कहानी: एक बार फिर होली ! - तेजेन्द्र शर्मा | 'Ek baar fir holi' hindikahani by Tejinder Sharma


एक बार फिर होली !


तेजेन्द्र शर्मा

नजमा के लाल होते गालों ने जैसे दुर्गा मासी पर लाल सुर्ख लोहे की छड़ ज़ैसा काम किया था। शाम होते-होते इस्लाम ख़तरे में पड चुका था, नजमा का कॉलेज जाना बंद; अचानक पूरा घर अभागा हो गया था
नजमा की ज़िन्दगी का वर्तमान रंग होली के रंगों से गहराई तक जुडा है। परसों ही नजमा भारत जाने वाली है। नजमा - एक पाकिस्तानी फ़ौजी की विधवा।

कराची के एक बंगले में गुमसुम सी बैठी नजमा आज तक अपने जीवन की भूल-भुलैया समझ नहीं पायी है। इस शहर में, इस देश में, वह कितनी बार आहत हुई है। कितनी बार उसने उस मौत को गले लगाया है जिसमें इन्सान का शरीर तो नहीं मरता लेकिन आत्मा कई कई मौतें मर जाती है। आज भी वह छलनी हुई आत्मा को अपने इस शरीर में ढो रही है जिसमें अपने ही ऊपर चढ़ाए गये कपड़ों को उठाने की ताकत नहीं।

यह सच है कि उसने इमरान को कभी अपना शौहर नहीं माना। वैसे निकाह के समय काज़ी साहब के पूछने पर उसने भी ''हां'' ही कहा था। लेकिन अगर अम्मा अपनी मौत का वास्ता दे कर कसमें दिलवाए, या फिर अब्बा मियां इस्लाम के ख़तरे में पड़ने का डर दिखाएं तो वह बेचारी ''हां'' के अतिरिक्त कह भी क्या सकती थी। बुलंदशहर में जन्मी नजमा पाकिस्तानी सेना के कैप्टेन इमरान के साथ विवाह कर कराची में आ बसी थी।


कराची एक अलग किस्म का शहर था। बुलन्द शहर और लखनऊ से अलग तो था ही, दिल्ली से भी एकदम अलग था। नजमा ने समुद्र कभी देखा नहीं था। हवा में पानी की नमकीन नमी कभी महसूस नहीं की थी। गांव की खुली हवा में पली नजमा के लिये फ़ौजी छावनी का माहौल खासा दमघोटू था। मलीर कैंट का इलाका भी अजीब सा था। कराची की मुख्य सड़क शाह फ़ैज़ल रोड से एक शाख़ की तरह निकलती हुई एक सीधी सड़क मलीर कैन्ट से जा कर मिलती थी। शहर-ए-गुलशन – नाम तो गुलशन था उसका लेकिन ले जाती थी वीराने की ओर। एक लम्बी अकेली सुनसान सड़क – ख़ौफ़ से भरपूर – नजमा अपने आपको उस सड़क पर कभी सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती थी।

घर में भी नजमा कुर्सियों के कुशन और कुर्सियों को सीधा करती रहती; हर कमरे में बिछे महंगे पाकिस्तानी कालीनों से तागे और कूड़ा साफ़ करती। तीन कमरों का घर – घर के भीतर अकेलापन और बाहर वीराना। बुलन्दशहर की अपनी उस बड़ी सी हवेली और उसमें काम करने वाले ग़रीब मुलाज़िमों के बच्चों की दोस्ती उस की यादों में गीलापन पैदा करते रहते। 3d यहां घर के कमरों की ऊंची ऊंची दीवारें जैसे उसे अपने ही घर में क़ैदी होने का अहसास देतीं। ड्राइंग रूम, डाइनिंग रूम और रसोईघर सभी जगह नीले थोथे वाला सफ़ेद चूना पुता था। हर कमरे में शीशम की लकड़ी का भारी भरकम फ़र्नीचर रखा रहता। बाहर बग़ीचे में टोकरी-नुमा कुर्सियां थीं – दो चार नहीं पूरी दर्जन भर। जब कभी अतिथि शाम बिता कर वापिस जाते तो इमरान का बैटमैन बेचारा उन भारी भारी कुर्सियों को वापिस रखते रखते हांफने लगता।

गुसलख़ाने की छत और दीवारें भी बहुत ऊंची थीं। दिल्ली के मुक़ाबले कराची में ठण्ड तो ना के बराबर पड़ती थी, लेकिन वहां सब लोग हमेशा गर्म पानी से ही स्नान करते थे। घर में हर वक्त एक ही चर्चा सुनाई देती। नाश्ते में क्या बनेगा, दोपहर के भोजन का मीनू क्या होगा और फिर रात के पकवान क्या होंगे। नाश्ते में भी मीट, लंच में भी और डिनर तो बिरयानी के बिना हो ही नहीं सकता था। दालें तो फिर भी बन जाती थीं लेकिन सब्ज़ियां खाये तो नजमा को क्ई क्ई दिन बीत जाते। अभी नजमा को बहुत सी बातें सीखनी और समझनी थीं। फ़ौजियों के तौर तरीके होते भी तो अजब हैं। प्यार और लड़ाई में कुछ ख़ास अन्तर नहीं महसूस होता। फ़ौजी लोग सिविलियन लोगों को तो इन्सान ही नहीं समझते थे।

