कहानी — इहे बम्बई नगरिया तू देख बबुआ — जितेन्द्र श्रीवास्तव


वाह जितेन्द्र जी वाह, क्या ख़ूब मनभावन भाषा में कहानी कही है आपने. रागदरबारी याद आ गया. बड़े दिनों बाद आराम-से, लुत्फ़ उठाते हुए पढ़ने वाली कहानी मिली... आपकी कविताओं का प्रशंसक तो पहले-से था अब कहानी का भी बन गया लेकिन कविवर कहानियां और लिखें... बड़ी आवश्यकता है हिंदी को आपकी भाषा शैली की. फिलहाल अगली कहानी तक के लिए संजीदा कहानी "इहे बम्बई नगरिया तू देख बबुआ" के लिए बधाई स्वीकारें.

भरत तिवारी

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इहे बम्बई नगरिया तू देख बबुआ...

— जितेन्द्र श्रीवास्तव

इहे बम्बई नगरिया तू देख बबुआ...


वे अस्सी के ठीक बाद वाले वर्ष थे। गाँव में साँझ ढलते ही खाना­पीना हो जाता था। लोग जल्दी­जल्दी खा­पीकर सो जाते थे। लगता जैसे वे दुनिया जहान की चिन्ताओं से विमुख हैं। कुछ­कुछ होते भी थे। उनके अपने दुःख का रंग ही इतना गाढ़ा था कि हर रंग फीका लगता था। बिजली अभी बहुत से गाँवों से बहुत दूर थी। ये वही दिन थे जब गाँवों में शादी के अवसर पर आने वाली नाच में नौटंकी शैली के नाटक होते थे। वह मनोरंजन की भूख थी या कुछ और, कहना मुश्किल है लेकिन लोगों में उनका गजब आकर्षण था। हालांकि गाँवों का भद्र समाज ऐसे मनोरंजन से दूर ही रहता था।

नौटंकी रात भर चलती। रात भर लोक संगीत की नदी बहती और उसमें फिल्मी गीतों की छोटी­छोटी धाराएं आकर गिरती रहतीं - कभी स्वाद को चटक बना देतीं तो कभी तिक्त भी। लोग रात भर चलने वाली ऐसे नाचों के दर्शकों को ’नचदेखवा’ कहते थे। ’नचदेखवे’ नाच के बाद के दिनों में नाटक की कहानी पर घंटों बतियाते थे। लगता जैसे रस अभी भी आत्मा में कहीं टपक रहा हो। कहना मुश्किल है कि बाबू सत्येन्द्र सिंह में नाच के प्रति आकर्षण ऐसी ही ’नचदेखवा पार्टी’ की कहानियों को सुनकर हुआ या भीतर ही कोई और राग बज रहा था। लेकिन जब उन्होंने एक बार तय कर लिया तो कर लिया। मजाल कि गाँव में आई किसी नाच पार्टी का कोई ’खेला’ उनसे छूटा हो। रसूखदार पिता की इकलौती संतान थे वे। उनकी बिरादरी के कुछ हमव्यस्क ही उनके यार­दोस्त थे। रात में खा­पीकर जब सब लोग सो जाते, सत्येन्द्र सिंह धीरे से छत के पीछे बाँस की सीढ़ी लगाकर उतर जाते और वहीं उनके हमशगल उनका इंतजार करते मिलते। पहले कुछ काना­फूसी होती फिर दबे कदमों से वे सब वर्जित फल चखने के लिए यात्रा पर निकल पड़ते। उस समय उनके चेहरों पर डर और विजय के सम्मिलित भाव होते थे। जैसे ही इलाका पार होता वे तेज कदमों से चलने लगते और पाण्डाल में पहुँचने से पहले चादर से चेहरा ढंक लेते कि कोई पहचान न ले और खबर पिता तक न पहुँचे। लेकिन वे बहुत दिनों तक छिपा न पाए। बात उड़ते­उड़ते पिता तक पहुँच ही गई। पिता को बहुत क्रोध आया। क्रोध के पीछे उनकी हताशा भी थी। बेटे को लेकर बड़े­बड़े सपने थे। कम से कम उसे डिप्टी कलक्टर तो बनाना ही चाहते थे वे।




सत्येन्द्र भी पढ़ने में कुछ­कुछ होशियार ही थे। बेटे को पथभ्रष्ट होता देख पिता विचलित हो गए। उन्होंने उसे जी भर पीटा। उनकी पत्नी गुहार लगाती रहीं - अब बेटे को जान से ही मार देंगे क्या? लेकिन क्रोध और अवसाद की मिश्रित मानसिक स्थिति में उन्हें कुछ भी सूझ नहीं रहा था। थक­हार कर ही उन्होंने मारना बंद किया। अगले दिन से नया नियम लागू हुआ। सत्येन्द्र की रात्रिकालीन चौकीदारी शुरू हुई। अब उनका घर से निकलना मुश्किल हो गया था। पता लगता कि गाँव में नाच आई है लेकिन वे जा नहीं पाते। जैसे नशेड़ियों की हालत होती है, बिल्कुल वैसी ही दशा थी उनकी। भीतर ही भीतर आत्मा छटपटा कर रह जाती। उठती हुई उम्र थी इसलिए कभी­कभी आक्रोश में भी आते थे सत्येन्द्र बाबू। पिता की अनुपस्थिति में माँ पर चिल्लाते “बच्चा नहीं हूँ मैं। इण्टर में पढ़ता हूँ। रिजल्ट भी अब तक बहुत अच्छा है। क्या हुआ जो मित्रों के साथ थोड़ा मनोरंजन कर लेता हूँ तो!” माँ समझाती - “बेटा, तुम्हारे लिए ही तुम्हारे बाबूजी परेशान हैं? पढ़­लिख लोगे तो तुम्हारा ही भाग्य चमकेगा। नाच­नौटंकी तब देखोगे तो कोई न रोकेगा। बाबूजी तुम्हारे दुश्मन थोड़े हैं।”

सत्येन्द्र बाबू झल्लाकर रह जाते। उन्हें लगता कि वे कैद हैं। पिता नाटकों में देखे खलपात्र की तरह लगते थे। बेचैनी के उन्हीं दिनों में बदलाव की एक बयार चली। अब लोग शादी या अन्य उत्सवों में नाच के बदले “विडियो” लाने लगे। एकदम नई चीज। तब तक टेलीविजन नहीं देखा था सत्येन्द्र सिंह ने। उनके पिता टेलीविजन खरीद सकते थे लेकिन उन्हें भय था कि टेलीविजन का नाच­गाना देखकर उनका बेटा बिगड़ जाएगा। गाँव में आने वाले विडियो का बखान करते हुए दोस्तों ने बताया कि विडियो पर फिल्म चलती है - अमिताभ बच्चन और रेखा की और कई­कई दूसरे हीरो­हीरोइनों की भी। जेनरेटर से चलता है विडियो और भैया मजा तो पूछो ही मत!’


