कहानी: विसर्जन से पहले - सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' | Hindi Kahani by Suresh Chandra Shukla 'Sharad Alok'

विसर्जन से पहले सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' 

प्रवासी दुकानों पर अभी भी अंतिम संस्कार का सामान आना शुरू नहीं हुआ है.
शायद इसलिए क्योंकि अभी यहाँ प्रवासियों ने सत्तर के दशक में ही आना शुरू किया था


मेरे सामने मेरे पति की अस्थियाँ रखी हैं.  मैंने उसे मिट्टी के एक सुन्दर लोटेनुमा कलश में रक्खा है. कलश ढूढ़ने  के लिए मैंने कितने प्रयत्न किये थे. भला हो मेरी कलाकार मूर्तिकार मित्र अनीता का जिसने मुझे कलश दिया. विदेश में और वह भी स्वीडेन में बहुत मुश्किल से मिल पाती हैं, भारतीय चीजें. प्रवासी दुकानों पर अभी भी अंतिम संस्कार का सामान आना शुरू नहीं हुआ है. शायद इसलिए क्योंकि अभी यहाँ प्रवासियों ने सत्तर के दशक में ही आना शुरू किया था. अब प्रवासी मरते भी हैं तो ज्यादातर लोग भारत का लोभ भले ही जीवित रहते अपने कलेजे से लगाये रखें पर जब अंतिम विदाई का समय आता है तो परिजन अंतिम संस्कार स्वीडेन में ही कर देते हैं. अंतिम संस्कार अपनों से बिछुड़ने का दुःख इतना बड़ा होता है और वह इतने ग़मगीन हो जाते हैं कि उन्हें मरने वाले प्रिय की गंगा में अस्थियाँ विसर्जन की अंतिम ईच्छा का ध्यान नहीं रख पाते.

       मेरा पति भारतीय था. इस छोटे से कलश में जो अस्थियाँ हैं वह उसी की  हैं. पूरे जीवन भर हम दोनों लड़ते रहे अपनी-अपनी संस्कृति के लिए. मुझे पश्चिमी संस्कृति सीधी-सादी, प्रायोगिक, पारदर्शी लगती तो मेरे पति जय शंकर को आदिकाल की, आदर्श, परंपरा में जकड़ी  भारतीय (पूर्वी) संस्कृति मानो उसके प्राण लगती थी. बेशक हमारा उसका जीवन भर झगड़ा रहा पर आज जब वह दुनिया से विदा हो गया है भारतीय संस्कृति में अपने को खोजने जा रही हूँ.

       मुझे पूरे जीवन भर समझ नहीं आया कि क्या बात है, कि स्कैनडिनेवियायी (नार्वे, स्वीडेन, डेनमार्क और फिनलैंड) लोग अवकाश में अलग-अलग देशों की यात्रा करते. ऐश करते, आनन्द उठाते. जीवन भी तो आनन्द के लिए बना है, यही  मेरा मानना है.  जीवन एक बार मिलता है. पर मेरा पति जब भी उसे अवकाश मिलता था वह भारत की यात्रा पर चला जाता था. कभी कुम्भ स्नान करने तो कभी बदरीनाथ-केदारनाथ, तो कभी वैष्णव देवी मंदिर को और अपने दोस्त और रिश्तेदारों को ढूढ़-ढूढ़कर मिलता था. उसे मानो भारत में ही स्वर्ग मिलता था. जय कहता था कि हमको अच्छे संस्कार और कर्म करने चाहिए ताकि अगला जन्म  भी सफल और सुन्दर हो. मैं वर्तमान और  भविष्य को दूसरे जन्मों के लिए नहीं जीना चाहती थी. और मैं कभी-कभी उससे जब कोई कार्य के लिए निवेदन करती तो उससे व्यंग्यात्मक लहजे में कहती थी,
सुरेशचन्द्र शुक्ल के कहानी संग्रह 'सरहदों के पार' का विमोचन
शुक्रवार 7 मार्च 2014 को शाम 4:00 बजे

