कहानी: अस्ताचल की धूप - रजनी गुप्त

       रजनी गुप्त की कहानियाँ समकालीन कथाकारों में अपनी अलग पहचान बनाती हैं. उनकी पात्र वो कहने में नहीं हिचकते जिसे अधिकतर कहानीकार या तो कहते ही नहीं या फिर सांकेतिक रूप से कहते हैं. स्त्री की पीड़ा को बहुत नज़दीक से देखती कहानी "अस्ताचल की धूप" बहुवचन में प्रकाशित हुई है .
संपादक

अस्ताचल की धूप



      ‘ अरे ! रचित ! तुम यहां , अचानक , कैसे ? ’

      ‘ और तुम ? कैसी हो ? कहां हो ? ’

      ‘ मेरी छोड़ो , तुम अपनी सुनाओ , कैसे अचानक टूट पड़ा आसमान का सितारा जमीं पर ? ’

      ‘ सिर को जरा उल्टी तरफ घुमाओ , वो देखो सामने वाला बैनर ....’

      ‘ ओहो , तो जनाब सेमीनार में आए हैं ...... आंखें चमकाते हुए बोल पड़ी वह।

      अरसे बाद स्वतःस्फूर्त हंसी को खुलकर बाहर निकलने की राह दिखी हो गोया सालों से बंद पुराने ताले को किसी ने एक ही झटके में खोल दिया हो।

      इतने दिनों की जमा बातों का एक सिरा छूटता तो दूसरा उसे झपटकर लपक लेता फिर दूसरे के हाथ से बात फिसलती तो पहला अपनी मुट्ठी में दाब लेता। ये सिलसिला ऐस ही आगे भी चलता रहता मगर अनायास प्रोफेसर और हैड वहां से गुजरे- ‘ अरे डॉक्टरसाब , आप , यहां ? हम कब से आपको ढूंढ रहे हैं ?’

      ‘ अच्छा , अच्छा ! बस अभी आते है थोड़ी देर में ..... भारत , अमेरिका और दक्षिणेशिया के अंर्तसंबंधों पर केन्द्रित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर आए थे प्रोफेसर रचित। बातों को विराम देते हुए उठे फिर मंजरी की तरफ आंखें गड़ागड़ाकर देखते रहे। चलते चलते बोलते रहे- ‘ तुम जरा भी नही बदली रचना, वही छरहरापन , जल्दी जल्दी बात करने की आदतें और वैसी ही हड़बड़ाहट। अभी हूं यहां एक हफ्ते , मुझे भी खूब सारी पेट भर के बातें करनी है तुमसे , तो फिर मिलते है आज शाम को , ठीक 7 बजे ? ओके ? ’

      और उसके जबाव की प्रतीक्षा किए वगैर तेज कदमों से नजरों से ओझल हो गए।

      उसके बाद तो सुबह शाम मिलने के सिलसिले शुरू हो गए थे। वे कभी गुजरे दिनों की पगडंडियों पर चहलकदमी करते तो कभी विगत की पटरियों से उतरकर वर्तमान पर लौट आते। दोनों ही कभी अपने जिए लमहों को फिर से जिंदा करने की जेद्दोजेहद करते तो कभी अपने अपने सीने में दफन दर्द को बांटने के लिए अकुला रहे थे। फड़फड़ाते शब्द अपने आप उछाल लगाकर बाहर आने को बेताब होने लगते-

      ‘ कैसे गुजरे इतने साल रचना, पता ही नही चला और देखते देखते उम्र की ढलान आ गई।’ कही खोयी खोयी सी आवाज सुनाई पड़ी।

      ‘ हमारी छोड़ो , तुम अपनी सुनाओ , कितने साल बीत गए तुम्हें वहां बसे हुए ? सुना है बला की खूबसूरत है तुम्हारी शरीकेहयात ? ’

      ‘ रचना , एक बात मुझे परेशान कर रही है , तुम्हारे गले men सनातन बसने वाली पुरानी चहकनुमा चिरैया कहां गुम हो गई ? ये हंसी तुम्हारी उत्ताल तरंगों वाली हंसी तो नही। ’ उसे ध्यान से देखते हुए पूछा।

      ‘ अरे , टॉपिक मत बदलो , जल्दी से बताओ अपने बारे में , सालों से जानलेवा उत्सुकता घेरे है मुझे। ’

      ‘ तुम्हारी जुटाई सूचनाएं भला गलत कैसे हो सकती है ? ’ बड़ी तटस्थता से उचारे बोल सुनकर ऐसा लगा जैसे उसकी आवाज ने उसका साथ छोड़ दिया हो। बमुश्किल अपने थूक को भीतर ढेलते हुए उसकी आंखों में ताकता रहा। बात को गोल गोल घुमाते हुए उसके चेहरे पर बदलते हाव भाव को पढ़ने की कोशिश करती रही वह। पता नही क्या सोचकर भर आई आंखों को पौंछने के लिए एक झटके ये उठी और झोले में रखी पानी की बोतल निकाल कर हलक तक भर आए जहर को पानी के सहारे अंदर धकेला परंतु लावा की तरह खदकती बेचैनी कम होने का नाम ही नही लेती। लगा जैसे धूप सीधे सिर पर पड़ रही हो और दूर दूर तक कहीं कोई छांह देने वाला पेड़ नही। सब तरफ घाम ही घाम। बोलने के लिए होंठ थरथराए। रचित ने कांपती जुबान में पूछा- ‘ कुछ तो बोलो रचना , चुप क्यों हो ?’

      ‘ शायद जो होना होता है , वही होता है , हमारे वश में कुछ भी तो नही। ’ दुपट्टे से आंखें पौंछते हुए उसने चारों तरफ रेंगती धूप और जलते कूड़े के ढेर को देखा फिर गीली आवाज गले से निकली- ‘ रचित , सपनों के सहारे कहीं जिंदगी चलती है ? तुम्हारे साथ भी तो देखे थे ख्वाब , लेकिन ..... हमारी मुट्ठी में क्या आ पाया ? कोरे शब्दों से जिंदगी चलती है भला ? ’

      ‘ उसके लिए अब और ज्यादा गिल्टी फील मत कराओ रचना। मैं मानता हूं , सौ प्रतिशत गलती थी मेरी। क्या बताएं रचना , जिंदगी पूरी ताकत से झपट्टा मारकर खींच लेती है और हम बेबस लहरों की तरह खारे समुंदर में डूबते चले जाते हैं , शायद तब तक इतनी देर हो चुकी होती है कि फिर से कहीं और जाने के रास्ते सूझते ही नही। फिर एक दिन दुनियां विकल्पहीन लगने लगती लेकिन हमें फिर भी जीना पड़ता। क्या करें ? कहां जाएं ? तुम सच कह रही हो , मेधा बला की खूबसूरत है , प्रतिभाशाली है , मगर तकदीर में उसका साथ नही बदा था। ’

