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हरे प्रकाश उपाध्याय की कवितायेँ, गुस्सा, चिंता और धूल-पसीना | Poems: Hare Prakash Upadhyay (hindi kavita sangrah)

सित॰ 4, 2015

कवितायेँ, गुस्सा, चिंता और धूल-पसीना

: हरे प्रकाश उपाध्याय



दफ़्तर



मेरे घर से दफ़्तर की दूरी
अलग-अलग जगह रहने वाले मेरे सहकर्मियों के लगभग बराबर
एक तरफ से मापो तो सोलह घंटे है
दूसरी तरफ से आठ घंटे है
रोज़-रोज़ जंजीर गिराओ तो कुछ समय जो कि दूरी का भी एक पैमाना है
इधर से उधर सरक जाता है
इस तरफ से मापो तो भागाभागी है, काँव-कीच है
एसाइनमेंट, कांट्रैक्ट, सेलरी, एबसेंट आदि की सहूलियतें हैं
उस तरफ से मापो तो थोड़ी सी नींद, थोड़ी सी प्यास है, थोड़ी सी छुट्टियों
रविवार, बाज़ार, इंडिया गेट, लोटस टेम्पल, बिड़ला मंदिर आदि के पड़ाव हैं
इन सारी चीज़ों का अर्थ राजधानी के दफ़्तर के निमित्त जिंदगी में
लगभग एक ही है
हर चीज़ में थोड़ी सी रेत है, चपचप पसीना है, बजता हुआ हार्न है
इस दूरी को जो रेल मापती है उसमें खूब रेलमपेल है
इन सब चीज़ों को जो घड़ी नचाती है
उसमें चाँद, आकाश, प्रेम, नफरत, उमंग, हसरत, सपने सेकंड के पड़ाव भर हैं
यह साजि़शों, चालाक समझौतों, कनखियों और सामाजिक होने के आवरण में
अकेला पड़ जाने की हाहा...हीही...हूहू...में व्यक्त समय है
इस घड़ी की परिधि घिसे हुए रूटीन की दूरी भी है
समाज की सारी घटनाएं प्रायोजित हैं जल्दी विस्मृत होती हैं अच्छा है अच्छा है...

दफ़्तर और घर के बीच
आ-जा रही जि़ंदगी में कोई दोस्त न दुश्मन है
सब सि़र्फ मौ़के का खेल है
यों ही नहीं बदल जाता है रोज राष्ट्रीय राजनीति में सांप्रदायिकता का मुहावरा
ये सारे लोग लगभग एक जैसे जो चारों ओर फैल गये
इनकी जि़ंदगी में
थोड़ा-सा कर्ज, थोड़ा-सा बैंक बैलेंस
थोड़ा-सा मंजन घिसा हुआ ब्रश है
बगैर साबुन की साफ़-शफ़्फ़ाक कमीज़ है पैंट है टाई है
आटो मेट्रो लोकल ट्रेन और उनका एक घिसा हुआ पास है
सुबह का दस है, शाम का दस है
बाकी सब धूल है
जो पैर से उड़ कर सिर पर
सिर से उड़ कर पैर पर बैठती रहती है
और पूरा शरीर उस उड़ान की बीट से पटा रहता है
महँगी कार में चलने वाले अपनी जानें यह कविता
दूरी के बारे में सोचने वालों की कविता है

जैसे मेरी सुबह दफ़्तर जाने के लिए होती है
और शाम दफ़्तर से घर लौट आने के लिए
दोपहर दफ़्तर के लंच आवर के लिए
रात में मैं दफ़्तर जाने के लिए आराम करता हूँ सोता हूँ
उसके पहले टीवी देखता हूँ
बीवी को गले लगाता हूँ
उसके हाथों का बनाया खाना खाकर
उसकी बाहों में जल्दी सो लेता हूँ
कि सुबह जब हो
मेरे दफ़्तर पहुँचने में तनिक देर नहीं हो
तीन दिन की थोड़ी-थोड़ी देर पूरे एक दिन का
भरपूर काम करने के बावजूद आकस्मिक अवकाश होती है

