बुधवार, अप्रैल 24, 2013

फोटो अंकल – कथाकार प्रेम भारद्वाज

फोटो अंकल – कथाकार प्रेम भारद्वाज

(रघु राय से क्षमा याचना सहित)

    हम केवल उन लोगों के बीच ही नहीं रहते जो जीवित अथवा मौजूद हैं, बल्कि हम उनके बीच भी रहते हैं जो मौजूद नहीं हैं...।-निर्मल वर्मा 

lamhi story kahani prem bhardwaj editor pakhi लमही स्टोरी कहानी प्रेम भारद्वाज संपादक पाखी शब्दांकन









‘फोटो अंकल ज्यादा परेशान मत हो... तुम्हारी दुनिया की यह श्वेत-श्याम तस्वीर है... जो दिखाई देती है... जबकि उसकी हकीकत ज्यादा जटिल और भयावह है... और वह नजर नहीं आती। उसे न हम समझ सकते हैं, न बर्दाश्त कर पाएंगे... जितना तुमने देखा, उससे कहीं ज्यादा ऐसे ढेरों दृश्य हैं जो नहीं देख पाए। सवाल विस्तार या समग्रता का नहीं, मूल संवेदना का है जो संकेतों से भी समझा-महसूसा जा सकता है। खैर अब इस तीसरी दुनिया को देखो जो महज एक ख्याल है... इसे दो दुनियाओं के बीच का मध्यांतर भी समझ सकते हो।...’

मध्यांतर जो कथा या जीवन के बीच एक राहत भर है... एक छोटा सा अंतराल... स्पेस ताकि सांस लिया जा सके... आगे आने वाले तनाव या बोझिलता को झेलने के लिए थोड़ी देर की खातिर सहज रह कर खुद को तैयार किया जा सके। इस मध्यांतर को आदर्श स्थिति या ‘होप’ भी माना जा सकता है, जो छोटा है मगर जिसका होना जिंदगी में जरूरी है। दीगर बात है, यह मध्यांतर दो पाटों के बीच पिसती ‘नीच ट्रेजडी’ सरीखा ही है।

पर्दे पर मध्यांतर लिखा हुआ नहीं मगर-फूल, जंगल, मैदान, झरने, नदी, बारिश, पोखर दिखाई दिए। यकीन मानिए यह यश चोपड़ा की फिल्मों का रोमांटिक भव्य दृश्य नहीं था लेकिन प्रेम था, उनका अपना एकांत था, स्वतंत्रता थी... सुख था। बगैर खरोंच का वजूद था... बिना सलवटों का मन। सरोकार-संवेदना के पायों पर टिका सिंहासन। एक बच्चा था जो हंस रहा था, खेल रहा था...। एक औरत थी जो सिर्फ देह नहीं थी और इस कारण वह प्रसन्न थी... आजाद थी। एक मजदूर जिसका कोई मालिक नहीं... आदमी आदमीयत से लबरेज, नदी पानी से, लोग प्रेम से... हवा में न जहर था-न संबंधों में मिलावट। मछली थी जो पानी से बाहर नहीं थी... पक्षी पिंजरे की कैद से बाहर। दरख्त थे... उनके साए में सुकून और सुकून में बैठा बुजुर्ग अपनी पोते को घुटनों पर बिठा ‘घुघुआ’ खिला रहा था।... जमीन पर रेंगते केंकड़े थे जो अपने जन्मदाता को मारने के बजाय उन्हें लाड़-प्यार कर रहे थे। न युद्ध, न हिंसा... न छल, न दुख...। और वह धरती ही थी... जन्नत नहीं। और यह सब दिल के। दिल को बहलाने के लिए गालिब ये ख्याल अच्छा है वाला ख्याल भर था। ‘फाटो अंकल-मध्यांतर का समय समाप्त हुआ... अब इस दुनिया और जिंदगी का दूसरा पार्ट देखने के लिए तैयार हो जाओ... बेशक यह हौलनाक है... तकलीफदेह, तनाव बढ़ाने वाला... मगर है तो यह वही दुनिया जिसमें तुम रहते हो... इसकी तल्ख हकीकतों से बावस्ता तो होना ही पड़ेगा... और जीना भी।

बच्चे की आवाज उभरी और तुरंत ही विलीन भी हो गई। कुछ देर का सन्नाटा... पहले से कायम गहरा अंधकार। वह उसका हाथ मजबूती से थामे हुए था।