      रचना की प्रश्नातुर आंखें उसी पर टिकी थी- ‘ आगे बोलो , चुप क्यों हो गए ? ’

      ‘ पता नही हमारे बीच कहां कैसे गड़बड़ी हुई , मैं खुद नही समझ पाया। गैर मर्दो के साथ उसका खुला वर्ताव मैं सह नही पाता था। उसे सही गलत समझाने लगता। उसे लगता , मैं हर बात पर रोकाटोका करता हूं। सच तो ये है , उसने कभी मेरी परवा नही की बल्कि जिस बात के लिए मैं मना करता , वह उतनी ही बेशर्मी से औरों के साथ अपना बिंदास सुलूक करती रहती। धीरे धीरे नौबत यहां तक आई कि मेरा कुछ भी बोलना उसे अपनी आजादी में खलल लगता। एक जमाना था , जब उसका उन्मुक्त रवैया मुझे जबरदस्त तरीके से खींचता था मगर बाद में यही हमारे अलगाव की वजह भी........

      लगातार बोलते रहने की वजह से माथे पर पसीना बहते हुए नाक के रास्ते होठों तक पहुंचा और अपने खारेपन का अहसास कराने लगा। थोड़ी देर रुककर बोलने लगा- रचना , पिछले साल वह हमें छोड़कर अपने किसी कलीग के साथ रहने लगी। जानती ही हो , वहां ये सब कॉमन है। हां , हमारी एक बेटी उसी के पास है। ’

      ‘ जिंदगी पता नही क्या क्या तमाशे दिखाती रहती , किसी को चैन से नही रहने देती , उफ ! ’

      ‘ रचना , हमारे चाहने , न चाहने के बावजूद जिंदगी की दिशाएं नही बदल सकती। वो तो अपनी धुरी पर घूमती रहती। ये जो बला की खूबसूरती है न ,कभी कभी जानलेवा साबित होती है। इस वक्त तो तुम मुझे बेहतर हाल में देख रही हो वरना मैं महीनों डिप्रेशन का मरीज रहा। हर वक्त पत्नी की दुश्चरित्रता का भूत सिर पर सवार होकर खौफ पैदा करता रहता। मुझे हर जगह उसी का चेहरा प्रेत बनकर पिछियाता रहता। तब जिस किसी औरत को देखता , उसे बाजारू , मतलबी , कमीनी और घटिया समझने लगता। सच बताऊं रचना , अपराधी हूं तेरा तभी तो ये सब भुगतना पड़ा , भटक रहा हूं तभी से , यहां से वहां जूझता हुआ। ’

      कैम्पस के पीछे फैलते कानफोड़ू संगीत से बेखबर वे हरे भरे पार्क में अपने अपने विगत को झाड़ने में तल्लीन थे। बाहरी धूल झड़ती जरूर थी मगर गहरे धंसा कांटा कैसे भी बाहर नही निकल पा रहा था। थोड़ी देर मौन के बाद पस्त आवाज में रचित ने रचना को टटोलना चाहा- ‘ तुम्ही कुछ बोलो , क्या क्या गुजरता घटता रहा तुम्हारी जिंदगी के आसपास ? ’

      ‘ शायद हम सबकी यही कहानी है। हम जैसा चाहते है , जिंदगी वो देती नही। जैसे जीने के सपने देखते है , इस या उस वजह से लगातार खुद को स्थगित करते रहते फिर एक दिन जिंदगी अंगूठा दिखा देती यानी हम कुछ करने लायक ही नही रह जाते। बस यही सोचती रहती , क्यों जिएं ? किसके लिए ? जीने की कोई तो वजह हो , नही ? ’ आवेश में बोलने के बाद अचानक माहौल में खामोशी बिछ गई।


     ‘ ऐ मैडम , कहां खो गई ? लौट आओ , वापस लौटो , चुटकी बजाते हुए रचित ने उसके चेहरे की तरफ देखा मगर वह तो आसमान की तरफ देखते हुए रुक रुककर ऐसे बोलने लगी गोया किसी स्टूडेंट को लैसन समझा रही हो - ‘ रचित , वक्त बस एकाध दो बार ही हमारा दरवाजा खटखटाता है। यदि उस वक्त किसी वजह से अनसुनी कर दी फिर कभी मौका नही देती जिंदगी और फिर कभी केाई बुलाने नही आता। फिर हम लाख चीखें चिल्लाएं , चाहे जितनी ताकत से दरवाजा पीटें , मगर कोई भी हमारी पुकार नही सुनता ...... ’ बोलते बोलते उसने आंखें मींच लीं और पलकों के भीतर अंधेरे में वही बोझिल चट्टान गिरने लगी- तलाक , तलाक , तलाक , बस यही हकीकत ध्रुवतारे की तरह अटल सचाई का अहसास कराने लगती। बेशक , मैं आजाद हूं , खाली हूं , फ्रीबर्ड , जो चाहो करूं , जहां मनमर्जी हो , जैसे चाहूं , घूमूं फिरूं , आजाद पंछी की तरह डाल डाल बैठकर जिंदगी का लुत्फ उठाने वाली ...... अचानक लगा जैसे सब कुछ भरभराकर बाहर फिक जाएगा , वहीं आवाजें , वही दर्द ... वही आरोप प्रत्यारोप।

      सचेत सतर्क नजरों से चारों तरफ घिरे अंघेरों से आंखें मिलाईं फिर बोली - चलो चलते है , बहुत देर हो गई।

      ‘ रचना , इतना सोचती क्यों हो ? जानती हो , जिंदगी सोचने से आगे नही बढ़ती , जीने से बढ़ती है। अब किस मुंह से कहूं कि आज भी मेरे मन में तुम्हारी खास जगह है , आई एम सीरियस यार ..... कहते हुए उसने बड़ी आशा भरी नजरों से उसकी तरफ देखा।

      सुनी अनसुनी करते वह आशा निराशा के भंवर में डूबी जाने क्या क्या सोचे जा रही थी। उसे लगा जैसे उसे कुछ भी नही सुनाई दे रहा। काश ! कि यही बात कुछ साल पहले कही होती। अब कुछ नही बचा भीतर।