इमरान भी  ख़ासा ज़िद्दी किस्म का इन्सान था, ''देखो नजमा, अब तुम मेरी बेगम हो। यू हैव नो चॉयस।''

''सुनिये, इतनी जल्दी क्या है? मैं आहिस्ता आहिस्ता अपने आप को तैयार कर लूंगी।''

''मैं यह बिल्कुल बरदाश्त नहीं कर सकता कि मेरी बीवी के पास हिन्दुस्तान का पासपोर्ट हो। अगर किसी को पता चल गया तो लोग क्या कहेंगे। मेरी तो सारी ज़िन्दगी पर बदनुमा दाग़ लग जाएगा।''

''आप सोचिये, पूरी ज़िन्दगी एक हिन्दुस्तानी हो कर बितायी है। अचानक अपने वजूद को कैसे बदल लूं? आप तो जानते हैं मैं थोड़ी सेंसिटिव नेचर की लडक़ी हूं। मुझे तो सुहाग रात मनाने में ही कितना वक्त लग गया था।''

''देखिये बेगम, अल्लाह से डरिये, कुरान-ए-पाक भी कहती है कि बीवी को शौहर की बात माननी चाहिये। इस मामले में हम आपकी एक नहीं सुनेंगे। आप आज ही पाकिस्तानी पासपोर्ट की अर्ज़ी भर दीजिये। इस बात को लेकर हम आपसे अब और बहस नहीं करना चाहते।''

रात भर रोती रही नजमा। तकिया भीगता रहा और इमरान करवट बदल कर गहरी नींद सोता रहा। सुबह होने को रोका जा सकता तो नजमा ज़रूर उसे रोक लेती। लेकिन सुबह हुई और सुबह के साथ ही शुरू हो गया इमरान का पासपोर्ट राग। नजमा की रोती हुई आंखों का इमरान के निर्णय पर कोई असर नहीं हुआ। इमरान की अम्मी और दोनो बहनें इस तरह चुपचाप काम कर रही थीं जैसे उन्हें इस मसले से कुछ भी लेना देना नहीं है। ज़ुबेदा ने तो आ कर पूछ ही लिया, ''इमरान भाई, नाश्ता तो करके ही जाएंगे न आप दोनों?  वैसे आलू के परांठे बना दिये हैं।''

नजमा ने कह दिया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है। वह नहीं खायेगी नाश्ता। इमरान पर इसका भी कोई असर नहीं हुआ। नजमा हैरान थी कि किस मिट्टी का बना है इमरान इतनी बेरहमी क्यों?

इमरान मियां ने कायदे से बैठ कर आलू के दो परांठे दही के साथ खाये, उस के साथ मसाले वाली चाय पी - एकदम फ़ौजी अंदाज़ में, चाय को प्लेट में डाल कर।

नजमा से रहा नहीं गया, ''सुनिये, आप ख़ुद ही फ़ार्म वगैरह भर दीजिये, हम साइन कर देंगे। हमसे नहीं भरा जायेगा।'' और नजमा लगभग भागते हुए बाथरूम में जाकर, अंदर से दरवाज़ा बंद करके खुल कर रोने लगी। उसे याद आ रही थीं अपनी सहेली चित्रा की बातें, ''देखो नजमा, यह जो संकटमोचन का मंदिर है न, इसकी बहुत मान्यता है। यहां जो भी आ कर मन्नत मानता है, वो ज़रूर पूरी होती है। मंगलवार को संकटमोचन का व्रत रखना होता है। हनुमान जी बहुत भोले हैं, जल्दी ही सबकी इच्छा पूरी कर देते हैं।'' उसने कितने मंगल को जाकर संकटमोचन के मंदिर से प्रसाद के रूप में मिठाई खाई है। आज तो मंगल नहीं है; भला जुमेरात को हनुमान जी कैसे हमारी बात सुनेंगे? नजमा मन ही मन दुआ मांग रही थी, ''हे संकटमोचन मुझे इस हालत से बचा लीजिये, आज दफ़तर बंद हो जाए। मुझे पासपोर्ट देने के लिये अफ़सर मना कर दे। मैं जब भी वापिस अपने मुल्क आऊंगी, आपके मंदिर में चढावा चढाने ज़रूर आऊंगी।'' किन्तु जुमेरात को मस्जिद की अज़ान के सामने संकटमोचन की दुआ नहीं सुनी गई।

और थोड़ी ही देर में आवाज़ भी आ गई, ''सुनती हैं बेगम, हमने फ़ार्म पूरा भर दिया है, इस पर साइन कर दीजिये।'' और नजमा ने अपने डेथ वारंट पर ख़ुद ही अपने हस्ताक्षर कर दिये।

वक़्त ने नजमा के ज़ख्मों के दर्द को कम कर दिया। लेकिन उन ज़ख्मों के निशान नजमा की आत्मा पर स्थायी रूप से चिह्नित हो कर रह गये। वह जीवन भर अपने पति के इस कृत्य को माफ़ नहीं कर पायी। इमरान को  कुछ फ़र्क नहीं पडा, वो भी हमेशा जानबूझ कर नजमा के सामने हिन्दुस्तान की बुराई करता। नजमा ने कविता लिखनी शुरू कर दी। उसकी कविताओं में हमेशा दोहरा अर्थ छिपा रहता। वह कभी भी इकहरे अर्थ वाली कविता नहीं लिखती थी। वह अपनी कविताओं में अपने देश, अपनी सहेलियों, अपने परिवार, अपने वजूद को याद करती रहती। एक बार नजमा ने अपनी कविता कुछ यूं शुरू की, ''मन करे माथे लगाऊं मैं वतन की ख़ाक को / कर के सजदे सिर झुकाऊं उस ज़मीने पाक को।''

