एक रिनेशां (पुनर्जागरण) और चाहिए — अनुज #Renaissance

Need one more Renaissance - Anuj

Why is there a need for renaissance - Anuj
Leonardo da Vinci's descendants 'include director Franco Zeffirelli'
Mona Lisa based on Da Vinci's gay lover, art detective claims

एक रिनेशां (Renaissance) और चाहिए -  विंची को याद करते हुए

— अनुज


इतिहासकारों का स्वाभाविक शगल

अभी हाल ही में यह ख़बर आई कि इटली के कुछ अनुसंधानकर्ता पिछले कुछ वर्षों से विश्वविख्यात चित्रकार और पाश्चात्य पुनर्जागरण (रिनेशां) के महत्वपूर्ण आधार-स्तम्भ लियोनार्दो द विंची की वंशावली की तलाश में जुटे हैं। लियोनार्दो द विंची म्यूजियम ऐन्ड सबाटो के निदेशक और इंटरनेशनल द विंची एसोसिएशन के अध्यक्ष ने तो यहाँ तक दावा किया है कि इतालवी इतिहासकारों ने लियोनार्दो के वंशज के रूप में कुछेक की पहचान भी कर ली है।

Franco Zeffirelli. Photograph: Roy Jones/ANL/REX Shutterstock
सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि इन तथाकथित वंशजों की फेहरिश्त में इतालवी फिल्म, ओपेरा और टेलीविज़न अकादमी अवार्ड के लिए नामित और इतालवी कला की दुनिया के स्थापित कलाकार फ्रैंको ज़ेफीरेली भी शामिल हैं (The Guardian: Leonardo da Vinci's descendants 'include director Franco Zeffirelli' http://gu.com/p/4tc5q/stw) । यहाँ पाठकों को यह याद दिला देना उचित होगा कि लियोनार्दो का जन्म-दिन इसी महीने की 15 तारीख को पड़ता है। यह सच है कि किसी ऐतिहासिक कल्ट के वशजों की तलाश करना इतिहासकारों का स्वाभाविक शगल होता है, लेकिन इतने सालों बाद यदि आज फिर से लियोनार्दो द विंची के वंशजों की तलाश की जा रही है तो जाहिर है कि कुछ तो बात होगी उस व्यक्ति में! यह भी सवाल उठता है कि वंशजों की तलाश का आख़िर क्या अर्थ हो सकता है। कहना न होगा कि अगर इतिहासकारों ने इस संदर्भ में किसी प्रकार की कोई दावा या घोषणा की है, और वह भी  बगैर किसी वैज्ञानिक प्रमाण के तो कुछ तो विशेष प्रयोजन रहा होगा? हालांकि यह दावा भी किया गया है कि अनुसंधानकर्ता इस परियोजना पर 1973 से काम कर रहे हैं। इसीलिए यह जरूरी हो जाता है कि हम लियोनार्दो द विंची की प्रासंगिकता और विश्व इतिहास में उसके महत्व पर यहाँ एक संक्षिप्त चर्चा करें। (BBC News - Leonardo da Vinci's 'living relatives' identified http://www.bbc.com/news/world-europe-36053229)

'रिनेशां' अर्थात् पुनर्जागरण

विंची का काल विश्व इतिहास परिदृश्य का वह काल था जिसे 'रिनेशां' अर्थात् पुनर्जागरण का काल कहते हैं। पुनर्जागरण की शुरुआत इटली से हुई थी। वस्तुत: पुनर्जागरण वह काल-खंड था जब से इंसान इंसानी कार्यकलापों पर गहरायी से विचार करने लगा था। इससे पूर्व दुनिया के लगभग सभी साहित्य और कला की चिन्ता जीवनोपरान्त के सत्य की तलाश ही रही थी जहाँ धर्म और दर्शन का वर्चस्व रहा था। लेकिन अब का मनुष्य वर्तमान की समस्याओं पर सोचने लगा था। उसकी चिन्ता अब यह नहीं रही थी कि जीवन के उपरान्त का जीवन कैसा होगा या कि इस जीवन के बाद क्या है। ऐसे में, मानव-जीवन में धर्म और दर्शन के स्थान पर तर्क की प्रधानता होने लगी थी और इंसान इस ओर उत्सुक रहने लगा कि मनुष्य की वास्तविक समस्या का अध्ययन किया जाना चाहिए। अब इंसान इस अनुभूति से गुजरने लगा कि मानव जीवन भी महत्वपूर्ण है और उसके क्रिया-कलापों को समझने की आवश्यकता है। अब तक मनुष्य की ज्ञान-प्राप्ति का लक्ष्य बदलने लगा था। यह मानवता के महत्व की स्थापना का काल था और मानवता की यह स्थापना ही लियोनार्दो द विंची की कला का मूल कथ्य है। दरअसल, पुनर्जागरण की भावना की पूर्ण अभिव्यक्ति इटली के तीन कलाकारों माइकेल एंजिलो, रफेल और लियोनार्दो द विंची की कृतियों में मिलती हैं

लियोनार्दो द विंची

लियोनार्दो द विंची का जन्म 15 अप्रैल, 1452 को इटली के विंची नामक स्थान पर हुआ था। हालांकि वे मूलत: एक चित्रकार थे, लेकिन उनकी रुचि एक विस्तृत कैनवास पर बिखरी पड़ी थी। वे एक मूर्तिकार, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, अभियांत्रिकी के विशेषज्ञ, इतिहासकार, लेखक, कवि, दार्शनिक और गायक आदि सभी एक साथ थे। कहते हैं कि उन्होंने ही सर्वप्रथम हवाई जहाज का मॉडल बनाया था। उन्हें हेलीकॉप्टर और टैंक के इज़ाद का भी श्रेय दिया जाता है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी चित्रकारी थी। 'द मोनालिसा' और 'द लास्ट सपर' का नाम उनकी ही नहीं, रहती दुनिया की कला के इतिहास की अनुपम थाती में शुमार किया जाता है।