      अपने ही वजूद के सैकड़ों टुकड़े बेवजह यहाँ वहां छितराकर जब वह खुद के पास लौटती तो विचित्र किस्म के सूनेपन का हौलनाक मंजर उसे अपनी जद में ले लेता फिर वह चैन से नही सो पाती। रचित की आवाज उसके भीतर धीरे धीरे बूंद बूंद टपकते पानी की तरह गिरने लगी- ‘ रचना , जब कभी मौका मिले और जिंदगी में जितनी तरह के रंग भर सकती हो , जीवन को उतने रंगों में डुबो दो। नया अर्थ दो जीवन को , नया स्पेस दो और फिर खुद को नई ऊर्जा से भर लो। गुड थिंग्स आर नेवर टू लेट। ’

      शब्द दर शब्द आहिस्ते से जमाकर बोला गया जिसे सुनकर लगा जैसे सालों से सूखे कुएं की पाट पर किसी ने कई बाल्टियां पानी उड़ेल दी हों , वैसे ही भीगता रहा उसका अंतस। क्यों ऐसा लगता जैसे कुछ भी नया रचने की सामर्थ्य नही रही। रचित की आवाज भीतर जाकर लौटने लगतीं। बेरोकटोक बहती हवा की तरह कुछ ताजगी बख्सते शब्द उसके भीतर जा रहे थे- ‘ कांट यू गिव मी एनदर चांस ? ’

      फड़फड़ाता प्रस्ताव हवा में ही लटकती कटी फटी पतंग की तरह लहराता रह गया। उसे लगता जैसे अंदरुनी कुएं की अतल गहराइयों में सब सूख गया और बाहर सब उजड़ गया , यहां तक कि जिजीविषा भी। उसने कहना चाहा , बेशक तुम्हारे साथ घंटों घूमते हुए लंबी लंबी बातें करना मेरे सूखे स्रोतों को थोड़ी देर के लिए भरता जरूर है मगर झर झर बहते स्वतः स्रोत तो नही रहे अब पर कितना कुछ चाहकर भी नही कह पाई वह।

      स्त्री जब नौकरी करते हुए आजादी से अकेले रहना शुरू कर दे तो पुरुषों का सुलूक उसके प्रति कितना अजीब होता है ? अनायास एक एक घटना की पुर्चियां खुलनी शुरू हो गई। उस राजकमल से आयकर विभाग में टकरा गई थी वह , फिर क्या था , वह गाहे व गाहे फोन करने लगा। एक दिन घर आ धमका फिर शुरू हो गया बार बार आने का सिलसिला। अचानक एक दिन गुस्से में आकर उसे कड़ाई से मना करना पड़ा। इसी तरह अपनी कलीग कामना के पतिदेव महीनों पीछे पीछे चक्कर काटते रहे। तंग आकर कामना से शिकायत करनी पड़ी। सबके सब लार टपकाने वाले , हुंह ! पुरुष जाति ही शायद ऐसी है , अहमक , मतलबपरस्त और दुहरे मानदंडों में जीने वाली। सामंती सिस्टम के पोषक इन पालनहारों के बारे में कहां तक सोचा जाए ? इतने कड़ुवे अनुभवों से गुजर चुकी कि प्रेम शब्द से यकीन उठ गया। नही , नही , प्रेम व्रेम कुछ नही होता , बस खुद को बेवजह किसी भ्रम में झोंक देना , कोहरे पार की धुंध भर या ऐसा धुआं जो आंखें मींचने पर मजबूर कर दे मगर हमारी गिरफ्त में कभी न आ पाए।

      ‘ अच्छा रचित ,जाना कब है ? ’ अंदरुनी उहापोह को दबाकर मौन भंग करने की पहल करते हुए धीरे से पूछा।

      ‘ तुम जैसा कहो। वैसे भी मेरा वहां कौन बैठा है जो मेरी राह तकता हो। ’ तटस्थ तरीके से कह दिया।

      ‘ आज मैं खुद से पूछूंगी और यदि मुकम्मल जबाव मिला तो मिलूंगी जल्द ही। फिर बताएंगे अपना फैसला। यू आर माई बैस्ट फेंड एवं यू अंडरस्टैंड मी बैटर। सोचती हूं , अपनी इस टूटन और दिमागी अस्थिरता को थोड़ा दुरुस्त कर लूं फिर देखते है आगे आगे होता है क्या क्या ? नया सांचा ढांचा गढ़ने लायक कुछ उत्साह , कुछ उमंग तरंग तो जुटा लूं अपने भीतर , नही ? ’

      उस दिन आसमान फीके और मटमैले रंगों से भर गया था। इधर उधर से लौटते पंछियों की किचपिच से बेखबर वे अस्ताचल के बदलते रंग भरे बादलों की बनती बिगड़ती आकृतियों की तरफ देखते रहे। टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों के मोड़ तक दोनों चुपचाप चलते रहे फिर धीरे धीरे अपने अपने जीवन की अंदरुनी पगडंडियों पर चलते चलते वे एक दूसरे से दूर , बहुत दूर निकलते गए।

--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--
      

      उस दौर में हर चीज में कितने कितने रंग भरे थे। सपनों की जैसे हरदम बरसात होती रहती। तितली बना मन कभी भी चुप मारकर बैठने के लिए तैयार ही कहां था ? दिन दिन भर हॉस्टल से कैम्पस , फिर कैम्पस से लाइब्रेरी और फिर यूनिवर्सिटी के दसियों चक्कर काटते हुए वक्त फुर्र से उड़ जाता। शाम को कमरे पर लौटती तो सिर टिकाते ही नींद धर दबोचती। कभी रात 12 बजे तक रचित के साथ लाइब्रेरी से लौटती तो कभी अलस्सुबह हॉस्टल से कैम्पस तक के शॉर्टकट वाली पगडंडी पर गुजरते हुए रचित संग जोर जोर से बहस करते हुए ठहाके लगाती तब आसपास के लोग आंखें फाड़ फाड़कर उनकी तरफ देखने लगते लेकिन तब तो हरदम जुबान एक ही तकिया कलाम - हू केयर्स ?