पर्दे पर एक दूसरी तस्वीर उभरी कब्रिस्तान की... किसी पुराने शहर का नया कब्रिस्तान... एक धुआं उठा... धुंध के गुबार की तरह... उसमें डोलते कुछ जिस्म दिखाई दिए... कब्र से निकलकर रोती-बिलखती छायाएं... वह एक औरत थी... जली हुई। दंगे में उसके साथ सामूहिक बलात्कार करने के बाद उसको जलते मकान के बंद कमरे में धकेल दिया गया था... जब तक आग बुझती उसके जिस्म के कुछ लोथड़े और हड्डियां बची हुई थीं... एक लड़की... उम्र बीस-बाईस साल शादी से इंकार करने पर उसके ही प्रेमी ने चेहरे पर तेजाब फेंक दिया। लड़की ने आत्महत्या कर ली। वह एक मासूम बच्चा था, भूख से तड़पकर जिसकी जान चली गई... वह रोटी-रोटी चिल्ला रहा था... एक आदिवासी... मगर न वह नाच रहा था... न गा रहा था... उसे नक्सली बताकर इसी देश की पुलिस ने मार गिराया था और बहादुरी का तमगा भी हासिल किया था।... एक बुजुर्ग जर्जर काया... बढ़ी दाढ़ी, बिखरे बाल... उसके परिजन तय नहीं कर पाए कि उसकी मौत भूख से हुई, शीत लहर से या सिस्टम के फेल होने से। एक औरत पेट पकड़े हुए थी... उसकी अंतड़िया बाहर निकल रही थीं... दंगाइयों ने उस औरत के पेट को फाड़कर बच्चा निकाला और उसे जमीं पर पर तरबूज की तरह पटक दिया... पता नहीं मां और शिशु में से पहले कौन मरा? मगर नाभि-नाल का रिश्ता बना रहा दो लाशों के बीच। गांव का दृश्य... घर के मालिक ने दाई को धमकाया और हाथ में कुछ पैसा रखा... दाई ने नवजात शिशु को खेत में ले जाकर नमक चटाकर मार डाला। वह लड़की है... इसलिए मार दी गई-मरी बताई गई... मां सब जानती है... मगर बेबस है... सिर्फ रो सकती है... ऑपरेशन थिएटर टेबल के ऊपर पड़ी रोशनी जब कोख के अंधेरी बंद गुफा में आई तो वहां हलचल हुई। उसे लगा अभी तो उसे बाहर की दुनिया से बावस्ता होने में महीनों हैं... फिर ये रोशनी कैसी... एक प्रहार हुआ और वह गाढ़े रक्त में तब्दील हो बहने लगी... न चीख, न शब्द... न कोई वजूद, न आकार, वह भ्रूण थी-मादा भ्रूण...।

‘मुझे ले चलो यहां से...’ वह परेशान हो उठा।

‘तुम तो पेशेवर फोटोग्राफर हो खींचो तस्वीरें।’

यह चंद दृश्य ही तो हैं-तुम उन्हें देखकर असहज हो गए। यह देश और समाज उतना और वही नहीं है जो तुम्हारी कैमरे में कैद हैं-जिसकी तस्वीरें उतारी है तुमने...’

‘यह सब नाकाबिल-ए-बर्दाश्त है।’
‘इसी माहौल में जी रहे हो तुम... यह वही दुनिया है जिसे तुमने बनाया है इसी दुनिया की तो तुम तस्वीर उतारते रहे हो...।’

‘मुझे यहां से ले चलो, ये दृश्य मुझसे देखे नहीं जाएंगे... इनको कैमरे में कैद करना मेरे वश नहीं...।’

‘अभी तो और खौफनाक मंजर आने बाकी हैं फोटो अंकल...।’