मैं दफ़्तर के सपने देखता हूँ
थोड़ी देर सहकर्मियों के षड्यंत्र सूँघता हूँ
जिससे बहुत तेज़ बदबू आती है
इस बदबू में मुझे धीरे-धीरे बहुत मज़ा आता है
मैं नींद में बड़बड़ाता हूँ
बॉस को चूतिया कह कर चिल्लाता हूँ मैं उसका कालर पकड़ लेता हूँ और वह मेरा
मैं हाथ-पैर भांज-भांज कर
बॉस की, कलीग की, सीनियर की, जूनियर की
दफ़्तर के कोने में काजल लगाए बैठी उस लड़की की ऐसी-तैसी कर देता हूँ
इस तरह चरम सुख पाता हूँ मैं
मेरे इस करतब को देख कर
नहीं जानता बगल में जग गयी पत्नी पर क्या गुज़रती है
जैसा कि उसे मैं जितना जानता हूँ हतप्रभ होती होगी
कहती होगी बड़े वैसे हैं ये या कुछ नहीं कहती होगी मन में क्या सोचती होगी कौन जाने

सुबह उठ कर पत्नी चाय बनाती है मेरी नींद के बारे में पूछती है
मैं अनसुना करता हूँ अनसुना करता रहता हूँ
और लगा रहता हूँ युद्ध की तैयारी में- एक औसत आदमी जैसा लड़ता है युद्ध
ब्रश, शेविंग, बूट पालिश, स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ सब जल्दी में
इस बीच अक्सर भूल जाता हूँ फूल को पानी देना
किसी बच्चे को दो झापड़ मारता हूँ
पिता कहते हैं जैसे-जैसे मुझे समझदार होना चाहिए मैं चिड़चिड़ा होता जा रहा हूँ

दफ़्तर जाकर काम निपटाता हूँ
इसको डाँटता हूँ उससे डाँट खाता हूँ
दफ़्तर में ढेर सारे गड्ढे
इसमें गिरता हूँ, उसे फाँदता हूँ
यहाँ डूबता हूँ वहाँ निकलता हूँ
कुर्सी तोड़ता हूँ कान खोदता हूँ
तीर मारता हूँ अपनी पीठ ठोकता हूँ

अखबार पढ़ता हूँ देश में तरह-तरह के फैसले हो रहे हैं
प्रधानमंत्री, फला मंत्री इस देश जा रहे हैं उस देश जा रहे हैं
देश में यहाँ-वहाँ बम फूट रहे हैं
इनमें मुसलमानों के नाम आते हैं
और एक दिन कहीं किसी साध्वी के हाथ होने के भी सबूत मिलते हैं
तो तमाम राष्ट्रवादी उसकी संतई और विद्वता के किस्से बताने लगते हैं
उसे चुनाव लड़ाने लगते हैं
किसी प्रांत में कुछ लोग इसाइयों की सफ़ाई में लग जाते हैं
हमारे दफ़्तर में इससे उत्तेजना फैलती है
इस आधार पर फ़ाइलों को लेकर भी साजि़शें होने लगती हैं
फिर कहा जाता है कि देश के कर्णधार ही सब पगले और भ्रष्ट हैं
तो हम जो कुछ कर रहे हैं कौन गलत कर रहे हैं
अलग-अलग गुट बन जाते हैं
और अपने गुट के कर्णधार को कुछ कहे जाने पर जैसे सबकी फटने लगती है
गुस्सा करने लगते हैं लोग गाली-गलौज़
प्रमोशन करने-कराने-रोकने का यह एक आधार बन जाता है... बनने लगता है
क्या जानते हैं कर्णधार कि उनके एक गलत फैसले से ढह जाते हैं
कितने कर्मचारियों के घर