जितेन्द्र श्रीवास्तव

जन्म: उ.प्र. के देवरिया जिले की रुद्रपुर तहसील के एक गाँव सिलहटा में।
शिक्षा: बी.ए. तक की पढ़ाई गाँव और गोरखपुर में। जे.एन.यू., नई दिल्ली से हिन्दी साहित्य में एम.ए., एम.फिल और पी-एच.डी.। एम.ए. और एम.फिल. में प्रथम स्थान।
प्रकाशित कृतियाँ:
कविता: इन दिनों हालचाल, अनभै कथा, असुन्दर सुन्दर, बिल्कुल तुम्हारी तरह, कायान्तरण।
हिन्दी के साथ-साथ भोजपुरी में भी लेखन-प्रकाशन। कुछ कविताएं अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उड़िया और पंजाबी में अनूदित। लम्बी कविता सोनचिरई की कई नाट्य प्रस्तुतियाँ।
आलोचना: भारतीय समाज, राष्ट्रवाद और प्रेमचंद, शब्दों में समय, आलोचना का मानुष-मर्म, सर्जक का स्वप्न, विचारधारा, नए विमर्श और समकालीन कविता, उपन्यास की परिधि।
संपादन: प्रेमचंद: स्त्री जीवन की कहानियाँ, प्रेमचंद: दलित जीवन की कहानियाँ, प्रेमचंद: स्त्री और दलित विषयक विचार, प्रेमचंद: हिन्दू-मुस्लिम एकता संबंधी कहानियाँ और विचार, प्रेमचंद: किसान जीवन की कहानियाँ, प्रेमचंद: स्वाधीनता आन्दोलन की कहानियाँ, कहानियाँ रिश्तों की (परिवार)।
भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से प्रकाशित गोदान, रंगभूमि और ध्रुवस्वामिनी की भूमिकाएँ लिखी हैं।
प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘उम्मीद’ का संपादन।
पुरस्कार-सम्मान: कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल सम्मान और आलोचना के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान सहित हिन्दी अकादमी दिल्ली का ‘कृति सम्मान’, उ.प्र. हिन्दी संस्थान का ‘रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार’, उ. प्र. हिन्दी संस्थान का ‘विजयदेव नारायण साही पुरस्कार’, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का युवा पुरस्कार, डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान और परम्परा ऋतुराज सम्मान।
जीविका: अध्यापन। कार्यक्षेत्र पहाड़, गाँव और अब महानगर। राजकीय महाविद्यालय बलुवाकोट, धारचूला (पिथौरागढ़), राजकीय महिला महाविद्यालय, झाँसी और आचार्य नरेन्द्रदेव किसान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बभनान, गोण्डा (उ.प्र.) में अध्यापन के पश्चात इन दिनों इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के मानविकी विद्यापीठ में अध्यापन ।

सम्पर्क: हिन्दी संकाय, मानविकी विद्यापीठ, ब्लॉक-एफ, इग्नू, मैदान गढ़ी, नई दिल्ली-68,
मोबाइल नं.: 9818913798।
ई-मेल:  jitendra82003@gmail.com



यह खबर सुनने के बाद अपने पर काबू रखना आसान न था। नौटंकी की बात और थी। अब तो अमिताभ और धमेंन्द्र की बात थी। हीरोइनों के नाच की बात थी। सत्येन्द्र सिंह ने सिर्फ इनके बारे में सुना और अखबारों में पढ़ा भर था। अब देखने की कोई न कोई जुगत तो लगानी ही थी और यह महज संयोग था कि जुगत लग गई और इसके लिए उन्हें माँ को मनाने के अलावा कुछ और नहीं करना पड़ा। हुआ यह कि पिता कुछ दिनों के लिए वैष्णों देवी के दर्शन के लिए गए और इसी बीच दो दिनों के लिए गाँव में एक शादी में विडियो भी आया। माँ को किसी तरह खुश कर जब सत्येन्द्र विडियो देखने पहुँचे तो किसी विजेता से कम नहीं लग रहे थे। दिल उछल रहा था। आखिर जीवन में पहली बार फिल्म देखने जा रहे थे वे। पैरों में अजीब सी सनसनाहट थी जो “राम तेरी गंगा मैली” की नायिका मंदाकिनी को देखकर और बढ़ गई थी।

रेडियो पर राजकपूर का नाम सुना था। अब उनकी बनाई फिल्म देखकर सत्येन्द्र सिंह किसी और ही लोक में पहुँच गए। पल भर के लिए उन्होंने फिल्म के नायक की जगह अपने को रखकर भी देखा। मंदाकिनी के साथ हिमालय की वादियों में एक गीत भी गाया और अचानक तय किया कि उन्हें “डिप्टी कलक्टर” नहीं “हीरो” बनना है और मंदाकिनी के साथ फिल्म में काम करना है। उस पल वे अपनी और मंदाकिनी की उम्र के अंतर को भी भूले रहे। उन्हें मंदाकिनी कहानियों में सुनी अप्सरा की तरह लगी थी और वे जानते थे कि अप्सराएं बूढ़ी नहीं होतीं।

सत्येन्द्र सिंह मंदाकिनी की नींद सोने और जागने लगे। पिता वैष्णों देवी का दर्शन कर लौट आए। उन्हें बेटे के ’विडियो दर्शन’ का समाचार भी मिल ही गया लेकिन इस बार वे चुप रहे। उन्होंने बेटे से बोलना बंद कर दिया। जो बेटा फिल्म देखने लगे, ऐसे कुलच्छन बेटे से क्या बोलना! वे बेटे को देखते तो मुँह दूसरी ओर कर लेते। बेटे को लगता कि पिता बहुत पिछड़े हैं। लोग चाँद पर जा रहे हैं और पिता फिल्म देखने को अपराध समझ रहे हैं। सत्येन्द्र सिंह को यह सोचकर झुरझुरी उठी कि तब क्या होगा जब वे फिल्मों में हीरो हो जाएंगे! क्या तब भी पिता उनकी फिल्म न देखेंगे! लेकिन यह सोचते­सोचते वे अचानक लजा गए। आखिर पिता उनको मंदाकिनी के साथ नृत्य करते कैसे देखेंगे! एक पल के लिए सत्येन्द्र को लगा जैसे मंदाकिनी उनके पिता की पुत्रवधू हो और यह सोचते हुए लाज से उनका चेहरा रक्तिम हो उठा।