हिंदी भवन, विष्णु दिगंबर मार्ग, नयी दिल्ली

मुख्य अतिथि: श्री विश्वनाथप्रसाद तिवारी, अध्यक्ष साहित्य अकादमी


बीसवीं सदी से विदेशों में  हिंदी कहानी लेखन और सम्पादन करने वाले सुपरिचित साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल की  इक्कीसवीं सदी की कहानियों के  संग्रह का विमोचन है जिसमें अनेक प्रख्यात कथाकार कहानी संग्रह पर चर्चा करेंगे।
जो कहानी पढ़ते हैं, लेखन से जुड़े हैं, शोध छात्र-छात्रा हैं अध्यापन और पत्रकारिता से जुड़े हैं उनके लिए भी यह बेहतरीन मौका है कहानी से जुड़े  पहलुओं को जानने का.



       'अगले जन्म के लिए मेरा यह काम कर दो.' वह मुस्कराता और कार्य कर देता. उसने ना कहना नहीं सीखा था. जय सच्चा इंसान था आज मुझे उसके न रहने पर अहसास हो रहा है.

       मैं कालेज के दिनों में बियर पीने लगी थी, चौंकिए नहीं जैसे जय मुझे नशे की हालत में देखकर चौंक जाता था. यहाँ  स्वीडेन में बियर वाइन पीना भोजन का एक हिस्सा है, विशेषकर शुक्रवार, शनिवार या कभी भी शाम को. पर मैंने अपने बच्चों के घर पर रहते बियर- वाइन नहीं पी थी, जय कहता था,

       'तुम खूब पियो, जूली! पर बच्चों के सामने नहीं.' 

       मेरे माता-पिता मेरी बियर पीने की आदत नहीं छुडवा सके थे जो जय ने छुडवा दी थी. क्या खास बात है भारतीय संस्कृति में? भारतीय फिल्मों से लगता है कि वह पहनावे, क्लब-जीवन, खाने-पीने की आदतों में और पार्टनर बदलने में हमसे भी आगे हैं. पर स्वीडेन में जय और दूसरे भारतीय परिवारों  को देखकर मुझे कभी नहीं लगा.  हाँ अपनी बातें छिपाना, कमियों पर पर्दा डालना कोई भारतीयों से ही सीखे. मिलजुलकर बिना कोई औपचारिकता के उत्सव मनाना भी कोई भारतीयों से ही सीखे.  जहाज पर यात्रा करते समय जय की यादों में खोयी रही. दिल्ली एयर पोर्ट पर जहाज लैंड होते ही हम अपना सामान लेकर कस्टम से होकर गुजर ही रही थी कि कस्टम वालों ने अस्थियाँ से भरे कलश को रोक लिया था, दक्षिणा देकर कस्टम से बाहर आ गयी थी. विदेशी लोगों में भारतीयों का आकर्षण बहुत है वह मैं अपने देश में भारतीय पर्वों पर आयोजित उत्सवों में देख चुकी थी.