हमने अपने-अपने घरों में मनोरंजन के लिए टीवी लगा रखा है
यह कम जि़म्मेदार है नहीं है हमारे  द्रोहपूर्ण ज्ञान के विकास में
यहीं से हम सीख लेते हैं नयी-नयी गालियां, डिस्को,
गुस्सा, प्यार करना और अवैध सम्बन्ध बनाना
और दफ़्तर में उसकी आज़माइश करना चाहते हैं
वहाँ एक से एक अच्छी चीज़ें हैं
नचबलिए है, लाफ़्टर शो हैं, टैलेंट हंट हैं, क्रिकेट मैच, बिग बॉस और
एकता कपूर के धारावाहिक
पर मैं सोचता हूँ इससे अपन का क्या
दफ़्तर न हो तो पैसा न मिले
पैसा न मिले तो केबल कट जाए
फिर ये साले रहें न रहें
भाड़ में जाए सब कुछ
गिरे शेयर बाज़ार लुढ़के रुपया
सुनते हैं गिरता है रुपया तो अपन की गरीबी बढ़ती है- बढ़ती होगी
अपन का क्या अपन कर ही क्या सकते हैं

बस सलामत रहे नौकरी
बॉस थोड़ा बदतमीज़ है
कलीग साले धूर्त हैं
कोई नहीं,
कहाँ जाइएगा सब जगह यही है
अपन ही कौन कम हैं

राजधानी में इधर बहुत बम विस्फ़ोट हो रहे हैं
क्या पता किसी दिन अपन भी किसी ट्रेन के इंतज़ार में ही निपट जाएं
माँ रोज़ सचेत करती है
बेटा ज़माना बहुत बुरा हो गया है
खाक बुरा हो गया है
हो गया है तो हो गया है
अपन को कोई डर नहीं
मुझे तो दफ़्तर जाते न डर लगता है न कोई उमंग
न चिंता न खुशी
यही है कि आने-जानेवाली ट्रेन लेट हो
तो थोड़ी बेसब्री जगती है
सरकार पर थोड़ा गुस्सा आता है
बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर प्यार उमड़ आता है
वैसे वे कौन-सी दूध की धुली हैं
आदमी तो सब जगह एक से...




बॉस और बीवी



वह जो मेरा बॉस है
आख़िर रोज़ क्या लेकर लौटता होगा अपने घर
अपनी प्रिय बीवी के लिए
क्या वह अपनी बीवी से
उमगकर करता होगा प्रेम
घर लौटकर चूमता होगा बेतहाशा उसका चेहरा
उतार लेता होगा उन वक़्तों में
अपने चेहरे से बनावटी वह सख्त नक़ाब
क्या उसकी दिल की घड़ी बदल लेती होगी
अपनी चाल
क्या वह दफ़्तरी समय की
चिक-चिक, झिक-झिक से अलग
किसी मधुर संगीत में बजने लगती होगी

मैं लौटता हूँ लिये
अपनी बीवी के लिए
अपने चेहरे पर गुस्सा, चिंता, धूल-पसीना
जिसे देखते ही वह
अपनी जीभ और होठों से
पोंछ देना चाहती है

मैं डपटता हूँ उसे
निकालता हूँ उसके हर काम में
बेवजह गलतियाँ
अपने बॉस की तरह बनाकर सख्त चेहरा
उसकी ख़बर लेता हूँ

मेरी प्रिय पत्नी मुझसे डरने लगती है
उसका डरना भाँपकर
मुझे खुद से ही डर लगने लगता है
मैं अपना चेहरा छुपाता हूँ
इधर-उधर हो जाता हूँ
परेशान हो जाता हूँ
मैं पागल हो जाता हूँ ...







मायावी यह संसार



अधिकांश चीज़ें मायावी हैं
मार तमाम संकटों के बीच ही
हँसी की बारिश
मार गुर्राहटों के बीच
कोयल की विह्वल पुकार
ऐ कोयल तुम पागल हो और एक दिन तुम पागल बना दोगी समूची दुनिया को
ऐ नदी तुम ज़रा इधर नहीं आ सकती शहर में
ऐ हवा, तुम अपना मोबाइल नम्बर दोगी मुझे
सुनो, सुनो, सुनो...
अधिकांश चीज़ें मायावी हैं...

