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रक्षा मंत्री परिकर का आमिर खान (Aamir Khan) पर कमांडो अटैक — अभिसार @abhisar_sharma

जुल॰ 31, 2016


रक्षा मंत्री परिकर का आमिर खान पर कमांडो अटैक

— अभिसार 


आज अखबार के पहले पन्ने  पर दो खबरें पढ़ी और न जाने क्यों लगा इन दोनों में एक लिंक है। पहले इस कथन  पर गौर करते हैं।

हमारी एक टीम काम कर रही थी, ताकि SnapDeal सबक ले और आमिर खान का विज्ञापन वापस ले


अगर आप एक बयान को अलहदगी में पढ़ें, तो आपको ऐसा लग सकता है के ये बयान किसी ‘उग्र’ गुट के कार्यकर्ता ने दिया होगा। आप बिलकुल भी कल्पना नहीं कर सकते के ये बयान, देश के रक्षा मंत्री मनोहर परिकर ने दिया होगा। और जब रक्षा मंत्री कहते हैं तो ‘टीम’ से सन्दर्भ सिर्फ कोई कमांडो यूनिट ही निकला जा सकता है। निकाला जाना भी चाहिए। मगर यहाँ रक्षा मंत्री की टीम ने न सिर्फ आमिर खान जैसे सॉफ्ट टारगेट को अपनी ‘टीम’ के ज़रिये निशाना बनाया, बल्कि जिस कंपनी का वो विज्ञापन कर रहे थे, जिसका आमिर खान के बयान से कोई लेना देना नहीं है, उसे भी सबक सिखाने की बात कही रक्षा मंत्री ने। सवाल ये के क्या प्रधानमंत्री मोदी अपने रक्षा मंत्री के इस बयान से सहमत हैं? खासकर तब जब वो “मेक इन इंडिया“ की दमदार अपील कर रहे हों? क्या मोदी इस बात के इत्तफाक रखते हैं के देश के सुपरस्टार को पहले तो प्रजातांत्रिक भारत में अपनी बीवी की बात सार्वजनिक करने का हक नहीं है और दूसरा, इसकी सज़ा उस कंपनी को दी जाए, जिसका वास्ता आमिर खान के निजी विचारों से नहीं? मैं जानना चाहूँगा के देश में निवेशक कितना आश्वस्त महसूस करेंगे अगर देश के रक्षा मंत्री एक ऐसे ‘अदृश्य’ कमांडो यूनिट की बात करेंगे जो ऐसी कम्पनीज को सबक सिखा रही है? आप इस बात का अर्थ समझ रहे हैं ? आप इसके पीछे छिपा संदेश समझ रहे हैं? अगर आमिर खान की बीवी अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर आशंकित है तो वो न सिर्फ चुप रहे बल्कि ऐसा सोचने की कल्पना भी न करे, क्योंकि ये देशद्रोह है और रक्षा मंत्री आमिर खान और उनसे जुडी तमाम कंपनियों को इसका सबक सिखायेंगे। ऐसा है क्या ? कम से कम अब प्रधानमंत्री को इस मुद्दे  पर अपनी खामोशी तोडनी चाहिए। कम से कम अब ये सवाल उठाना स्वाभाविक है के क्या वो ऐसी ‘टीम्स’ (जिसका ज़िक्र परिकर ने किया) के लिए, देश में निवेश, मेक इन इंडिया और प्रजातंत्र की बलि देने को तैयार हैं? क्या वक़्त नहीं आ गया है के प्रधानमंत्री इस मुद्दे को लेकर एक कड़ा और निर्णायक सन्देश दे के वो इन टीम्स के साथ हैं या जो वादा उन्होंने देश को दो साल पहले दिया था, उस  पर कायम हैं?

हाल में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को अपनी आगरा रैली रद्द करनी पड़ी थी, क्योंकि आगरा के 8 लाख दलित उन्हें कड़ा सन्देश देना चाहते थे

Image shared by 'Gau Raksha Dal' on Facebook... Image/Caption courtesy India Today

गौ रक्षा ????

आज अखबार में एक और खबर की तरफ मेरा ध्यान गया। बीजेपी के दलित सांसदों ने प्रधानमंत्री से अपील की है के गौ रक्षा के नाम पर दलितों पर किये जा रहे हमलों पर प्रधानमंत्री और पार्टी कड़ा सन्देश दे। नगीना से पार्टी सांसद यशवंत सिंह, मोहनलालगंज से कौशल किशोर, इटावा से सांसद अशोक कुमार दोहरे सब मानते हैं के गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारों को इससे सख्ती से निपटना चाहिए और ऐसे गुटों को कड़ा संदेश भेजना चाहिए। कड़ा सन्देश ! अब बात करते हैं इस कड़े सन्देश की। हाल में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को अपनी आगरा रैली रद्द करनी पड़ी थी, क्योंकि आगरा के 8 लाख दलित उन्हें कड़ा सन्देश देना चाहते थे। मरहम और गलती मानना तो दूर, आगरा से बीजेपी सांसद रामशंकर कठेरिया की मानें तो बीजेपी को उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए एक दलित उम्मीदवार पेश करना चाहिए। यानी सतही बातें जितने भी करवा लीजिये, राजनीतिक खानापूर्ति जितनी करवा लीजिये, बीजेपी अब भी बुनियादी मुद्दे को संबोधित करने को राज़ी नहीं। और जब तक ये चलता रहेगा, बीजेपी को दुर्भाग्यवश दयाशंकर सिंह और मधु मिश्र जैसे नेताओं से ही पहचाना जायेगा। अब हो सकता है के इसके पीछे भी बीजेपी की दूरगामी राजनीति छुपी हो, हो सकता है के ये पार्टी को लखनऊ तक पहुँचाने में मदद करे, शायद इसलिए मोदी खामोश हैं और अमित शाह आगरा जाने से डरते हैं।