       पहले हवाई यात्रा की थकान, फिर दिल्ली एयरपोर्ट में टैक्सी से रेलवे स्टेशन पहुंची, वहां चार-पांच कुलियों का समूह आ गया.  मेरे पास तीन सूटकेस (बैग) थे वह भी भारी  भरकम सो मैंने तीन कुलियों को एक-एक बैग पकड़ा दिया. उनमें से एक ने कहा कि वह सभी बैग खुद उठा कर अपने सर पर लाद लेगा. पर मैंने तीनो में से एक-एक बैग उठवाया. मुझे याद है मेरा जय मुझे कभी भी कोई बोझ नहीं उठाने देता था अब-जब उसका अहसास है तो उसके देशवासी से कैसे तीनो बैग एक साथ उठवा  लूं. लोग कहते हैं कि जय के मरने के बाद मैं भावुक हो गयी हूँ. मुझे भारतीय मित्रों ने स्टाकहोम में चलते समय कहा था कि ध्यान रखना कहीं कोई कुली, टैक्सी वाला या फेरीवाला आपका सामान न साफ़ (गायब) कर दे. इन तीनो बैगों में जय का ही सामान है जो मैं यहाँ दान करने लाई हूँ. मैं उसकी यादों को कपड़े के रूप में नहीं रखना चाहती. यदि कोई कुली बैग ले भी गया तो मुझे कोई दुःख नहीं होगा. यदि मेरा बैग ले भी गया तो भारतीयों की तरह मैं समझूँगी कि मेरी किस्मत में नहीं था. नियति को यही मंजूर था. यात्रा में ऐसा लग रहा था कि यादों के साथ जय मेरे साथ यात्रा कर रहा है. जय के मरने के बाद उसकी यादें हर पल मेरा पीछा कर रही थीं.  वह भारत में अपनी यात्राओं के बारे में इतनी बार बता चुका था कि मुझे नयी जगह पहली बार ही देखा क्यों न हो पर वे जगहें चिर परिचित लगती थीं.
पहले मैं सोचती थी कि जय कैसा भारतीय है जो दिन रात भारत की तारीफ़ में पुल बांधते नहीं थकता था वह अपने देश चला क्यों नहीं जाता? क्या वह भारत से प्रेम नहीं करता ?  जय ऐसा भारतीय था जिसे अपने देश से प्रेम नहीं है क्या?  वह अपना परिवार, देश, मित्र सभी कुछ छोड़कर चला आया था. कभी-कभी मैं कहती कि क्यों नहीं तुम ख़ुशी-ख़ुशी अपने देश चले जाते हो, बेशक मुझे परेशानी होगी. तुम्हारी ख़ुशी के लिए मैं तुम्हें पैसे भी भेजती रहूंगी. पर वह कभी हमेशा के लिए जाने को तैयार नहीं हुआ था.

       हाँ, हर पल जब भी मेरे पास होता था. किसी न किसी बहाने अपने , माता पिता, भाई -बहन, दोस्त और उनकी बातें करके कभी नहीं थकता था. जब आज वह नहीं है, मुझे ज्ञात हुआ है कि वह मुझे बेहद प्यार करता था.

       उसने स्वीडेन में मेरे माता-पिता, दादी-दादा और नानी-नाना को अपना घरबार छोड़कर बुढ़ापे में वृद्धागृह में अकेले जाना पड़ा था. उन्हें वृद्धागृह में रहते देखा था जिन्हें परिवार वाले एक महीने में एक बार और बाद में केवल त्योहारों क्रिसमस-ईस्टर आदि अवसरों पर देखने जाते थे. जिन्दगी के आखिरी मोड़ पर उसे मेरे बुजुर्गों की हालत और हालात पर रोना आया. मेरे पिता की मृत्यु के बाद जब मेरी बूढ़ी माँ अकेली हो गयीं थी, उसने कहा था, 'जूली क्यों न अपनी मामा (माँ) को अपने पास रख लेते हैं. शैली (बेटी) भी घर छोड़कर चली गयी है. उसने अपना फ़्लैट ले लिया था. उसी कमरे में मामा रह लेगी.'  उस समय मुझे लगा था कि जय पागल तो नहीं हो गया है. मैंने उसे जवाब दिया था, 'नहीं-नहीं, मैं मामा के साथ नहीं रह सकती. हमारी आजादी का क्या होगा? ' 
'मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, जूली! तुमने कभी सोचा है, माँ के पास स्वर्ग होता है.'  जय ने मुझे समझाने की कोशिश की थी. मुझे मालूम था मेरे खानदान में कभी भी किसी ने अपने माता-पिता को साथ नहीं रक्खा तो मैं ही क्यों रक्खूं.  मैंने जय से कहा था, 'मामा (माँ) बहुत बूढ़ी है, और बीमार भी रहने लगी है. मैं रोज नौकरी पर जाती हूँ. शाम को अपनी मर्जी से क्या हर कुछ आसानी से कर पाउंगी, नहीं बाबा! मैं माँ को साथ नहीं रख सकती.' जय ने मेरे कंधे पर हाथ  रखते हुए कहा था, 'तुम चिंता न करो,  मैं तुम्हारी माँ की सेवा कर दूंगा. माँ बस एक बार जीवन में मिलती है.'