जिनकी आवाज़ों के शोर के बजे नगाड़े
उनसे भागे जिया
जिनकी आवाज़ न आये
उसी आवाज पर पागल पिया...
जहाँ रहने का ठौर, मन वहाँ न लागे मितवा
चल, यहाँ नहीं, यहाँ नहीं, यहाँ नहीं...
पता नहीं कहाँ
चल कहीं चल मितवा...
अधिकांश चीजे़ं मायावी हैं...

जिन चीज़ों से प्रेम वे अत्यंत अधूरी
इन अधूरी चीज़ों की भी महिमा गज़ब

यह जीवन सुख-दु:ख की एक पहेली...

जी नहीं रहे हम
बस अपनी उम्र के घंटे-पल-छिन गिन रहे बस
और इसी गुणा-भाग में एक लंबी उम्र गुज़ार कर
जो गये
उनके लिए मर्सिया पढ़ रहे हैं हम...






गर्म हवाएं



अब अपनी डायरी में
जब भी लिखना चाहता हूँ कविताएँ
कविता नहीं लिखी जाती
बस आँसू गिरते हैं आँखों से
किसका दु:ख समाया मेरी आँखों में

किसी काम में जी नहीं रमता
अपनों की यादें आती हैं
दूर बहुत हैं अपने जन...
तड़प उठती है
नफरत होती है
गुस्सा आता है
खाली-खाली लगता है

कहते हैं साथी सब
मैं काहिल-निकम्मा हो रहा हूँ

मर जाने या मारे जाने का इतना इंतज़ाम है
फिर घड़ी-घड़ी यह प्यास क्यों उठती है
मुझे भूख क्यों लगती है
जीवन की
कितना भय बढ़ा है
असुरक्षा और अनिश्चितता के बादल घने हुए हैं
पर अब भी करता हूँ मैं प्यार
डर-डरकर छुप-छुपकर
उससे मिलने जाता हूँ...

धोखा खाता हूँ जहाँ-जहाँ भरोसा रखता हूँ
फिर धोखा देता हूँ बुरे खयालों को
आँखें चुराता हूँ मुसीबतों से
और जीता चला जाता हूँ पूरी बेशर्मी से
दुश्चिंताओं को धकियाते हुए
जो आकर बैठ रही हैं ऐन आत्मा में...






हाल-चाल



कविताएँ छपीं तो कुछ दिन
दोस्तों के फोन आये
कुछ अज़नबियों की चिट्ठियाँ
न कविताएँ छप रही हैं
न कोई हाल-चाल पूछ रहा है
कितना सन्नाटा है
एक खाली गिलास
एक अधूरी डायरी
कागज भयानक स़फेद
इस कोरेपन पर मैं धरूँगा
विकट पहाड़ से दिन
एक तरफ रखूँगा भूनी मूँगफली से सौंधे बीते दिन
सम्हालकर रखूँगा यहाँ सबका उधार-बाकी
स्मृतियाँ

पर सोचता हूँ मोर पंखों की तरह
कि बेवफा की प्रेम पातियों की तरह...

मैं एक कलम
इस खालीपन में देर तक हिलाता हूँ
भरना चाहता हूँ इसमें
दोस्तों की बातें
हरे प्रकाश उपाध्याय
संपादक
मंतव्य (साहित्यिक त्रैमासिक)
ए-919/1, इंदिरा नगर, लखनऊ-226016
मोबाइल-08756219902
ईमेल: hpupadhyay@gmail.com
अजनबियों की मादक चिट्ठियाँ सम्हालकर
गिलास में भरना चाहता हूँ इनका काकटेल
जैसे साँसों की रोशनाई लबालब
और इससे रचना चाहता हूँ अपना विदा गीत

बेगाने हो गए हैं सब
मुश्किल है
करूँ क्या जाऊँ कहाँ
रास्ता ही क्या है अब...


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