वो जला रहे हैं ये गुलिस्तां | #भरत_तिवारी



वो जला रहे हैं ये गुलिस्तां

— भरत तिवारी


वो जला रहे हैं ये गुलिस्तां
हो बुझाने वालों तुम कहाँ


यहाँ आग घर तक पहुँच रही
जो तुम अब भी यों ही खड़े रहे
जलता हुआ घर देखते
तो घर कहाँ से लाओगे

जल जायेगा जब सब यहाँ
न रहेगा तब जब ये जहाँ
वो रहेंगे क्या तब भी यहाँ
जो जला रहे हैं ये गुलिस्तां

जो भूले हो अब लौट लो
मुहब्बतें फिर सीख लो
सबसे गले जा के मिलो
हारी जो दुनिया जीत लो

वो जला रहे हैं ये गुलिस्तां
हो बुझाने वालों तुम कहाँ



००००००००००००००००
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
बिहारियों का विस्थापन: ‘समय की रेत पर’ की कथा
अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika
परिन्दों का लौटना: उर्मिला शिरीष की भावुक प्रेम कहानी 2025
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
कहानी 'वो जो भी है, मुझे पसंद है' - स्वाति तिवारी | Hindi Kahani by Swati Tiwari