जानकीदास तेजपाल मैनशन - अलका सरावगी | Excerpt of Alka Saraogi'sNovel 'Jankidas Tejpal Mansion'


‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’ एक नहीं दो उपन्यास हैं, एक जो आत्मकथा के रूप में लिखा गया है और दूसरा उसी के साथ बेहद रचनात्मक ढंग से बुनी गयी घटनाओं का तानाबाना। इसका अंग्रेजी अनुवाद भी जल्दी ही होना चाहिए... शायद उसे पढ़ कर, हिंदुस्तान में मौलिक-अंग्रेजी-लेखन के नाम पर उपन्यासों को पढ़ाने वालों को समझ आये कि लेखन क्या होता है! 

भरत तिवारी
पहली और अंतिम नौकरी - अलका सरावगी |  Excerpt of Alka Saraogi's Novel 'Jankidas Tejpal Mansion'

पहली और अंतिम नौकरी



उपन्यास अंश - 'जानकीदास तेजपाल मैनशन'

अलका सरावगी 

‘‘अमेरिका से पढ़कर लौटे हो। यहाँ काम कर सकोगे?”- ‘घुरघुर’ बोला था। कम्पनी का नम्बर दो या नम्बर तीन आदमी और ऐसी आवाज? जयदीप को हैरत हुई थी। फटे बाँस की सी आवाज वाले बास का नाम उसने पहले ही दिन घुरघुर रख लिया था। उसने जवाब दिया था- ‘‘काम करने के पहले कैसे बताया जा सकता है!” अनजाने ही उसकी आवाज जवाब देते समय कुछ फटी हुई सी निकली थी। घुरघुर का चेहरा तन गया था। एक तो यह कोई जवाब जैसा जवाब नहीं था। ऊपर से क्या यह कल का लौंडा उसकी आवाज की नकल उतार रहा था? जयदीप जानता था कि उसे आदरपूर्वक कहना चाहिए था- ‘‘सर, एक मौका मिले तो कर के ही बता सकता हूँ।” पर घुरघुर के शब्दों में ही सिर्फ अविश्वास नहीं था, उसकी पूरी ‘बाडी लैग्ंवेज’ यानी हाव-भाव से यह साफ था कि वह यकीनन जानता है कि जयदीप वहाँ काम नहीं कर सकेगा। जयदीप को इससे बुरी तरह चिढ़ हुई थी और वह इसे छिपा नहीं पाया था।

नौकरी पर रखने के लिए घुरघुर कोई जयदीप का इंटरव्यू नहीं ले रहा था। जयदीप को खुद बिड़लाजी ने वहाँ भेजा था। एडवोकेट बाबू के पुराने मित्र बिड़ला बिल्डिंग का सारा कानूनी काम देखते थे। सीनियर बिड़ला जी से मिलने वह आर.एन.चटर्जी लेन की शानदार सोलह मंजिली इमारत में गया था, तो एडवोकेट बाबू के वकील मित्र वहाँ मौजूद थे। उससे कोई प्रश्न नहीं पूछा गया था। जयदीप को आश्चर्य हुआ था कि बिड़लाजी को उसकी पढ़ाई से लेकर एडवोकेट बाबू की बीमारी तक हर बात की जानकारी थी। जयदीप को बाद में पता चला था कि बिड़लाजी का ‘दरबार’ रोज सुबह विक्टोरिया मेमोरियल में लगता है या फिर उनके घर में सुबह की चाय पर, जहाँ ‘बाबू’ के कृपापात्र उन्हें हर तरह की जानकारियाँ देते हैं। शायद एडवोकेट बाबू अपने चुप रहने की आदत के कारण ही इस दरबार में शामिल नहीं हो पाए थे। वरना वे उस माहौल के लिए बिलकुल मुफीद थे।

जयदीप ने बिड़लाजी के विशाल चेम्बर से बाहर निकलकर बहुत गहरी चैन की साँस भरी थी। सिर्फ इसलिए नहीं कि उसे नौकरी मिल गई थी, बल्कि इसलिए भी कि वहाँ की हवा में उसे वही जानी-पहचानी परेशान करनेवाली गंध आ रही थी। कायदे ओर मर्यादा की नसीहतों के बोझ से दबा है आदमी इस देश में। बिड़ला है तो क्या और टाटा है तो क्या। कोई अपने मन की न कह सकता है, और न ही कोई बात किसी के मन की कही सुन सकता है। एडवोकेट बाबू के सामने वह जैसे घुट जाता है, वैसे ही बिड़लाजी के सामने भी जैसे जमीन पर बिछ गया था। क्या अमेरिका में कोई राकफेलर या हेनरी फोर्ड से मिलने जाता है, तो ऐसे ही अपने को अदना महसूस करता है? यहाँ हर समय एक तरह की वर्ण-व्यवस्था चलती रहती है- कोई तुमसे उम्र में बड़ा है तो, कोई तुमसे धन या पद में बड़ा है। बस सबका लिहाज करते चलो। एक मिनट के लिए भी यह मत जताओ कि तुम अपने विषय को भी उनसे ज्यादा जानते हो, जो तुमसे ऊपर बैठकर तुम्हें देख रहे हैं।

कितना अलग माहौल था अमेरिका में यूनिवर्सिटी का। प्रोफेसर इस तरह मिलने जैसे दोस्त हों। हर तरह का मजाक करते। अंग्रेजी में कोई ‘आप’ और ‘तुम’ का भेद नहीं है। हर कोई ‘यू’ है- छोटा हो या बड़ा। हर किसी को उसके नाम से बुलाया जा सकता है। शुरू शुरू में जयदीप को अजीब लगता था कि प्रोफेसर होने का कोई जैसे रुतबा ही नहीं दिखता। पर धीरे-धीरे वह उस खुलेपन और दोस्ताने का कायल हो गया था। खुद उसे ‘असिस्टेंट टीचर’ का काम दिलाने में प्रोफेसर हैनिंग ने कितनी मदद की थी। जब हैनिंग को पता चला था कि जयदीप स्कालरशिप के लिए दूसरी यूनिवर्सिटी में ट्रांसफर लेना चाहता है, तो उन्होंने तुरंत वहीं काम दिलाकर उसके खर्चे की व्यवस्था कर दी थी।

जयदीप ने अपने कमाए डालरों से फोर्ड मुस्टांग खरीदी। ग्रुनडिग कम्पनी का जर्मन टेपरिकार्डर लेकर जापान, हांगकौंग, सिंगापुर होते हुए घर पहुँचा था, तो सबकी आँखें फटी रह गई थीं। यह सब मौज वह सिर्फ प्रोफेसर हैनिंग के कारण कर पाया था। पर उन्होंने कभी ऐसा नहीं जताया कि वे उस पर कोई अहसान कर रहे हों। इंडिया में न ऐसी उदारता कोई दिखलाएगा और दिखा भी दे, तो तुम्हें अपना गुलाम बनाकर रखेगा। अपने घर में झाड़ू भी लगवा ले, तो कोई बड़ी बात नहीं। जयदीप के साथ जादवपुर में पढ़े हुए उसके दोस्त अशोक घोष के बड़े भाई की पी.एच.डी. तीन साल लटकी रही थी। उसका गाइड कोई जल्दी में नहीं था कि घोष को अपने हाथ से निकल जाने दे। उसे अपने प्रोफेसर के नाम से पेपर लिखने और समय-समय पर उसकी जगह क्लास लेने के अलावा प्रोफेसर की पत्नी के छोटे-मोटे काम भी करने होते थे। ‘‘प्रोफेसर उसे कभी यह नहीं कहता कि मेरा यह काम दो। पर वह इस तरह अपनी दिक्कतें बताया है कि मेरा भाई कह उठता है, सर मैं कर देता हूँ न आपका काम। आप चिंता न करें। उसकी सेवा भावना का उसे कोई पुरस्कार न मिले, ऐसा भी नहीं है। भाई को प्रोफेसर ने बंगलौर में एक सेमिनार में भाग लेने भेज दिया है”- अशोक हँस-हँस कर बताता था।