      अचानक कैसे क्या क्या एक झटके में गुजर जाता और जिंदगी झपट्टा मारकर छीन लेती है हमारी रची दुनियां। सर्र से सब कुछ फिक जाता है फिर कभी न आने के लिए। रचित के बाहर जाने की खबर सुनकर स्तब्ध रह गई थी तब। उस रात की पीली रोशनी दीवारों से झरकर मन के अंदरुनी अंधेरों से एकाकार हो गई थी। क्यों इस जीवन पर अख्तियार नही रहता ? हालात कैसे हमें नियतिवाद की तरफ धकियाते रहते ? हमारे चाहने , न चाहने से कुछ भी नही बदलता। वक्त खुद अपने पैरों चलता। न तो वो किसी के रोके रुकता , न किसी के हांके हंकता। जो जो जिंदगी मे होता चला गया , आंखें मूंदे स्वीकार करना विवशता बनती गई अकेली लड़की किसके बूते अपनी जिंदगी का सफर तय करेगी ? मां बाप के ब्रम्हास्त्र लगातार फिकते रहते। कुछ महीने तक तो रचित से संपर्क रहा फिर धीरे धीरे उसके पत्र आने बंद होते गए। वह बार बार शहर बदलता और तेजी से नौकरियां भी। साथ साथ घंटों गुजारने वाला रचित बिना बताए किस दिशा में रुखसत कर गया ? सोचकर आश्चर्य होता है। बिना बताए कुछ न करने वाला रचित का आज कोई अता पता नही , है न अजीब बात ? हकीकत का बैल उस वक्त अपने पैने सींग फैलाए , मुंह बाए खड़ा था।

      वह अंधेरे में घुलती चीजों को समझना चाहती थी , कहीं कुछ तो रहस्यमय है , गहरी गुंथी छायाओं जैसा अबूझ लेकिन क्या ? क्या था वहां ? अब तक ढोयी जिंदगी में ऐसे अनजान किस्म की गुत्थी का कोई ओर छोर , कोई अर्थ पकड़ पाती तो राज खुलता या कोई समझ विकसित होती। जिंदगी को खुशियों के रास्ते फलांगते हुए वह कितना कुछ जानना सीखना भूलती गई। संबंधों के गणित से कितनी कितनी अनभिज्ञ जो थी वह ?

       कमरे की हर चीज को वह ध्यान से देखती- पलंग के सिरहाने रखी पानी की बोतल , ड्रेसिंग गाउन , अलार्म घड़ी , इधर उधर छितरे कपड़े और दीवार पर टंगी तस्वीरें , लेकिन उसके कान बगल वाले कमरे से आते पति के खर्राटों की तरफ लगे। अचानक दीवार पर टंगी तस्वीरें उससे बतियाने लगीं- ऐ लड़की , चैन की नींद सोना है तो जो जैसा हो रहा है , उससे आंखें मूंदे चुपचाप सो जा। छुरी जैसी बातें सीने को भेद जाती। विनय जैसे पति की परछाई तक को पकड़ पाना मुश्किल था। अब अकेली क्या करे वह यहां इस कमरे में ? अनजान डर के मारे हलक सूखने लगा तो पानी की दो बूंदें गुटकी। ओफ ! ये काले धुएं जैसा बदबू नथुनों में कडुवाहट भरने लगती फिर उस घुटन को पीना पड़ता। नुकीला सवाल काट खाने दौड़ता - ‘ वह यहां क्यों पड़ी है ? पेट भरने लायक नौकरी कर तो रही थी फिर यहां क्यों ? ’

      कैसे कटेगी आगे की जिंदगी ? जितना सोचती , लहुलुहान हो उठती। आखिर क्या सोचकर शादी की थी उसने ? क्या वाकई पति का वजूद जीरो था जो सौतेली मां के इशारे से हिलता डुलता। उसे आवाज केा सुनकर किस तेजी से वह भरे वैलून की तरह उछल पड़ता था- ‘ जी , आया , अच्छा , हां , ओके ...। ’

      ऐसे ही चंद शब्दों के अलावा उसके मुंह से कभी कुछ भी नही सुना उसने। शादी से पहले एक बार आया था मिलने यूनिवर्सिटी कैम्पस में। हॉस्टल की लड़कियां बर्रे की तरह झुंड बनाकर टूट पड़ी थी लेकिन तब भी वह बुत बना बैठा रहा। ज्यादा से ज्यादा , ‘ हूं , हां , बस ठीक है , ’ लेकिन लड़कियां बकर बकर करती रहीं।

      ‘ ऐ मिस्टर , आपके जुबान तो है न ? सुना है नौकरी करते हैं , क्या वाकई ? बिना बोले काम चल जाता है वहां ? ऐ रचना , इन्हें किसी स्पीच थेरेपी वाले के यहां ले जाओ। जब थोड़ा बोलने लायक हो जाएं तभी करना शादी , सच्ची में , समझीं न ? ’ समवेत हंसी के दौरान भी वह जस का तस बना रहा गोया नदी के बीचोंबीच पड़ी स्थिर चट्टान हो कोई। कुछ सहपाठी मित्रों के हाथ मिलाने पर वह पहले सकुचाया फिर वे सब उसके झेंपूपन और झुकेपन का मजाक उड़ाने लगे। शायद ये ज्यादा ही सॉफिस्टिकेटेड है , सोचकर मैं टाल गई। उसके ढीले कपड़े देखकर सोचा , शर्मीला टाइप होगा , गवदू बच्चे जैसा मासूम है ये , घर वाले ऐसे तर्को से चुप करा देते।

      ‘कहीं घूमने चलना है ? ’ मटकते चटकते अंदाज में पूछ लिया उसने।

      ‘कहां ? किसलिए ? ’

       अबोध बच्चे जैसी कोमल आवाज सुनकर रचना जोर से हंस पड़ी तो वह अचकचाते हुए उसे एकटक देखने लगा। ये इतना चुप्पा , सीधा और घुन्ना जैसा क्यों है , जरूर कोई हीनताग्रन्थि या शर्म संकोच की भारी भरकम चट्टान तले तो नही दबाया गया इसका वजूद ? शायद ये किसी से अपने मन की बात कह ही न पाया हो , वह कयास लगाती रही लेकिन वह उसकी आंखों में टुकुर टुकुर ताकता रहा फिर कोमल आवाज में धीरे से बोला- ‘ रचना जी , एक बात मैं कहूंगा , मैं अपनी मां से बहुत अटैच फील करता हूं , तुम प्लीज इसे ठीक से समझ लो फिर जैसा ठीक समझो। वो शायद मेरी कमजोरी है। उनका प्यार मेरा संबल है , मेरी सबसे बड़ी ताकत भी। ’

      ‘ ठीक है , ठीक है , ... उस दौरान इस बात को हल्के फुल्के ढंग से हंसी में उड़ा दिया। इसके बाद वह कुछ और नही बोल पाया। रचना ने घुमा फिराकर कई जगह से घेरना चाहा मगर वह जड़वत बैठा रहा चुपचाप।