मोनालिसा

जब कभी भी पेंटिंग्स की बात चलती है तो सबसे पहला नाम 'द मोनालिसा' की अवश्य ही चलती है। कभी मोनालिसा की मुस्कराहट की बात चलती है तो कभी उसकी आँखें के पास और होठों के पास के शैडो को लेकर विद्वान बहस करते रहते हैं। मोनालिसा की महत्ता इसी बात में निहित है कि आज भी उसपर पूरी दुनिया में बहस की जाती है। कुछ लोगों का मानना है कि मोनालिसा विंची की प्रेमिका थी तो कुछ कहते हैं कि यह उनकी कोई बहन थी। हालांकि लियोनार्दो द विंची की अपनी कोई संतान नहीं थी लेकिन उनके पिता ने कई विवाह किए थे जिसके उपरान्त विंची के भाई-बहनों की संख्या अच्छी खासी हो गयी थी। हाल ही में, एक शोधकर्ता ने शोध करके यह बताया है कि विंची 'गे-सेक्सुअल' थे और 'द मोनालिसा' उनके किसी 'गे' पार्टनर की तस्वीर है। यह भी हद है यार कि लोग विंची जैसे बड़े व्यक्ति की छीछालेदर से बाज भी नहीं आते.....! हो सकता है कि यह कयास इसलिए भी लगाया जा रहा हो क्योंकि एकबार लियोनार्दो 'सोडोमी' के मामले में कानून के अपराधी बने थे, हालांकि उन्हें बिना किसी दंड आदि बवेले के तत्काल छोड़ दिया गया था(Telegraph: Mona Lisa based on Da Vinci's gay lover, art detective claims http://www.telegraph.co.uk/news/2016/04/20/mona-lisa-based-on-da-vincis-gay-lover-art-detective-claims/)

मोनालिसा की रहस्यमयी मुस्कराहट


Mona Lisa has long been thought to be based on the wife
of a Florentine silk merchant
बहरहाल, मोनालिसा चाहे जो भी रही हो, या कि यह एक पेंटर की कपोल-कल्पना ही हो, लेकिन इसकी महत्ता इस बात में निहित है कि मोनालिसा मानवता की और मानवीय भावना की प्रथम मुखर अभिव्यक्ति है। विंची की विशेषता इसबात में अधिक है कि वे मोनालिसा के रूप में एक स्त्री का चित्र खींचते हैं जिसकी मुस्कराहट में हज़ारों मानवीय भाव एक साथ एकाकार होकर अभिव्यक्त हो आए हों। विंची की 'मोनालिसा' की खासियत इसी तथ्य में छुपी है कि मोनालिसा धार्मिक चरित्र नहीं है बल्कि वह एक सामान्य स्त्री है। अपनी इस कृति से लियोनार्दो द विंची ने यह संदेश दिया है कि मनुष्य एक सुंदर कृति है। मोनालिसा की रहस्यमयी मुस्कराहट यह बताती है कि सामान्य मनुष्य की आंतरिक शक्तियाँ असीम है। इसतरह विंची लघु-मानव की महत्ता को स्थापित करते हैं। यह विंची की अद्भुत सोच थी। कहना न होगा कि विंची का समय अंधकार और वर्जनाओं में डूबा हुआ मध्यकाल था।

द लास्ट सपर

पुनर्जागरण काल की कलात्मकता की यह एक खास विशेषता थी कि कलाकारों ने अपने विषय तो धर्मग्रंथों से लिए लेकिन उसे रूप मानवीय दिया। लियोनार्दो द विंची की पेंटिंग्स 'द लास्ट सपर' इसका जीवन्त उदाहरण है। यह विंची की सोच का ही कमाल था कि उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पेंटिंग्स 'द लास्ट सपर' में जीसस क्राइस्ट को आम लोगों के साथ भोजन करते हुए दिखाया। विंची की चिन्ता आम जनता थी। शायद यही कारण है कि उन्होंने क्लासिकी को छोड़कर जन-जीवन में उतरना ही अपनी कला का ध्येय बनाया। यही वह बिन्दु है जहाँ विंची बड़े बन जाते हैं।

विंची के वंशज

और आज जब विंची के वंशजों की तलाश की जा रही है तो इसका अर्थ कहीं यह तो नहीं कि एक बार फिर से लघु-मानव की महत्ता की स्थापना की आवश्यकता महसूस की जा रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि विश्व स्तर पर बढ़ते धार्मिक कट्टरतावाद के विरुद्ध यह आग़ाज़ है फिर से मानवता की स्थापना की संकल्पना को दोहराने की? सवाल यह उठता है कि क्या आज सचमुच हमें विंची के बहाने यह याद करने की जरूरत नहीं है कि हम अत्याधुनिक होने का चाहे कितना ही ढोल क्यों न पीट लें, हम कितने ही हाईटैक होने का दावा कर लें, हम अभी भी उसी सामंती युग और उन्हीं वर्जनाओं में जी रहे हैं जिसके विरुद्ध लियोनार्दो द विंची, माइकेल एंजिलो, रफेल, पेट्रार्क और दांते आदि ने विद्रोह का शंखनाद किया था?

अनुज
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