जयदीप घुरघुर को देखता दोनों दुनियाओं की तुलना करता रहा था। यह घाघ शायद जानता है या इसने तय कर लिया है कि यह हर तरह से कोशिश करेगा कि जयदीप वहाँ न टिके। जयदीप ने भी उसी क्षण ठान लिया था कि उसकी ऐसी हर कोशिश को वह नाकाम कर देगा। जयदीप के पास चुनने के लिए और रास्ते भी कहाँ थे। पूरे पूर्वी भारत में सिर्फ आठ कम्पनियों में कम्पयूटर लगे हुए थे। टाटा कंसलटेंसी सर्विस से बम्बई में इंटरव्यू देने के लिए उसके पास कल ही चिट्ठी आई थी। पर उसे अच्छी तरह मालूम था कि एडवोकेट बाबू उसे बम्बई जाने नहीं देंगे। बंगाल में नक्सल आंदोलन से घबराकर कई उद्योगपति अपना दफ्तर दिल्ली या बंबई ले जा चुके थे या ले जा रहे थे। जो पढ़ाई वह करके आया था, वह इस देश के लिहाज से अपने समय से बहुत आगे की पढ़ाई थी। बंगाल या कलकत्ता में दूसरी नौकरी की संभावना लगभग शून्य थी। मारवाड़ी घरों के पढ़े-लिखे लड़कां के लिए बिड़लों के यहाँ नौकरी मिलना न केवल आसान था बल्कि बिड़ला में काम करनेवालों की समाज में इज्जत भी थी। एडवोकेट बाबू और उनके मित्र की कृपा से मिली नौकरी पर वह नहीं टिकेगा तो आखिर करेगा क्या?

अलका सरावगी, अन्तरराष्ट्रीय ख्याति रखने वाली लेखिका हैं। 2001 में हिंदी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कृत (कलिकथा वाया बायपास) अलका सरावगी का जन्म 1960 में कलकत्ता में हुआ है। साहित्य में पीएचडी और पत्रकारिता में डिप्लोमा रखने वाली लेखिका की कृतियों का अनुवाद, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, इतालियन, स्पेनिश और तमाम भाषाओँ जिनमे अधिकतर भारतीय भाषाएँ भी शामिल हैं, में हो चुका है।

उनका बहुचर्चित उपन्यास ‘कलिकथा वाया बायपास’ को कैंब्रिज, टुरिन, नैप्लस, हेइदेल्बेर्ग जैसी यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

विदेशों में उनकी उपस्थिति कुछ इस तरह दर्ज है –


  • भारतीय लेखन का प्रतिनिधित्व, Belles estranges, फ्रांस, 2002
  • भारतीय लेखन में सामूहिक यादों पर संगोष्ठी, ट्यूरिन, इटली 2003 
  • मॉरीशस साहित्य महोत्सव, 2004
  • बर्लिन साहित्य महोत्सव, 2004
  • Calendidonna  2005, उडीन, इटली
  • फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेला 2005, 2006
  • Salon du Livre, पेरिस, 2007
  • ट्यूरिन पुस्तक मेला, 2007
  • Incroci di civilita, वेनिस, 2010

कहानी संग्रह
१) कहानी की तलाश में
२) दूसरी कहानी (‘अ टेल रीटोल्ड’ नाम से पेंगुइन से प्रकाशित)

उपन्यास
१) काली-कथा वाया बायपास 
२) शेष कादंबरी 
३) कोई बात नहीं
४) एक ब्रेक के बाद
५) जानकीदास तेजपाल मैनशन 

सम्पर्क
2/10, सरत बोस रोड, 
गार्डन अपार्टमेंट्स, गुलमोहर, 
कोलकाता – 700 020
मो०: 98301 52000.
ईमेल: alkasaraogi@gmail.com
इस देश में फारेन-रिटर्न्ड होना वरदान है या श्राप है, उसे अब ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा था। यहाँ हर आदमी विदेशों से आई छोटी-से-छोटी चीज के लिए भी लालायित दिखता है। उसने अपने एक अमेरिकी दोस्त पैट्रिक से सुना था कि दिल्ली की सड़कों पर उसने अपना लाइटर, पेन और घड़ी बेचकर रहने का सारा खर्च निकाल लिया था। पैट्रिक के पीछे जब-तब लोग पड़ जाते थे और पूछते थे कि क्या उसके पास बेचने के लिए फारेन का कुछ सामान है। कस्टम्सवाले एयरपोर्ट पर हर आनेवाले की तरफ भिखमंगों की तरह देखते रहते हैं कि कुछ मिल जाए। अक्सर लोग उनके लिए सिगरेट का पैकेट या एक चाकलेट ले आते हैं ताकि वे लोग परेशान न करें। बाहर से आनेवाला हर शख्स यहाँ के लोगों के लिए जैसे कोई कल्पवृक्ष है। पर अब जब वह यहाँ आकर रह ही गया है, तो लोगों को न जाने क्या परेशानी है। वे जैसे उसे किसी-न-किसी तरह पीटकर उसके अंदर से अमेरिका का भूत निकालना चाहते हैं। उसे ऐसा लगता है कि सिवाय उसके परिवार के हर आदमी चाह रहा है कि वह वापस अमेरिका लौट जाय। हर आदमी जैसे कह रहा है कि उसके लिए यहाँ कोई जगह नहीं हो सकती।

हिन्द मोटर फैक्टरी पहुँचने के लिए पहले दिन उसने हावड़ा स्टेशन से उत्तरपाड़ा स्टेशन की ट्रेन पकड़ी, तो उसे बहुत अजीब सा अनुभव हुआ था। उसे लग रहा था कि हर आदमी उसे ऐसे देख रहा हो जैसे वह कोई अजूबा हो। मुश्किल यह थी कि जयदीप को भी सबलोग ऐसे लग रहे थे जैसे वे उसी के देश के लोग न होकर किसी प्राचीन पिछड़ी हुई सभ्यता से आए हुए लोग हों। कोई बगल से गुजरता या पास खड़ा होता या बैठता, तो जयदीप को उससे एक तरह की बदबू-सी आती। बाद में उसे पता चला था कि यह लोगों की गंध न होकर ट्रेन और स्टेशन की ही गंध है जो सर्वव्यापी है। बार-बार उसे मिशिगन यूनिवर्सिटी की साफ-सुथरी बसों में बैठे गोरे-चिट्टे सजे-धजे लोग याद आते, जो कुछ दूसरी तरह से ही हँसते-बोलते थे। यहाँ तो कोई हँसता, तो उसके गंदे दाँतों को देख जयदीप को घिन आ जाती। बहुत ही कम लोग दिखते, जो पान या तम्बाकू या पान-मसाला न खाते हों। तब उसने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा आएगा कि पान-मसाला खाए बिना उसका दिमाग काम ही नहीं करेगा। अब सोचो तो लगता है कि इस देश में आदमी जिस तरह तनावों में जीता है, उसके पास यही एक सस्ता और समाज द्वारा स्वीकृत साधन है कि वह अपना दिलोदिमाग हल्का कर सके। एडवोकेट बाबू के सामने वह सिगरेट या शराब नहीं पी सकता था, पर बाद के दिनों में पान-मसाला धड़ल्ले से खाने लगा था। दफ्तरों की इमारतों में हर तल्ले की सीढि़यों पर पान-जरदे की थूकी हुई पीक के निशानों की तरफ उसका ध्यान जाना बिलकुल बंद हो गया था।