धीरे­धीरे कुछ समय बीता। इण्टर की परीक्षा में सत्येन्द्र सिंह प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए । पिता को लगा कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। भीतर ही भीतर पिता को बेटे पर गर्व हुआ। माँ ने भी बेटे का पक्ष लेते हुए उन्हें सुना ही दिया - “बेटे को आवारा कहते थे। आवारा कहीं अव्वल आते हैं। अपना बेटा अव्वल आया है।” पिता ने इस प्रेम में डूबे व्यंग्य पर कोई शाब्दिक प्रतिक्रिया न दी। बस हँसकर चुप हो गए। मूँछ पर ताव देकर गाँव में एक चक्कर लगाया। दरवाजे पर जो आया, उसे मिठाई खाए बिना जाने न दिया। बेटे को बुलाकर गले लगाया और समझाते हुए कहा - अब गोरखपुर में पढ़ना है। वहां बहुत से आकर्षण हैं। कई­कई सिनेमा हाल हैं लेकिन तुम्हें खानदान की मर्यादा को बचाते हुए बस पढ़ना है। कलक्टरी की परीक्षा न पास कर पाओ, कोई बात नहीं, डिप्टी कलक्टर तो बनना ही बनना है। तुम मेरी इकलौती आशा हो।

बाबू सत्येन्द्र सिंह ने पिता को भरोसा दिलाया और एडमिशन के बाद गोरखपुर आ गए। गोरखपुर उनके लिए महज शहर नहीं था, बहुत बड़ा शहर था। गाँव में लोग कहते थे कि वहां रात और दिन के अंतर का पता ही नहीं चलता है। रात भी एकदम उज्जर होती है - बगुले की तरह। बिजली तो जाती ही नहीं। वहाँ लड़कियाँ सायकिल चलाती हैं। यह जो बलेसर यादव ने गाया है, ऐसे ही थोड़े गा दिया है - “जबसे लड़की लोग सायकिल चलावे लगली, तबसे लइकन क रफ्तार कम हो गइल।” ये बातें लोग सत्येन्द्र सिंह के पिता को भी सुनाते। जाहिर है कि इसके पीछे मजा लेने की मंशा होती थी। सत्येन्द्र बाबू के पिता लोगों के सामने ऐसी बातों को हँसी में उड़ा देते लेकिन भीतर ही भीतर विचलित भी होते थे - “कहीं बचवा बिगड़ न जाए”। लेकिन फिर मन को समझाते कि पढ़ने के लिए जाना तो पड़ेगा ही। आखिर घर बैठे तो डिप्टी कलक्टरी मिलेगी नहीं।

तो अन्ततः सत्येन्द्र सिंह शहर आ ही गए। पिता की आँखों में अफसरी थी और बेटे की आँखों में बम्बई। लगे हाथ बता दूँ कि आज की मुम्बई तब बम्बई ही थी और ’लाउड स्पीकर’ पर उन दिनों अक्सर अमिताभ बच्चन की एक फिल्म का मशहूर गीत - ’इहे बम्बई नगरिया तू देख बबुआ’ बजा करता था। सत्येन्द्र सिंह ने जिस दिन तय किया कि उन्हें बम्बई जाना है और किसी भी शर्त पर मंदाकिनी का हीरो बनना ही बनना है उसी दिन से इस गीत को मंत्र की तरह जपने लगे थे। गला ऐसा कि जब गाएं तो राग गर्धब ही निकले। हाँ, चेहरा­मोहरा ठीक­ठाक था। कुल मिलाकर चिकने थे सत्येन्द्र बाबू और यह भी संयोग ही था कि उन दिनों बम्बई की हवा बदल रही थी। एंग्री यंगमैन ढलान पर था और कुछ चिकने हीरो इंडस्ट्री में अपनी जगह बना रहे थे। इन घटनाओं ने उन्नीस वर्षीय सत्येन्द्र सिंह की कल्पना को पंख लगा दिए। उन्होंने बहुत रोमांच के साथ गोरखपुर की धरती पर कदम रखा जैसे चाँद पर उतरे हों। मन लहालोट था। वे अपने गाँव के पहले विद्यार्थी थे जिसने प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल और इण्टर पास किया था और गोरखपुर पढ़ने आया था। आपको हँसी आ रही होगी कि दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, चेन्नई और बंगलौर जैसे शहरों वाले देश में गोरखपुर जैसे छोटे शहर को लेकर इतना उत्साह बेवकूफी ही है लेकिन कभी सोचिएगा उन लोगों के बारे में जिन्हें आज से लगभग तीस वर्ष पहले मिट्टी का तेल भी बहुत मुश्किल से मिलता था। सत्येन्द्र सम्पन्न परिवार से थे लेकिन उनकी सम्पन्नता भी देर रात तक लालटेन जलाने और थोड़ा अच्छा खाने­पहनने से अधिक न थी। अब जमींदारी न थी, बस रसूख कायम था। सत्येन्द्र को भी इसका फायदा मिलता था लेकिन गाँव तो गाँव ही था। आजादी के लगभग चालीस साल बीत जाने के बाद भी अंधेरा ही गाँव की पहचान था। ऐसे परिवेश से आए सत्येन्द्र गोरखपुर में चौंधिया गए तो क्या अचरज! वैसे छोड़िए इन बातों को! कहानी किसी और दिशा में चली जाएगी। गोरखपुर आने के बाद सत्येन्द्र सिंह को जिस बात ने सबसे ज्यादा राहत दी, उसे सुनकर आप फिर हँसेंगे। हुआ यह कि जिस कॉलेज में उन्हें दाखिला मिला, उससे कुछ ही दूरी पर शहर का सबसे प्रतिष्ठित सिनेमा घर था। यह वही सिनेमाघर था जिसमें “गाँधी” फिल्म पूरे एक वर्ष चली थी। इसी सिनेमाघर में उन्होंने बड़े पर्दे पर पहली फिल्म देखी – “नगीना”। श्रीदेवी को भी पहली बार देखा। नागिन बनी श्रीदेवी गा रही थी - ’तूने बेचैन इतना ज़ियादा किया, मैं तेरी हो गई मैंने वादा किया।’ सत्येन्द्र सिंह फिर दूसरी दुनिया में चले गए। श्रीदेवी को परेशान करते खलनायक अमरीशपुरी को देखकर उनकी भुजाएं फड़क उठीं। आवेश में वे चिल्ला उठे - ’बुड्ढे जान से हाथ धो बैठेगा।’ लोग हड़बड़ाकर उनकी ओर देखने लगे। लोगों को अपनी ओर देखता देख सत्येन्द्र को अपनी स्थिति का बोध हुआ और वे चुपचाप वहाँ से खिसक लिए। मन मसोस कर रह गए कि जाहिलों के नाते पूरी फिल्म भी नहीं देख पाए।