      ‘ ऐसे गवदू के साथ कैसे गुजारा होगा ? ’ रचना ने साफ साफ अपने पापा से कह दिया लेकिन वो उसे ही उल्टी पट्टी पढ़ाने लगे- ‘ क्या हुआ जो थोड़ा शर्मीला है ? सीधा है , ऐसे नेक लड़के ढूढे नही मिलते आज के जमाने में। वो तेरी तरह मुंहजोर नही है। कितनी उम्र निकलती जा रही है तेरी , ऐसे ही मना करती रही फिर कहां से मिलेंगे नए रिश्ते ? तेरी एक ही तो शर्त थी , नौकरी पसंद करने वाले लोग चाहिए वो इन्हें पसंद है.. ’ इधर मां के तर्क भी जोरदार थे- ‘ ऐसे ही लड़के निभाऊ निकलते हैं , बाद में धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा।’

      लेकिन बाद में कभी कुछ ठीक नही हो पाता। जिंदगी और रिश्ते अपने रास्ते आप चलते हैं , किसी के हंकाए भला कितनी दूर तक चल पाएंगे ? रेत की तरह हाथ से झड़ जाते हैं रिश्ते और ये सब एक झटके से अचानक से हो जाता है , हमारे चाहने , न चाहने से बेखबर , हमारी परवाह किए वगैर।

      सो शादी ससुराल से जुड़े भ्रमजाल से जल्दी ही बाहर निकल आई वो । क्या आया उसके हिस्से ? जासूसी करती आंखें और कठपुतली की तरह हिलते डुलते पति जिनके जीवन का हर कदम उनकी मां के इशारों पर आगे बढ़ता। ये कैसा घनचक्कर है ? क्यों वो बेवजह उन्हें अलग अलग रखने की चालें चलती रहीं ? क्यों वो जानबूझकर सुहागरात की रस्म अदायगी में भी अड़ंगे लगाती रहीं ? क्यों ? आखिर क्यों ? वैसे भी क्या था उस रात में ? सोचते ही वितृष्णा से होंठ टेढ़े होने लगते और पेट में उबलते पानी जैसा खौलन और भाप बनने लगती ।

      ‘ रचना , मेरे पापा साइंसिस्ट थे , लेकिन होमफ्रंट पर मां की चलती है , उनकी हर बात मानना हमारा फर्ज है , वह बच्चों की नर्सरी राइम्स को दुहराता रहता और रचना गर्दन नवाए सुनती रहती। उस समय परी लोक में सैर कराने वाले सपने साथ छोड़ने को कतई तैयार नही थे मगर क्या करती ? उन अनछुए लमहों में था ही क्या ? कुरेदने की कोशिश करने लगी। शर्माना , झिझकना , दिल का धड़कना वगैरा सुना होगा ? नही , नही , ऐसा कुछ भी तो नही था। पति के चेहरे , हावभाव और आंखों में खुशियों के बादल छलांग क्यों नही लगा रहे ?

      ‘ रचना , ये तुम्हारे लिए है , मां ने दिए है .... बात बात में मां को ले आता , ओफ ! फिर वही मां। मन में आया , इसी वक्त अंगूठी निकालकर फेंक दूं मगर शिष्टतावश चुप साधे रही। लुटे पिटे चेहरे वाला विनय दबे अंधेरे का फायदा उठाते हुए कब चुपके से सर्र से बाहर निकल गया , पता ही नही चल पाया। लब्बोलुआब ये कि हमारी गोल्डन नाइट धीरे धीरे ब्लेकनाइट में तब्दील होती गई। सप्ताह भर बाद ही लौट आई मायके। लस्त पस्त सी लुटी पिटी सूरत देखकर मां तो सकते में आ गई मगर पापा का तकियाकलाम- ‘ देखेंगे , बात करेंगे , धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। ’

      क्या वाकई कभी कुछ ठीक हो पाता है ? कालपी से उरई , फिर झांसी , ललितपुर और इलाहाबाद होते हुए अब इस दूरंदेशी पहाड़ी जगह की नौकरी। दिन भर पढ़ाती लेकिन शाम होते ही उचाट तन मन लिए सूने आसमान को निहारा करती। इस दैत्यााकार समय को भरने की कोई तरकीब नही सूझती। चारों तरफ पहाड़ियां , ताड़ के लंबे ऊंचे पेड़ों वाले हरे भरे माहौल में नीरवता का दुर्भेद्य किला भेद पाना दुश्वार लगता जैसे घने अंधेरे में बजती पेड़ों की पत्तियां चुपचाप सिर नवाए उसके खोए वजूद की विवशता देखकर खामोश हो गई हों। रात की बोझिलता से हवा की सांसें घुटती हुई लगतीं। रचना के लिए दिन रात एक ही मौसम रहता , वही उमस , बेचैनी और वैसी ही घुटन हर वक्त तारी रहती। धीरे धीरे पति शब्द निरर्थक साबित होने लगा। कभी भ्रम होता जैसे बैठे बैठे गाड़ी थोड़ी खिसकी हो मगर जल्द ही अहसास होता कि ये तो बगल वाली गुजरती ट्रेन को देखकर चलने का आभास हुआ था। न वो कभी रचना के पास झांकने आया , न ही संदेश वगैरा या फोन , न चिट्ठी , न कोई हालचाल , फिर है क्या आखिर हमारे बीच ? सवाल भटकती प्रेतात्मा की तरह पिछियाता रहता।

      सास का तना चेहरा , झुर्रियों भरी बांहें और मिची मिची आंखों में लाख खोजने पर भी मनुष्यता के चिन्ह नही ढूंढ पायी वह। कुछ भी ऐसा नही था जो उनके रिश्ते को नॉर्मल रख पाता। वे सब दरवाजा बंद करके क्यों रहते हैं ? जरूर कुछ न कुछ छिपाया जा रहा। वे सब उसे चोर निगाहों से क्यों देखते ? कुछ भी पूछने पर कन्नी काट लेते। शायद सब शाम से ही पीने बैठ जाते। उस कमरे में क्या चल रहा है ? कोई भी ठीक से बताने को तैयार ही नही। शादी के तुरंत बाद होली का त्योहार पड़ा था। रचना का मन उछाह से भरा था लेकिन खुद के बूते अकेले क्या कर पाऊंगी ? पड़ोस में भुनते खोए की खुशबू से मन किया कि चलो कुछ बनाया जाए मगर उस अजीब से परिवार में सब कुछ रेडीमेड चलता। रंग , गुलाल और लस्सी की याद आई तो सास से दबी जुबान में कहा। उन्होंने सुनकर अनसुनी कर दी। दूर कहीं बजते मंजीरों की धुन सुनकर उसके भीतर सोए राग बजने को अकुलाने लगे। अब तक सास की इच्छाओं को चीन्हने से इंकार ही तो करती आई है वह मगर क्या रहा हासिल ? ऐसे तो देह और मन को दबाते दबाते उम्र निकल जाएगी , नही , अब और नही , फिर वह तय करती , आज विनय के सामने बाल खोलकर मैरून रंग की साड़ी पहनकर निकलूंगी तो वह जरूर प्यार की रागिनी छेड़ेगा और हमारे बीच जीम बर्फ पिघलेगी , फिर वही प्यार का जादू , मगर आज ये सब क्या अटपटा सा देख लिया ? कभी न हंसने वाला विनय आज कितनी जोर से खिलखिलाकर हंस रहा था , अपने एकलौते दोस्त के संग जो परफ्युम की बोतल उसके ऊपर उड़ेलता हुआ निहायत ही गंदे तरीके से उससे सट रहा था। आखिर क्या था वह सब ? तभी उसने पीछे वाले आइने से रचना को घूरते हुए देख लिया तो एकदम से सटपटा गया। फिर जैसे एकदम से चोरी पकड़े जाने पर सहमे , डरे और लुटे पिटे अपने चेहरे को छिपाते हुए बालकनी में चला गया।