जयदीप पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखे, तो उसके जीवन के ‘हार्ड-ड्राइव’ में क्या-क्या ‘डाटा’ या तथ्य जमा हं? कितनी उदारता बनाम कितना घटियापन? कितना आदर्शवाद बनाम कितनी चालूपंथी या दाँव-पेंच? कितना सच बनाम कितना झूठ को सच बनाने की कला? जयदीप ने उन दिनों ही ‘साइंस-फिक्शन’ यानी वैज्ञानिक कल्पनाओं पर आधारित किताबें पढ़नी शुरू की थीं। उसका जीवन उसे हाँककर जिस पतली गली में ले आया था, उसमें से कहीं कोई रास्ते नहीं फूटते थे दोनों तरफ से उसे चूर करने के लिए जैसे दो रोडरोलर चले आ रहे थे। उसमें से कहीं बचने का रास्ता निकलता था, तो सिर्फ आकाश में उड़कर बच जाने का। यह उड़ान जयदीप को इन काल्पनिक विज्ञान की पुस्तकों से मिल रही थी। जहाँ मौका मिलता, वह आर्थर क्लार्क की ‘रामा-1’, रामा-2 और रामा-3 खोलकर बैठ जाता। तीसरी पूरी होने पर वह वापस पहली कड़ी पढ़ने लग जाता। हिन्द मोटर कम्पनी का ‘सिस्टम्स’ मैनेजर किस योग्यता के बल पर उस पद पर पहुँचा था, यह जयदीप को कभी पता नहीं चला। हिंदुस्तान में शायद योग्यताओं की बिलकुल अलग परिभाषाएँ काम करती हैं। मारवाड़ी होना एक काफी बड़ी योग्यता है, यह उसे पहली बार पता चला। शायद खुद उसके चुनाव के पीछे भी यह योग्यता ज्यादा काम कर रही है, ऐसा सोचकर वह पहले कुछ मायूस हुआ। फिर उसने अपने को याद दिलाया कि पूरे भारतवर्ष में कम्प्यूटर का ज्ञान रखने वाले इने-गिने लोग हैं। उनमें कम-से-कम यह सिस्टम्स मैनेजर अगरवाल हरगिज नहीं है। अगरवाल को नौकरी किसी भी कारण से मिली हो, उसकी और अगरवाल की कोई तुलना किसी हाल में नहीं की जा सकती।

अगरवाल ने पहले दिन ही उसे काम पर आने से रोकना चाहा ‘‘आई.बी. एम कम्पनी ने हमारे यहाँ कम्प्यूटर की मशीन लगाते वक्त ही कह दिया था कि उनके ‘एपटिट्यूड’ टेस्ट को बिना ‘पास’ किए कोई यहाँ काम नहीं करेगा। आपको पहले वह परीक्षा देनी पड़ेगी।” जयदीप का खून उबल पड़ा। ऐसी कोई बात बिड़ला जी ने नौकरी देते वक्त नहीं कही थी। वह क्या आई बी एम में नौकरी करने आया है कि उनकी योग्यता की परीक्षा दे? शायद अगरवाल जैसे-तैसे वह परीक्षा पास करके ही यहाँ मैनेजर बना बैठा है और अस्सी लोगों की टीम पर हुक्म चला रहा है। इस देश में कुछ भी हो सकता है। यहाँ तक कि आप किसी और को अपने नाम से परीक्षा में बैठा सकते हैं। ‘‘आप जिस ‘यूनिकोड’ भाषा का कम्प्यूटर में इस्तेमाल कर रहें हैं, वह अब अमेरिका में पढ़ाई नहीं जाती। मैने तो सिर्फ उसे इसलिए अपने-आप पढ़ा है ताकि यहाँ काम कर सकूँ”- जयदीप ने जानबूझकर अपना लहजा अमेरिकन अंग्रेजी का बना लिया- ‘‘आप जिस कम्प्यूटर का यहाँ इस्तेमाल कर रहे हैं, वह आई.बी.एम ने पाँच साल पहले यानी 1966 में बनाना ही बंद कर दिया था।” अगरवाल उसकी बातों और फकाफक अंग्रेजी बोलने से कुछ सकपका गया। उसके बाद उसने उस परीक्षा की कोई बात नहीं की। जयदीप को आज तक नहीं मालूम कि आई.बी.एम ने ऐसी कोई शर्त रखी थी या यह अगरवाल के दिमाग की खुराफात थी। इसके पीछे घुरघुर का भी हाथ हो, ऐसी पूरी संभावना थी। अगरवाल ने उसे कुछ दिन लाइब्रेरी में बैठने और फाइलों को देखने के काम पर लगा दिया था। ऑफिस में बैठने के लिए उसे कोई कुर्सी टेबल नहीं दिया गया था। अपने लिए चेम्बर की तो उसे कोई सपने में भी गुंजाइश नहीं दिख रही थी। कम्प्यूटर की लाइबेरी में पंखा नहीं था और एयर-कंडीशन जाने कब से खराब पड़ा था। वह एक महीने तक प्रायः हर दिन सुबह-शाम एयर-कंडीशन ठीक करवाने की पेशकश करता रहा। तब तक वह समझ नहीं पाया था कि ऐसा भी हो सकता है कि कोई जानबूझकर उसे तंग करने के लिए ऐसा कर रहा हो। उसे यही लग रहा था कि आजादी के तेईस साल बाद भी देश में इतने इंजीनियर नहीं हुए हं कि छोटी-मोटी मशीनों की मरम्मत सही ढंग से हो सके। उसे इस बात पर निराशा जरूर थी। पर गुस्सा नहीं था। जब उसने अमेरीका की सुविधाओं को छोड़कर इस देश में रहने का फैसला कर ही डाला था, तो जो हो, उसे सहना था। सहना ही नहीं, बदलना भी था। मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी में विभिन्न विभागों में तकरीबन तीन सौ भारतीय विद्यार्थी थे, पर उसकी जानकारी में उसके अलावा सिर्फ दो ही और थे, जो भारत लौटे थे। जयदीप को यह सिद्ध करना है कि उसने जो किया वही सही था। आखिर हम आजादी के समय पैदा होने वाली भारत की पहली जवान पीढ़ी हैं। हम ने बाहर की दुनिया देखी है। हम ही भारत को नहीं बदलेंगे तो कौन बदलेगा?

