कहानी: गोरिल्ला प्यार - गीताश्री | Hindi Kahani "Gorilla Pyar" - Geetashree

गोरिल्ला प्यार  - गीताश्री




चटाक् ... इंद्र ने चांटा तो नहीं मारा, लेकिन जो किया, वह किस चांटें से कम है। इंद्र औचक उसे चाटा मारकर चला गया। आदमकद चांटा। दोनों बेड पर थे। रति को तत्पर, स्पर्श, चुम्बन और आलिंगन से देह खिल उठी थी। खिला हो ज्यों बिजली का फूल। बिना किसी भूमिका के अचानक इंद्र भडक़ उठा, ‘इटज नॉट फेयर अर्पि।’ तुम्हें अपने बॉस के साथ बार में अकेले नहीं जाना चाहिए था।

वो भी ऐसे बार में जहां सिर्फ कपल्स इंट्री होती है। कुछ तो है ना तुम्हारा उनसे..कैसे इनकार कर सकती हो..सार्वजनिक और प्राइवेट स्पेस में हम रिश्तो के हिसाब से जाते हैं ना..नहीं। तुमने मुझसे झूठ बोला..तुम वहां थी उसके साथ और मुझे मेरा दोस्त एसएमएस करके बता रहा था और तुमसे मैंने पूछा तो तुमने कहां बॉस के पास हूं..केबिन में..। 

छोटी-सी बात... ये भी कोई बात होती है। ये तो तय नहीं हुआ था कि हर छोटी छोटी बात एक दूसरे को बताएं। ये महागैर जरुरी मामला है..ये सवाल पूछना और इस पर ऐसे रिएक्ट करना ही रिश्तों की सीमा का उल्लंघन है..प्लीज..लीव इट यार..अर्पिता ने चाहा कि इगनोर कर दें। रोमांचक क्षणों में दफ्तर की बातें। बेहद बोरिंग। 
‘वह आदमी ठीक नहीं है... गोरिल्ला है...गोरिल्ला..साला खल्वाट...।’

 गीले क्षणों में ऐसी बातें।

 ‘फिजूल बातें मत करों, इंद्र... किस मी... आई वांट...’ देह धधक रही थी, शब्द बिखर रहे थे... बेतरतीब... उसे लगा इंद्र अब झुका, तब झुका...अनिर्वच आनंद...।

यह क्या? कहां है इंद्र? इंद्र उठा। पतलून पहनी। फिर टी-शर्ट, कलाई में घड़ी बांधी और बेफीता जूतों में पांव डाल अर्पिता के फ्लैट से बाहर निकल गया। कोई शब्द नहीं प्रेम क्या इतना निष्ठुर भी हो सकता है। अर्पिता के लिए आंखें खोलना कठिन था और आंखें मींचना मुश्किल। देह प्रत्यंचा-सी तनी हुई थी। बिजली का फूल अपने पूरे आभार में खिला हुआ था। मगर इंद्र चला गया, बेड पर अधखुली किताब की तरह अर्पि को आतुर, अतृप्त और फडफ़ड़ाती छोडक़र।

वह एक अजीब रात थी। और रातों सी होकर भी और रातों से भिन्न। अर्पिता इस रात को शायद कभी नहीं भूल पायेगी। हर रोज सांझ का ढलना, रात की दहलीज हुआ करता है। इस रोज भी ऐसा ही हुआ। इंद्रजीत के साथ अर्पिता को रातें सुरमई लगा करती थीं, मगर यह रात उसे यकबयक चारकोल-सी काली लगने लगी। एअर कंडीशन ऑन था, लेकिन अर्पिता की देह पसीने में नहायी हुई थी। पसीना सूख जाये। लिहाजा उसके फैन का स्विच ऑन कर दिया, मगर देह की पोरों से पसीना रिसता रहा। लगा मानो तमाम रंध्रों से पसीने का सैलाब फूट पड़ा, ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ था।