      यकीनन , रचना ने अपनी आंखों से देखा , वे दोनों दरवाजा बंद करके घंटों पड़े रहते। अक्सर साथ साथ पत्ते खेलते , खाते -पीते , हां वो अधेड़ सास भी उनके लिए बोतलें छिपाकर ले जाती। तो इस तरह मनाया गया वहां पर रचना का पहला होली का त्योहार।

      ऐसे ही कुछ दिन और खिचते रहे लोकलाज के नाम पर। नौकरी में अकेले पड़ते ही वही यक्ष सवाल घेरने लगता-इससे बंधे रहने इससे बंधे रहने की तुक ? जिसकी जुबान प्रतिकार के लिए कभी न उठे , उसके साथ का औचित्य ? आखिर क्या सोचकर शादी कराई ऐसे आदमी की ? शक करने को अब बचा ही क्या था ? अचानक एक मौका हाथ लगा। शहर में दंगे शुरू हो गए थे सो कर्फ्यू तन गया। बैठे बैठे ऐसा जी उचटा, ऐसी घुमेर उठी कि रात में ही चल पड़ी पति के पास। अब आर पार का फैसला हो ही जाए। जो भी होगा , देखा जाएगा। आखिर कब तक टाला जा सकता है भविष्य ? आवेश से भरी रचना बिना खबर किए निकल पड़ी। अचानक उसे देखते ही घबड़ा गया वह। तुरंत मां को फोन मिलाने लगा। रचना ने लपककर रोकना चाहा मगर उसने एक न सुनी। पत्नी होने का हवाला दिया फिर अवश स्थिति में जोर जोर से रोने लगी। शायद रोने धोने से कुछ पिघला फिर उनके बीच पहली बार पति पत्नी के संबंध बने यानी ये नपुंसक नही है फिर क्यों है ऐसा ? कहीं कुछ तो फांस है , दिमाग के घोड़े कई दिशाओं में घूमने लगे। साफ लहजे में बात की मगर वह बात बात में मां का पल्लू छोड़ने को तैयार नही था।

      ‘ मैं अकेले कुछ नही फैसला कर सकता , आने दो उन्हें। ’

      ‘ क्यों बुला रहे उन्हें , बीवी हूं तुम्हारी , इतना हक तो बनता है मेरा ’। आवाज में थोड़ी नाटकीयता थी।

      ‘ वो सब मैं नही जानता , तुम्हारे सवालों का मेरे पास कोई जबाव नही। हम कैसे साथ साथ रहेंगे , आगे क्या करना है , जैसी बातें मां से ही डिस्कस करके। ’ उसके हड़बड़ाते चेहरे पर परेशानी के भाव रेंगने लगे लेकिन आवेश से भरी रचना की आवाज कांपने लगी- ‘ फिर क्यों रहूं तुम्हारी ब्याहता बनकर ? मां के साथ ही रहो।’

      ‘ जैसा चाहो करो। तुम अपने पैरों खड़ी हो सो खुद अपने तरीके से फैसले ले सकती हो , मैं तो यही कह सकता हूं। ’ बड़ी तटस्थ मुद्रा में इतना भर बोल पाया वो।

      इसके पहले कि भीतर सुलगती आग से पूरा घर जल पाता , उसकी मां ऐन मौके पर आ धमकी। खाने को लपलपाती बड़ी बड़ी लाल आंखों से उन्होंने रचना को खा जाने वाली नजरों से घूरा फिर गुर्राती आवाज में बमक पड़ी- ‘ तुम्हें वहां नौकरी से अचानक भाग आने को किसने कहा था ? ऐसी क्या आफत आन पड़ी थी ?

      ‘ ऐसा ही कुछ कुछ समझ लो। क्यों , क्या मेरा कोई हक नही बनता इनके पास आने का ? पत्नी हूं आखिर इनकी .....;

      ‘बकवास बंद करो , समझीं ? बड़ी आई समझाने वाली। हुंह ! न खाना बनाने का शऊर , न

      घर को ठीक ढंग से रखने की तमीज , न किसी से कायदे से बोलने की सलीका , चली आई उजड्डों के घर से मुंह उठाए , हद है बेशर्मी की भी , ऐसी भी क्या आग लगी थी तन बदन में ? ’ उसने इस बार सोच समझकर अचूक वार किया।

      उसके भीतर दुबककर बैठी कमजोर स्त्री न जाने कहां गुम हो गई सो पूरी बेशर्मी से जबाव दिया- ‘ हां , सच्ची में मन नही लगता वहां , इनके वगैर ,...... प्रेम दर्शाने का ट्रम्प कार्ड खेला जा रहा हो जैसे।

      ‘ लेकिन अभी तो इसका तबादला वहां हो नही सकता और तुम्हारा भी यहां नही हो पा रहा। ऐसे में जैसा चल रहा है , चलने दो , बाद में देखते है....। ..’ बड़े संभल के जतन से बोले जा रहे थे चुनींदा बोल।

      ‘ मुझे ऐसी नौकरी करने का कोई शौक नही , मैं ही क्यों वहां अकेले पड़ी रहूं ? ’

      ‘ लेकिन तुम्हें नौकरी करनी है , ये मेरा फैसला है , बाकी तुम्हारी मर्जी , जैसा अच्छा लगे , करो। ’ कहकर वे वहां से चलती बनी।

