नन्ही लड़की - शिवरतन थानवी

    श्री शिवरतन थानवी जी , जो जनसता के संपादक श्री ओम थानवी जी के पिता हैं । उन्होंने महान तुर्की कवि “नाज़िम हिकमत” की हिरोशिमा में झुलसी सात साल की बच्ची के बारे में लिखी प्रसिद्ध कविता 'नन्ही लड़की' को, जब अपने शब्दों में अनुवादित करा, तो ऐसा लगा कि वो बच्ची खुद ही कह रही है कविता । उस बच्ची का सारा दर्द अपने में समहित करती इस कविता को, प्रकाशित कर शब्दांकन अपना योगदान दे रहा है ।
ये अतिशयोक्ति नहीं है जब ओम जी कहते हैं “इसे हिकमत ने 1956 में लिखा था। तब से दुनिया भर में उसे गाया जाता है। यू-ट्यूब पर भी अनेक लिंक मौजूद हैं। अँगरेजी में उसके कई अनुवाद हुए हैं। हिंदी में भी होंगे। एक अनुवाद आज मेरे पिताजी ने किया है। मैंने उसे जितनी बार पढ़ा, मेरी आंखें नम हो आईं। आप भी इस युद्ध-विरोधी कविता को अपने मित्रों से साझा करें। एक बेहतर दुनिया बनाने में कविता की भूमिका भी कम नहीं होती।

आइये चलिये ! अब... शांति पैदा करके दिखाते हैं।

नन्ही लड़की

अनुवाद: शिवरतन थानवी


दरवाजों पर मैं आपके
दस्तक दे रही हूँ।
कितने ही द्वार खटखटाए हैं मैंने
किन्तु देख सकता है कौन मुझे
मरे हुओं को कोई कैसे देख सकता है

मैं मरी हिरोशिमा में
दस वर्ष पहले
मैं थी सात बरस की
आज भी हूँ सात बरस की
मरे हुए बच्चों की आयु नहीं बढ़ती

पहले मेरे बाल झुलसे
फिर मेरी आँखे भस्मीभूत हुईं
राख की ढेरी बन गयी मैं
हवा जिसे फूँक मार उड़ा देती है

अपने लिए मेरी कोई कामना नहीं
मैं जो राख हो चुकी हूँ
जो मीठा तक नहीं खा सकती।

मैं आपके दरवाजों पर
दस्तक दे रही हूँ
मुझे आपके हस्ताक्षर लेने हैं
ओ मेरे चाचा! ताऊ!
ओ मेरी चाची! ताई!
ताकि फिर बच्चे इस तरह न जलें
ताकि फिर वे कुछ मीठा खा सकें।


KIZ ÇOCUĞU

Nâzım Hikmet


Kapıları çalan benim
kapıları birer birer.
Gözünüze görünemem
göze görünmez ölüler.

Hiroşima'da öleli
oluyor bir on yıl kadar.
Yedi yaşında bir kızım,
büyümez ölü çocuklar.

Saçlarım tutuştu önce,
gözlerim yandı kavruldu.
Bir avuç kül oluverdim,
külüm havaya savruldu.

Benim sizden kendim için
hiçbir şey istediğim yok.
Şeker bile yiyemez ki
kâat gibi yanan çocuk.

Çalıyorum kapınızı,
teyze, amca, bir imza ver.
Çocuklar öldürülmesin
şeker de yiyebilsinler.










It is me knocking at your door

Nâzım Hikmet Ran


It is me knocking at your door
- at how many doors i've been
But no one can see me
Since the dead are invisible.
I died at Hiroshima
that was ten years ago
I am a girl of seven
Dead children do not grow.
First my hair caught fire
then my eyes burnt out
I became a handful of ashes
blown away by the wind.
I don't wish anything for myself
for a child who is burnt to cinders
cannot even eat sweets.
I'm knocking at your doors
aunts and uncles, to get your signatures
so that never again children will burn
and so they can eat sweets.
    * Credit Mr. Om Thanvi

I Come and Stand at Every Door

Read by Hema Manicka


I come and stand at every door
But no one hears my silent tread
I knock and yet remain unseen
For I am dead, for I am dead.

I'm only seven although I died
In Hiroshima long ago
I'm seven now as I was then
When children die they do not grow.

My hair was scorched by swirling flame
My eyes grew dim, my eyes grew blind
Death came and turned my bones to dust
And that was scattered by the wind.

I need no fruit, I need no rice I
need no sweet, nor even bread
I ask for nothing for myself
For I am dead, for I am dead.

All that I ask is that for peace
You fight today, you fight today
So that the children of this world
May live and grow and laugh and play.







"The Little Girl" or "I Come and Stand at Every Door"

[Read by Hema Manicka, 2007]

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3 comments :

  1. बहुत मार्मिक कविता ! मरे हुओं की उम्र नहीं बढ़ती .... हर बच्चा मीठा खा सके ज़िंदा रह सके, सुंदर इच्छा !!

    अनुपमा तिवाड़ी

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  2. बड़ी भावपूर्ण कविता है । हिकमत ने इसे तुर्की में लिखा , पर हिन्दी में अनूदित हो कर भी यह मूल कविता लगती है । शिव रत्न जी को इस के लिए बधाई ।

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  3. ओह! बहुत मार्मिक और संवेदनशील कविता!
    एक सचेत प्रयास कि इन सभी भाषाओं मे अनुवाद करके इसे प्रस्तुत किया गया| भावनाएं दूर दूर तक प्रसारित हों ....शत शत कामनाएँ!!

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