इस वक्त कुछ नहीं किया जा सकता। सिवाए तड़फड़ाने के। वो जो कर गया यह भी हिंसा ही है। देह और मन क साथ जब होते हैं तो महाआनंद का पल गढा जाता है। अर्पि के लिए यही ईश्वरीय राह थी। वहां तक पहुंचने के लिए..। अभी देह सन्नाटे में और मन अधमरा। इस वक्त उसकी देह बोल रही है। वह रौंदे जाने को तैयार है। वे बांहें खो गई हैं। अपने दोनो हाथो से देह को समेटना चाहती है और अपनी ही देह समा नहीं पाती, अपनी बांहो में। जगी हुई देह को सुलाने की ताकत को चुकी अर्पि चीख चीख कर रो पड़ी। रोते हुए देह हिलती रही, जांधे रगड़ खाती रहीं..आनंद और क्रंदन साथ चलते रहे।  

न जाने कितना अर्सा गुजर गया, इंद्रजीत के साथ? उसने जिन्दगी में कभी चीजों का हिसाब-किताब नहीं रखा। अनुभूति को भी क्या कभी गिना जाता है। क्या अश्रु और स्वेद की गणना मुमकिन है? आलिंगन और स्पर्श का सुख। इंद्रजीत के साथ कितने दिन, कितनी रातें? अंग संग की चाह। लटों की तरह परस्पर गुंथे हुए दो शरीर। एक पुरुष, एक स्त्री, एक अर्पिता, एक इंद्रजीत। दोनों भिन्न होकर भी अभिन्न। हिसाब-किताब से चीजें कितनी बार रस खो देती हैं।

कितनी बार रस बरसा है। न जाने कितनी बार। इंद्रजीत के साथ वह अनगिन बार रस में सराबोर हुई है। रस की बारिश में वे दोनों भीगते रहे है। आपाद मस्तक। नंगधडग़। निश्छल बच्चों की तरह। उन क्षणों में दोनों कितने मासूम प्रतीत होते हैं। वह कैसी लगती होगी? तब वह अपने आपको नहीं देखती। आंखें मूंद लेती है। इंद्रजीत कवि है। अलग-अलग मौकें पर अलग-अलग उपमायें। स्त्री-देह न हुई एक समूची कायनात हुई। एक बारगी इंद्रजीत ने कहा था, अर्पि, जानती हो, अभिसार के लिए प्रस्तुत तुम्हारी देह कैसी लगती है?
उसके वक्षरोओं पर उंगलियां फिराते हुए अर्पिता ने कहा था,  ‘हूं... नहीं तो...।’ 

इंद्र हंसने लगा था। भेदभरी थी कि कहे चुहलभरी हंसी। 

चलो छोड़ो...। इंद्र ने उसका जूड़ा खोल दिया था। स्याह सघन केश उसके शाने पर बिखर गये थे। 

‘नहीं बताओ ना...।  उसने जिद पकड़ ली थी।’ हां बताओ, अभी... इसी वक्त अर्पि के स्वरों में कुतूहल था। जानने की उत्कंठा।

‘तुम बिजली के फूल सी लगती हो, अर्पि खिला हो ज्यों बिजली का फूल... इंद्र को समर्पित अर्पि इंद्र पर एक बार फिर निसार हो गयी थी। 

 बिजली का फूल... वाह... क्या बात है? सचमुच बेड पर वह बिजली का फूल ही तो हो जाती है... चमकती हुई ...रोशन... उत्तेजना से लबरेज। इंद्र उसे बाँहों में लेकर या गोद में उठाकर पलंग की तरफ बढ़ा नहीं कि उसकी देह में करंट बहना शुरू हो जाता है... बिजली का प्रवाह धीरे-धीरे बढ़ता, पल-पल बढ़ता हुआ बोल्टेज,  इस दैहिक वोल्ट की कोई सीमा नहीं होती। उसकी निर्वसना देह सुर्ख हो जाती।  देह नहीं मानो धधकती हुई भट्टïी हो। उत्तप्त शरीर को इंद्र प्रेम की बारिश से नहलाकर शीतल कर देते थे। प्रेम अगन बुझाने के लिए प्रेम की बरखा। रिमझिम-रिमझिम फुहारें, पुलक भरे अनिर्वच क्षण...।

ऐसे क्षणों को अर्पिता ने एक नहीं, अनेक बार जिया है। यह वह पुलक है, जो फिर-फिर जिये जाने पर भी फिर-फिर जिये जाने की ललक जगाती है।