अब उनके सपनों में मंदाकिनी पीछे छूट रही थी और श्रीदेवी उनकी चेतना पर छाने लगी थी। उन्हीं दिनों उन्होंने शहर के सोलह टाकिजों में से एक “वीनस” में “हिम्मतवाला” और एक दूसरे टाकिज “झंकार” में “मिस्टर इंडिया” देखी। इन फिल्मों को देखने के बाद उन्हें लगा कि श्रीदेवी उनके रक्त में समा गई है। उन्हें अपनी धमनियों में अजीब सा महसूस होता। अखबारों से लेकर दुकानों तक उन्हें श्रीदेवी की जो भी तस्वीरें मिलीं, उन्हें उन्होंने इकट्ठा किया। मन में आया कि दीवारों पर सजा दें लेकिन पिता के ख्याल ने उनकी इच्छाओं पर पानी फेर दिया। फिर भी कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही था। आखिर सुबह उठते ही श्रीदेवी की तस्वीर न देख पाने की स्थिति में पूरे दिन को खराब हो जाना था और बेचैन मन की और बेचैनी कैसे सही जाती! बहुत सेाच­विचार कर उन्होंने अपने सर्टिफिकेट वाली अटैची में वह सुरक्षित जगह निकाली, जहाँ श्रीदेवी चिंतामुक्त रह सकती थीं और सुबह­सबेरे वे नयनों को शीतलता दे सकते थे। ऐसी व्यवस्था कर वे मन ही मन प्रसन्न हुए । कॉलेज वे नियमित जाते लेकिन शहर के किसी भी चित्रमंदिर में यदि श्रीदेवी की फिल्म लग जाए तो वे पहले शो में जरूर पहुँचते थे।

सपनों में श्रीदेवी के साथ लुका­छिपी खेलते सत्येन्द्र पढ़ाई में भी मन लगाने की कोशिश करते लेकिन बात बन नहीं पा रही थी। हाँ, उनके व्यक्तित्व की चमक का एक लाभ यह जरूर हुआ था कि कॉलेज में उनके ढेर सारे चाहने वाले बन गए थे लेकिन मित्रता के लिए उन्होंने विवेक मौर्य और रमेश राय को ही चुना था। वे उन्हीं के साथ दोपहर का खाना खाते और कभी­कभी फिल्म भी देखते थे। विवेक के पिता पी.डब्लू.डी. में इंजीनियर थे जबकि रमेश के पिता बिहार के गोपालगंज में खेती­बाड़ी करते थे। रमेश अपने मामा के पास रहता था जो रेलवे में क्लर्क थे। विवेक और रमेश इंजीनियर बनना चाहते थे। बी.ए. करते हुए वे अपनी तैयारी को जारी रखे हुए थे। कुछ दिन इसी प्रकार पढ़ते­रगड़ते बीते कि सत्येन्द्र बाबू की मुलाकात भावेश से हो गई। भावेश रंगमंच का कलाकार था और फिल्मों का रसिया। हुआ यह कि एक दिन जूनियर इंस्टीट्यूट के पास से गुजरते हुए सत्येन्द्र को पता चला कि यहाँ नाटक होता है और आज ’आषाढ़ का एक दिन’ नामक नाटक का मंचन होना है। तब तक उन्हें न तो ’मोहन राकेश’ के बारे में पता था और न ही उनके नाटक ’आषाढ़ का एक दिन’ के बारे में लेकिन नाटक से मिलने वाले आनंद के विषय में वे खूब जानते थे। उस दिन पल भर विचार करने के बाद उन्होंने साइकिल को स्टैण्ड में जमा कर नाटक देखने का निर्णय कर लिया। वे खुश थे कि यहाँ पिता का पहरा नहीं था। उस दिन उन्होंने डूब कर नाटक देखा। नाटक देखते हुए कई बार उन्हें लगा जैसे वे ही कालिदास हैं और मल्लिका उन्हीं की प्रतीक्षा कर रही है। नाटक समाप्त होने पर कलाकारों के परिचय क्रम में उन्होंने जाना कि उस दिन कालिदास का रोल जिस रंगकर्मी ने निभाया था, वह भावेश था। मल्लिका के रोल में भावना श्रीवास्तव थीं। उस दिन सत्येन्द्र बाबू भावेश से इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने उससे मिले बिना न जाने का निर्णय किया। साहस करके पूछते­पूछते ग्रीन रूप में पहुँचे और अभिभूत­सी आवाज में (जिसमें थोड़ा कम्पन भी था) उन्होंने भावेश को बधाई दी। न जाने क्यों एक लगभग युवा की बधाई भावेश को भी अच्छी लगी। उस दिन फिर मिलने की बात कहकर सत्येन्द्र अपने क्वार्टर पर आ गए।

अगले दिन सुबह अखबार पढ़ते हुए सत्येन्द्र आश्चर्य से भर गए। अखबारों में उस नाटक की समीक्षा छपी थी। वे सोचने लगे गाँव में बाबू जी नाटक देखने पर बुरा मानते थे और यहाँ लोग न सिर्फ नाटक देख रहे थे बल्कि अखबारों में उसके बारे में भी छपा है। अखबार पढ़कर उन्होंने जाना कि भावेश और भावना गोरखपुर के प्रसिद्ध रंगकर्मी हैं। उन्हें खुद पर गर्व हुआ कि पिछली शाम वे एक स्टार के साथ थे। उन्हें पहली बार इसका साक्षात अनुभव हुआ कि अभिनय करने वालों को लोग इज्जत की निगाह से भी देखते हैं। खैर, सत्येन्द्र फिर अपनी दिनचर्या में लौट आए थे। एक दिन शाम में वे सूरजकण्ड चौराहे पर सब्जी खरीद रहे थे कि अचानक भावेश दिख गया। वे सब्जी वाले को जल्दी­जल्दी पैसे देकर भावेश की ओर लपके­नमस्कार! मैं सत्येन्द्र। उस दिन नाटक के बाद आपसे मिला था ... एक ही झोंक में वे सब कुछ बोल गए।

भावेश ने उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाया - जी, मुझे याद आया। आप सबसे कम उम्र के प्रशंसक थे इसलिए भूल नहीं पाया आपको... उसने हँसते हुए कहा। आइए, कहीं बैठकर चाय पीते हैं।

भावेश के प्रस्ताव ने सत्येन्द्र को बाग­बाग कर दिया। यह वह इच्छा थी जो वे स्वयं व्यक्त करना चाहते थे लेकिन इसकी नौबत ही नहीं आई। उस दिन वे गुनगुनाना चाहते थे... आजकल पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे... लेकिन चुप रहे। शहर का एक बड़ा स्टार उन्हें साथ बैठकर चाय पीने और बतियाने की दावत दे चुका था। धीरे­धीरे चलकर वे दोनों ढाबेनुमा एक दुकान की बेंच पर बैठ गए। भावेश ने दो कट चाय का आर्डर दिया। सत्येन्द्र ने पहली बार ’कट चाय’ शब्द सुना। उन्हें लगा कि यह जरूर कुछ ख़ास होगा। वे विस्मित थे। कुछ पल की चुप्पी के बाद भावेश ने ही बात शुरू की... कट चाय का मतलब एक चाय में दो। हम कई लोग एक साथ बैठते हैं तो इसी तरह शाम गुजरती है। दो­तीन बार कट चाय पीते हैं और किसी की जेब में पैसे हुए तो नमकीन या समोसा भी मँगा लेते हैं। ख़ैर, तुम अभी क्या करते हो? देखो, अब मैं तुम्हें तुम ही बुलाऊँगा... बुरा मत मानना।

