाल, चावल, रोटी, सब्जी सर्वोत्तम खाना है। वर्ना अगर अतिथि की तबीयत बिगड़ गई तो उसे दिक्कत होगी। रक्षाबंधन को जब मैं खाद्य सामग्री लेने गया तो मुर्गा, मछली, मटन और अंडा चारों लेकर पहुंच गया। पत्नी का आश्चर्य बढ़ता गया, चिंता गहराती गई। सब कुछ असामान्य हो रहा था।

वह समझ नहीं पा रही थीं कि आखिर हो क्या रहा है। उनका चेहरा सूखता जा रहा था। आंखें गोल गोल दिख रही थीं, जैसे किसी चिंता, भय में डूबी हुई हों। रह रहकर यह संदेश देना भी न भूलतीं कि बेटे को जगाकर, उसे बताकर जाइएगा। तीन दिनों में 30 बार यह संदेश मिले। मैं सिर्फ मुस्करा देता था।

शायद वह मुझे गौतम बुद्ध, खुद को यशोधरा और मेरे पुत्र को राहुल समझ रही थीं! शायद उन्हें यह संदेह होने लगा था कि मैं शांति और ज्ञान की तलाश में सोते हुए पुत्र को छोड़कर हमेशा के लिए जाने वाला हूं!

ट्रेन पकड़ने वाले दिन की सुबह आने ही वाली थी। रात को पत्नी ने मेरा कपड़ा पैक किया। बैग फटहा था। इसे लेकर खूब झगड़ा हुआ। उन्होंने कहा कि अगर बैग खरीदने को कहें तो भी आप ज्ञान देते हैं। जो है, उसमें पैक कर दिया तो भी दिक्कत है। मैंने उनसे कहा कि पहले बताया होता तो किसी पड़ोसी से मांग लेता। पड़ोसी लोग सामान्यतया अच्छे होते हैं। मांगने पर कोई भी बैग दे देता। अब आधी रात को किससे मांगूं। तभी छोटे भाई का बैग दिखा और उसे खाली कराकर सारा कपड़ा लत्ता उसमें भर लिया। इस समस्या का समाधान हो गया। साथ ही झगड़ा होते ही पत्नी भी कुछ नॉर्मल हो गईं कि सब कुछ एब्नॉर्मल नहीं चल रहा है। सुबह सबेरे पत्नी ने यह भी नहीं कहा कि बेटे को जगाकर बता दें कि जा रहा हूं। मेरी योजना थी कि तपस्या करने जाना है तो बस से जाकर ट्रेन पकड़ूंगा, लेकिन स्टेशन जाने के लिए मैंने टैक्सी बुला ली। संभवतः इन वजहों से स्थिति थोड़ी सामान्य हो गई।




निजामुद्दीन से ट्रेन पकड़कर इगतपुरी के लिए रवाना हो गया। एर्णाकुलम जाने वाली ट्रेन में भी केरल के लोग नहीं मिले। मेरे आसपास सभी लोग दिल्ली व उसके आसपास या हरियाणा के थे। हालांकि रेल के खानपान विभाग के वेंडर यह अहसास दिला रहे थे कि ट्रेन केरल की ओर जा रही है। भारतीय रेल ने यह विशेषता कायम रखी है कि जिस मार्ग की ट्रेन होती है, उस इलाके से जुड़े स्थानीय खाद्य ट्रेन में परोसे जाते हैं। भले ही इन तीन सालों में थोड़ा सा बदलाव यह हुआ है कि खाने में कॉक्रोच मिलने लगे हैं और खाना जेब पर भारी पड़ने लगा है। ज्यादातर यात्री साईं बाबा का दर्शन करने जा रहे थे। ग्रामीण परिवेश के लोग। करीब 50 लोगों की एक टीम थी, जो विभिन्न कोच में फैले हुए थे।

एक यात्री ऐसे भी मिले, जो आगरा से ट्रेन पर चढ़े और इगतपुरी जा रहे थे। मैंने यूं ही जिज्ञासा वश पूछा तो पता चला कि वह भी विपश्यना करने ही जा रहे हैं। वह बहुत खुश हुए। धार्मिक प्रवृत्ति के महाशय की बॉडी और खाने पीने के तरीके से ही शायद हरियाणा के लोग उन्हें सेठ जी कहकर संबोधित कर रहे थे। शारीरिक ढांचे और खानपान से लोगों को भारत में पहचान लेना बहुत कठिन नहीं है और हरियाणा के ग्रामीणों ने मेरे साथी विपश्यी को सही पहचाना था। वह सेठ जी ही थे। सेठ जी मुझसे बात कर खासे खुश थे। उन्होंने कहा कि प्रभु की लीला देखें कि आप से ट्रेन में मुलाकात हो गई। आप जैसे भले व्यक्ति का साथ मिल गया, यह ईश्वर की कृपा ही है। बार बार ईश्वर और प्रभु सुनकर मुझे हंसी भी आ रही थी, लेकिन वहां बैठे सभी लोग जर्जरात धार्मिक थे। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उस समय मैं कांचा इलैया की पुस्तक “हिंदुत्व मुक्त भारत” पढ़ रहा था। कुछ लोगों ने किताब का शीर्षक देखा भी, लेकिन उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सहिष्णुता बनी रही।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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