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हज़रत गंज की यादें — विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा - 26: | Vinod Bhardwaj on Hazratganj


हज़रत गंज की यादें

— विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा

लखनऊ के हज़रत गंज की कई सुंदर यादें हैं। लखनऊ यूनिवर्सिटी में पाँच साल पढ़ाई की थी, क़रीब चार बजे से हज़रत गंज तीन चार घंटे के लिए अपना ठिकाना बन जाता था। शाम को हज़रत गंज में मस्ती में घूमने का नाम गंज़िंग था। आपने गंज़िंग नहीं की, तो क्या किया। अब सुना है हज़रत गंज के चौक को अटल चौक नाम दे दिया गया है। मैं जब गंज़िंग का दीवाना था, तो वहाँ एक संस्कृति अभी बची हुई थी। क़रीब दो सौ साल पुराने हज़रत गंज के इतिहास में नवाब भी हैं, अंग्रेज़ साहब भी हैं और अब भारतीय संस्कृति के रक्षक भी अटल मुद्रा में आ गए हैं। 

रघुवीर सहाय की एक सह कविता है कैलाश वाजपेयी के साथ, फूलों में वो बात नहीं है, जो फूलों में होती थी। 

पहले तो मैं छोटी सी किताबों की दुकान चेतना से शुरू करूँ। प्यूपल पब्लिशिंग हाउस की इस दुकान में दिलीप विश्वास काउंटर पर बैठते थे। वामपंथी तो थे ही, हम जैसे छात्रों की काफ़ी मदद करते थे। मैं अपना भारी बस्ता वहाँ काउंटर के नीचे छिपा देता था, कुछ देर किताबें देखता था और फिर गंज़िंग के लिए निकल जाता था। 

हज़रात गंज 
दिलीप विश्वास अपनी तीखी नज़र से देखते थे, कि मैं किन किताबों के फ़्लैप ज़्यादा देर तक पढ़ता था। एक दिन वह बोले, मैं देख रहा हूँ की तुम ज़्यादातर उन्हीं लेखकों की किताबें उठाते हो, जिनका कॉम्युनिज़म से मोहभंग हो चुका है। 

ऐसी बात नहीं है, देखिए मैंने गोर्की की माँ ख़रीदी है, मैं अपनी सफ़ाई देता था। 

दरअसल रूसी क्लासिक्स के अनुवाद बहुत सस्ते होते थे। अपनी जेब उन्हीं के लायक थी। जिल्द भी शानदार होती थी, काग़ज़ भी चिकना। पेंग्विन द्वारा प्रकाशित सार्त्र का लघु उपन्यास नौसिया वहीं से ख़रीदा था, तीन रुपए पंद्रह पैसे की स्टैम्प आज भी याद है। कवर पर डाली की पिघलती घड़ियों वाली मशहूर पेंटिंग थी, जिसका ओरिजनल रूप मैं दस साल बाद पेरिस में डाली के बड़े शो में देख सका। जॉर्ज पापिंदू सेंटर तब नया नया खुला था, बारिश में पेरिस और भी ख़ूबसूरत हो जाता है , अगर आप सेंटर की मशीनी सीढ़ियों से ऊपर जा रहे हों। और मैं पेरिस में नौसिया किताब के कवर की डाली की अद्भुत पेंटिंग को सचमुच सामने देखने के सुख में डूबा हज़रत गंज की छोटी सी किताबों की दुकान चेतना को याद कर रहा था। 

चेतना के बाद शाम से पहले का ठिकाना था, मेफ़ेयर सिनेमा का वातानुकूलित कॉम्प्लेक्स। ब्रिटिश काउन्सिल वहाँ थी, क्वालिटी रेस्तराँ था, राम आडवाणी की हाई क्लास बुक शाप थी, मेफ़ेयर में स्टूडेंट छूट के बाद डेढ़ रुपए का हॉलीवुड की किसी फ़िल्म का टिकट ख़रीदने का सुख भी मौजूद था। कुँवर नारायण से दोस्ती हो गयी, तो क्वालिटी में कॉफ़ी पीने के बाद बाल्कनी यानी पीछे की सीटों में बैठ कर अंतोनियोनी की ब्लो अप जैसी कोई फ़िल्म देखने का दुर्लभ अनुभव भी याद आ रहा है। 

लखनऊ आर्ट्स कॉलेज में असद साहेब पढ़ाते थे, ऐसा कहा जाता था कि वह हुसेन की म्यूज यानी प्रेमिका को कभी एकतरफ़ा चाहने के चक्कर में कुँवारे ही रहे। उनका शौक़ नवाबी था, कॉलेज के बाद क्वालिटी में अकेले बैठ कर चाय पीना। उनकी एक ख़ास सीट थी, बाहर आते जाते लोग दिखते रहते थे। 

वैसे म्यूज़ भी एक दिलचस्प धारणा है कला की दुनिया में। अक्सर वे शादीशुदा सुंदरियाँ होती थीं, किसी मशहूर पेंटर की प्रेरणा बन जाती थीं, और पतिदेव भी ख़ुश रहते थे कि मेरी बीवी का दीवाना एक बड़ा पेंटर है। पेंटिंग से तो ख़ैर घर भर जाता ही था। 

एक बार एक बड़े कलाकार के बेटे ने कुंठित स्वर में मुझसे कहा, वह म्यूज़ क्या ख़ाक है, साली रंडी है। मुझे बुरा लगा। बच्चे अपने बूढ़े बाप की जवानी से चिढ़ते हैं। पिकासो तो नब्बे के क़रीब पहुँच कर भी इरॉटिक रेखांकन बना रहा था। 

