शुक्रवार, फ़रवरी 08, 2013

समंदर-सी आवाज - भरत तिवारी Remembering Jagjit Singh

संगीत; ये शब्द ही कितना सुरीला है शायद आपको याद ना हो कि वो कौन सा गाना या ग़ज़ल या गायक था जो आप के दिल में सबसे पहले उतरा था और अगर याद है तो ये बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि वो आज भी दिल के उसी कोने में बैठा होगा – कभी ना जाने के लिये .

मै छोटा बच्चा था तब कोई ६ – ७ साल की उम्र होगी एक छोटे से शहर में रहता था बाकी बच्चों की तरह मेरी भी अपनी बदमाशियाँ थी और मुझे भी संगीत सुनना अच्छा लगता था. घर में एक रिकोर्ड प्लेयर था बड़े सारे रिकार्ड भी थे. पिता जी को अक्सर ही अपनी सरकारी नौकरी के सिलसिले में राजधानी जाना पड़ता था. ये सुनते ही की पापा लखनऊ जा रहे हैं खुशी यो छलाँग मार कर अंदर कूद जाती थी कि जब तक रात में पिता जी वापस ना आ जायें वो कुछ नहीं करने देती थी सिवाय इंतज़ार के यहाँ तक की गली में खेलने का भी मन नहीं होता था .

खैर रात के ९ बजे पिताजी वापस आये लखनऊ से, उनके आने के बाद रुकते नहीं बनता था बस ये जल्दी लगी रहती थी कि आज कौन सा रिकॉर्ड लाये है पापा . उस रात रिक्शे पर ३ बड़े बड़े डब्बे रखे थे , अब तो साहब दिल निकल कर बाहर खुशी ने भी बाहर छलाँग लगायी और जा चढ़ी रिक्शे पर. HMV लिखा था तीनो डिब्बों पर.

रात में पापा ने कहा कि सुबह ही खुलेगा ये सब अभी तो बस आप सो जायें उस आवाज़ में जिसका मतलब होता था कि जवाब नहीं देना है बस सुने और करें

अब जब सुबह बैठक में डिब्बे खुले और उनके अंदर का सब सामान फिट हुआ और तो सामने था नया रिकॉर्ड प्लेयर जिसके साथ २ स्पीकर अलग से थे . नया रिकॉर्ड भी आया था उसे प्ले किया गया. और जो आवाज़ उसमे से निकली उसे सुन कर लगा कि कभी सुनी तो नहीं है ये आवाज़ लेकिन ऐसी आवाज़ कि बस मैं डूब गया उसमे. रिकॉर्ड का नाम था “दि अनफोरगेटेबलस्” और गायक थे “जगजीत सिंह” कब और कैसे वो एक ६ साल के बच्चे के इतने प्रिय हो गये ये तो मुझे भी नहीं पता बस इतना पता है कि उसके बाद उनकी आवाज़ से जो मुहब्बत हुई वो अब मेरे साथ ही जायेगी.

उम्र बढती गयी रिकोर्ड्स आते गये फ़िर कैसेट्स का जमाना आ गया और कैसेट प्लेयर से ज्यादातर उनकी ही आवाज़ आती रहती थी. जगजीत ना आये होते अगर मेरी ज़िंदगी में तो मैं शायद कभी भी गज़ल प्रेमी ना बनता. मेरे लिये ग़ालिब एक नाम है जगजीत जी का ठीक वैसे ही जैसे निदा फाज़ली, सुदर्शन फकिर ... आप बुरा ना माने लेकिन सच है ये ... मै इन सबको और बाकियों को जिनके लिखे को जगजीत जी ने गाया सिर्फ इसलिए ही जानता हूँ.
फ़िर जब दिल्ली में बसेरा हो गया और एक सुबह अखबार में पढ़ा की वो यहाँ सिरीफोर्ट में जगजीत आने वाले हैं तो कि वो यहाँ गायेंगे, अब जाने कहाँ कहाँ से पैसे निकाले टिकट खरीदा और सुना उनको. उनके सामने यों लगा कि कोई मखमल का इंसान मखमल के गले से अपनी मखमली आवाज़ के घागे पूरे हाल में फैला रहा हो और भी बंध गये हम उस रात, फ़िर कोई मौका नहीं गया कि वो यहाँ दिल्ली में आयें और हम उन्हें ना सुनें.

दिल्ली के सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में २६ फरवरी २०११ को उनका ७०वां जन्मदिन और उनके सगींत जीवन के ५० वर्ष पुरे होने की खुशी में कांसर्ट थी. पंडित बिरजू महाराज और गुलज़ार इस मौके पर उनके साथ स्टेज पर थे . एक डाक्यूमेंट्री भी दिखायी गयी थी उनके संगीत के सफ़र की और आँखें खुशी से नम हो गयी थी देख कर क्या पता था कि उस दिन उन्हें आखिरी बार देख रहा हूँ , शायद दिल्ली में वो उनका आखरी कार्यक्रम था.

सात महीने ही बीते थे बस, सर्दियाँ आने को थीं और इस मौसम ने दिल्ली में गुलबहार हो जाती है जगजीत जी का कोई ना कोई प्रोग्राम दिल्ली में ज़रूर होता, लेकिन १० अक्तूबर २०११ उनके हमसे दूर जाने की खबर ले कर आया और मेरी जुबान से बस इतना ही निकला कि
किसी गफ़लत में जी लूँगा कुछ दिन
तेरे गीतों में मिल लूँगा कुछ दिन
अभी आयी है खबर, बहुत ताज़ा है
अभी अफवाह समझ लूँगा कुछ दिन

कोई दिन नहीं जाता जब उनको ना सुना जाये और जायेगा भी नहीं. आज भी जगजीत जी उस सात साल के बच्चे के दिल के उसी कोने में बैठे हैं – कभी ना जाने के लिये . 

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