तुम्हारे दक्ष हाथ — प्रेम कवितायेँ — श्री श्री Prem Kavita in Hindi Language


प्रेम कवितायेँ  — श्री श्री Prem Kavita in Hindi Language

'प्रेम कसैला था' व अन्य कवितायेँ

— श्री श्री

Shri Shri's Hindi poems powerfully express intricate emotions of love. Beautifully crafted her poems may at times look erotic but they have that decency which is essential in love. Enjoy...
- Bharat Tiwari 
प्रेम कसैला था

प्रेम कसैला था

एक रहस्य था उस अंतिम अभाषिक तत्व का
जो तुम्हारी हथेलियों में था

तुम्हारी तरलता
तुम्हारा घनत्व
तुम्हारी आह्लादित मनोकांक्षा
सब उस रहस्य के बीच से निकलती
जल की एक धारा थी

यह एक स्वप्निल सत्य था
कि मेरी देह का रक्तिम रिसाव तुम्हें प्रिय था
और यह भी अनकहा सत्य था
कि तुम्हारी देह की नक्काशी का हुनर 
मुझे प्रिय था

तुम खोलते थे उसे नियंत्रण के नियम से
जो मेरी रजस्वला कमर से 
चांदी के गुच्छे के रूप में बाँध दिए जाते थे

मैं देखती थी
तुम्हारा नीला श्रृंगार 
सख्त और उदार है 

वह प्रविष्ट होता है मेरी रक्तिम झिल्लियों में 
एक नर्म खरगोश की तरह

तभी खिलते हैं लाल बुरांश
मेरी उत्सवी देह में ....


इस बर्फ के शहर में


इस बर्फ के शहर में

तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आती
आता है तो केवल तुम्हारा ताप

वह फिसलना चाहता है मेरे हाथों से
छीनना चाहता है मेरी पीली कुम्हलाई देह
मैं अकेली लौ की तरह काँपती हूँ

काँपती हूँ तब तक 
जब तक दुःख अपने लिखने को 
मेरी देह में तब्दील नहीं कर लेता

मेरी साँसे बंद हैं तुम्हारी कांच की दीवारों में
और तुम्हारी बातें
तहदार हैं किसी कम्युनिस्ट की तरह

कुछ छिपी हुई रोशनियों से
फ्रायड के किताबी सन्देश मेरी कांच की दीवारों से झांकते हैं
मेरी बाहें सिमोन की सफ़ेद परछाईं को समेटे 
लिपटना चाहती हैं तुमसे

सड़कें लंबी होती जाती हैं
दिन छोटे
रातें दिन से भी छोटी

और मैं
एक अवसादग्रस्त शहतूत का पेड़ बन
गिलहरियों को 
बदलती शताब्दी के तर्कों की मिठास से भरे
शहतूत खिलाते हुए 
उनके कानों में तुम्हारा नाम ऐसे लेती हूँ 
जैसे कोई फाहा हो रुई का

गिलहरियाँ प्रेम करने लगती हैं
तुम्हारी साँवली खुरदरी पीठ से
और मैं
सिगरेट के धुंए के छल्लों में
प्रेम के खौफ़ का लिफाफा खोलती हूँ

मेरी सड़कें बहुत लंबी नहीं
गहरी हैं बहुत
कब्र जितनी ....


तुम ईर्ष्या हो मेरी

तुम ईर्ष्या हो मेरी

मेरे प्रेमी के विस्तार में
तुम अक्सर बेख़ौफ़ दिखाई देती हो

तुम्हारी आँखें किसी नश्तर की तरह चुभती हुई धंसती हैं मुझमें

मेरी हताशा के आवेग से
तुम बेशक एक प्रमाणिक कृति बनती हो
लेकिन
तुम्हारा उगना इतना असमय होता है
कि मैं बिना आनंदित हुए 
लिख देती हूँ तुम्हें
एक ही सांस में ....


जागना और भोगना जागृति को

जागना 

और भोगना जागृति को
गर्भ की दीवारों को छूकर ....

ताप 
अवरोध
और भिक्षा पवित्र गान की ....

अर्जित कर अनदेखे कोणों से
एकत्र कर लिये 
गर्भ वाली रात में ....

वो सूक्ष्म अधिकार भी
जो दिये थे हमने एक-दूसरे को
भरी आंखों से ....

ली थी पीड़ा की वर्तिका 
एक-दूसरे से
सूक्ष्म सम्भोग में
अविलम्ब ....

आत्माओं के देवमंत्रों में
निभाई थी हर भूमिका हमने ....

बार-बार तृप्त होते रहे .... होते रहे ....
महकते रहे स्वर्ग के फूलों से ....