ज़ुबेदा ने झट से कहा था, भाभी जान ये 'उस' ज़मीने पाक नहीं, 'इस' ज़मीने पाक होना चाहिये। इमरान की झुंझलाहट साफ़ सुनाई पड रही थी, ''ज़ुबेदा मैं तो ज़िन्दगी भर इंतज़ार करता रहूं, तब भी तुम्हारी भाभी जान इस ज़मीन को पाक नहीं कहने वाली। ये तो मुहाजिरों से भी गई गुज़री है।''

''मुहाजिरों से गई गुज़री!" - यह कहने वाला मेरा अपना शौहर है !'' नजमा कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थी। पराया देश, पराये लोग। अपना पति भी पराया सा क्यों लगने लगता है। गिद्धों का एक समूह और बेचारी सी नजमा ! किन्तु जीवन तो जीना ही होता है। नजमा ने भी अपने आसपास के माहौल में रूचि लेनी शुरू की। मलीर कैण्ट पूरी तरह से फ़ौजी क्षेत्र होने के कारण रहने वाले सभी लोग भी फ़ौजी ही थे। सब एक दूसरे की सहायता करने को तत्पर रहते।

अपने पति के साथ नजमा फ़ौजी पार्टियों में भाग लेती तो उसकी ननदें उसे कराची के उच्च-मध्यवर्गीय माहौल से परिचित करवाती रहतीं। पति इमरान को बस एक ही रट रहती, "कश्मीर आज़ाद करवा कर ही रहेंगे"।

नजमा की समस्या यही थी कि उसका शरीर, आत्मा और दिमाग पूरी तरह से भारतीयता में रंगे थे। उसे पाकिस्तान की मिट्टी पर बारिश की हलकी फुहारें पड़ने के बाद मिट्टी से वैसी भीनी भीनी सुगन्ध आती नहीं महसूस होती थी जैसी कि अपने गांव में। उसे लखनऊ विश्वविद्यालय में बिताया एक एक पल परेशान करता है। वहीं तो उसकी मुलाकात हुई थी एक नौजवान से - चन्द्र प्रकाश। सब उसे चंदर कह कर बुलाते थे। कुछ ही दिनों में नजमा चंदर के व्यक्तित्व में इस कदर रंग गयी कि अन्य विद्यार्थियों ने उन्हें चांद तारा कह कर बुलाना शुरू कर दिया। दूर दूर से एक दूसरे को देख कर ख़ुश हो जाने वाले चंदर और नजमा ने धीरे धीरे भविष्य के सपने बुनने भी शुरू कर दिये थे। चंदर वैसे तो डाक्टर बनना चाहता था लेकिन उसके मन में एक कवि पहले से विद्यमान था। कृष्ण और राधा की होली के नग़में वह इतनी तन्मयता से गाता था कि नजमा भाव विभोर हो जाती। उसे होली के त्यौहार की प्रतीक्षा रहती। अपनी सहेलियों के साथ मिल कर होली खेलती और अपनी मां से डांट खाती। उसका होली के रंगों में रंग जाना उसकी आवारगी का प्रतीक था। किन्तु मां को उन रंगों का ज्ञान ही कहां था जो नजमा के व्यक्तित्व पर चढ रहे थे। नजमा अब चंदर की सुधा बनने को व्यग्र थी।

कराची के चिपचिपे मौसम में उसे याद आता था अपना शहर अपना देश। जब नजमा छोटी थी शाम को जैसे ही हल्की सी अंधेरी की बारीक़ सी चादर फैलती, तो चिड़ियां बेचैन हो कर आसमान पर झुण्ड के झुण्ड बना कर उड़ने लगतीं थीं। पूरा अन्धेरा होते ही सन्नाटा सा छा जाता था। छिटपुट झींगुर की आवाज़ सुनाई देती और कहीं कोई जुगनू अपनी रोशनी बिखेरता निकल जाता। फिर धीरे धीरे चांद तारों की रौशनी फैलने लगती। नजमा घर के आंगन में लेटी यह सब तमाशा देखती और उसका आनंद लेती। कभी कभी जब सुबह सवेरे आंख खुल जाती तो नजमा को महसूस होता कि चांद अपनी ठण्डी ठण्डी रोशनी से धर्ती को सराबोर करता डूब रहा होता और कोई सितारा टूट कर ज़मीन की गोद में गिर कर खो जाता। सुबह उठ कर नजमा ज़मीन के उस हिस्से में टूटा हुआ तारा खोजने ज़रूर जाती। उसे आज भी वही लगता कि जैसे अपने हिस्से के सितारे वहीं अपनी जन्मभूमि को सौंप कर आ गई हो। कराची का महानगरीय जीवन कभी भी उसके छोटे से शहर बुलंदशहर की यादों को ढक नहीं पाया। अपने गांव की होली आज भी दिल में गुदगुदी मचाने लगती।