बिना एयरकंडीशन वाली सिस्टम्स लाइबे्ररी में फाइलों के बीच घिरा जयदीप हँस पड़ा। उसने अपने रूमाल से माथे पर आया पसीना पोंछ डाला। वह जो कुछ सोच रहा है, पूरा का पूरा उधार का सोच है। उसके साथ ही भारत लौटे दीपंकर सेन ने जब ये सारी बातें मिशिगन में भारतीय संस्कृति समूह द्वारा आयोजित विदाई समारोह में कही थीं, तो जयदीप के साथ-साथ सबके चेहरों पर एक व्यंग्य भरी हँसी उग आई थी। बाकी लोगों को लौटना नहीं था- उन्हें यह आदर्शवाद निरा थोथा लग रहा था। जयदीप की हँसी के पीछे उसका जाना हुआ यथार्थ था। उसे मालूम था कि दीपंकर सेन एक जाने-माने वैज्ञानिक का बेटा है। उसके लिए दिल्ली के विज्ञान भवन से लेकर देश के किसी भी आईआईटी में नौकरी तैयार है। मुश्किल तो उस जैसे को होनेवाली थी, जो कलकत्ता के नक्सल आंदोलन के कारण रोज बंद होते कारखानों और बोरिया-बिस्तर समेटकर भागती कम्पनी के छोड़े हुए ऊसर में फसल उगाने पर मजबूर था। उसका आदर्श सिर्फ एक बेटा होने तक सीमित था। देश की बात तो दीपंकर ही कर सकता था।

उसका अनुमान बिलकुल सही निकला था। दीपंकर सेन को आई.आई.टी दिल्ली में आते ही नौकरी मिल गई थी और वह माइक्रोचिप्स पर लिखे गए अपने रिसर्च पेपर के कारण पूरे देश के इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग विभागों के सेमिनार में बुलाया जाने लगा था। कलकत्ते के टालीगंज में अपने पुश्तैनी मकान में उसने पिछले दिनों कलकत्ता आने पर उसे खाने के लिए बुलाया था। जयदीप ने जानबूझकर उसे हिन्द मोटर कम्पनी के अपने अनुभवों के बारे में कुछ नहीं बताया था। बल्कि उसने कहा था कि वह वहां के सिस्टम्स डिपार्टमेंट को ‘आरगेनाइज’ कर रहा है और देश की सबसे ज्यादा बिकनेवाली गाड़ी की कम्पनी के साथ जुड़कर बहुत गौरव का अनुभव कर रहा है।

दीपंकर के घर पर उसका एक मित्र विजेन राव उसे मिला था, जो दीपंकर के साथ आईआईटी खड़गपुर में था। विजेन उर्फ विज्जू की बातों से जयदीप बहुत हैरान हुआ था, खासकर यह सुनकर कि उन जैसों का अमरीका जाना एक बड़ी योजना का हिस्सा था। भला एक व्यक्तिगत निर्णय, जिसमें कोई आपको सलाह-मशविरा तक न दे रहा हो, किसी दूसरे की योजना कैसे हो सकती है? ‘‘अमेरिका ने आजादी के दस साल बाद पी.एल-480 नाम का गेहूँ भारत को डालर की बजाए रुपये लेकर दिया था। उस रुपये को अमेरिका ने कृषि विश्वविद्यालय बनाने में भारत में ही लगा दिया। वहाँ से पढ़नेवाले आगे रिसर्च के लिए अमेरिका की स्कालरशिप पर जाने लगे। इस तरह अमेरिका भारत में खाद, बीज आदि उत्पादों के लिए अपना बाजार बनाने की शुरुआत कर रहा था। तुम सब लोग जो अमेरिकी यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग या डाक्टरी पढ़ने गए, ये सब उसी योजना के हिस्से थे”- विज्जू की बातें बिल्कुल बेबुनियाद नहीं लग रही थीं, ‘‘अच्छा बताओ, तुम्हारे यहाँ अमेरिका की ‘स्पैन’ मैगजीन आती है या नहीं?”- विज्जू ने पूछा था। जयदीप ने हामी भरते हुए सोचा- तो क्या अमेरिका हर आनेवाले विद्यार्थी के अते-पते अपनी जानकारी में रखता है? ‘‘बिल्कुल। तुम जाने-अनजाने अमेरिकी चीजों और जीने के तरीकों को चाहने लगते हो। एक दिन तुम्हारी सब बातें, तुम्हारे शब्द, तुम्हारी भाशा, तुम्हारे त्योहार, तुम्हारे घर की सब चीजों अमेरिका की होंगी”- विज्जू ने कहा था।

जयदीप का माथा कुछ भन्ना गया था। बेचारे एडवोकेट बाबू ने किस मुसीबत से उसे अमेरिका भेजा था। उतनी ही मुश्किलों से उसे अमेरिका द्वारा हजम किए जाने से बचाकर वापस बुलाया। आनेवाले समय में शायद एडवोकेट बाबू जैसे पिता ऐसा कर नहीं पाएँगे। विज्जू के जाने के बाद जयदीप ने दीपंकर की ओर देखा था कि वह कुछ कहे। आश्चर्य की बात थी कि अमेरिका में रहते हुए तो दीपंकर हर समय अमेरिकी कल्चर का मजाक बनाता था। पर आज एकदम गूंगा बनकर बैठा रहा था। ‘‘मैं ‘अपोलिटिकल’ आदमी हूँ”- दीपंकर ने कहा- ‘‘मैं किसी तरह की राजनीति में नहीं हूँ। न मं किसी के पक्ष में हूँ, न विपक्ष में। हम वैज्ञानिक हैं। हमारा काम प्रकृति को बांधकर आदमी के जीवन को सुगम बनाना है। विज्जू की सुनोगे तो चकरा जाओगे। वह अमेरिका को नव-साम्राज्यवादी देश मानता है। कम्युनिस्टों के हिसाब से हर कोई अमेरिका से पैसे खाकर यहाँ पर सी.आई.ए. का एजेंट बना हुआ है। मुझे इन सब बातों से कोई लेना-देना नहीं है। विज्जू सौ प्रतिशत सही हो या सौ प्रतिशत गलत, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

बिना पंखे और एयरकंडीशन की लाइब्रेरी में चार सौ फाइलों को एक महीने तक पढ़कर जयदीप ने तीस पन्नों की रिपोर्ट तैयार कर डाली थी। वाकई आदमी को ईमानदारी और मेहनत से काम करने के अलावा कुछ और सोचने की जरूरत नहीं है। अपनी भूलां ओर कमियां की रिपोर्ट सीधे बिड़लाजी तक पहुँचने की आशंका से सारा डिपार्टमेंट हिल गया था। उनका यह अंदाजा कि अमेरिका से पढ़कर लौटा यह चिकना लड़का गर्मी से घबराकर दो-चार दिन में ही हार मान लेगा, गलत निकला था। जयदीप को सिस्टम्स डिपार्टमेंट के एक आदमी ने हिंदमोटर के लिए ट्रेन पकड़ते वक्त यह सब बताया। उसकी बातें सुनकर जयदीप सोचता रहा कि अब उसे दुश्मनों के साथ कुछ दादागिरी करनी होगी। उसी दिन उसने फाइनेंस मैनेजर को उसके चेम्बर में बिना इजाजत घुसकर अमेरिकी लहजे की अंग्रेजी में आदेश दिया था कि उसके लिए विभाग में एक नई टेबुल कुर्सी की व्यवस्था किस जगह पर की जाएगी। उसने देखा था कि यहाँ इस देश में ऐसी अंग्रेजी बोलते ही सामनेवाला हार जाता है। उसकी अंग्रेजी को पूरी तरह समझ नहीं पाने के कारण लोग हर बात पर हामी भर लेते हैं। जयदीप ने उसी अंदाज से बात करते हुए चार पंक्तियों का एक ‘नोट’ बनाकर उसे थमा दिया था जिसमें लिखा था कि विभाग के कौन-कौन लोग सीधे उसे रपट करेंगे। इस तरह उसने अपने नीचे साठ लोगों को ले लिया था। बाद में यह नोट उसने नोटिस बोर्ड पर खुद चिपका दिया था। देखो कि अमेरिका रिटर्न्ड चिकना लड़का यहाँ कैसे टिकता है!