       मैं उसे देखते ही रह गयी थी. मैं जय के तर्कों का जवाब न दे सकी थी परन्तु मैं माँ को अपने साथ नहीं रख सकी थी. आज सभी कुछ स्मरण हो रहा है. मेरी बेटी शैली सप्ताह में केवल एक बार बहुत चाहने पर मिलती थी.

       जब मैं जय पर झल्लाती थी तो कुछ भी कह जाती थी. एक बार मैंने माँ की बात करते हुए जय से कहा था,
'जय जब हम बूढ़े होंगे हम तुम्हारे साथ नहीं रहेगें. हम अलग रहेंगे.' तब जय ने व्यंग्य  कसते हुए कहा था,
'इसमें क्या खास बात है? तुम्हारी दादी ने 70 साल की उम्र में तुम्हारे बाबा को तलाक देकर अपनी आयु से सात साल कम के बूढ़े के साथ रहने लगी थी. कपड़े ऐसे पहनती थी जैसे कोई युवा लड़की हो. मजे से कैसे सिगरेट से कश मारकर बातें करती थी जैसे वह  फिल्म की हीरोइन हेलेन या मैडोना हो.'

जय कहता था, 'जब जूली (जूलिए) तुम बूढ़ी होगी तो मैं तुम्हें वृद्धाघर  में नहीं जाने दूंगा. मैं तुम्हारी सेवा घर पर ही कराऊंगा.'

       कितने नेक विचार थे उसके मेरे बारे में. वह वायदा का पक्का नहीं था वह मुझे छोड़कर मुझसे पहले ही दुनिया से विदा हो गया.

       आज जब जय मेरे साथ नहीं है उसकी अस्थियों की राख  मेरे हाथों में है. मेरा मन नहीं होता कि उसकी अस्थियों को अपने से अलग रक्खूं.  जिस गंगा नदी को वह जीवन भर पूजता रहा और मैं उसकी आस्था को समझ नहीं पायी. वह गंगा नदी को माँ कहता था. भारतीय नदियों को ज्ञानस्थली कहता था जहाँ ऋषि-मुनियों ने अपना डेरा डाला, ज्ञान पाया और ज्ञान दिया. जब वह कुम्भ के मेले में गंगा स्नान करने आया था. वह बहुत संतुष्ट था. बहुत खुश. उसका मानना था कि उसके सारे पाप धुल गए हैं पर वह यह भी कहता कि पवित्र गंगा को बहुत गन्दा और कलुषित कर दिया है प्रदूषण ने.

       रेल वाराणसी पहुँच गयी.  कुछ सोते-जागते और कुछ जय की यादों में समय कट  गया.  मेरा मन बहुत दुखी था. मुझे जय की अस्थियों से भी लगाव बढ़ गया था. यह अस्थियाँ भी मुझसे दूर हो जायेंगी, पर जय की अंतिम ईच्छा पूरी हो जायेगी और उसकी आत्मा को शान्ति मिलेगी, यह जानकार संतोष था. मेरे मन में विचारों की श्रंखला कसमसाने लगी.


सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' विदेशों में गत 34 वर्षों से हिंदी का प्रचार प्रसार कर रहे हैं. वो
नार्वे की प्रथम हिंदी पत्रिका 'परिचय', और गत 25 वर्षों से नार्वे में एक मात्र हिन्दी की सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रिका 'स्पाइल-दर्पण' का संपादन कर रहे हैं. उनके  लेखन से विदेशों में (नार्वे में) हिन्दी  साहित्य को एक आयाम मिला है.
रजनी,  नंगे पाँवों का सुख,  नीड़ में फँसे पंख और गंगा से ग्लोमा तक चर्चित काव्य संग्रहों और 'अर्धरात्रि का सूरज', 'प्रवासी  कहानियाँ'  और  'सरहदों के पार' चर्चित कहानी संग्रहों के रचनाकार सुरेशचन्द्र शुक्ल को नार्वेजीय लेखक यूनियन, हिंदी अकादमी दिल्ली, शताब्दी हिन्दी प्रचारक पुरस्कार, राजस्थान,  चौथे विश्व हिन्दी सम्मलेन मारीशस और छठे  विश्व  हिंदी  सम्मलेन, लन्दन, यू के में सम्मानित किया जा चुका है.
संपर्क: speil.nett@gmail.com
       मुझे अपनी स्वतंत्र-उदार पश्चिमी  संस्कृति से बेहद प्रेम है और मैं उसकी आदी हूँ. पर भारत में सभी कुछ है. मैंने जय से भाषा सीख ली थी और कभी-कभी मैं सोचती थी कि यदि मैं जैसे भारतीय संस्कार भी सीख लेती तो मैं यहाँ भारत में रह जाती. भारत में धूप की कमी नहीं. स्वीडेन में जिस दिन सूरज निकलता है और धूप होती है तब हम सभी पूरे दिन भर चर्चा  करते हैं और धूप खाने की फ़िराक में होते हैं.

       भारत में सामूहिक और सामाजिक जागरण की कमी है जबकि लोग सरल, संस्कारवान और दयालु होते हैं. हमारे देश में सभी साक्षर हैं और सभी क़ानून का तथा अपने और  दूसरों का दोनों का ध्यान रखते हैं. यहाँ भारत में अमीर और गरीब में बहुत अंतर है और क्लास सिस्टम हावी है.  यदि मैं भारत में रहती तो समानता लाने में, और क्लास में अंतर को अपने आसपास कम करने का प्रयास करती.

       भारत में पर्यावरण पर लोग जागरूक नहीं हैं.  मैं कैसे समझाऊं की बिना वातावरण और प्रकृति को साफ सुथरा रखकर कैसे अपना जीवन स्तर कैसे ऊंचा रख सकते हैं?

       वाराणसी रेलवे स्टेशन पर बाहर निकलते ही मैंने अपने जय के परिवार के पुस्तैनी पण्डे (पंडित) परिवार के बारे में पूछा. मैंने उनके नाम की तख्ती ऊपर उठा रखी थी. जय, इन पण्डे (पंडित) जी से मिलने आया करता था उसके पिता और दादा भी इन्ही पंडितजी से अपनी सारी पूजा अर्चना कराते थे.

       एक व्यक्ति जिसका भारी भरकम शरीर, जिसका चौड़े  माथे पर चन्दन और टीका लगा हुआ था पास आया और उसने मुझे वहाँ तक पहुंचाने को कहा. जय के साथ रहकर मैं हिंदी सीख गयी थी मैं टूटी-फूटी हिंदी बोल सकती थी और समझ लेती थी. यह जानकार लोग थोड़ा हैरान हुए कि मुझे हिंदी आती है.  