अर्पिता ने अपने आपको देखा। निर्वसना। कोई आवरण नहीं। बेड तक के डोर और बेड के दरम्यान वह कपड़ों से मुक्त हो लिया करती हैं। इस दिलचस्प खेल में कभी कम वक्त लगता है, तो कभी ज्यादा। आज की घटना... उफ्फ... क्या ऐसा भी होता है?  वह तो सोच भी नहीं सकती थी। वह यानी अर्पिता... एक वर्किंग वूमैन... कामकाजी स्त्री। अर्पिता यानी छोटे नगर मे पैदा हुई महानगरीय सोच की स्त्री। कोई मुलम्मा नहीं, वर्जनाएं नहीं, टेबू नहीं, बस, जिंदगी को जिंदगी सा जीने में गहरा यकीन।

अर्पिता को जड़ता नहीं सुहाती। रूटीन से उस बचपने से चिढ़ है। रिश्ते ऐसे हों कि उनमें रोमांच बचा रहे। कॉलेज में लड़कियां कहतीं, अर्पि को तो अलग तरह का रिश्ता चाहिये। 

कैसा रिश्ता? सहेलियां पूछती तो अर्पिता कहती... समथिंग, थ्रिलिंग... जीवन में सनसनी, उत्तेजना, रोमांच न हो तो जीवन कैसा।  होस्टल के कमरे में रात बत्तियां गुलकर अर्पिता कैसेट लगा आंखें मूंद लेती और फकत कानों से नहीं, सारी देह से सुनती... प्यार को प्यार ही रहने दो... कोई नाम न दो...। यह सिलसिला अभी तक जारी है, अलबत्ता अर्पिता अब कॉलेज गर्ल नहीं, वर्किंग वूमैन विद लॉट ऑफ लाइव एक्सपीरियंस है। अनुभव से ही तो अनुभूतियां उपजती हैं, अन्यथा सब कल्पना है खामख्याली।

इंद्रजीत से उसकी मुलाकात एक गोष्ठी में हुई थी। ऊंचा पूरा कद, सपनीली आंखें, कविता में, कोमल बातों में गजब का सलीका, लेकिन सलूक में कठोर इंद्र सचमुच यथानाम तथा गुण था। विलास को आतुर, तत्पर। गोष्ठी में इंद्र के वक्तव्य ने मोह लिया। वह बोल रहा था..ईश्वर हमारी अपूर्ण दुनिया का पूर्ण चेहरा है...। अर्पि तो लगा इंद्र उसके प्रेम, उसकी सोच का पूर्ण चेहरा है। अर्पि की तारीफ ने इंद्र को बांध लिया और अर्पि को..इंद्र के खुले विचार ने जो दुनिया को घिसे पिटे ढर्रे पर चलने के लिए फटकार रहा था। वह समझ गई थी कि इंद्र वही चेहरा है जो बिना बांधे रिश्ते निभा लेगा। अक्सर वह सोचती कि क्या हर स्त्री को वैसा ही रति-सुख मिलता होगा, जैसा उस इंद्र से मिलता है। या फिर उसकी मात्रा अलग-अलग होती है? उसने शादी नहीं की। कर सकती थी। वरों की कमी नहीं थी। और फिर अर्पिता के पास सबकुछ था। अच्छी शिक्षा, पक्की नौकरी, बैंक बैंलेंस, आकर्षक व्यक्तित्व, सुगठित देहयष्टि।

अर्पिता ने प्रेम किया। शादी नहीं की कि शादी बंधन है। पत्नी के फ्रेम में तो वह छटपटाती  रहती। घुट जाती। उसका प्रेमी दकियानूसी पति में बदल जाता। घड़ी के कांटों से दफ्तर जाना। सांझ को लौटना। कभी-कभी पिक्चर, पिकनिक और शॉपिंग। बच्चे-बच्चे, सास-ससुर, देवरानी, जेठानी, देवर और जेठ नहीं भी तो बंधी-बंधाई दिनचर्या। बंधा-बंधाया रिश्ता। कोई ऊष्मा नहीं, गर्माहट नहीं, औपचारिक प्रेम, किताबी रिश्ते, दैहिक भी, मानसिक भी। 

सोच की धुरी प्रेम। प्रेम है तो जीवन है। अंग-राग के पहले ही प्रसंग में अर्पिता ने कह दिया था... इंद्र हम एक साथ नहीं रहेंगे... एक छत के नीचे नहीं रहेंगे। हम जीवन भर मिलेंगे। फिर-फिर  मिलेंगे हर बार हम पहले प्रेमी और पहली प्रेमिका की मानिंद मिलेंगे... हम जीवन एक संग जियेंगे, लेकिन विवाह नहीं, नो फेरे... नो कोर्ट शिप... नो बंधन... और तो और लिव-इन भी नहीं।