अरे, माफ़ करें, प्रिय पाठक, गंज़िंग में यह म्यूज़ कहाँ से आ गयी। 

राम आडवाणी

राम आडवाणी ख़ुद लखनऊ की एक पढ़ी लिखी पहचान थे। उन्हें वहाँ की आख़िरी तहज़ीब भी कहा जाता है। चार साल पहले पच्चानवे की उम्र में उनका निधन हुआ। वह अंग्रेज़ क़िस्म के अन्दाज़ में मीठा बोलते थे। शुरू में मैं उनकी वातानुकूलित किताबों की दुकान में घुसने से घबराता था। अपन चेतना वाले थे, आम आदमी। पर जब मैंने कुँवर नारायण के साथ वहाँ जाना शुरू कर दिया, तो राम मेरी भी थोड़ी सी इज़्ज़त करने लगे। एक बार मैं अकेले वहाँ गया, जेब में थोड़े से पैसे थे, हार्डबैक में एक नई किताब ख़रीदी द न्यू लेफ़्ट। राम ने मुझे थोड़ा घूर कर देखा। लड़का कुछ पढ़ने लगा है। 

गरमियों में ब्रिटिश काउन्सिल लाइब्रेरी में कई लोग दोपहर में सामने लंदन का कोई मशहूर अख़बार रख कर कुर्सी में सो रहे होते थे। वह मेरा पसंदीदा अड्डा था, साइट एंड साउंड ने मुझे फ़िल्म सिखायी, न्यू सोसायटी में जॉन बर्जर के कॉलम ने कला सिखाई, लंदन मैगज़ीन ने साहित्य सिखाया। जब मुझे दिल्ली में उस लाइब्रेरी के बंद हो जाने की ख़बर मिली, तो बहुत अफ़सोस हुआ। मेरे लिए असली यूनिवर्सिटी तो वह लाइब्रेरी थी। 


मेफेयर के सामने अंग्रेज़ी दुनिया की याद दिलाने वाला रॉयल कैफ़े था, कभी कभी हम भी वहाँ घुस जाते थे। थोड़ा आगे अब सेंट जोसेफ़ कथीड्रल की भव्य इमारत है, पर वहाँ कभी सेंट जोसेफ़ स्कूल था, जहाँ नवीं क्लास में मैं पढ़ चुका हूँ। वहाँ मुझे फ़ादर रोमानो का अंग्रेज़ी म्यूज़िकल उच्चारण बहुत पसंद था। क्लास में एक साँवला कमज़ोर सा लड़का था, उसके नाम से मैं प्रभावित हो गया, जॉर्ज हैमिल्टन। वाह! एक नवाबी शिया हसीन लड़का सरफ़राज अब्बास था जो हमेशा इत्र वाला सफ़ेद रूमाल नाक पर लगाए रहता था। एक ग़रीब सा लड़का था, मुहम्मद अय्यूब अंजुम मधु। बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद मैंने उसको एक कविता में भी प्रेम से याद किया है। और हाँ, इसी स्कूल में एक लड़के ने मुझे मस्त राम की किताब पढ़ने को दी और अंग्रेज़ी क्लास में उसे चोरी से पढ़ते हुए मेरा प्रथम शीघ्र पतन हुआ। 

एक अध्यापक थे खरे। मेरे पिता स्टेट बैंक में ख़ज़ांची थे, खरे उनके पास अक्सर जाते थे। एक बार पिता ने मुझे फ़र्स्ट एड कैम्प में गोल्ड मेडल का सर्टिफ़िकेट ला कर दिया, खरे उन्हें दे गए थे। मैं किसी कैम्प में कभी गया ही नहीं था। बरसों बाद दूरदर्शन पर मेरा लिखा सीरीयल मछलीघर, स्वाभिमान से पहले दिखाया गया था। मीता वशिष्ठ उसकी नायिका थी, राग दरबारी फ़ेम कृष्ण राघव उसके निर्देशक थे। उसमें मैंने इस फ़ेक गोल्ड मेडल प्रसंग का इस्तेमाल किया है। 

हज़रत गंज के आख़िरी कोने पर ऐतिहासिक इंडियन कॉफ़ी हाउस था, प्रथम विश्व युद्ध के दिनों में जो स्थापित हुआ था। सारे बड़े लेखक वहाँ बैठते थे। यशपाल की मेज़ पर बातें सुनने का सुख याद आ रहा है। अब तो उस जगह को अकाल पीड़ित घोषित कर देना चाहिए। 

सड़क के दूसरे कोने पर बेनबोज रेस्तराँ था, जिसे बुद्धिजीवियों का अपर हाउस भी कहा जाता था। वहाँ के समोसे बहुत शानदार थे। रोज़ाना तीन बजे वहाँ एक अधेड़ हो रहा प्रेमी जोड़ा रोज़ नियम से बैठता था। पास में ही चौधरी स्वीट हाउस की मिठाई ग़ज़ब की थी। 

एक लखनऊ इससे भी पुराना था, अब्दुल हलीम शरर ने पुराना लखनऊ किताब में उसका अद्भुत चित्रण किया है। सत्यजीत राय जब शतरंज के खिलाड़ी फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे, तो उन्होंने हमें इस किताब का अंग्रेज़ी अनुवाद दिखाया था। नैशनल बुक ट्रस्ट में इस किताब का हिंदी अनुवाद उपलब्ध है। 

पुराने लखनऊ का स्वाद, एक खो चुकी तहज़ीब का दिलचस्प दस्तावेज़ है ये किताब। 

रघुवीर सहाय की एक सह कविता है कैलाश वाजपेयी के साथ, फूलों में वो बात नहीं है, जो फूलों में होती थी। 

गंज़िंग में अब वह बात नहीं है जो गंज़िंग में होती थी। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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