होली खेलने की आदत, सखियों के साथ मौज मस्ती, मावे से भरी गुजिया का आनंद, नजमा का बस चलता तो सारा साल होली ही खेलती रहती। बांग्लादेश  के जन्म के बाद की होली नजमा के जीवन की आख़री होली बनने जा रही थी। पहली बार चंदर ने अपने हाथों से नजमा के कंवारे गालों पर गुलाल मला था। गुलाल के बिना ही नजमा के गालों की शर्म ने उसे जो लाली दी थी, गुलाल उसके सामने पीला पड रहा था। और उन गालों को लाल होते देख लिया था दुर्गा मासी ने। दुर्गा मासी अपनी भांजी सुपर्णा के साथ चंदर के विवाह के सपने सजाये थी। नजमा के लाल होते गालों ने जैसे दुर्गा मासी पर लाल सुर्ख लोहे की छड़ ज़ैसा काम किया था। शाम होते-होते इस्लाम ख़तरे में पड चुका था, नजमा का कॉलेज जाना बंद; अचानक पूरा घर अभागा हो गया था, ''मैं तो उस वक्त भी कहती थी, कि जब सभी लोग पाकिस्तान जा रहे हैं, तो हम ही क्यों यहां रहें। उस वक्त मेरी किसी ने नहीं सुनी। इस अभागन को पूरे शहर में एक भी मुसलमान लडक़ा नहीं मिला, जो काफ़िरों के घर जाने को तैयार बैठी है। हमारा तो परलोक ही बिगाड दिया है।''

अम्मा चिल्लाए जा रही थी और अब्बा गुस्से से आग उगल रहे थे। इससे पहले कि नजमा कुछ भी समझ पाती, उसे विमान में बैठा कर कराची भेज दिया गया था - इमरान मियां के घर। एमए हिन्दी बीच में ही रह गयी। शरीर पर इमरान की मोहर लग गई थी, लेकिन दिल और आत्मा पर चंदर का कब्ज़ा था। होली के रंग में रंगे चंदर की सूरत ही चंदर की अंतिम तस्वीर थी जो कि नजमा के दिल में बसी उसके साथ कराची चली आयी थी।

'' ज़ुबेदा तुम्हें मालूम है कि पाकिस्तान में मोहन जोदड़ों और हड़प्पा कहां हैं?''

'' वो क्या होता है भाभी जान?''

'' अरे, तुमने यह नाम कभी नहीं सुने? हमारे हिन्दुस्तान में तो स्कूल के बच्चे भी जानते हैं उनके बारे में।''

''नहीं तो। वैसे भाभी जान आप बार बार हिन्दुस्तान के गुण गाने कम कर दीजिये। भाई जान को ये कतई पसंद नही है।''

हैरान, चुप नजमा अपनी ननद को बताती तो क्या बताती। लेकिन ज़ुबेदा ने उसकी मुश्किलों को बढा ही दिया, ''भाई जान ये मोहन जोदड़ों और हड़प्पा कहां हैं पाकिस्तान में?''

''तुम्हें क्या करना है वहां जा कर?''

''भाभी जान पूछ रहीं थीं।''

''क्यों नजमा साहिबा क्या आपके हिन्दुस्तान वाले मोहन जोदड़ों और हड़प्पा को भी कश्मीर की तरह हडप जाना चाहते हैं? उनको कहना कि यहां तो तक्षशिला भी है। उनका बस चलता तो उसे भी बांध कर अपने साथ ले जाते।इन सब शहरों का इस्लाम से कुछ नहीं लेना देना। वहां जा कर आप क्या करना चाहती हैं बेगम साहिबा? अगर आपको कहीं चलना ही है तो मक्का मदीना का सफ़र करिये, शायद अल्लाह मियां आपका भी कुछ भला कर दें।''

चुभती बातें, कटु वचन, हर वक्त याद दिलाया जाना कि वह  हिन्दुस्तान की यादों से बाहर आए - नजमा अब रात को चांद से बातें करने लगी थी। उसे पूर्णमासी के चांद में कृष्ण और राधा होली खेलते दिखाई देते। कृष्ण की पिचकारी से निकला रंग, चांद को भी रंगे हुए था। चांद की चांदनी का रंग उस पर चढने लगता। एक फ़ौजी की पत्नी चाहे किसी भी देश में क्यों न हो, अकेलापन उसका सबसे बडा साथी होता है। फिर नजमा तो अपने साथ अपना अकेलापन सरहद के पार ले गयी थी। वह कभी-कभी सोचती कि उसकी सास और ननदें उसकी मनःस्थिति को समझ क्यों नहीं पातीं। फिर शीघ्र ही अपने आपको समझाने लगती कि इसमें उनका क्या कसूर। वे बेचारी उतना ही तो सोच सकती हैं जितना उन्होंने सीखा है। उसकी सास हैरान भी होती कि उसे कैसी बहू मिली है।

'' नजमा बेटी तुम बाहर जा रही हो तो पंसारी से थोडा सामान भी लेती आना।''

'' जी अम्मी। मुझे लिखवा दीजिये।''

'' एक किलो मूंग साबुत, मलका, काले चने और 6 टिकिया लक्स साबुन। ओवलटीन का एक डिब्बा। ''

'' अरी बहू तुम ये कौन सी ज़बान में लिख रही हो?''

'' जी अम्मी हिन्दी में लिख रही हूं।''

'' अरे तुम्हें उर्दू लिखनी नहीं आती क्या?''

