#अजीबजंग: क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री एलजी के रोबोट हैं ? — नीरजा चौधरी #AjeebJung


जब भारत के अन्य राज्यों में राज्यपाल महज नाम के प्रमुख हैं और उनका सारा कामकाज मंत्रिपरिषद की सलाह से होता है तब दिल्ली के उपराज्यपाल के पद में ही ऐसे कौनसे सुर्खाब के पर लगे हैं कि उनके लिए दिल्ली की मंत्रिपरिषद की सलाह कोई मायने नहीं रखती। 



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आखिर जनता का प्रतिनिधि कौन है? एलजी तो हैं नहीं लेकिन वे ही सरकार के सर्वेसर्वा हैं तो क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री उनके रोबोट हैं?  

— नीरजा चौधरी

यह लोकतंत्र का मजाक ही तो है


कोर्ट के फैसले से लगता है कि दिल्ली के विधायकों की जवाबदेही जनता के प्रति बनती ही नहीं है। तो दिल्ली की जनता अपनी समस्याएं किसे सुनाएगी? इसके लिए क्या जनता को उप राज्यपाल के पास जाना होगा?

दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला सर-माथे, लेकिन दिल्ली की 'आप' सरकार का यह सवाल अपने आप में दम रखता है कि अगर दिल्ली का सर्वेसर्वा उपराज्यपाल को ही होना है तब फिर दिल्ली में विधानसभा गठित करने का संविधान संशोधन किया ही क्यों गया?

दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है, इस बात से इनकार नहीं है पर संविधान संशोधन के जरिये अनुच्छेद 239 एए के तहत उसे विधानसभा उपलब्ध कराई गई है। इस विधानसभा के लिए चुनाव भी होते हैं। जिस तरह आमतौर पर लोकतंत्र में होता है, यहां भी संविधान के तहत चुनाव जीतकर आए जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जनता के प्रति होती है।

दिल्ली की जनता का इस सारी परिस्थितियों में क्या कसूर है? दिल्ली के मतदाताओं नें मिलकर आप पार्टी को जिताया है। 

दिल्ली में प्रशासनिक अधिकारों की लड़ाई को लेकर भले ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपना फैसला उपराज्यपाल नजीब जंग के पक्ष में सुनाया हो लेकिन यह फैसला समझ से परे है। इस फैसले को समझें  तो ऐसा लगता है कि दिल्ली विधानसभा के सदस्यों की जवाबदेही जनता के प्रति बनती ही नहीं है। यदि ऐसा है तो दिल्ली की जनता अपनी समस्याओं को किसे सुनाएगी? उन्हें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए क्या उपराज्यपाल के पास जाना होगा?




उस उपराज्यपाल के पास जो जनता के प्रति जवाबदेह ही नहीं है! वाकई, यह बहुत ही अजीब फैसला है। यह सवाल भी उठता है कि जब भारत के अन्य राज्यों में राज्यपाल महज नाम के प्रमुख हैं और उनका सारा कामकाज मंत्रिपरिषद की सलाह से होता है तब दिल्ली के उपराज्यपाल के पद में ही ऐसे कौनसे सुर्खाब के पर लगे हैं कि उनके लिए दिल्ली की मंत्रिपरिषद की सलाह कोई मायने नहीं रखती।

दिल्ली के कामकाज को लेकर जिस तरह की प्रशासनिक परेशानियां सामने आ रही हैं, वह पहले पिछली सरकारों के साथ सामने नहीं आईं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पूर्व के मुख्यमंत्रियों और उपराज्यपालों के कामकाज के संदर्भ में दोनों ही ओर से लचीला रुख अपनाया हुआ था। यदि परेशानी हुई भी तो उसकी व्याख्या संविधान की भावना के अनुरूप ही की गई।