जयदीप की फितरत नहीं थी कि वह अपनी बात को इस तरह मनमानी के तौर पर चलाए। आज तक उसने एडवोकेट बाबू से कोई जिरह तक नहीं की थी कि उसके जीवन के फैसले उससे बिना पूछे क्यों लिये गए। न ही उसने स्कूल, विश्वविद्यालय या अमेरिका में कभी किसी को कुछ करने का आदेश दिया था। पर उस दिन उस पर जैसे कोई भूत सवार हो गया था। यह सिस्टम ऐसे ही बदलेगा। उसे मन-ही-मन आश्चर्य भी हुआ जब फाइनेंस मैनेजर ने उसकी सारी बातें मान लीं। क्या इस देश में लोग इसी तरह बातें मानने के आदी हैं? क्या अंग्रेजी बोलकर इनसे कुछ भी करवाया जा सकता है? शायद उनलोगों ने समझ लिया था कि यदि वह एक महीने गर्मी में मरकर रिपोर्ट तैयार कर सकता है, तो वह टूटने-बिखरने वाला इंसान नहीं है। या हो सकता है कि उन्हें लगा हो कि बिड़लाजी तक उसकी सीधी पहुँच है। वह जो कह रहा है, उसे न मानने पर उनकी शिकायत ऊपर तक जा सकती है। न जाने क्या कारण था, पर उसे दो पाँव टिकाने भर की जमीन उस देश में मिल गर्द थी। या कम-से-कम उस समय तो उसे ऐसा ही लगा था।

लोगों की आँखों में जयदीप को कभी अदब का भाव नजर आता था तो कभी धीरज से भरी हिकारत का। छह महीने बाद जब उसने कहा कि शेयरहोल्डर के हिस्से और वितरण की प्रणाली का जो काम वे लोग कम्प्यूटर पर करने में चार से छह घंटे लगाते हैं, उसे वह बीस मिनट में कर सकता है, तो मीटिंग में सन्नाटा छा गया था। घुरघुर के अंदर की घुरघुराहट बंद हो गई थी। उसने सामान्य बोली में लगभग फुसफुसाकर कहा था- ‘‘तो आपको लगता है कि अभी तक यहाँ आराम हो रहा था, काम नहीं!” ‘‘दिस इस नाट द पांइट सर”- जयदीप तुरन्त अमेरिकी लहजे की अंग्रेजी की शरण में चला गया था- ‘‘मुद्दा यह है कि आप परिवर्तन चाहते हैं या नहीं? हम दो सौ स्क्वायर फीट जगह को घेरकर पन्द्रह के.वी. पावर खानेवाली इस पुराने मॉडल के कम्प्यूटर पर तीन सौ रुपए प्रति घंटे खर्च करते हैं। आप तीन शिफ्ट में जितना काम इस कम्प्यूटर से करवा रहे हं, मैं उतना ही काम दो शिफ्ट में करवा सकता हूँ।” घुरघुर के पास उसे शाबासी देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। चारों ओर से जो आवाजें उनके कान तक पहुँच रही थीं, उनमें ‘कर के देखना तो चाहिए ही’, ‘वाह क्या बात है’- जैसे जुमले थे।

जयदीप फूला नहीं समा रहा था। मीटिंग से बाहर निकलते हुए घुरघुर ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा कि उसे कम्पनी के वाइस पे्रसिडेंट ने मिलने के लिए बुलाया है। आ गए ना बच्चू तुम हमारे वश में। अमेरिका से पढ़कर आया हुआ आदमी यहाँ किस तरह काम कर सकता है, समझ में आया तुम्हें?- जयदीप मन-ही-मन घुरघुर से बात करता आगे बढ़ गया था।

धीरे-धीरे हिन्द मोटर कम्पनी की बातें उसे पता चलने लगी थीं क्योंकि कम्पनी में काम करनेवाले अधिकतर युवा लोग उससे किसी-न-किसी बहाने से बात करने लगे थे। कई तो हावड़ा स्टेशन से हिन्दमोटर की ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन पर उसका इंतजार करने लगे थे। जादवपुर विश्वविद्यालय से ही उससे दो साल सीनियर रहकर मैकेनिकल इंजीनियरिंग किए हुए जयंत सेन से उसे पता चला था कि विदेश से पढ़कर आए इंजीनियरों की तनख्वाह वहाँ सात-आठ सौ रुपये से अधिक नहीं, पर गोरी चमड़ीवाले अमेरिका ‘जेसमोर’ को पचीस हजार रुपए की तनख्वाह मिलती है। जयंत सेन का भी कहना था कि जेसमोर अमेरिका में किसी मोटर कम्पनी में मामूली वर्कर्स सुपरिंटंडेंट था। उसकी योग्यता सिर्फ उसका गोरा साहब होना है। ‘‘तुम्हें भी बड़े बाबू ने इसीलिए रख लिया होगा क्योंकि तुम फिरंगियों की तरह ही गोरे हो”- जयंत की बात सुन जयदीप का मन कड़वाहट से भर गया था। ‘बड़े बाबू’ यानी सीनियर बिड़लाजी! तो क्या जयंत को पता है कि उसका एपायंटमेंट कहां से हुआ है। और क्या वह सोच रहा है कि उसकी तनख्वाह भी जेसमोर जैसी है?
जादवपुर के दिनों से ही उसे मालूम है कि बंगाली दोस्त बनते हैं लेकिन अचानक कुछ ऐसा कहते हैं कि आपके पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाय। न वे आप पर भरोसा करते हैं और न आप उन पर कर सकते हैं। ‘‘कौन बड़े बाबू जयंत? क्या घुरघुर को तुम बड़े बाबू की कह रहे हो,” जयदीप ने जानबूझकर जयंत के सामने ऐसे दिखाया था जैसे वह समझा न हो। बंगाली ‘बाबू’ का मतलब होता है कोई क्लर्क जैसा आदमी, जिसके हाथ में इतनी ताकत होती है कि आपका कोई भी काम अटका सके या कभी होने ही न दे। बिड़ला लोगों को उनके सारे खिदमतगार ‘बाबू’ कहते हं, चाहे वे उनके सबसे सीनियर लोग क्यों न हों। यहां ‘बाबू’ का मतलब है ‘बास’, जो आपसे कई दरजे ऊँचा इन्सान है।