       मैं रिक्शे पर सवार होकर पंडित जी के साथ चाल दी थी.  पंडितजी बहुत सहयोग कर रहे थे. घाट पर पहुँचने के पहले ही उन्होंने अंतिम संस्कार और पूजा के  सामान का प्रबंध करा दिया था. घाट पर बैठकर पंडित जी ने पूजा शुरू कराई थी  तब से अस्थि विसर्जन तक जय की स्मृतियाँ मेरे मस्तिष्क में छाया की तरह लगी रहीं.  जय सदा कहता था, ' जूली!  देखना यह पैसा धरा (रखा)  रह जाएगा. हम लोग पैसा एकत्र करते रहते हैं अंतिम दिनों तक चाहे हमारे पैर कब्र में लटक रहे हों.' जय ने मेरे नाम से दिल्ली के एक बैंक में बहुत सा पैसा और लखनऊ में एक फ़्लैट ले रक्खा है. जब तक जय जीवित था मैं उसके साथ भारत में नहीं रह सकी. अब जब उसकी यादे हैं क्या उनके सहारे पूरा जीवन बिता सकूंगी. जय आयु में मुझसे 10 वर्ष बड़ा था. वह बहुत जल्दी जीवन त्याग गया अभी वह अवकाश प्राप्त भी नहीं हुआ था. वह जब कहता था कि भारत में कुछ महीने घर वालों और रिश्तेदारों के साथ बिना नौकरी किये भी गुजारा कर सकते हैं. खासकर मुसीबत के समय, और स्वीडेन में किसी के पास समय और पैसा नहीं है जो जरूरत पड़ने पर दूसरों को दे सके.  यदि मैं भारतीय नृत्य नहीं सीखती तो शायद जय भी हमारे करीब नहीं आ पाता.  बच्चे अपनी राह  पर और 55 साल कि छोटी आयु में मैं नितांत अकेले, क्या करूंगी. अकेले कैसे रहूंगी. स्वीडेन में आम आदमी की औसत आयु 85 वर्ष है जबकि भारत में 55-57  बरस. पंडित जी ने मेरी ईच्छा  के अनुसार मुझसे ही सारे क्रियाकर्म कराये. और मैं भी पंडित जी को मुंह माँगा दान देती रही.

       पंडित जी से मैंने पूछा, पंडित जी अस्थियों का विसर्जन कहाँ करना शुभ होता है? उन्होंने जवाब दिया कि बीच नदी में, नाव द्वारा जाना पड़ेगा. मैंने पंडित जी के साथ उनके दो सहयोगियों के साथ नाव पर सवार हो गयी. मैंने देखा कि अन्य लोग भी अस्थियों का विसर्जन कर रहे थे.  पुरुष ही नंगी पीठ अस्थियों का विसर्जन कर रहे थे. मैंने स्वयं महिला होकर विसर्जन की बात कही. पहले पंडित जी नहीं माने बाद में मान  गए और मैंने अपने शरीर में अन्दर पहले से ही स्वीमिंग ड्रेस पहन रक्खी थी. पंडित जी ने पहले से ही नदी के बारे में उसकी गहराई आदि बात  बता दी थी. साथ ही दुर्घटना होने पर बचाने के लिए दो आदमी साथ रखे थे. मेरे वस्त्र उतारते ही स्वीमिंग ड्रेस में सभी की आँखे मेरी ओर लग गयी थी. जैसे कोई तमाशा हो. मुझे उनका आश्चर्य से देखना जायज लग रहा था. क्योंकि एक महिला वह भी यूरोपीय विदेशी  महिला अस्थियाँ विसर्जित करने आयी  है. बीच नदी में नाव से उतरने पर मेरे शरीर में काफी कीचड़ - मिट्टी चिपक गयी थी.

       पंडित जी ने सफ़ेद वस्त्र पहनने के लिए कहा था पर मैं अपने साथ वह साड़ी लेकर आयी थी जिसे जय ने मुझे मेरे जन्मदिन में उपहार में दिया था. उस समय मैं वह गुलाबी साड़ी न पहन सकी थी और इनकार कर दिया था, पर आज जब वह दुनिया में नहीं है  उसका वचन निभा रही हूँ.  मेरे जिद करने पर पंडित जी ने कुछ नहीं कहा.

       लोग फुसफुसा रहे थे कि देखो  विधवा ने रंगीन साड़ी पहनी है. मैं उनको क्या समझाऊँ कि जय मुझे हमेशा रंग-बिरंगे कपड़ों में देखना चाहता था. जय की अस्थियों का अस्तित्व गंगा नदी मिल गया था. आदमी का जन्म हुआ, शिशु, बाल, युवा वृद्ध और एक दिन दुनिया से प्रस्थान. मानो काल चक्र में पहले से ही बंधा  हो जीवन.
 - सुरेशचन्द्र शुक्ल

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1 comments :

  1. सजीव सी आँखों के सामने चलती कहानी।

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