पूर्व में ऐसा भी नहीं हो रहा था कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के फैसले को बिल्कुल मानने से ही इनकार कर रहा हो। मुख्यमंत्री के निर्णय पर ध्यान ही नहीं दे रहा हो। लेकिन, टकराहट अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के साथ अधिक हुई। यह सही है कि केजरीवाल अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तरह अधिक शक्तियां चाहते हैं।  वे दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की बात भी करते हैं। इसके चलते दिल्ली के कामकाज में अड़चनें बढ़ती ही चली गई हैं।

उन्हें यह कहने का मौका मिल रहा है कि उपराज्यपाल तो केंद्र सरकार के नुमाइंदे हैं और केंद्र सरकार के कहे अनुसार ही काम करते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार उपराज्यपाल के माध्यम से उन्हें काम नहीं करने दे रही है। अजीब  ब्रेक डाउन की स्थिति बन गई है दिल्ली में। कामकाज के बदले काम न होने को लेकर आरोप-प्रत्यारोप अधिक हो रहे हैं। केजरीवाल राजनीति में हैं और दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से उन्हें और शोर मचाने का मौका मिला है कि उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा। वे इसका राजनीतिक लाभ उठाएंगे।

सवाल यह नहीं है कि उन्हें काम करने दिया जा रहा है या नहीं करने दिया जा रहा है। सवाल इस बात का है कि दिल्ली की जनता का इस सारी परिस्थितियों में क्या कसूर है? दिल्ली के मतदाताओं नें मिलकर आप पार्टी को जिताया है। उसके 67 सदस्य हैं विधानसभा में। उन्हें इतनी बड़े बहुमत के साथ इसी भरोसे पर जिताया गया है कि दिल्ली के लोगों की परेशानियों को दूर करने के मामले में वे कदम उठाएंगे। लेकिन, उच्च न्यायालय के आदेश से ऐसा लगता है कि वे ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं हैं।

उन्हें उपराज्यपाल के कहे अनुसार ही काम करना होगा। ऐसे में दिल्ली के मतदाता क्यों नहीं सोचें कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है? दिल्ली में लोकतंत्र का मजाक बनाकर रख दिया गया है। एक-एक करके आप पार्टी के सदस्यों को गिरफ्तार किया जा रहा है। हो सकता है कि उनके खिलाफ लगे आरोप सही भी हों लेकिन इसी तरह के आरोपी तो अन्य दलों में भी हैं। ऐसे में उनके पीछे भी तो पड़ा जा सकता है। जब अन्य दलों के नेताओं के साथ ऐसा नहीं होता तो लगता है कि कहीं यह राजनीतिक द्वेष तो नहीं निकाला जा रहा है।

क्या केंद्र सरकार दिल्ली सरकार को मजा चखाने के इरादे से ऐसा कर रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री असहाय से लगते हैं। उन्हें मुख्य कार्यकारी अधिकारी की तरह पदस्थापित कर दिया गया है। मुख्य कार्यकारी अधिकारी को कुछ अधिकार तो होते हैं लेकिन उन्हें तो कुछ भी अधिकार ही नहीं। उनकी सरकार कोई बिल पारित करती है तो उसे रोक दिया जाता है। आखिर जनता का प्रतिनिधि कौन है? एलजी तो हैं नहीं लेकिन वे ही सरकार के सर्वेसर्वा हैं तो क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री उनके रोबोट हैं?

ऐसा लगता है कि दिल्ली के मतदाताओं के साथ धोखा हो रहा है। वे अपने आप को ठगा सा महसूस करते हैं। यह केजरीवाल के साथ या आम आदमी पार्टी के साथ अन्याय नहीं है बल्कि दिल्ली के आम लोगों के साथ अन्याय है। बहरहाल मामला और पेचीदा हो गया है और इसका समाधान केंद्र सरकार या संसद के हाथ में नहीं है बल्कि अब तो मामले का समाधान सर्वोच्च न्यायालय ही करेगा। नहीं तो दिल्ली की जनता चुनाव में अपना फैसला सुनाएगी।


नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार
तीन दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय, राजनीति विश्लेषक। कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के साथ जुड़ी रही हैं। 
साभार राजस्थान पत्रिका
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