लिव-इन भी नहीं, ताकि प्रेम बचा रहे। प्रेम ही तो स्पन्दन है। वह चला गया तो शेष क्या रहा? निस्पन्द शरीर। जड़-संबंध, आडंबर, ढोंग, रूटीनी जिंदगी, एक ऐसी जिंदगी, जो ठीक वहां खत्म हो तो जिंदगी एक ऐसी जिंदगी, जो ठीक वहां खत्म होती है, ऐन जहां से शुरू होता है रोमांच। अर्पिता ने न जाने कितने शादीशुदा जोड़ों को देखा है। नंबर ऑफ कपल्स। उसने शादी के बाद प्रेमी युगलों को कुम्हलाते देखा है। उसने व्यस्क होने के थोड़ा पहले ही तय कर लिया था कि वह जिंदगी में मर्द को उतनी ही जगह देगी, जितने में उसका अस्तित्व बचा रहे, साथ ही बचा रहे प्रेम।

इंदजीत की सोच भी लगभग वैसी ही थी। तकरीबन एक सी सोच। दो बंदे, एक ख्याल, एक मानुष, दूसरा मानुषी, जब खयालात सांझा हुए तो दोनों की खुशी का पारावार न रहा। इसके बाद तो उन्होंने सब कुछ सांझा किया। दोनों ने देह के स्फुलिंग एक साथ देखे और एक साथ चटकीलें तारे गिने... चट...चट... चटाक...।
चटाक से चांटा मारकर वहीं अनोखा प्रेम उसके जीवन से बेदखल हो गया अपने आप। 

और वह अधखुली किताब कई रातों तक ऐसी ही खुली रही। इंद्र नहीं आया सो नहीं आया। ना फोन किया ना अर्पि का फोन उठाया। कई एसएमएस भी भेजे, कोई जवाब नहीं। दस दिनों के इंतजार ने अर्पि को भीतर ही भीतर बदल दिया। कितना सोच समझ कर ऐसा रिश्ता बनाया जो सबसे अनोखा था। लिव-इन से भी आगे। कितना रोमांच, कितना नयापन और कितनी मस्ती थी। एक दूसरे के प्रति केयर का भाव भी था। रिश्तो के बीच स्पेस की गुंजाइश भी थी। सबकुछ ठीकठाक तो चल रहा था। अचानक क्या हुआ इंद्र को..वह बड़बड़ाई। उसे यकीन नहीं हुआ कि उन दोनों के रिश्ते में कभी ऐसा मोड़ भी आएगा। झगड़े पहले भी हुए लेकिन वे अलग किस्म के थे। आम पति पत्नी वाले नहीं..प्रेमी प्रेमिका वाले नहीं..एक समझदार किस्म के दो सहयात्री की तरह लड़े, भिड़े और मिले। फिर अचानक क्या हुआ..इतना समझदार मर्द भी एक मामूली मर्द की तरह व्यवहार कर सकता है..तो फिर बाकी क्या बुरे हैं। सारी कविताई घुसड़ गई कवि जी की..स्त्री स्वातंत्र्य पर लंबा भाषण देने वाला बंदे का ये चेहरा। क्या करुं..क्या करूं..मुठ्टियां भींचे अर्पि का पारा चढता चला जा रहा था। अब नहीं आएगा कभी इंद्र। उसे लगा उसने खो दिया हमेशा हमेशा के लिए..उसका अब इस दिलचस्प रिश्ते से भी भरोसा सा उठ गया। औरत मर्द के बीच कुछ अनोखा नहीं घट सकता..वे नर-मादा ही बने रहेंगे..। एक नए खेल का भाव मैदान में उठ रहा था। एक और स्त्री भीतर में जन्म ले रही थी। 