जी, बिल्कुल बुलाइए। मुझे बुरा नहीं लगेगा। मैं अभी बी.ए. फर्स्ट ईयर में पढ़ता हूँ। सत्येन्द्र ने अपने भीतर की सारी विनम्रता उगल दी।

अरे भाई, तुम तो बहुत छोटे हो। मैंने इसी वर्ष सेण्ट एण्ड्रयूज़ से एम.ए. पूरा किया है और मेरे साथ जो मल्लिका का रोल कर रही थीं वे मेरी हमउम्र हैं और शादी­शुदा भी। उनके पति का अच्छा खासा बिजनेस है।

वो शादी­शुदा हैं? सत्येन्द्र ने घोर आश्चर्य से पूछा।

हाँ, भाई। उनके पति भी नाटक देखने आते हैं। इसमें आश्चर्य की क्या बात है!

सत्येन्द्र को फिर पिता की याद आई। वे उन्हें ग्यारहवीं शताब्दी के व्यक्ति लगे। यहाँ लोग अपनी पत्नी को दूसरे के साथ नाटक करने देते हैं और मेरे पिता जी मुझे नौटंकी और फिल्में नहीं देखने देते जबकि वहाँ तो नौटंकी में स्त्रियों का रोल भी पुरुष ही करते थे। हद है पिछड़ेपन की... उन्हें ऐसे परिवेश में जन्म लेने पर ग्लानि हुई।

अचानक क्या सोचने लगे? भावेश ने टोका तो सत्येन्द्र वर्तमान में लौट आए। कुछ सोचते हुए उन्होंने पूछा­गाँवों में होने वाली नौटंकी के विषय में आप क्या सोचते हैं?

भावेश ने सत्येन्द्र के चेहरे पर आँखें गड़ा दीं। उसके माथे पर बल आए और उसने मुँह गोल करते हुए कहा - नौटंकी... फिर कुछ पल चुप रहा। इन क्षणों में वह सत्येन्द्र को चिन्तक की तरह दिखने लगा। वे दत्तचित्त होकर उसे सुनने की मुद्रा बनाए हुए थे। भावेश ने कहना शुरू किया - एक अद्भुत फार्म है नौटंकी ... लोक जी उठता है उसमें लेकिन कभी­कभी फूहड़ता भी आ जाती है। इधर हम लोग भी कुछ नाटकों को नौटंकी शैली में करना चाहते हैं... देखोगे तो फर्क समझ में आएगा।

सत्येन्द्र बाबू भावेश की बातों से प्रभावित हो गए थे हालांकि उन्हें ’अद्भुत फार्म’ का आशय समझ में नहीं आया था। उन्हें नौटंकी का मतलब नाटक मालूम था और भावेश न जाने फार्म... शैली... क्या-क्या बोल रहा था। कुछ देर चुप रहने के बाद अचानक उन्हें फिल्मों के प्रणय दृश्यों की याद आई। उन्हें लगा कि उनके शंका निवारण के लिए भावेश से उपयुक्त कोई दूसरा नहीं हो सकता। थोड़े संकोच के साथ उन्होंने भावेश से कहा - ’एक और बात पूछना चाहता था। आपका नाटक देखते हुए मैंने नोट किया कि प्रणय दृश्यों को दिखाने के लिए आप लोगों ने नायक­नायिका के बीच कोई पारदर्शी शीशा वगैरह नहीं लगाया था जैसा कि फिल्मों में होता है।’ सत्येन्द्र सिंह की बात सुनकर भावेश अकबका गया। वह समझ नहीं पाया कि भावेश कहना क्या चाहता है। उसने कहा भी - मैं कुछ समझा नहीं।

अब सत्येन्द्र ने समझाने के अंदाज में कहा - दरअसल मेरे गाँव के कई लड़के बम्बई में काम करते हैं। वे गर्मियों में जब गाँव आते हैं तो फिल्मी दुनिया की ढेरों कहानियाँ सुनाते हैं। उन्हीं में से एक ने बताया था कि वह अक्सर शूटिंग देखने जाता है। हम लोगों के पूछने पर कि चुम्बन आदि के दृश्य कैसे फ़िलमाते हैं, उसने बताया था कि बीच में आर­पार दिखने वाला शीशा लगा रहता है। हीरो­हीरोइन अपनी­अपनी ओर से उसी शीशे पर होंठ रख देते हैं और लगता है कि वे चुम्मा ले रहे हैं।

सत्येन्द्र की बात सुनकर भावेश ठठाकर हँस पड़ा। अब सत्येन्द्र उसे अकबका कर देख रहे थे। उनकी समझ में नहीं आया कि उनकी बात में हँसने लायक क्या बात थी। उन्होंने तो शूटिंग की बारीकी बताई थी। वे भावेश को देखने लगे। धीरे­धीरे अपनी हँसी पर नियंत्रण करते हुए सत्येन्द्र ने कहा - किस जमाने की बात कर रहे हो मित्र! ऐसा कुछ भी नहीं होता है।

तो क्या हीरो­हीरोइन सचमुच का चुम्बन लेते हैं? सत्येन्द्र सिंह की आँखे अचरज से फैल गई थीं।

दृश्य बिलकुल सच्चा होता है लेकिन अभिनेता और अभिनेत्री के लिए सिर्फ अभिनय होता है। अपनी बात समाप्त करते हुए भावेश ने शर्ट की जेब से नेवीकट निकाल कर सुलगा लिया। जब वह चाय की चुस्कियों के बीच धुएं के गोले छोड़ रहा था। सत्येन्द्र उसे मंत्रमुग्ध देख रहे थे। उन्हें लग रहा था जैसे वे अमिताभ बच्चन के सामने बैठे हों। इन्हीं क्षणों में न जाने उन्हें क्या सूझा कि वे भावेश से अमिताभ के बारे में पूछ बैठे - आप कभी बच्चन साहब से मिले हैं?

सत्येन्द्र के सवाल पर भावेश मुस्कुराया। उसे सत्येन्द्र के भोलेपन पर आश्चर्य हुआ लेकिन वह उसकी नज़रों में पैदा हुए अपने स्टारडम को खोना नहीं चाहता था इसलिए धीरे से बोला... किसी से कहना मत... वैसे तो थियेटर ही मेरा पूजा गृह है लेकिन एक प्रोजेक्ट पर बात चल रही है। एक बार मैं बम्बई हो आया हूँ और जल्द ही फिर जाऊँगा। बात बन गई तो बच्चन साहब के साथ काम करूँगा और दुनिया देखेगी। तुमने तो मेरा अभिनय देखा ही है।

सत्येन्द्र उसके माया लोक में फंस चुके थे इसलिए उसकी शेखी उन्हें स्वाभाविक लगी। बात करते­करते उसने सिगरेट सत्येन्द्र की ओर बढ़ा दिया - एक कश लो... कला की असाधारण दुनिया में तुम्हारा स्वागत है पार्थ !