''नहीं अम्मी हमारे हिन्दुस्तान में तो सभी लोग हिन्दी लिखते हैं।''

''अरे हिन्दू चाहे किसी ज़बान में लिखें, हमें क्या फ़र्क पडता है। मगर तुम तो मुसलमान हो। अपनी ज़बान में लिखो।''

''मगर अम्मी मुझे तो उर्दू लिखनी नहीं आती है। हां पढ ज़रूर लेती हूं। हमारे हिन्दुस्तान में तो बहुत से मुसलमान सिर्फ़ तेलुगू, तमिल या मलयालम जानते हैं। वहां हर मुसलमान की ज़बान उर्दू नहीं है।''

''या अल्लाह! कैसी लडक़ी मिली है! नजमा ये बात तुम समझ लो अच्छी तरह कि उर्दू तो तुम्हें सीखनी ही पडेग़ी।''

नजमा की समस्या ये थी कि वह अपनी मर्ज़ी के विरूद्ध इमरान से विवाह करके पाकिस्तान रवाना कर दी गयी थी। ऐसे में अगर उसे थोड़ा अतिरिक्त प्यार मिल जाता या फिर उस की मनःस्थिति को समझने का प्रयास किया जाता तो वह अवश्य ही अपने ससुराल से हिलमिल जाती। लेकिन कसूर ससुराल का भी कहां था। पूरे परिवेश में खलनायक कोई नहीं था। बस स्थितियां ही ऐसी थीं कि नजमा के लिये उनमें पिसना उसकी विवशता थी।

अपनी भोली ग़लतियां करने से भी बाज़ नहीं आती थी नजमा। एक दिन ज़ुबेदा से पूछ ही तो लिया, ''जुबेदा, यहां कराची में होली कहां खेलते हैं? ''

'' होली! ये क्या होती है?''

'' यह एक त्यौहार होता है जिसमें सब एक दूसरे पर रंग डालते हैं।''

अम्मी ने सुन लिया, '' नजमा बेटी, तू काफ़िरों जैसी बातें क्यों करती है। रंग खेलना इस्लाम में हराम है मेरी बच्ची। मैं तो समझ भी लूंगी क्योंकि मैं भी हिन्दुस्तान की पैदायश हूं, अगर कहीं इमरान के कानों में ये बात पड ग़ई तो गज़ब हो जाएगा। अब तू शादी करके यहां आ गई है बेटी, अपने आपको यहां के रस्मो-रिवाज़ में ढाल मेरी बच्ची। तू भूल जा कि तू हिन्दुस्तान से यहां आयी है। अब तू इस घर की इज्ज़त है। इस इज्ज़त को बनाए रख बेटी। तेरी ज़िन्दगी अब इमरान है, होली नहीं।''

नजमा प्रयत्न भी करती कि इमरान के प्रति उसके मन में कोई कोमल तंतु जन्म ले ले। किन्तु इमरान का फ़ौजी अक्खडपन उस तंतु को जन्म लेने से पहले ही कुचल देता। उसे रत्ती भर फ़र्क नहीं पडता था कि नजमा क्या महसूस कर रही है। उसे तो अपनी भूख शांत करनी होती थी जो हो ही जाती थी। प्रकृति ने बनाए हैं नर और मादा शरीर और प्रकृति ने ही बनायी है वासना। सृष्टि ने उत्पत्ति के लिये ही वासना को जन्म दिया है। सभी जानवर उत्पत्ति के लिये संभोग भी करते हैं। इन्सान ने अपने आप को जानवरों से अलग करने के लिये प्रेम जैसी कोमल भावना का आविष्कार किया है। यदि प्रेम एवं वासना दोनों का समन्वय हो जाये तो जीवन के अर्थ ही बदल जाते हैं।

प्रकृति  ने अपना रंग यहां भी दिखाया और नजमा गर्भवती हो गई। रेहान के जन्म ने इमरान के अहम की तुष्टि तो की ही। नजमा की थोडी इज्ज़त भी बढवा दी। नजमा सोचती रह गयी कि अगर कहीं ग़ल्ती से भी बेटी पैदा हो जाती तो इमरान से क्या-क्या सुनने को मिलता। इमरान ख़ुश था कि पाकिस्तानी फ़ौज के लिये एक और सिपाही ने जन्म लिया है।

फ़ौजी स्कूलों में पढ  रहे रेहान के साथ भी नजमा के कोमल तन्तु नहीं जुड पा रहे थे। वह उसे अपने पुत्र से कहीं अधिक अपने पति का पुत्र ही लगता। उसके नाक नक्श भी इमरान पर ही गये थे। वैसे वह देख कर हैरान अवश्य होती कि कैसे प्रकृति एक छोटे से बालक में अपने पिता की शक्ल हूबहू डाल देती है।

समय बीतता रहा। बांग्लादेश युद्ध को लोग भूलने लगे थे। लेकिन इंदिरा गांधी का नाम आज भी वहां एक बला की तरह लिया जाता था। बांग्लादेश इमरान के मन में एक  नासूर बना बैठा था। वह हमेशा किसी ऐसे मौके की तलाश में रहता कि वह बांग्लादेश का बदला कश्मीर में ले सके। समय ने रेहान को भी बडा कर दिया। समय ने ही ऐसा भी किया कि रेहान के किसी भी और भाई या बहन ने जन्म नहीं लिया। इमरान और नजमा ने रेहान को अपनी अपनी ओर से बेहतरीन परवरिश देने का प्रयास भी किया। लेकिन इससे हासिल ये हुआ कि रेहान चकरा सा गया। दो लोग जिनकी सोच एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत थी, एक बच्चे को अपनी अपनी तरह से परवरिश देने का प्रयास कर रहे थे।

