हिन्दी में प्रतिरोध कविता की लम्बी परपरा रही है


हत्या से आत्म हत्या तक — विमल कुमार का नया कविता संग्रह

हत्या से आत्महत्या तक — विमल कुमार का नया कविता संग्रह 

सोलह मई केवल एक तारीखभर नहीं है देश के इतिहास में बल्कि वह एक ऐसी लकीर है जो भारतीय राजनीति के अँधेरे को बयाँ करती है जबकि भारतीय समाज मीडिया और लेखकों का एक वर्ग इसे नयी रौशनी के रूप में भी देख रहा है . यही कारण है कि सच के लिए लडाई और कठिन हो गयी है . कलबुर्गी , पंसारे धभोलकर जैसे लोग मारे गए और देश में असहिष्णुता के विरोध में लेखकों कलाकारों की पुरस्कार वापसी का एक ऐतिहासिक सिलसिला शुरू हुआ . आज भले ही यह सिलसिला थम गया है लेकिन अब देश के छात्र यह लडाई लड़ रही है और भीतर ही भीतर यह आग धधक रही है . रोहित वेमुला की आत्महत्या इसी जलती हुई भीतर की आग की आंच एक प्रतीक है . हिन्दी के कवियों ने इस आंच को कविता रूप देने की कोशिश की है . वरिष्ट कवि विमल कुमार ने अपने नए काव्य संग्रह हत्या से आत्महत्या तक में इस आंच को कविता में उतरने की कोशिश की है . वे संभवतः पहले कवि हैं जिन्होंने लगातार फेसबुक पर सीधे ये कवितायेँ लिखी और सोलह मई २०१४ के बाद लिखी गयी कविताओं को अपनी वाल पर पोस्ट करने का जो सिलसिला शुरू किया वह अब भी जारी है . इस तरह दो साल पूरे हो गए और उनकी इन कविताओं का यह संग्रह आपके सामने है . दो साल मोदी सरकार के भी हो गए . इन दो सालों में झूठ का लगातार प्रचार किया गया . विमल कुमार ने अपनी इन कविताओं में इस झूठ को बेनकाब किया है . ये कवितायेँ केवल मोदी के खिलाफ नहीं बल्कि उन प्रवृतियों के खिलाफ है जिसकी एक झलक इंदिरा जी में भी नज़र आयी थी और इसकी थोड़ी झलक केजरीवाल जी में भी दिखाई पड़ती है यद्यपि ये तीनो तीन तरह की राजनीतिक सोच वाले हैं. विमल कुमार ने अपने पांचवें कविता संग्रह में सीधी मुठभेड़ का रास्ता और जोखिम उठाया है . शायद उन्हें संसद में एक पत्रकार के रूप में इस राजनीति के अँधेरे की भयावहता को करीब से देखने का मौका मिला है . हिन्दी में निराला, नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और धूमिल ने राजनीतिक ताने बाने के अंतर्विरोधों को तीखे ढंग से उजागर किया है . बाद में अलोक धन्वा, राजेश जोशी, गोरख पाण्डेय, मनमोहन, वीरेन डंगवाल, विष्णु नागर, मंगलेश, देवीप्रसाद मिश्र और कुमार अम्बुज ने इस परम्परा को आगे बढाया है . विमल कुमार ने इस परम्परा को पुख्ता बनाते हुए इन कविताओं में . अपनी बात प्रखर ढंग से कही है .उनका कहना है कि अब हर जगह नए भेडिये और निर्वाचित हत्यारे सामने आ गए है और हत्यारों को हत्यारा कहना मुश्किल हो गया है . सेल्फी युग के नायक ही वास्तविक नायक हैं और सब कुछ इवेंट में बदल गया है राजनीति की एक पैकेजिंग होने लगी है .

vimal kumar

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1 comments :

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (20-05-2016) को "राजशाही से लोकतंत्र तक" (चर्चा अंक-2348) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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