‘‘अरे तुम बुरा मान गए?”- जयंत ने भाँप लिया था कि जयदीप को अच्छा नहीं लगा है- ‘‘मुझे पता है कि तुम जहाँ से गुजरते हो, लोग बात करना बंद कर देते हैं। बिना इंटरव्यू के जाब मिलने पर ऐसा ही होता है बंधु। घुरघुर तुमसे नफरत क्यों करता है, सारा ऑफिस जानता है। हर रोज उसे लगता है कि तुम आज ‘बिड़ला पार्क’ में बाबू के दाढ़ी बनाते समय उनके सामने बैठ कर आए होगे।” जयदीप जयंत के साथ ठहाका लगाकर हँस पड़ा। ‘‘जबकि सच यह है जयंत कि अगर बिड़लाजी खुद मुझे चाय पर बुलाने के लिए फोन करें, तो भी मैं न जाऊँ। एक मेरा बाप यानी एडवोकेट बाबू ही बहुत है मेरे लिए, जिसके सामने मैं साँस भी गिन-गिन कर लेता हूँ। तुम्हारी तो बड़े बाबू से मुलाकात होती रहती है। बताओ, तुम उनके सामने साँस ले पाते हो?” जयदीप की बातों से जयंत खुल गया था- ‘‘अरे तुम सच पूछो, तो बाबुओं को खाली प्राफिट से मतलब है। मैंने सुना है कि रात को नींद खुलने पर साढ़े बारह बजे हों या रात के दो बजे हों फैक्टरी में फोन कर के बड़े बाबू पूछते हैं कि कितनी गाडि़याँ असेंम्बली लाइन से निकलीं। एक गाड़ी भी कम निकल जाय, तो उनका ‘मूड’ बिगड़ सकता है। इसलिए हमारा डिपार्टमेंट करता क्या है जानते हो? प्रोडक्शन को हमेशा कम कर के बताता है ताकि किसी दिन कम हो, तो पिछले को जोड़कर बता दिया जाय। ‘रिस आक्सफोर्ड’ गाड़ी के बीस साल पुराने मॉडल पर गाड़ी बना रहे हैं और नाटक ऐसा कि हमारी अपनी देसी गाड़ी हो। वहाँ कब का यह मॉडल पिट गया, पर ये कम-से-कम तीस चालीस साल इसी मॉडल को जरा-सा हेर-फेर कर के चलाएगें जब तक पब्लिक उसे खरीदना न बंद कर दे।”
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जयदीप को मालूम है कि खुद एडवोकेट बाबू ने जब पहली एम्बेसेडर गाड़ी खरीदी, तो उन्हें छह महीने इंतजार करना पड़ा था। गाड़ी का दाम शायद तब बीस हजार रुपये था, पर जल्दी लेने के लिए दो हजार ‘प्रीमियम’ या ज्यादा पैसा देना पड़ता। बिड़लाजी के पास सालाना तीस हजार गाडि़याँ बनाने का लाइसेंस है, जबकि गाड़ी की माँग बहुत ज्यादा है। गाड़ी के ‘डीलर’ इसीलिए प्रीमियम वसूल कर पाते हैं। खुद बिड़लाजी की मौज है क्योंकि कोई मौजूद नहीं है जो उन्हें टक्कर दे सके। अमेरिका में फोर्ड मुस्टांग चलाकर अब एम्बेसेडर को चलाना ऐसा है जैसे कोई ट्रक चला रहा हो। ऊपर से कोई भरोसा नही कि कब गाड़ी का ‘एक्सल’ टूट जाय या कि कब ‘गियर बाक्स’ जवाब दे जाय। खुद बिड़लाजी को अपनी कम्पनी की गाड़ी पर भरोसा नहीं है, इसीलिए इम्पोर्टेड स्टूडीबेकर में बैठते हैं। यह बात तो उसे अब मालूम हुई है, जब वह खुद इस कम्पनी में आया है।

अरे, क्या मैं वाकई अमेरिका का ‘इटेंलेक्चुअल काम्परेडोर’ बन गया हूं जो इस तरह सोच रहा हूँ?- जयदीप को दीपंकर का दोस्त विज्जू याद आ गया था। विज्जू ने कहा था कि अमेरिकी यूनिवर्सिटी इसी मकसद से भारतीय विद्यार्थियों को स्कालरशिप देकर बुलाती है। अब जब वह यहाँ वापस आ ही गया है, तो क्या उसका या उसकी पीढ़ी के इंजीनियरों का यह कर्तव्य नहीं है कि हम अपनी चीजों को दुनिया की टक्कर का बनाएँ? जयंत सेन के चेहरे पर विद्रूप भरी हँसी आ गई थी- ‘‘बड़े बाबू हर महीने प्रोडक्शन रूम आते हैं जहाँ एम्बेसेडर के हर पार्ट अलग-अलग चारों तरफ रखे हुए हैं। हर पार्ट के साथ लिखा हुआ है कि वह इम्पोर्ट होता है या यहाँ बनता है। जाहिराना तौर पर धीरे-धीरे गाड़ी को पूरी स्वदेशी बनाना है, पर उसके पीछे यह मत समझना कि कोई आदर्श-वादर्श का मामला है। सरकार ने इम्पोर्ट पर रोक लगाकर इन्हें मजबूर कर दिया है कि गाड़ी के सारे-के-सारे पार्ट्स यहीं बनाओ। गाड़ी अच्छी बने या नहीं, इससे न सरकार को मतलब है न कम्पनी को। प्रोडक्शन डिपार्टमेंट की भी चांदी है। जो रुपया खिलाएगा, उसी फैक्टरी या वर्कशाप का माल सही बताकर खरीद करवा देंगे। बाद में गाड़ी खरीदनेवाला रोएगा या किसी वर्कशाप के चक्कर लगाता रहेगा।”

जयदीप का मन मर गया। उसके दोस्त वहाँ अमेरिका में कम-से-कम पन्द्रह हजार की नौकरियाँ कर रहे हैं और यहाँ चौदह सौ की तनख्वाह में वह क्या इसलिए पड़ा है कि एक पुराने मॉडल की घटिया गाड़ी बनानेवाली फैक्टरी में पुराने मॉडल का कम्प्यूटर पुराने तरीकों से चलाता रहे? दुनिया कहाँ आगे जा रही है, इस देश में किसी को जानना ही नहीं है। सरकार ने एक तरफ विदेशों से तकनीक का आयात कम करने के चक्कर में घटिया माल गाडि़यों में इस्तेमाल करने के लिए कम्पनी को मजबूर कर दिया है। दूसरी तरफ गाड़ी का दाम ही नहीं, डीलर की कमीशन भी सरकार ही तय कर रही है कोई भी कम्पनी ऐसे माहौल में ऐसे माहौल में बढि़या माल या किसी गाड़ी का नया माडॅल बनाने की कोशिश क्यों करेगी?