रेहान लंदन में पढाई कर रहा था। शादी के छब्बीस साल बाद भी नजमा और इमरान के बीच यदि किसी चीज़ की कमी थी तो वो थी विश्वास की। इमरान का नजमा पर अविश्वास का सीधा सीधा कारण था नजमा का हिन्दुस्तानियत से बाहर न आ पाना; हिन्दी भाषा का प्रयोग करना; होली में अतिरिक्त रूचि होना; उसकी स्कूल कॉलेज की सहेलियों की सूची में सभी नाम हिन्दू लडक़ियों के नाम होना और बार बार अपना तक़िया कलाम दोहराना कि हमारे हिन्दुस्तान में तो ऐसा होता है। वहीं नजमा के दिल में ये बात गहराई तक उतरी हुई है कि इमरान उसे कभी भी कहीं भी छोड सकता है। नजमा के दिल से इस घटना को हटा पाना लगभग असंभव है।

''बेगम साहिबा, अब तो आप भी कार चलाना सीख लीजिये। आप मोबाइल भी हो जाएंगी और कार चलाना तो एक अच्छी कला भी है।''

''आप क्यों तकलीफ़ करते हैं? हम किसी मोटर ड्राइविंग स्कूल से सीख लेंगे।''

''अरे बेगम, जब हम हैं तो स्कूल की क्या ज़रूरत! पूरे पाकिस्तान में हम से अच्छा उस्ताद आपको कहां मिलेगा?''

''देखिये मैं ग़लती करूंगी, तो आपको गुस्सा ज़रूर आयेगा। फिर आपका मूड ख़राब होगा। चलिये हम कहीं घूम आते हैं। हम कार चलाना ड्राइविंग स्कूल से ही सीख लेंगे।''

किन्तु इमरान हाशमी आज बहुत बढिया मूड में थे। नहीं माने। और हो गई कार की ट्रेनिंग शुरू।

''अरे बेगम ध्यान से। आप अगर क्लच दबाए बिना गेयर बदलेंगी तो सोचिये बेचारा गेयर क्या करेगा। टूट फूट जायेगा और नुक़सान होगा सो अलग।''

नुक़सान की चर्चा सुनते ही नजमा के दिमाग में तनाव बढ ग़या। ग़लतियां भी उसी हिसाब से बढने लगीं। बार बार इमरान का टोकना और व्यंग्य कसना। ''नजमा जी, आप गाडी सांप की मानिंद क्यों चला रही हैं? ऐ सड़क़ पर चलने वालो सब जा कर अपने घरों में दुबक कर बैठ जाओ आज हमारी बेगम सडक़ पर गाडी ले आईं हैं, जिस-जिस को अपनी जान प्यारी हो, भाग लो सर पर पांव रख कर।।''

नजमा ने एक बार फिर कहा कि बाकी ट्रेनिंग फिर कभी हो जाएगी। लेकिन इमरान कहां मानने वाला था। जब नजमा ने ग़लत मोड़ क़ी ओर मोड़ दी गाडी, तो इमरान फट पडा, ''बेगम हम अगर भैंस को भी कार चलाना सिखा रहे होते, तो वो भी अब तक बेसिक बातें सीख गई होती। आप तो कमाल करती हैं। आपके हिन्दुस्तान में लोग ऐसे ही कार चलाते हैं क्या?''

बस, अब बहुत हो चुका था, ''हम अब कार नहीं चलाएंगे।'' कह कर नजमा ने कार का दरवाज़ा खोला और कार से नीचे उतर गई। इमरान के अहम को ठेस लगी, ''अरे भाई अगर छोटी सी बात कह भी दी तो क्या फ़र्क पड़ ग़या?''

''हम ने कह दिया न, हमें कार चलानी नहीं सीखनी।''

''देखो नजमा, हम आख़री बार कह रहे हैं कि कार में बैठ जाओ और कार चलाओ, वर्ना हम से बुरा कोई न होगा।''

''हमारा फ़ैसला आख़री है। आप ड्राइविंग सीट पर आ जाइये।''

''अगर मैं ड्राइविंग सीट पर आ गया, तो आपके लिये अच्छा न होगा।''

इमरान ड्राइविंग सीट पर आये, कार स्टार्ट की और नजमा को घर से पांच मील दूर सुनसान सी सड़क पर अकेले छोड क़र कार आगे बढा दी।

नजमा सोचती रह गई कि ये हुआ क्या। वह अभी भी उम्मीद लगाए बैठी थी कि इमरान कार मोड़ क़र वापिस लायेंगे और उसे मना कर ले जाएंगे। लेकिन इमरान नहीं आये। नजमा वहीं सडक़ किनारे बैठ कर खूब रोयी। अल्लाह से ले कर संकटमोचन तक सभी को शिकायत भरे लहजे में याद किया। फिर हारी हुई खिलाड़ी क़ी तरह, अपनी बेइज्ज़ती की पोटली को साथ बांधे, फटफटिया आटो रिक्शॉ पर घर पहुंची। वहां ज़ुबेदा ने बताया, ''भाभी जान, भैया तो क्लब चले गये हैं। रात का खाना वहीं खा कर आयेंगे।'' नजमा ने उस रात कुछ नहीं खाया। उसे एक बात का विश्वास हो चुका था कि यह इन्सान उसे ज़िन्दगी के किसी भी मोड पर अकेला छोड क़र जा सकता है। विश्वास के काबिल नहीं है इमरान।