उसके एकाएक ऑफर पर सत्येन्द्र हड़बड़ा गए। एक­दो बार नहीं­नहीं किया फिर एक कश कसकर खींचा और खाँसने लगे। आँखों से पानी निकल आया। भावेश ने आश्वस्त किया - पहली बार ऐसा होता है... बाद में इसी धुएँ के छल्ले में हमारा आनन्द लोक तैयार होता है।

उस शाम भावेश से विदा होने के बाद सत्येन्द्र सिंह ने नेवीकट का पूरा पैकेट खरीदा। क्वार्टर पर माचिस की डिबिया थी लेकिन उन्होंने एक माचिस की डिबिया भी खरीदी। आज उन्होंने कला की दुनिया में स्वतंत्र पदार्पण का मन बना लिया था। उस रात दो बजे तक क्वार्टर सं. 35/3 में शीशे के सामने धुएँ के छल्ले बनते रहे और खाँसी की स्वर लहरियाँ उठती रहीं। सत्येन्द्र सिंह गुनगुनाते भी रहे -

बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम
कला की दुनिया में ये पहला कदम...

फिर एक दिन भावेश और साथियों के साथ उनके अगले शो ’महाभोज’ की प्रस्तावना बनने के बाद उन्होंने कला की दुनिया में दूसरा कदम रखा। भावेश ने कहा - तुम इसमें महेश शर्मा का एक बेहद महत्वपूर्ण रोल करने जा रहे हो। वह इंटेलेक्चुअल है... दिल्ली विश्वविद्यालय का शोध­छात्र। उसके कैरेक्टर में तुम कैसे प्रवेश करोगे? एक इंटेलेक्चुअल टफनेस और एक खास किस्म की करुणा की जरूरत है इसके लिए... यह तुम्हारे चेहरे पर भी दिखनी चाहिए। तुम्हें जमकर तैयारी करनी पड़ेगी। सोते­जागते इसी के विषय में सोचना होगा।

सत्येन्द्र ने भावेश को आश्वस्त करना चाहा लेकिन भावेश को यक़ीन नहीं आया। उसने कहा - मेरे भरोसे को तोड़ना नहीं है। यह रोल तुम्हारा भविष्य तय करेगा। आओ, सेलिब्रेट करते हैं... अपना पैग बनाओ!

सत्येन्द्र के मन में ललक उठी लेकिन उन्होंने ना­ना किया। भावेश पल भर के लिए मुस्कुराया... जैसे उसे सत्येन्द्र का रहस्य पता हो - ले लो... यह शुद्धतावाद बहुत दिन नहीं चलता। सब लोग मोहन जी की तरह नहीं होते कि बिना शराब­सिगरेट के भी बड़े निर्देशक बन जाएं... ले लो! अक्सर हम लोग देशी से काम चलाते हैं... आज रम है... दम है...। फिर सत्येन्द्र ने सारा संकोच तोड़ते हुए ’ओल्डमंक’ के तीन पटियाला पैग उड़ा दिए। आज सचमुच उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। रिक्शेवाले भलेमानुष ने उन्हें उनके कमरे तक पहुँचाया। किसी तरह टो­टा कर उन्होंने किराया दिया और पहली बार जो कहा उस पर उन्हें अगली सुबह गर्व हुआ। उन्होंने होश खोते­खोते कहा - एक दिन गर्व करोगे और लोगों को बताआोगे कि तुमने सत्येन्द्र सिंह को छुआ था... लोग तुम्हारा हाथ छूकर माथे से लगाएंगे... आई एम गोइंग टू बीकम ए ग्रेट एक्टर लाइक बच्चन साहब। रिक्शेवाले को उनकी बातों पर हँसी आ गई थी। हर रोज पियक्कड़ों से उसका पाला पड़ता था। नशे के गायन­वादन से वह पूरी तरह परिचित था। किराया जेब में डालते हुए उसने बाहर से दरवाजा चिपका दिया। किसी तरह हिलते­डुलते सत्येन्द्र ने सिटकिनी लगाई।

धीरे­धीरे सत्येन्द्र सिंह भावेश की संस्था ’नवजीवन’ के सक्रिय सदस्य हो गए। ’महाभोज’ के मंचन पर उन्हें अच्छे अभिनय की प्रशंसा भी मिली। इस बीच उन्हें एक नया शौक चर्राया। उन्होंने कॉलेज की छात्र राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरू की और माहौल उनके पक्ष में बनता गया लेकिन चुनाव से ठीक पहले वे मैदान से बाहर हो गए। उनके समर्थकों और मित्रों में गहरी निराशा फैल गई। किसी को ठीक­ठीक पता नहीं था कि इतने शानदार माहौल के बावजूद सत्येन्द्र सिंह पीछे क्यों हट गए! कुछ लोगों का अनुमान था कि सत्येन्द्र को ब्रहमज्ञान हुआ है कि सब मिथ्या है... कुछ लोगों का अनुमान था कि नाटक­नौटंकी में दिलचस्पी लेने वाला राजनीति क्या करेगा... एक­दो करीबी समझे जाने वाले लोगों का अनुमान था कि यह अलका की चेतावनी का परिणाम है।

अब आप जरूर सोच रहे होंगे कि यह अलका कौन है? अलका का परिचय सीधे­सीधे दिया जा सकता है लेकिन यह असहिष्णुता होगी और यह तोहमत अपने सिर कौन लेना चाहेगा। तो आइए, अलका की ओर चलते हैं। महाविद्यालय में आए कुछ ही महीने हुए थे। फिलॉसफी की क्लास के बाद सत्येन्द्र गैलरी में खड़े थे कि अचानक एक स्त्री आवाज में एक्सक्यूज़ मी  सुनकर भीतर तक भींग गए। उनके सामने खड़ी लड़की उनसे फिलॉसफी के प्राध्यापक­अध्यक्ष डॉ. दीक्षित के बारे में पूछ रही थी। उन्होंने हड़बड़ा कर उसे दीक्षित जी के बारे में सूचना दी। लड़की चली गई लेकिन सत्येन्द्र ने उसे अपनी पुतलियों में बसा लिया। उस रात वे ठीक से सो न सके। बस उनके कानों में उसकी आवाज का संगीत बजता रहा। सत्येन्द्र चकित थे कि एक ही लड़की में मंदाकिनी और श्रीदेवी दोनों एक साथ। उस दिन प्रकृति के चमत्कार में उनका यकीन और गहरा हो गया। उन्होंने याद करने की कोशिश की कि इस लड़की को पहले भी देखा है या नहीं लेकिन कुछ याद नहीं आया।