अर्पिता उठी। उठना पहली दफा उसे इतना कठिन और पीड़ादायी लगा। लैपटॉप लेकर बेड पर बैठ गयी। फेसबुक ऑन किया। हमेशा स्टेटस को अनविजिबल रखने वाली अर्पि ने पहली बार विजिवल कर दिया। हरी बत्ती जलते ही दिखने लगे, अनगिन लोग, एक नहीं, अनेक लोग, चैट...दर ...चैट का न्योता। रात गहराती रही। जैसे उन्हें देर रात किसी स्त्री से चैट का इंतजार रहा हो। फेसबुक पर देर रात चैट को उतावले लोगो की संख्या देखर एकबारगी अर्पि को हंसी आ गई। जिसे देखो, वहीं पूछ रहा है.. व्हाट आर यू डूइंग? कुछ तो वीडियो चैट के लिए उकसा रहे हैं। नो..नो वीडियो चैट प्लीज। क्या कर रही हूं..मर्द ढूंढ रही हूं..मिलेगा क्या। हाहाहाहा...

सिल्ली गर्ल..जोकिंग..

नो..म सीरियस..

क्यों...व्हाई...बिकौज, आई एम ए गर्ल..इसलिए आपको जोक लग रहा है। 

नीड ए मैन फौर टूनाइट...फ्री ऑफ कॉस्ट..ओके..

स्त्री का इतना खुला आमंत्रण देख कर कुछ हरी बत्तियां लाल हो गईं..और कुछ अनविजिवल..स्सालों..फट गई क्या..तुम ढूंढों औरते..जाल फेंको..मछली की तरह फंसने वाली औरते चाहिए..शेरदिल औरत नहीं..ये पांच हजार दोस्त मेरे..फेसबुक पर दोस्त बनने के आग्रह भेज भेज कर खून पीते रहे..आज उन्हें लग रहा है मैं मजाक कर रही हूं। गो टू हेल्ल..उफ्फ इतना वक्त हो गया। 

 घड़ी के कांटों के लिहाज से मिडनाइट। 

ओह.. यह ठीक रहेगा। वह बुदबुदायी। तभी एक चैट चमकी। 

वाउ.. लुकिंग यंग एंड हैंडसम, नाम आकाश। 

आकाश..उड़ान का शौकीन..उसका प्रोफाइल खोला। शानदार तस्वीरें। फ्लाइट के साथ, पायलट के ड्रेस में। स्वीमिंग पुल में नहाते हुए। स्टेटस सिंगल और इंटेरेस्टेड इन वीमेन वनलि। अर्पिता को पूरा प्रोफाइल भा गया। हां...ये बंदा ठीक रहेगा। इससे जमाती हूं। 

आज वह बिना घुमाए फिराए बात करना चाहती थी। बहुत हो गया।  

 हाय डियर, व्हाटस अप..आकाश चहका।

‘ क्या तुम अभी आ सकते हो, आकाश।’

कोई लागलपेट नहीं, सीधा प्रस्ताव। 

आकाश थोड़ी देर तक चुप रहा फिर पूछा..आर यू सीरियस.

यस डूड..ज्यादा सवाल नहीं..मिल कर करेंगे सारी बातें। ज्यादा मत पूछो। मेरे बारे में सबकुछ मेरे प्रोफाइल में लिखा है और मेरा ताजा अपडेट भी पढ लिया होगा...मैं इमोशनल ट्रामा में हूं..देखो, सबसे ज्यादा पुरुषो ने इसे लाइक किया है। हाहाहाहा...अर्पि का मन थोड़ा हल्का हुआ। 

‘ मुझे कहीं भी दूर ले चलो मैं तुम्हारे साथ एक रात बिताना चाहती हूं, यस तुम्हारे साथ, लेकिन अपने बेड पर नहीं, अपने फ्लैट पर नहीं कहीं और...। ’

आकाश ने आने में देर नहीं की। अर्पिता ने दरवाजा अधखुला छोड़ दिया। बेल या दस्तक की जरूरत नहीं। 

चले आओ आकाश। आई एम वेटिंग फॉर यू। आकाश आया। वह तुंरत उसके साथ हो ली। आकाश ड्राइव करता रहा। इधर-उधर की बातें। लतीफे, कुछ मौसम। कुछ म्यूजिक की बातें, गुडगांव पहुंचने में ज्यादा देर नहीं लगी। दोनों सेकेंड फ्लोर पर पहुंचे। आकाश ने बंद फ्लैट खोला। छोटा लेकिन साफ-सुथरा फ्लैट। डबल नहीं, दो सिंगल बेड, क्या फर्क पड़ता है। आकाश ने स्कॉच के दो पैग लिए। नार्मल पैग, अर्पिता ने तगड़ा पेग बनाया। आज कोई सोडा नहीं, नो आइस, औन दी रॉक्स। कमरे में स्वर लहरियां तैरती रही। दोनो थिरकते रहे। आकाश के हाथ उसके कंधों से फिसल कर वक्ष... फिर कटि...और फिर नितंबों तक आ गये। कपड़े जिस्म से कब जुदा हुए दोनों को पता ही नहीं चला। देह प्रत्यंचा-सी फिर तन गयीं। आकाश पर बिजली के फूल का नशा छा गया। देह देर तक देह को मथती रही। 