      जहरीले बोलों की सुलगती राख से पुत गया रचना का तन मन। झपट्टा मारकर चोंच में बंद कीड़े की तरह किलबिलाने लगी वह। ये पति नाम का जीव इतना दब्बू , कायर और घोंचू क्यों है ? क्यों इसके दिलोदिमाग में चौबीसों घंटे मां का खौफ तारी रहता है ? जरूर कोई गहरी साजिश है , कोई राज है , सोचकर रचना ने छानबीन शुरू कर दी। सबसे पहले मौका पाकर पति के कमरे की तलाशी ली। हर चीज केा ध्यान से देखने लगी। कमरे में जहां तहां मां के कपड़ों का साम्राज्य था। बिस्तर पर दूसरे मर्द के कपड़े , घड़ियां , और , और भी कुछ गड़बड़ तो है .... , अचानक उस रोज बिना खटखटाए कमरे में घुसने पर मां के चेहरे पर बिछी हड़बड़ाहट , क्या था उसमें ? कहीं कुछ तो है ।

      और फिर एक दिन , जब वहां से लौटने का प्लान बनाया लेकिन प्लान के मुताबिक उसी रात लौटकर रसोई की टूटी खिड़की से जो मंजर देखा , फिर तो किसी से कुछ कहने सुनने को कुछ रह ही नही गया था। दो मर्द एक दूसरे से बुरी तरह गुंथे हुए थे। मोमबत्ती की तरह सुलगता रहा वजूद। फिर आखिरी छोर तक पहुंचते पहुंचते लगा कि साबुत कुछ भी नही बचेगा। चट्टान की तरह अडिग कुतर्क करते पुरुष का कोई कुछ नही बिगाड़ सकता। स्त्री होकर भी स्त्री के प्रति न जाने किस जन्म की दुश्मनी निकाल रही थी वो मां बनी औरत ? कितनी तरह के सवाल जबाव बेदम होकर फर्श पर लुढके पड़े थे।

      ‘ ये सब हकीकत जानते समझते हुए क्यों की गई ये शादी ? किसके दबाव में आखिर क्यों ? ’ जैसे कंटीले सवाल लहुलुहान करते रहे जिनके जबाव दोनों में से किसी के पास भी नही थे। खदकते शब्द बाहर आने के लिए अकुलाते मगर कहीं से कोई रास्ता नही मिला। धीरे धीरे मौन एक वृत्त बनाता रहा। बाहरी लोगों के कहने सुनने से क्या फर्क पड़ जाता ? तो क्या जिंदगी भर अकेले रहना पड़ेगा उसे ? जितना सोचती , बदन से गर्म लपटें निकलने लगती। यहां रहने के दौरान किन किनसे वास्ता पड़ा जिनके ऐवज में क्या क्या लेना चाहा , सोचते ही मादा होने का अहसास कड़ुवाहट घोलने लगता। जिस तिस की सहानुभूति से चिढ होने लगती ।सारे रिश्ते बेेमानी लगने लगे। क्यों न इस जगह छोड़कर कहीं और शिफ्ट हो जाऊं ? सोचकर रचना ताबड़तोड़ ढंग से रिक्तियां देखती। फिर से इंटरव्यू के दौर शुरू हो गए। अब सब कुछ नए सिरे से शुरू करना होगा , सेा इस दिशा में तेजी से हाथ पैर चलाने शुरू कर दिए।

--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--x--


      बहती हवा की शक्ल में वक्त अपने होने का अहसास जब तब कराता रहता। छत पर बिछी चांदनी , हिलते डुलते पेड़ , मंदिर में बजती घंटियां, कीड़ों की घुरघुराहट , जलते पत्तों का धुआं और पड़ोस में लड़ते झगड़ते बच्चों की आवाजें मन के सूनेपन के साथ संगति बिठाने लगती। अरसे बाद रचित से मिलकर सुकून मिला। कुछ दिनों तक लगातार उसकी खुद से बातें होती रहीं। समवेत आवाजों के न जाने कितने अक्स रचना के भीतर आकार लेने लगते। इधर वह खुद से जूझती रही , उधर वह इसी बीच वह फिलाडेल्फिया उड़ गया। यह उसकी पुरानी आदत थी यानी जो भी उसके मनमुताबिक न हो तो वह बिना सफाई मांगे अपने तयशुदा रास्ते पर कूच कर जाता।

      धीरे धीरे उसके इर्द गिर्द धुएं की गाड़ी परत बनने लगी। अंधेरों से भरी रात में घंटों खुद से बातें कंरने की आदत सी पड़ गई। करवट बदलते ही घबराहट का ऐसा बगूला उठा कि पसीने से तरबतर हो उठी। थोड़ी देर बाद आंखें खोली , उफ ! फिर वही अंधेरा , वही काला रंग , ये रंग आसानी से पीछा नही छोड़ता। आंखें मूंदते ही लगता जैसे किसी को उसकी जरूरत नही , कोई भी तलबगार अंाख दूर दूर तक नजर नही आती , सोचते ही बेचैनी घेरने लगती। इससे निजात पाने के लिए आंखें फाड़कर अंधेरे में हाथ पैर हिलाकर कुछ टटोलने की कोशिश की तो अलार्म घड़ी लुढ़कने की आवाज सुनाई पड़ी। ठूंठ की तरह बेढब जिंदगी ही उसके हिस्से आ रही थी जिसे रचित फोन पर लंबी लंबी बातें करके चुटकियांे मंे गायब कर देता और फिर सोए सपने जग जाते। कितनी विचित्र , कितनी रहस्यमय और जटिल पहेली है प्रेम। कभी लगता , इसकी कौंध के सामने सूरज की रोशनी भी फीकी पड़ जाए। एक साथ कितने फूलों की महक पहली बार सूंघने का अहसास जगा। अंदरुनी रेगिस्तान जैसे अचानक हुई बारिश से लबालब भर गया। उसकी तरंगित बातें सुनकर नए नए पंख उगने लगते और वह निर्बंध उड़ान भरने लगती। कितना अनूठा , कितना विरल सुख है ये।

      ‘ आंटी , आप मेरा होमवर्क करा देंगी ? ’

      ‘ हां , हां , क्यों नही ? चलो , अभी चुटकियों में कराते है ’ उसकी आवाज में उल्लास फूट पड़ता।

      घर के सामने रहते दिबू के साथ खूब सारा वक्त बिताने में इन दिनों उसे मजा आने लगा। जब भी वह खाली होता , लपकर रचना के पास चला आता फिर वे मिलकर खूब खेलते , कभी कैरम , ताश या पतंग उड़ाते और उसके दोस्तों संग मस्ती करते। उनके साथ बातें करके उसके भीतर सूखे स्नेह का नया सोता पनपने लगता ।क्या इतना प्रेम पहले भी था उसके अंदर ? खुद में आई तब्दीलियां देखकर वह खूब खुश होती। इस दिबू में ऐसा क्या था कि वह सब छोड़छाड़कर उसकी एक टेर पर उसके पास दौड़ जाती। उसकी भोली सूरत देखकर सारा अवसाद धुल जाता। एक दिन वह मिट्टी का गुल्लक दिखाने लगा- ‘ आंटी , मैं रोज इसमें एक एक सिक्का डालूंगा , फिर जब यह भर जाएगा तो कितने सारे पैसे होंगे न मेरे पास , इत्ते सारे .... वह दोनों बांहें फैलाकर बताने लगता।