अगले दिन वह लड़की उन्हें फिलासफी की क्लास में दिखी। विभागाध्यक्ष डॉ. दीक्षित ने क्लास खत्म होने  के बाद सत्येन्द्र को अपने कमरे में आने को कहा। सत्येन्द्र पल भर के लिए भयभीत हो गए... कहीं कल इस लड़की ने कुछ कहा तो नहीं। वे दीक्षित सर के पीछे­पीछे उनके कमरे में गए। कुछ ही सेकेण्ड बीते होंगे कि वह लड़की भी वहाँ आ गई। सत्येन्द्र अब पूरी तरह भयभीत हो गए थे लेकिन वहाँ खड़े रहने के सिवाय और कोई चारा भी नहीं था। दीक्षित जी ने दोनों को बैठने का संकेत करते हुए कहा - सत्येन्द्र, ये अलका हैं। कल ही इन्होंने एडमिशन लिया है। इनके पिता का यहाँ ट्रांसफर हुआ है। वे बिजली विभाग में एक्सियन हैं। परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इनको प्रिन्सिपल कोटे से एडमिशन दिया गया है ।

सत्येन्द्र दीक्षित जी की ओर देखते हुए उन्हें चुपचाप सुन रहे थे। दीक्षित जी कह रहे थे - मैं चाहता हूँ कि तुम इनकी मदद करो। अब तक फिलॉसफी में जो पढ़ाई हो गई है, उसकी तैयारी करा दो। खाली पीरियड में यहीं मेरे कमरे में बैठ कर पढ़ सकते हो।

सत्येन्द्र को मुँह माँगी मुराद मिल गई थी। जो रोगी को भावे, वही वैद्य फरमावे। दीक्षित जी उनके लिए देवदूत बन गए थे। सत्येन्द्र ने वहीं बैठे­बैठे गोलघर वाली कालीमाता के चरणों में सिर झुका दिया था... जय हो माई की... कृपा अपरम्पार है आपकी। फिर अलका की ओर देखा। अलका को सत्येन्द्र के बारे में दीक्षित जी ने पहले ही बता दिया था। दीक्षित जी सत्येन्द्र को स्नेह करते थे और उनका भी विश्वास था कि सत्येन्द्र मेहनत करते रहें तो डिप्टी कलक्टर अवश्य हो जाएंगे। शायद यह बात उन्होंने अलका को भी बता दी थी। अलका और सत्येन्द्र की इस दूसरी मुलाकात के बाद उनके बीच तीसरे की जरूरत नहीं रह गई थी। गुलशन का कारोबार चल निकला था। जाहिर है ऐसे में अलका की चेतावनी का सत्येन्द्र के लिए सर्वोपरि महत्व होना ही था।

छात्र राजनीति से पीछे हटने के बाद सत्येन्द्र का फोकस रंगकर्म और अलका पर था। पढ़ाई की गति मद्धिम हो गई थी। पहले साल प्रथम श्रेणी का अंक अर्जित करने वाले सत्येन्द्र दूसरे साल इक्यावन परसेण्ट पर रह गए थे। उन्होंने पिता से झूठ बोल दिया था लेकिन अलका को सब मालूम था। उसने सत्येन्द्र सिंह को बहुत समझाया। कैरियर पर फोकस करने को तैयार किया लेकिन उनमें बहुत फर्क नहीं आया। वे अलका को बहुत चाहते थे लेकिन डिप्टी कलक्टर बनकर अपने भीतर के कलाकार की तौहीन करना नहीं चाहते थे। उन्हें मायानगरी में वह स्पेस भरना था जो बच्चन साहब खाली कर रहे थे। अलका की डाँट­फटकार के बीच नाटकों में अभिनय करते हुए उन्होंने किसी तरह छप्पन प्रतिशत अंकों के साथ बी.ए. पास कर लिया।

उनके अनुसार अब गोरखपुर में उनके लिए कोई संभावना नहीं थी। पिता इलाहाबाद के पक्ष में थे जहाँ एम.ए. करते हुए पी.सी.एस. की तैयारी हो सकती थी। अलका दिल्ली के पक्ष में थी जहाँ अपार संभावनाएं थीं और स्वयं सत्येन्द्र के सपनों में बम्बई के स्टूडियोज और जुहू का एक बंगला था जिसे बच्चन साहब के बंगले के ठीक सामने होना था। वे सिनेमा में नई इबारत लिखना चाहते थे और चाहते थे कि पुरानी इबारत के ठीक सामने हो नई इबारत। इलाहाबाद के ठीक सामने खड़ा हो गोरखपुर।

अलका के आगे सत्येन्द्र की अपनी न चली। उन्होंने पिता को कुछ­कुछ समझाया और दिल्ली जाने का मन बना लिया। मन क्या बनाया बल्कि दिल्ली चले गए। अलका एम.बी.ए. करने अहमदाबाद चली गई। लेकिन सत्येन्द्र के दिल्ली जाने से पहले गोरखपुर में एक और काण्ड हुआ। उनके परम मित्र विवेक मौर्य को अपने पड़ोसी इंस्पेक्टर साहब की बेटी मुक्ता से एकतरफा प्रेम हो गया। दोनों के घर में आना­जाना था लेकिन मुक्ता का कोई झुकाव विवेक की ओर नहीं था। मुक्ता बेहद खूबसूरत थी और विवेक भाई डेढ़ आँख के थे। उनकी एक आँख दूसरी आँख से थोड़ी छोटी थी लेकिन आँख छोटी हो या बड़ी, उसमें किसी का रूप तो उतर ही सकता है और विवेक भाई की आँखों में मुक्ता उतर गई थी। विवेक भाई के एकतरफा इश्क का झण्डा बुलन्द था और उन्हें पूरा यकीन था कि एक दिन उनकी मुहब्बत रंग लाएगी लेकिन कुछ ही दिनों में उनके यकीन पर बिजली गिर गई। उन्होंने देखा कि मुक्ता के घर में एक युवक आ धमका है और मुक्ता उससे घुल­मिल कर बतिया रही है। विवेक के मन में आया कि यह दृश्य देखने से पहले ही वह अंधा क्यों नहीं हो गया। कैसा घनघोर कलियुग है कि सच्चे प्रेम की कोई कद्र ही नहीं है।