जन्म 
मृत्यु
जन्म
मृत्यु
ईश्वर ....
ॐ ....


स्वप्नरेखायें

स्वप्नरेखायें ....

आडी-तिरछी .... अबूझ पहेलियां और तपते रहस्य 

एक के बाद एक सब में डूबते गये ....
जीवन के सूक्ष्मतम तत्व को आत्मा में ग्रहण करते ....
समाधिष्ट होते तत्वों के नन्हें तंतु सुनते ....
शब्द सुनने की कोशिश में मौन को पीते 
जिस्मों की अबोली भाषा से ....

देह के कमल रहस्यों में खुद को खोजते
जैसे कोई अधूरी कविता को दोहराता है बार-बार ....

तब ....
एक तल खुलता है नया .... जिस पर पावं रखते ही हम तैरने लगते हैं
अपनी-अपनी समाधियों के नव-शिल्पों की शीतल धारा में ....
धीरे-धीरे उतरने लगती है रात 
शिथिल आत्माओं की सफेद चादरों पर ....

हम चूमते हैं उंगलियां एक-दूसरे की, विस्तारित रात के पाखियों की कलरव में ....
टांगते जाते हैं एक-दूसरे के अनकहे शब्द .... बोधि वृक्ष की शाखों पर ....

हम सोते हैं बुद्ध की आंखों में
और जागते हैं बुद्ध की ही आंखों में ....



तुम्हारे दक्ष हाथ

तुम्हारे दक्ष हाथ

जब मेरी परिपक्व देह में
स्त्री खोज रहे थे ....
तो यह मेरी प्रीति के कई जन्मों की यात्रा थी ....

मैंने पहचाना तुम्हारा स्पर्श
तुम्हारी गति
तुम्हारा दबाव
तुम्हारी लय ....

हमारी मृदुल स्मृतियों में मैं एक भावपूर्ण नृत्यांगना थी
और 
एक उपासक भी ....
उस पहाड़ की, जिस पर देवी का मंदिर था ....
प्रसाद रूप में अर्पित किए गेंदा-पुष्पों और सिंदूर से मेरी आस्था कभी नही जुड़ी ....

मेरी आस्था थी देवी की नीली रहस्मयी जीभ में ....
मेरी आस्था थी उसकी फैली बड़ी लाल जालों से भरी आँखों में ....
और 
उसके क्रोधित सौंदर्य में उठे पैर की विनाशक आभा में ....

महिषासुर ....
बलशाली भुजाओं वाला महिषासुर वहाँ अपनी अंतिम निद्रा में था ....

इस दृश्य का भय
केवल तुम जानते थे
और मेरी आस्थाओं को भी केवल तुम देख पाते थे ....

तब भी तुम्हारे हाथ दक्ष थे
पतंग उड़ाने में
बेर तोड़ने में,संतरे छीलने में
और 
प्रथम रक्तस्त्राव की असहनीय पीड़ा से बहें मेरे आँसू पोंछने में ....

आज भी तुम्हारे हाथ दक्ष हैं
एक स्त्री खोजने में ....


मैं अपनी ज़मीन से ऊपर उठकर

मैं अपनी ज़मीन से ऊपर उठकर 

तुम्हें प्रेम करने की आस्था में हूँ ....

और इस कोशिश में 
श्री श्री Shri Shri hindi writer

श्री श्री


हरियाणा साहित्य अकादमी से कहानी के लिए युवा लेखन पुरस्कार.
जन्म - 26 नवम्बर
एम ए - इतिहास, मास कम्यूनिकेशन और अब हिंदी में
कहानियाँ, कवितायें - कथाक्रम, सम्बोधन, राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती, हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगन्धा, भोपाल और कुछ दिल्ली की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित
हरियाणा साहित्य अकादमी से ही एक कहानी और पुरस्कृत.
सम्पर्क - shreekaya@gmail.com
भय के शोक का मंत्र अपनी भूरी नीली आँखों के किनारों पर जब-जब छोड़ती हूँ .... 

वो लाल रंग का हो जाता है ....

किसी बुरे स्वप्न की नीति अपने अहंकार से मेरा रंग बदलती जाती है 
और मैं 
लगभग भग्न होकर 
अशेष होने की सम्पूर्ण चेष्ठा में काया के दोहरेपन का उत्सव मनाती हूँ ....

एक छंद बनकर 
अपने आशीषित कौमार्य पर सुगंधित और सुगम मिलन की कल्पना के बीज बो देती हूँ ....

समुद्र का बूढ़ा और प्रेममयी रक्षक 
सारा नमक आशीर्वाद रूप में मेरी काया को अर्पण कर देता है ....

मेरी मेधा शालीन होकर समुद्र का नदियों से मिलन अब समझ पाती है 


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