आजकल नजमा अपनी कविताओं की पेंटिंग बना रही थी। अपनी कविता को कैनवस पर उतारने का उसका शौक उसे एक ही थीम को दो कलाओं के माध्यम से पेश करने का मौका देता था। पाकिस्तान में राजनीतिक माहौल गरमा रहा था। कारगिल की तैयारियों में कर्नल इमरान हाशमी की भूमिका बहुत अहम थी। इमरान ने कभी नजमा को कारगिल के बारे में कोई सूचना नहीं दी।

कारगिल युध्द शुरू हो गया। सभी फ़ौजी सरहद पर निकल गये थे। मुहल्ले में बस औरतें ही दिखाई देती थीं। शहर में कब्रिस्तान का सा सन्नाटा महसूस होने लगा था। वैसे यह युद्द भी एक अजीब सा युद्ध था। दोनों देश लड़ भी रहे थे और पाकिस्तान कहे भी जा रहा था कि उनका देश युद्ध में किसी तरह से नहीं जुड़ा हुआ है। दोनों ओर से लोग मारे जा रहे थे।  बहुत से पाकिस्तानी सैनिक भी शहीद हुए। किन्तु राजनीतिक कारणों से पाकिस्तानी सरकार ने उन शवों को पहचानने या स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। उन शवों में से एक शव कर्नल इमरान हाशमी का भी था। इमरान को कहां पता था कि उसका अंतिम सरकार हिन्दुस्तान की थल सेना करेगी और वो भी भारत की धर्ती पर। उसका परिवार उसके शरीर के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पायेगा।

इमरान की मौत के बाद नजमा पाकिस्तान में नितांत अकेली पड ग़ई। अम्मी तो जन्नत के लिये कब की रवाना हो चुकी थीं। दोनों ननदें भी अपने अपने घरों वाली थीं। नजमा को कराची कभी अपना घर लगा ही नहीं था और पाकिस्तान सरकार ने इमरान की मौत को कोई महत्व ही नहीं दिया था। कोई मरणोपरांतर्  पदक तक नहीं। कोई ज़मीन या वज़ीफ़ा नहीं। राजनीति की शिकार नजमा ने भारत जाने का फ़ैसला किया। अपने हिन्दुस्तान जा कर देखना चाहती थी कि वहां क्या कुछ बदला है।

लेकिन अब उसे भारत जाने के लिये वीज़ा लेना पडेग़ा। जिस देश की ख़ातिर वह कभी पाकिस्तानी नहीं हो पायी, आज वहीं जाने के लिये वीज़ा लेना होगा। इमरान की अच्छी जान पहचान थी, उसकी बेवा होने का एक लाभ तो था कि काम हो जाते थे। यह भी हो गया। किन्तु फिलहाल तो दोनो देशों में उडानों पर ही प्रतिबंध लगा हुआ था। नजमा पहले अपने पुत्र रेहान को मिलने लंदन गई, और वहां से ब्रिटिश एअरवेज़ से दिल्ली।  बडी भाभी और उनके बच्चे नजमा को लेने आये थे।

दिल्ली से बुलंदशहर का सफ़र उसकी रगों में रक्त का बहाव बहुत तेज़ करता गया। सोच सोच कर परेशान थी कि क्या चंदर आज भी वहां रहता होगा, क्या डाक्टर बन गया होगा, क्या उसे याद करता होगा? फिर मन ही मन मुस्कुरा भी रही थी। कितनी बेवक़ूफ है वो, भला चंदर ने क्या अपना जीवन नहीं जीना था। उसकी भी शादी हुई होगी, उसके भी बच्चे होंगे। कितना मज़ा आयेगा चंदर के बच्चों को देखकर। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा होता, तो वो बच्चे उसके अपने होते! इस उम्र में भी उसके गाल लाल हो आये थे।

बडे भाई के घर जाने से पहले तो वह दिल्ली को पहचानने का प्रयास कर रही थी। एअरपोर्ट इतना बडा और माडर्न हो गया था। रास्ते में चौडी सडक़ें, फ्लाइ ओवर, और सभी माडर्न कारें। जब भारत छोड क़र गई थी तो बस एम्बेसेडर और प्रीमियर कारें ही तो होती थीं। क्या चंदर के पास भी अपनी कार होगी। अगर डाक्टर बन गया होगा तो ज़रूर होगी। चित्रा उसे देख कर क्या करेगी। बच्चे अपने फूफी को देख कर ख़ुश थे मगर पहली बार मिलने वाली झिझक ज़रूर थी। भाभी जान इमरान के बारे में बातें कर रही थीं। रेहान की पढाई, नौकरी और शादी। भला भाभी से चंदर के बारे में कैसे पूछे। भाभी ने बताया कि चित्रा ने तो वहीं एक वकील से शादी कर ली थी। उसके तीन बच्चे हैं - एक बेटी और दो बेटे। इंदु शादी कर के लखनऊ चली गई थी। कमला से कोई संपर्क रहा नहीं था। चित्रा से मिलने को बेताब थी नजमा। क्या उसे पहचान लेगी? अगर पहचान गई तो कैसे व्यवहार करेगी?