      रचित के खयालों में खोयी उसके भीतर एक और सोच आकार ले रही थी , प्रेम का गुल्लक भी तो ऐसा ही होता है , जब भी अतिरिक्त भाव उमड़ें , डालते जाइए। विचित्र बिडंबना है कि इस गुल्लक तोड़ने पर हासिल क्या ? बक्त बेवक्त की मुसीबत से भिड़ने के लिए एक तिनके सी राहत, इसे यूं ही खनकाते रहें , ऐसे ही खूबसूरत भ्रमों से कटती है जिंदगी। इसे तोड़ना यानी असमय सपनों की मौत मतलब खुद की मौत।

      ‘ आप क्या सोचने लगी ? ’ दिबू ने उसकी एकाग्रता भंग करते हुए उसका चेहरा अपनी तरफ खींचा फिर बोला- ‘ आज छत पर पतंग उड़ाएंगे और बैडमिंटन भी तो खेलना सिखाएंगी आप ? ’

      कभी वह पतंग की डोर पकड़ती तो कभी छोड़कर वापस खींच लेती। जिंदगी का खेल भी तो ऐसा ही है। ये क्या होता जा रहा है उसे ? हर खेल में ज़िंदगी का मर्म बूझने बैठ जाती। चाहे अनचाहे अंतस में हर वक्त रचित के बोल बजते रहते। रोज रात को घंटों फेान करना - ‘ कभी अपने को कम न आंको , तुम्हें वक्त ने तोड़ा जरूर है मगर समझदारी भी तो बख्सी है। जानती ही हो , हर झटका एक नई सीख देता है सो इसे चुनौती की तरह लो और उसी ढंग से स्वागत करो जैसे अनचाहे मेहमानों का करती हो। मुझे समझने की कोशिश करो रचना , मुझे तुम्हारी हंसी चाहिए , तुम्हारी खुशी भी। लिसिन , आई एम स्टिल वेटिंग योर रिप्लाई , जस्ट वेटिंग , वेटिंग एंड वेटिंग , सुन रही हो न ? मेरे लिए तुम वही हो जो सालों पहले थी। ’

      सुनते सुनते आंखें भर आईं। फिर तो रचित ने उसे इतना हंसाया कि एकदम से कपूर की तरह हल्की हो उठी। ये देखो , रचित की बातों से कमरे का हर कोना राग की सुनहरी आभा से जगमगाने लगा। भीतर से कोई पुरानी धुन होठों से बजने लगी। जहां हर पल चौंकते , सहमते या सोचते हुए काटती थी , आज वही रात सपनों से गमक रही थी।

      ‘ ओके , रचना , हम अच्छे दोस्त की तरह ही हमेशा रहेंगे , एक दूसरे का सहारा बनकर जिएंगे। हम साथ साथ है न ? ’ फिर वे देर तक हंसते हुए मीठे मीठे सपने देखते रहे।

      ठंड के बावजूद रचना ने फुर्ती से बतख की तरह फुदकते हुए अपने लिए चाय बनाई और खिड़की से स्कूल जाते चहकते बच्चों को देखती रही। दिबू का एडमीशन किसी अच्छे स्कूल में कराना है , उसे एक नई जिंदगी के लिए तैयार करना है। उसकी अकेली विधवा मां भला कैसे क्या कर पाएगी ? सोचते हुए उसने राहत की सांस ली जैसे तेज चलती हवाओं ने भीतरी उमस को पल भर में छूमंतर कर दिया हो लेकिन जीवन इतना सरल होता कहां है ? अचानक जैसे नाटक शुरू होने से पहले ही मंच भचाक से टूट पड़ा हो ।

      ‘ नही , नही , ऐसा नही हो सकता , ओ गॉड ..... एक भयानक चीख उसके गले से निकली और दिशाएं दहल उठीं। लगा जैसे रेत भरे समुंदर में चारों तरफ से उठती तूफानी लहरें वेग से चली आ रही हों ओर जमीन से आकाश तक चारों तरफ काला धुआं , रेत और कीचड़ फैल गया हो। तूफान से घिरी बदहवास रचना के कदम क्यों नही बढ़ पा रहे ? उसे लगता जैसे एक ही जगह खड़े होकर जैसे ही वह कदम आगे बढ़ाती , पैर जमीन में धंसने लगते। उसे सब तरफ भूचाल से टूटे मकान क्यों नजर आ रहे हैं ? ये सब कैसे हो सकता है ? अभी पिछली रात में ही घंटे भर बातें हुईं थी लेकिन आज किसी ने जैसे उसे तपती भट्टी में झोंक दिया हो - ‘ एक्यूट डिप्रेशन से जूझ रहा था वो , सुबह सुबह सड़क पार करते समय अचानक दो कारें आपस में जबरदस्त तरीके से टकराई एंड. ऑन द स्पॉट , ही इज नो मोर ......

      तपते बोलों को कैसे भी सह ही नही पा रही थी। कल कितने तरीके से समझा रहा था वो - रचना , हम मिलकर इस जीवन का प्रयोजन ढूढेंगे और बचे खुचे जीवन केा एक नया अर्थ देंगे। यस , वी कैन डू इट , सुनो , हमारे इस साझे जीवन का एक मकसद होगा , हम इसमें रेाज नए रंग भरेंगे और नया विस्तार भी देंगे , अस्ताचल जाते सूरज की तरह। तुम खूब सपने देखना , हम उन्हें साकार करेंगे।

      उसे लगा जैसे पतंग के मंझे से उसके दोनों हाथ लहुलुहान हो उठे हों। देखो , देखो , आकाश में टूटी हमारी पतंग किस कब्रिस्तान की तरफ जा रही है ? हमारी पकड़ से बाहर कहां भागी जा रही है वह ? कैसे भी रोक नही पा रही उसके टूटे वजूद को , वो देखो , ध्यान से , रचित जा रहा है , रोको उसे , पकड़ो उसे , पूरी ताकत से पकड़ लो , जाने न पाए , अरे , कोई है ? लेकिन कोहरे भरी उस सुबह में धुआं और धुंध के सिवाए कुछ नही सूझ रहा था।

रजनी गुप्त 
विस्तृत परिचय 
Share on Google +
    Facebook Commment
    Blogger Comment

0 comments :

Post a Comment

osr5366