जीवन का एक नया अध्याय, प्रीतिमास, चेप्टर इज ओवर, अर्पिता ने सोचा, इंद्र अब कभी नहीं आयेगा, इंद्र से नोकझोंक पहले भी हुई थी, लेकिन इस तरह वाक ओवर, ऐसा बहिर्गमन, वो भी बेबात पर। अर्पिता ने इंद्र को जेहन से झटक दिया। जिस प्रेम को बचाने के लिए अर्पिता ने सबकुछ किया। अलग तक रही, कभी पैसा दिया तो मांगा नहीं, देकर भूल गयी। सब कुछ अर्पित कर दिया। नेह में पगी हुई देह वार दी। उसके बाद ऐसा सलूक। वह शायद रिश्तो में बंधने के लिए नहीं बनी थी या प्रेम उसे रास नहीं आता। धोखा..छल और उसके बाद अविश्वास की यह काली चादर उसे लपेट कर खाई में पटक गई थी। 

जब शहर जाग रहा था, अर्पिता आकाश के साथ उसके फ्लैट से निकल सीढिय़ां उतर रही थी। वे रातभर साथ रहे। कोई पर्सनल सवाल नहीं कि उन्हें पर्सनल नहीं होना था। यह पहली और आखिरी मुलाकात है। अर्पिता ने सोचा , इंद्रजीत... कवि इंद्रजीत वान्ट कम बैक। अब नहीं लौटेगा इंद्र। कभी नहीं, दोनों कार के समीप पहुंचें आकाश ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। अचानक अर्पिता के मोबाइल पर फोन की घंटी घनघना उठी। अरे, उधर इंद्र था। भीगी हुई पश्चाताप से भरी आवाज। 

‘मैं वापस आ रहा हूं अर्पि। मैं नहीं रह सकता तेरे बिना... मुझे माफ कर दो... अब हम साथ-साथ रहेंगे... हमेशा- हमेशा के लिए...शादी भले ना करना, लिव-इन... अलग-अलग नहीं... सुन रही हो ना अर्पि।‘‘ शब्दों में कुछ छलक रहा था तरल।

अर्पिता के गले में कुछ अटक गया। कंठ रूंध गया। बमुश्किल उसने रूलाई रोकी- कहा,  ‘‘इट इज टू लेट इंद्र। ‘‘
पता नहीं उसका कहा इंद्र तक पहुंचा या नहीं? वह आकाश के बगल की सीट पर बैठ गयी। उसके होंठ कांप रहे थे। आकाश ने उसे देखा, गाड़ी स्टार्ट की और खाली-सी सडक़ पर बढ़ा दी। गुडग़ांव-दिल्ली को जोडऩे वाली एक्सप्रेस हाईवे थोड़ी गीली थी। लगता है कि इस ओर कल रात जमकर बारिश हुई होगी। एफएम पर पुरुष आवाज में भाषण बज रहा था..आज सभ्यता का संकट सबसे ज्यादा है। यह सभ्यता शरीर का सुख खोजती है, इसलिए यह सभ्यता अधर्म है..मनुष्य की मुक्ति का रास्ता...

आकाश ने वाक्य पूरा होने से पहले रेडियो बंद कर दिया। अर्पिता की तरफ देखा। कुछ देर देखता रहा। उसके लिए मानसिक रुप से बिल्कुल अजनबी इस लडक़ी का चेहरा जलबुझ रहा था। उसने पूछा कुछ नहीं, क्योंकि पर्सनल नहीं होना था...।


गीताश्री

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1 comments :

  1. ये है आज की कहानी,हमारे पीढ़ी की कहानी; बँधे-बँधाए सूत्र नहीं, बिना किसी लाग-लपेट खुली-बिखरी हकीक़त ।

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