मैं अब भी मानता हूँ के मोदीजी के मन में देश का विकास सर्वोपरि है और वो देश को तरक्की के रास्ते  पर ले जाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। मुझे न जाने क्यों ये अब भी लगता है के गौ रक्षक दल जैसे सामाजिक संगठन (ये मेरे नहीं थावर चंद गहलोत के शब्द हैं), बजरंग दल, हिन्दू सेना ये सब अब भी हाशिये पर खड़े संगठन हैं जो नयी व्यवस्था में अपनी प्रासंगिकता ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं। मगर! मगर जब मैं रक्षा मंत्री को ये बातें करते सुनता हूँ तो मुझे सरकार की नीयत  पर शक होने लगता है। तब मुझे लगता है के ये सब एक राजनीतिक प्लान का हिस्सा है। तब मुझे लगता है के इस सोच से इत्तफाक रखने वाले लोगों को शायद ऐसा लगता होगा के भारतीय जनमानस ऐसी सोच से इत्तफाक रखता है। शायद वो भी एंटी नेशनल पत्रकारों, अभिनेताओं, दलितों और मुसलमानों को सबक सिखाने के मूड में है। वर्ना और क्या वजह हो सकती है इस वहशीपने के जारी रहने और सरकार के ज़िम्मेदार लोगों द्वारा उसे सही ठहराने की कोशिश के पीछे ?

काश के परिकर इस मुद्दे को फिर से तूल देने के बजाय, अपनी उस दूसरे बयान पर स्पष्टीकरण देते जिसमें उन्होंने कहा के सेना को सिविलियन ऑपरेशन में लाठी चलाने के लिए नहीं रखा जा सकता। आपने कहा था के सेना एक हाथ पीछे बांधे ऐसे हालात में ज़मीन पर नहीं उतर सकती। आपने सही कहा था के सेना को आपदा प्रबंधन के अलावा किसी और चीज़ के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ये बात अलग हैं सेना को न सिर्फ हरियाणा में तैनात किया गया, बल्कि अधिकतर समय एक हाथ पीछे बाँध कर रखा गया, क्योंकि कई इलाकों में पुलिस को आन्दोलनकारियों के सामने पलायन करते हुए देखा गया। शहर के हिस्से जल गए, मगर सेना की तैनाती क्यों हुई और हुई भी तो क्या इस्तेमाल हुआ, ये पहेली बनी हुई हैं।

Abhisar Sharma
Journalist , ABP News, Author, A hundred lives for you, Edge of the machete and Eye of the Predator. Winner of the Ramnath Goenka Indian Express award.
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टिप्पणियां

  1. Wow Abhisar.. What a point.. Lets not expect decency from these law-breakers..

    जवाब देंहटाएं
  2. ये एक अजीब स्तिथि है,देश के रक्षा मंत्री को भी किसी को सबक सिखाने के लिए पर्दे के पीछे से काम करना पर रहा है।

    पर्दे के पीछे छिप के किसी को सबक सिखाना कहीं न कहीं ये साबित करता है की अमीर खान ने जो भी कहा या जैसा उन्हें लगता है वो गलत नही है।

    पर्दे के पीछे से सबक सिखाने का मतलब है की अमीर की कही हुई बते सही थी लेकिन आप को वैक्तिगत तौर पर गलत लगी और आप उसे पर्दे की आर मे सबक सिखाने मे लग गए।
    अगर अमीर की बते गलत होती तो मंत्री जी उसे देश के सामने सबक सिखाते न की पर्दे के पीछे।

    दूसरी बात गाय के नाम पर इतना तमाशा किया ज रहा है और उसपर हमारे प्रधानमन्त्री की चुप्पी कहीं न कहीं उनकी सहमति की ओर इशारा कर रही है।

    ये सब फसाद मोदी जी की एक अपील पर रुक सकता है लेकिन मोदी जी की चुप्पी समझ से परे है।
    मोदी जी अपनी प्रतिमा नही लगाने की अपील कर सकते हैं लेकिन गाय के नाम पर होने वाले ज़ुल्मो को रोकने की अपील के लिए कोई शब्द नही है।


    अच्छा ब्लाग लिखा है आपने, एक ओर मीडिया के एक खेमा सरकार से सवाल करने को देशद्रोह की श्रेणी मे डाल रही है इस स्तिथि मे आप का इस प्रकार का ब्लॉग लिखना प्रशंसनीय है।

    जवाब देंहटाएं
  3. ज़िन्दाबाद अभिसार साहब

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (02-08-2016) को "घर में बन्दर छोड़ चले" (चर्चा अंक-2422) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  6. राष्ट्र विद्रूपता की ओर अग्रसर है...धर्म की आड़ में मानवता के साथ ये बलात्कार बेहद घृणित करने वाला है, मगर तथाकथित राष्ट्रवाद के समर्थक लोकतंत्र व इंसानियत की बोटी बोटी होने तक हिंदुत्व मात्र की रक्षा के लिए प्रतिबढ हैं. मैं ऐसे हर धर्म को मानने से इंकार करती हूँ जो हमें हत्या के पथ पर धकेलता हो...

    जवाब देंहटाएं

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