घर आ पहुंचा। भाई जान से मुलाकात हुई। दुआ सलाम। औपचारिक बातें। छब्बीस साल पुरानी कडवाहट को दोनों ही भुला देना चाहते हैं। बहन के जुर्म के लिये उसे देश निकाला देने के बाद मुलाकात के अवसर बने ही नहीं। आठ भाई-बहनों में सबसे छोटी नजमा के बाद घर में कोई दूसरी शादी भी तो नहीं होनी थी, जिसके लिये नजमा आने का प्रयास करती। अम्मी और अब्बा के इंतकाल का दुख भी उसने पाकिस्तान में अकेले ही सह लिया था। वह एक ओर पाकिस्तान में अपने अकेलेपन से लड़ी, अपने वतन की याद में तडपी, वहीं वह यह भी नहीं भूली थी कि उसे कराची एक सज़ा के तौर पर भेजा गया था। इमरान उसकी सज़ा था, इनाम नहीं। छब्बीस साल की क़ैद हुई थी उसे, बामुश्शक्त। जेल से छूट कर घर आई थी नजमा। आज सज़ा देने वाले भी इस दुनिया में नहीं थे और सज़ा भी।

घर में भी बडे भाई के रूतबे के साथ-साथ बहुत से परिवर्तन भी महसूस किये नजमा ने। बुलंदशहर में भी अब दिल्ली की सुविधाएं आ पहुंची थीं। सब कुछ देखते हुए भी नजमा का दिल किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था। चित्रा का पता मालूम नहीं था - न उसे और न ही भाभी जान को। चित्रा के मायके जाना होगा। पता नहीं वहां कौन होगा। बिखरे हुए धागों को समेटना भी तो आसान काम नहीं होता। धागे उलझते जाते हैं - गांठें नहीं खुल पाती हैं।

दो दिन के बाद चित्रा का पता लग पाया। और चित्रा तो नजमा को देख कर जैसे पगला सी गई। भूल गई कि तीन बच्चों की मां है। समय जैसे थम सा गया था। दोनो सहेलियों में जम के बातें हुईं। दोनों ने मिल कर भोजन बनाया। नजमा ने चित्रा को आश्चर्यचकित कर दिया, ''क्या कहा, तुम शाकाहारी हो गई हो ! यह चमत्कार कैसे हो गया ?''

''वहां कराची में सब गाय का मीट खाते थे। हमने तो ज़िन्दगी में कभी नहीं खाया था। जब मना किया तो हम पर हिन्दू होने का इल्ज़ाम लगा दिया। हमने फ़ैसला कर लिया कि हम मीट खाना ही बंद कर देंगे। हम ने घास-फूस खाना शुरू कर दिया। अब तो यही खाना अच्छा लगता है। पहले पहले अम्मी के हाथ के गोश्त की याद आती थी मगर अब तो सब पुरानी बातें हो गईं। वहां कराची में तो लोग हमें हिन्दू ही कहने लगे थे।''

''कितने साल बीत गये न? यहां की याद तो खूब आती होगी ? हम सहेलियां भी बिछड ग़यीं। कोई लखनऊ में है तो कोई दिल्ली में। कांता तो मुंबई चली गई है। और सुरेखा को अमरीका वाला आ कर ले गया। पहले पहले तुम्हारे बारे में खूब बातें करते थे फिर आहिस्ता-आहिस्ता सब के काम बढते गये और नजमा रानी पीछे छूटती गईं। न तो चित्रा ने चंदर के बारे में कोई बात छेड़ी और न ही नजमा ने कुछ पूछा।

भाईजान के घर जल्दी ही नजमा बच्चों के साथ घुल मिल गई। बच्चे रेहान के बारे में बातें करते। उसके लंदन में रह कर पढने से वे खासे प्रभावित लग रहे थे। नजमा के शाकाहारी हो जाने से भाभी जान को भोजन का मीनू बनाने में खासी परेशानी हो रही थी। बच्चों के लिये गोश्त बनाने के साथ साथ अब सब्ज़ी और दाल भी बनानी होती। दो-तीन दिन बस ऐसी ही बातें होती रहीं, जिनके न होने से नजमा को कोई फ़र्क नहीं पडता। क्ई बार तो नजमा बिना ठीक से सुने ही जवाब दे देती। उम्र के इस पडाव पर भी किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने की चाह कितनी प्रबल हो सकती है जिसके हवाले कभी अपना जीवन कर देना चाहा था।

अगले सप्ताह एक बार फिर होली है। नजमा के दिल में अपनी आख़री होली की याद अचानक ताज़ा होने लगी है। कराची की घुटन के बाद अचानक एक और होली की खुली ख़ुश्बू! कैसी होगी अगले सप्ताह की होली?  क्या उसके भतीजा-भतीजी भी होली खेलते होंगे ? अचानक नजमा को लगा कि किसी ने उसके चेहरे पर गुलाल लगा दिया है। उसका चेहरा आज फिर ठीक वैसे ही लाल हो गया, जैसे छब्बीस साल पहले हुआ था। बस आज उसे देखने के लिये दुर्गा मासी ज़िन्दा नहीं थी।
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1 comments :

  1. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-04-2015) को "अरमान एक हँसी सौ अफ़साने" {चर्चा - 1943} पर भी होगी!
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    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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