उर्दू को कोई ख़तरा नहीं है



असली स्वाद पाने के लिए रसिक मूल भाषा को अधिक पसंद करता है

- भरत तिवारी 




हर बोली का एक अपना-काव्य होता है, भाषाओं का विस्तार और भाषाओं का आपसी मेलजोल, उस काव्य को अन्य भाषाओं में भी ले कर आता है, लेकिन यह भी है कोई काव्य उसी बोली में अपनी पूरी छटा बिखेर पाता है, जिस बोली की वह उपज है। जापानी: हाइकू, पंजाबी: गीत, सिन्धी: सूफी, संस्कृत: कालिदास का काव्यं, राजस्थानी: डिंगलवीर या चारण, फ्रेंच: बैलेड, हिंदी: गाना, अवधी: दोहा, उर्दू: ग़ज़ल। ये कुछ मिसालें हैं जो दिखाती हैं कि भले ही काव्य की ये विधाएं मूल भाषा से इतर में भी लिखी, कही और पसंद की जा रही हैं , लेकिन इनका असली स्वाद पाने के लिए रसिक मूल भाषा को अधिक पसंद करता है।


ग़ज़ल आज अनको भाषाओं में कही जा रही है, हिंदी में इसका प्रचलन बहुत है। एक कारण हिंदी और उर्दू भाषा का एक दूसरे से जुड़े होना भी है, दोनों भाषाओं का व्याकरण एक जैसा है। इन दोनों से मिलकर जो बोली बनती है उसे बहुधा ‘हिन्दुस्तानी’ कहते हैं: उर्दू काव्य की विधा शायरी खासकर ग़ज़ल अपना असली रंग इसी बोली में दिखाती है। पहली दफ़ा अमीर खुसरो की कलम से निकलने के बाद हिन्दुस्तानी-शायरी लगातार आगे बढ़ती रही है, जिसमें वली, मीर, ज़फर, ग़ालिब से लेकर मोमिन, दाग़, बिस्मिल, फिराख और गुलज़ार, दुष्यंत तक शामिल हैं।

बुधवार को, दिल्ली के इस्लामिक सेंटर में, हिन्दुस्तानी शायरी में, शायर-गायक मीनू बख़्शी की खूबसूरत ग़ज़लों का एक नया दीवान 'मौज-ए-सराब: भ्रम की लहरें', जिसे रूपा पब्लिकेशन्स ने प्रकाशित किया है, ग़ज़लगोई और ग़ज़लों के पाठ और कथक के बीच रिलीज किया गया।

आज के नवोदय टाइम्स में





जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में स्पेनिश ज़बान की प्रोफ़ेसर मीनू बख़्शी, उसी हिन्दुस्तानी-शायरी का शौक रखती हैं, जिसका अभी मैंने जिक्र किया है। उनकी मातृभाषा पंजाबी है लेकिन अपनी दिल की बात कागज़ पर उतारने के लिए उन्होंने ज़बान-ए-उर्दू यानी हिन्दुस्तानी को चुना है। बेहतरीन आवाज़ में गायकी का हुनर रखने वाली प्रो० बख्शी को 2014 में हुस्नआरा ट्रस्ट ने अमीर ख़ुसरो एवार्ड और बिहार उर्दू एकाडमी ने जमील मज़हरी एवार्ड से सम्मानित भी किया है। और हाल ही में उन्हें स्पेन की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए Order of Isabella la Catolica अवार्ड, जो स्पेन का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान है, से पुरस्कृत किया गया है।

बुधवार को दिल्ली में उमस थी, लेकिन 'मौज-ए-सराब’ में पहुँच जाने से वह हसीन हो गयी। किताब को रिलीज़ किये जाने के लिए कामना प्रसाद के संचालन में बुनी शाम में चिन्तक-लेखक-डिप्लोमैट राजनीतिज्ञ पवन वर्मा, मशहूर फ़िल्मकार मुज़फ़्फ़र अली, और कलाकार-एक्टिविस्ट शबाना आज़मी मौजूद रहे।








"उर्दू को कोई ख़तरा नहीं है!" पवन वर्मा ने यह कहते हुए बताया, "हमारी बोली में उर्दू के शब्द इस तरह घुले हुए हैं कि बातचीत में वह आते ही आते हैं।"

शबाना आज़मी ने फ़रमाया, “उर्दू बहुत दिनों तक फिल्मों में सुरक्षित रही, मगर अब ऐसा नहीं है।"

जनाब मुज़फ़्फ़र अली ने कहा, "यह एक ऐसी किताब है जो आपकी हमसफ़र बनेगी, अच्छे-बुरे हर मौ़के पर यह किताब आपका साथ देगी।"






इस शाम की खूबसूरती के रंग को पुख्ता किया, कथक की माहिर शिवानी वर्मा ने। शिवानी लगातार, कथक में नए और खूबसूरत प्रयोग कर रही हैं, उनके यह प्रयोग कितने खूबसूरत हैं, इस बात का अंदाज़ा, उन्हें कॉपी किये जाने की कोशिशों, से भी लगता है। शिवानी ने आज का नृत्य मीनू बख़्शी के नए दीवान की ग़ज़ल पर परफॉर्म किया। ग़ज़ल के दो शेर देखिये —

“जब ये दिल बना है मुहब्बत का आईना
हर दम है सामने तेरी सूरत का आईना
हुस्ने-नज़र है आपका जो सुर्खरू हूँ मैं
वरना कहाँ हूँ मैं किसी अज़मत (सम्मान) का आइना”

उर्दू हिंदी का झगड़ा हमेशा से ही सियासतदानों का काम रहा है, जिसके बीज अंग्रेजों ने बोये और हम उसकी जहरीली झाड़ को अबतक पानी दे रहे हैं...यह समझना और बंद करना ‘अब’ ज़रूरी है।




(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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1 टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (23-09-2017) को "अहसासों की शैतानियाँ" (चर्चा अंक 2736) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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