पर्दे पर चित्र आ रहे थे... आग ही आग... दावानल... जंगल जल रहे हैं... खेतों की फसलें जल रही हैं... घर मकान जल रहे हैं। लोग भाग रहे थे इधर से उधर... चीखें-पुकार... आग के ऊपर आशाओं-आश्वासनों के तैरते गुब्बारे... जो जल्द ही फट जाते थे... इसके बीच कहीं सिंहासन भी था... सिंहासन पर बैठे शहंशाह का चेहरा साफ नहीं... मगर वे व्यस्त थे... वहां मूसलाधार बारिश हो रही थी... संसद भवन में बैठे तो इंसान थे... मगर वहां की आवाजें इंसानों जैसी नहीं थीं... तय मानिए वह मछली बाजार नहीं, संसद भवन था। लेकिन वहां बाजार का प्रभाव या बाजार के लिए रास्ता बनाने पर शोर-शराबा था... गांव का एक वीरान जगह उसे शमशान ही मान लिया जाए... एक साथ 82 चिताएं जल रही थीं... एक जनसंहार में ये लोग हलाल किए गए थे... आलम यह था कि मुखाग्नि देने वाले कम पड़ गए। एक ने तीन-तीन चिताओं को मुखाग्नि दी... इनमें एक पांच साल का बच्चा भी था जो उतरी पहने था और इस माहौल की भयावहता से पूरी तरह अनभिज्ञ... वह बार-बार मां के पास जाकर दाल-भात खाने की जिद कर रहा था... एक बुजुर्ग जो दूसरे गांव के थे वे उसका हाथ पकड़कर चिता में आग लगवा रहे थे। यह जब हो रहा था तब मंडल और कमंडल आंदोलन उसने चरम को छु चुका था... भूमंडलीकरण की सेज बिछ रही थी...। दूर कहीं औरतों का स्वर सुनाई दे रहा था, उनके स्वर में विपत्ति थी... उन्नति की कोख से निकली विपत्ति। ...सहसा थोड़ी देर के लिए अंधेरा। क्षण भर बाद पर्दे पर जो तस्वीर उभरी उसने उलझा दिया... कुछ सफेदपोश लोग दुनिया का चेहरा बदल रहे थे। देश का रंग-रोगन ठीक कर रहे थे... सत्ता और पूंजी, प्रेमी-प्रेमिका वासना में लीन... मुनाफे की सेज पर रति-क्रिया, मजा लेने का शगल... हमारे हुक्मरान थे... हमारे नेता थे... मुख्यमंत्री-मंत्री... जनप्रतिनिधि... अलग अलग पोशाक... मगर सबके चेहरे एक जैसे थे... एंडरसन के चेहरे जैसे। तमाम लोगों के चेहरे एंडरसन के चेहरे में तब्दील हो गए... शहर दर शहर जहर फैलने लगा... लोग लाशों में तब्दील होने लगे... कब्रिस्तान में भीड़... शमशानों में भीड़, अस्पताल शव से भर गए... फिर कोई बच्चा दफनाया जा रहा था... सिर्फ सिर रह गया... वे लोग लगातार मिट्टी डाल रहे थे... कुछ पल ही बचे थे वे पूरी तरह दफन होने जा रहे थे... मुट्ठी भर मिट्टी, फिर मुट्ठी भर मिट्टी... बगल में उसकी मां अपने कलेजे के टुकड़े को पल-पल दफन होते देख रही थी... बच्चे ने आवाज दी... उसे किसी ने नहीं सुना...। वह शायद इतनी कमजोर आवाज थी कि सुनी नहीं जा सकती थी...।
मगर वह सुन गया। वह चीखा-- ‘बंद करो मिट्टी डालना, वह मरा नहीं जिंदा है। क्यों जिंदा लोगों को दफन कर रहे हैं...।’

वह तेजी से दौड़ा... कब्रिस्तान की ओर। दफनाने वाले हाथों को उसने मना किया। उन्हें वहां से भगाया... फिर बेतहाशा-सा वह मिट्टी हटाने लगा... उसके हाथ तेजी से चल रहे थे, वह एक हाथ से मिट्टी हटा रहा था दूसरे से बच्चे के माथे को सहला रहा था, मानो कह रहा हो-घबरा मत बच्चे मैं तुझे बचा लूंगा...।’

सहसा एक आवाज हुई। कमरे के पंखे घूमने लगे। एयर कंडीशनर चलने लगा। रोशनी तेज हो गई... कमरे में फूलों का सुंदर गुलदस्ता... पार्श्व संगीत... गालिब की गजल... सब कुछ उजला-उजला, साफ-शफ्रफाक। सामने वह चित्र अब फटा-फटा था... चिंदी-चिंदी, जिसने उसे शोहरत दिलवाई थी...। माहौल शांत था... मन उदास... दिल बोझिल... दिमाग में कहीं एक सवाल अटका था... क्या अंधेरों में रहकर ही स्याह जिंदगियों की तस्वीरें खींची जा सकती हैं, उजालों में रहकर स्याह-बदरंग जिंदगी की तस्वीरें खींचना-बनाना अनैतिकता और बेईमानी है? अंधेरों और उजालों का बीच फंसा वह करे तो क्या? नरम लड़ाइयों के इस दौर में ताकतवर राक्षस होकर जीते हैं। कमजोर कीड़े बनकर रेंग रहे हैं... बीच के लोग थोड़ा जीते हैं... थोड़ा रेंगते हैं... इनमें से वह खुद क्या है?

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2 टिप्‍पणियां:

  1. आम आदमी की नियति नरम लड़ाईयों में मोहरा बनना है.वह मजबूरियों के चलते ऐसे कदम उठाता है जिनके कारण उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारती रहती है.

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  2. बहुत उम्दा विषय को लेकर शुरू की गयी कहानी अंत तक पहुँचते भटक गयी।चरित्र चित्रण में बहुत बिखराव भावनात्मक रूप से पात्रों के साथ जुड़ाव नहीं होने देते। लेकिन विषय चुनने के लिए लेखक निश्चित रूप से बधाई के पत्र हैं।

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