फँस गए तुम जयदीप। तुम ही नहीं, इस देश में हर आदमी फँसा है। प्रिवी पर्स खत्म कर और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इंदिरा गांधी ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाकर वोट बटोर रही है। गरीबी तो जाने हटेगी या नहीं, पर दुनिया की टक्कर का सामान बनाने का सपना तो सबको भूल ही जाना चाहिए। हर आदमी इसी फिराक में लगा हुआ है कि कैसे वह ज्यादा-से-ज्यादा पैसा कमा ले। इससे ज्यादा इस देश में कोई कुछ सोच ही नहीं पाता। पूर्वी पाकिस्तान में आजादी के लिए लड़ाई चल रही है। लाखों लोग सीमा में इस पार आ गए हैं। कलकत्ता शहर में ट्रेड यूनियनों ने पहले ही कोई कम मुसीबतें नहीं खड़ी कर रखी थीं। अब रिफ्यूजी आकर रही-सही कसर पूरी कर रहे हैं। पर हर युद्ध में कुछ लोग पैसे जरूर कमाते हैं। हिन्दमोटर कम्पनी के पास बेडफोर्ड ट्रक के आर्डर आए हैं। कारखाने की भारी ‘प्रेसिंग’ मशीन को एम्बेडेसर गाड़ी बनाने से फुरसत नहीं है, ट्रक कैसे बनेंगे? एक ही उपाय है कि लोहारों के यहाँ ठोंक-पीट कर ट्रक तैयार करवाए जाएँ। पर कम्पनी बदनामी के डर से यह काम बाहर नहीं करवा सकती। इसलिए कम्पनी के अंदर ही यह काम करवाया जा रहा है। मुनाफे का कोई मौका छूटना नहीं चाहिए- यही मानो मूलमंत्र है इस देश का।

जयदीप ने वाइस प्रेसिडेंट के चेम्बर में घुसते हुए निश्चय किया कि वह इन सब बातों पर कुछ नहीं सोचेगा। देश जाए भाड़ में उसकी बला से। जिस देश में एक नया टेलिफोन कनेक्शन लेने में दस साल लग जाते हैं, और आने के बाद भी वह काम नहीं करता, उस देश में रहना है, तो ऐसे ही रहना होगा। अपने बूते पर जो कुछ वह कर सकेगा, उतना जरूर करेगा। इनके कम्प्यूटर को तीन शिफ्ट से दो शिफ्ट पर लाकर दिखाएगा।

जयदीप ने अपनी राजेश खन्ना वाली मुस्कान चेहरे पर लाकर हल्की सी गरदन टेढ़ी कर वाइस प्रेसिडेंट की तरफ देखा। जवाब में उसे एक पथरीला चेहरा देखा, जो कभी जीवन में शायद ही मुस्कुराया हो। ‘‘देखिए, मिस्टर जयदीप गुप्ता! हर कम्पनी के कुछ तौर-तरीके, उसूल होते हं। बेशक आप अमेरिका से पढ़कर आए हैं, पर हमें अनुशासन में रहकर ही तरक्की कर सकते हैं। देखिए मिसेज गांधी ने पाकिस्तान को किस तरह पन्द्रह दिनों में उसकी औकात बता दी”- वाइस प्रेसिडेंट की बातों का सिर-पैर जयदीप के समझ में नहीं आ रहा था।

‘‘सर, मैंने कम्पनी का क्या कोई नियम अनजाने में तोड़ दिया है? प्लीज़ मुझे बताइए कि अगर मैं तीन शिफ्ट की जगह दो शिफ्ट में काम करवाकर कम्पनी का फायदा करवाना चाहता हूँ तो क्या मैं गलत हूँ ? आप कह सकते हैं कि मुझे मीटिंग में यह बात न बोलकर अलग से कहनी चाहिए थी। पर सर, जब बात कम्पनी के फायदे की हो, तो वह कहीं भी बोली जानी चाहिए। अगर बाबू भी सामने होते, तो मैं कह देता। आय एम सारी, पर मैं इसे अनुशासन तोड़ना नहीं मान सकता “- जयदीप का चेहरा लाल हो गया था और उसकी साँसें तेज चल रही थीं। ‘‘आपकी पीढ़ी की यही समस्या है, मिस्टर गुप्ता। आपलोग बिना पूरी बात सुने अपनी बात कहने लगते हैं। आपके सुझाव पर हमें भला क्या आपत्ति हो सकती है? मगर आप ट्रेड यूनियनों के मजदूरों की तरह बात-बात पर आपे से बाहर होकर नारे लगाएंगे तो इससे क्या कम्पनी को फायदा होगा?” वाइस प्रेसिडेंट की बातों से जयदीप का सर चकरा रहा था। या तो यह आदमी पागल है या वह पागल हो जाएगा। मन तो उसका सचमुच हो रहा था कि शहर में जगह-जगह नारे लगाते जुलूसों की तरह चिल्ला-चिल्ला कर कहे- ‘गली- गली में शोर है, हमारा वी.पी. चोर है। नहीं चोर नहीं, पागल है’। पर वह बुत बना वाइस प्रेसिडेंट की ओर देखता रहा। ‘‘हमारे यहाँ हमेशा से चाय काँच के गिलास में पिलाई जाती है। अब आप अगर हल्ला मचाएँगे कि मेरे लिए कप में चाय लाओ, तो इससे आप जानते हैं क्या होगा?”- अब जाकर जयदीप को मामला समझ में आया। कहाँ तो वह सोच रहा था कि वी.पी. उसे एक शिफ्ट के पैसे बचाने के लिए शाबासी देने बुला रहा है और कहाँ दो-पाँच रुपए के एक कप के लिए उसे लताड़ रहा है। जयदीप का चेहरा तमतमा गया। चाहे दुनिया रसातल में चली जाए, वह यह बेहूदगी नहीं बरदाश्त कर सकता। ‘‘हां, मैं जानता हूं कि कप में चाय माँगने से क्या होगा” -उसने बिल्कुल धीमी आवाज में फुसफुसाकर कहा जैसे कोई रहस्य की बात बतानेवाला हो- ‘‘हो सकता है कि चीन और अमेरिका मिलकर पाकिस्तान के दो टुकड़े होने से बचाने के लिए इंडिया पर हमला कर दें।” वी.पी. के चेहरे पर आई हैरत या गुस्से को देखे बिना जयदीप उठकर बाहर निकल गया।

जयदीप सीधे स्टेशन की तरफ चल पड़ा कि ट्रेन पकड़कर कलकत्ता चला जाय। ये लोग उसे टिकने नहीं देंगे। शायद उसे यह बात समझ लेनी चाहिए। स्टेशन पर आकर पता चला कि रेल लाइन पर किसी ने कटकर आत्महत्या कर ली है, इसलिए ट्रेनों का आवागमन बंद है। आज उसे जीवन में पहली बार समझ में आ रहा था कि कोई आदमी इस तरह जीवन से मायूस होकर अपनी जान कैसे दे सकता है। वह स्टेशन में बेंच पर बैठ गया और अपना लैटरपैड निकालकर अपना त्यागपत्र लिखने लगा। अचानक उसने देखा कि जयंत सेन दौड़ता हुआ उसकी तरफ आ रहा है। जयदीप को आश्चर्य हुआ कि क्या जयंत को सब बातों का पता चल गया है। जयंत हाँफता हुआ आकर बगल में बेंच पर बैठ गया। ‘‘मुझे किसी तरह घर पहुँचना होगा। मेरे काका ने पंखे से लटककर फाँसी लगा ली है। स्टेशन पर आया तो पता चला कि यहाँ भी कोई रेल लाइन पर कटकर मर गया है। उफ्, उसे भी आज ही मरना था।” जयंत की बात सुन जयदीप हतप्रभ हो गया। वाकई हर आदमी सिर्फ अपने सुख-दुख के बारे में सोच पाता है। कैसी अजीब मारकाट की दुनिया बन गई है। ‘‘तुम्हारे काका ने ऐसा क्यों किया”- जयदीप ने पूछा।

‘‘अरे क्या बताऊँ, काका पूर्वी पाकिस्तान से अपने बेटे को लेकर चले आए। थोड़ा बहुत सोना कपड़ों में छिपाकर लाए थे। उसी को बेच-बाचकर काम चला रहे थे। हमने घर के पिछवाड़े में एक कोठरी उनको रहने के लिए दे दी थी। साथ में खाना खिला रहे थे। इससे ज्यादा हम भी क्या करते? मानिकतला में हमारा पुश्तैनी घर काफी बड़ा है। पर पिछली तीन पीढि़यों में बँटते-बँटते अब सबके पास एक या दो कमरे ही हाथ आए हैं”- जयंत सेन ऐसे बता रहा था जैसे अपना अपराध-बोध कम करने के लिए सफाई दे रहा हो- ‘‘काका काकी और अपने बेटे की पत्नी को एक बचपन के मुसलमान दोस्त के घर रखवाकर आए थे। बाकी सोना जमीन के नीचे दबाकर आए थे कि वापस तो जाना ही है। बेटे को लेकर इसलिए आना पड़ा था कि वहाँ जमीन को लेकर मुसलमान पड़ोसी से बहुत झगड़ा चल रहा था। उन्हें डर था कि युद्ध की आड़ लेकर कहीं उसकी हत्या न करवा दी जाय। जबसे आए थे, रोज बाप-बेटा सारी रात झगड़ते थे। फिर लड़का बुरी तरह रोने लगता। रात के सन्नाटे में रोज उसका रोना सुनता। उसे लगता था कि उसकी पत्नी को उनका मुसलमान दोस्त कभी वापस नहीं लौटाएगा। बेचारे की नई-नई शादी हुई थी-” जयंत का गला भर्रा गया और वह चुप हो गया।
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जयदीप सुन्न सा बैठा रहा। उसका मन नहीं हुआ कि सांत्वना के दो शब्द जयंत को बोले। न ही जयंत को अपने मन की बात बताने का अभी सही वक्त था। सब अपने-अपने नरक में अकेले ही रह सकते हैं। जितना गुस्सा, आक्रोश, नफरत आदमी अपने अंदर दबाए रखने के लिए मजबूर है उसे निकालने से तो विस्फोट हो जाएगा। अच्छा होता कि वह सबको उसी तरह की बातें बोलता जैसी सुनना उन्हें पसंद है। कितना आसान जीवन जिया जा सकता था सबकी मिजाजपुरसी करके। एक तरफ उसकी एक मनचाही पढ़ी-लिखी इंजीनियर लड़की के साथ सगाई पक्की हो रही है और दूसरी तरफ वह त्यागपत्र लिख रहा है। वह जानता है कि सगाई पक्की होने के पीछे भी बिड़ला में नौकरी की भूमिका है। नौकरी छूटने से एडवोकेट बाबू का डर और उनके मित्र का डर जिनकी बदौलत यह नौकरी मिली थी- सब उससे नाराज हो जाएंगे। कोई यह नहीं समझेगा कि किस तरह उसने यहाँ एक साल निकाला है। काश वह कभी अमेरिका गया ही नहीं होता। तब शायद वह इस तरह के अपमान को सह पाता और हर हालत में इसी नौकरी पर टिका रहता। जो फायदा वह कम्पनी को करवा रहा था, उसके लिए शाबासी के दो शब्द तो दूर की बात है। एक चाय के कप के लिए इस तरह उसे जलील किया जा रहा है।

सारी दुनिया इसी तर्ज पर चलती है। आदमी आदमी का खून पीना चाहता है। अमेरिका वियतनाम को मार रहा है। पाकिस्तान अपने ही धर्म के बंगाली भाइबन्दों को। नक्सली पुलिस को, पुलिस नक्सलियों को। कोई किसी को जीने नहीं दे सकता। हर आदमी दूसरे का हक मारना चाहता है। तभी लोग जीवन से इतना घबड़ा जाते हैं कि आत्महत्या ही आसान रास्ता लगता है। एडवोकेट बाबू और माँ क्या जानते हैं इस दुनिया के बारे में? सारे परिवार भाई-बहन-रिश्तेदार-दोस्त- सबको यही लगता है कि जयदीप बड़ी जीत में हैं। अमेरिका में पढ़ने का मौका आखिर कितने लोगों को मिलता है? उन्हें यह नहीं मालूम कि अमेरिका ने उससे उसका देश छीन लिया है। वह कहीं और का नहीं हो सकता। होना भी नहीं चाहता। पर ये सारे लोग उसे यहाँ का मान नहीं पाते। उसे जाने क्यों वहीं वापस भेज देना चाहते हैं- हर कदम पर उसके लिए कांटे बिछाना चाहते हैं।

जयदीप ने जयंत सेन की ओर देखा। जयंत उसकी तरफ प्रश्नों से भरी निगाह से देख रहा था। इस वक्त ट्रेन पकड़ने जयदीप क्यों आया था? ‘‘मैं यहाँ काम छोड़ रहा हूँ। अपनी ‘प्राइवेट कंसलटेन्सी’ चलाऊँगा। किसी के नीचे अब जिंदगी में कभी काम नहीं करूँगा”- जयदीप ने निश्चय भरे स्वर में कहा। अपने ही शब्दों में उसे एक नई राह दिख रही थी और वह फिर जिन्दा हो रहा था। ‘‘त्यागपत्र लिख दिया है”- जयदीप आदतन हल्की सी गरदन टेढ़ी कर मुस्कराया। जयंत का मुँह व्यंग्य से टेढ़ा हो गया। -‘‘तुम्हें शायद मालूम नहीं कि तुम्हारा त्यागपत्र मंजूर नहीं होगा क्योंकि तुम्हें सिर्फ बिड़लाजी छोड़ सकते हैं, जिन्होंने तुम्हें रखवाया था। और किसी की ताकत नहीं कि तुम्हें छोड़ दे। जयदीप तुम्हें अभी यहीं रहना होगा जब तक ऊपर से छुट्टी न मिले।” जयदीप ने ऊपर आकाश की ओर देखा। ‘‘अरे, वह ऊपरवाला नहीं यार”- कहकर जयंत आती हुई ट्रेन पर चढ़ने के लिए खड़ा हो गया- ‘‘वैसे तुम चाहो, तो तुम्हें बिड़लाजी भी नहीं छोड़ पाएँगे। जैसे ही ट्रेड यूनियन को पता चलेगा, वे तुम्हारे पास आकर कहेंगे कि आप चिंता न करें। बिड़ला को हम देख लेंगे। ट्रेड यूनियन के दबाव से बिड़लाजी ने हर किसी को फैक्टरी में नौकरी दे रखी है। हजार लोग कम से कम ऐसे हैं जिनको न कुछ आता है और न वे कुछ करते हैं। तुम चाहो, तो मैं यूनियन लीडर को कह दूँगा।” जयदीप ने गरदन हिलाई- ‘‘नहीं, मैं खुद छोड़ रहा हूँ। और बरदाश्त नहीं होता।”

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