विवेक ने अपनी बेचैनी अपने राजदारों सत्येन्द्र और रमेश से शेयर की और उनके सुझाव पर अतिथि युवा का बायोडाटा प्राप्त किया। पता चला कि विवेक की नींद में प्रेम चोपड़ा की तरह उपस्थित वह युवा मुक्ता की ममेरी बहन का देवर था। इस खबर ने विवेक की भूख उड़ा दी। उन्हें लगा कि मुक्ता तक पहुँचने के उनके सारे रास्ते अचानक अवरुद्ध हो गए हैं। उन्हें विधाता पर क्रोध आया... पहली बार तो प्यार किया था और उस पर भी इतनी बेदर्दी से तुशारापात कर दिया... धिक् जीवन... धिक् जीवन... उनके अपने ही भीतर से धिक्­धिक् की आवाज आने लगी और एक सुबह तो हद हो गई जब उन्हें अचानक महसूस हुआ कि मुक्ता एक गौरैये में बदलकर उड़ी चली जा रही है... दूर कहीं क्षितिज की ओर।

विवेक की बिगड़ती दशा देखकर सत्येन्द्र को गहरी पीड़ा हुई। सच्चे मित्र का दुःख जो महसूस न करे, वह अधम होता है और सत्येन्द्र खुद को अधम की श्रेणी में नहीं रख सकते थे। उन्होंने रमेश राय और चार रंगकर्मी मित्रों को अपने क्वार्टर पर बुलाया। फिर एक योजना बनी कि विवेक उस मजनूँ से दोस्ती कर उसे इंदिरा बाल विहार घुमाने के बहाने तमकुही कोठी के पास ले कर पहुँचें। वहाँ चारों रंगकर्मी मित्र किसी बहाने उनसे उलझकर मजनू की धुलाई करेंगे। दो­चार थप्पड़ विवेक को भी मारेंगे। संभव है, इस धुलाई प्रकरण के बाद मजनूं गोरखपुर से भाग जाए और विवेक का अवरुद्ध राजपथ पुनः उसके विचरण के लिए खुल जाए। विवेक भी इस योजना से सहमत हो गया और पाँच दिन बाद इस योजना को कार्य रूप भी दे दिया गया।

मजनूं को पीटकर सब खुश थे। उन्हें लग रहा था जैसे विवेक के जीवन में अब खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी लेकिन अगली सुबह इंस्पेक्टर अंकल ने विवेक को उठवा लिया। मजनूं चतुर सुजान था। उसने विवेक के ’मुक्ता प्रेम’ को ताड़ लिया था इसलिए उसका पक्का यकीन था कि उसे विवेक ने ही पिटवाया है। थाने में दो ही थप्पड़ में विवेक भाई की पैंट गीली हो गई। उन्होंने चारों रंगकर्मियों के नाम­पते उगल दिए। रंगकर्मियों की भी अच्छी खातिर हुई। चारों का पिछवाड़ा सूज गया। खबर मिलते ही सत्येन्द्र मोहद्दीपुर में एक मित्र के क्वार्टर पर छिप गए थे। हर पाँच मिनट पर टायलेट जाते थे। डर के मारे उनका पेट खराब हो गया था। वे जितनी देर टायलेट के बाहर रहते उतनी देर माता रानी का जाप करते। वह तो भला हो पुलिस वालों का जिन्होंने बस मजनूं को पीटने वालों के नाम पूछे थे और उन्हीं की तशरीफ सुजाकर प्रसन्न थे। विवेक के पिता ने इंस्पेक्टर साहब के हाथ­पांव जोड़े तो उन्होंने पड़ोसी धर्म के नाते केस को आगे नहीं बढ़ाया। विवेक के साथ चारों रंगकर्मी कराहते और सत्येन्द्र को कोसते हुए अपने­अपने घर गए। किसी तरह यह खबर सत्येन्द्र सिंह तक पहुँची तो उनकी जान में जान आई। अगले दिन रंगकर्मी मित्रों की दशा देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया था। यह सोचकर उनका हृदय काँप गया कि यदि उनके भी पिछवाड़े की दशा पुलिस ने ऐसी ही कर दी होती तो दिल्ली जाना महीनों स्थगित हो जाता। मित्रों के इस त्याग पर वे भावुक हो गए और आँखों में आँसू लिए उनसे विदा हुए।

दिल्ली में एम.ए. करते हुए सत्येन्द्र मण्डीहाउस का चक्कर लगाते। नाटक देखते और खुद पर कुढ़ते - क्यों अलका की बात मान ली... वह स्वयं तो चली गई अहमदाबाद और मैं यहाँ धूल फाँक रहा हूँ... कभी­कभी उसकी चिट्ठी आ जाती है... यह भी कोई जीवन है... माय फुट...

इसी तरह कुढ़ते और धूल फाँकते हुए धीरे­धीरे वे एक नाट्य समूह से जुड़ गए। मन को थोड़ी राहत मिली लेकिन यह उनकी मंजिल नहीं थी। दिल्ली प्रवास के एक वर्ष की उपलब्धि के नाम पर उनके खाते में मात्र एक नाटक था, जिसमें उन्होंने सहायक भूमिका निभाई थी। उन्होंने कोशिश की थी कि उन्हें ’अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में दुष्यंत की भूमिका मिल जाए लेकिन निर्देशक ने मना कर दिया था। उसका कहना था कि वह अपने पुराने अभिनेताओं पर भरोसा करेगा। संघर्ष और असफलता के उन्हीं दिनों में गोरखपुर से भावेश की आत्महत्या की खबर आई। पता चला कि वह अपनी सह अभिनेत्री भावना श्रीवास्तव के प्रेम में पागल हो उठा था। भावना ने पहले थोड़ी­बहुत हवा दी फिर आँचल समेट लिया था। लेकिन आत्महत्या की वजह सिर्फ इतनी नहीं थी। रंगकर्मी मित्रों के अनुसार वह अपनी बेरोजगारी से भी त्रस्त था और गोरखपुर में रंगकर्म की दशा ऐसी नहीं थी कि उससे घर चलाया जा सके। मित्रों को किसी न किसी प्रोजेक्ट का हवाला देकर उसने बम्बई के भी कई चक्कर लगाए थे लेकिन बात कुछ बन नहीं पाई थी। थियेटर को अपना पूजा गृह मानने वाले भावेश की लाश उसी ग्रीनरूप में मिली थी जहाँ सत्येन्द्र उससे पहली बार मिले थे। उसकी आत्महत्या का सबसे करुण प्रसंग यह था कि जिस दिन उसने आत्महत्या की उसी के अगले दिन उसकी पत्नी ने एक बेटी को जन्म दिया था।

सत्येन्द्र को याद आया कि भावेश ने ही कभी बताया था कि मण्डीहाउस कमाल की जगह है। साहित्य­संस्कृति वाले यहाँ कुछ न कुछ खोते­पाते रहते हैं। यहाँ सपनों के कई केंद्र हैं - रवीन्द्र भवन, बहावलपुर हाउस, दूरदर्शन भवन,  श्रीराम सेण्टर... स्वप्नदर्शी इन भवनों की परिक्रमा करते रहते हैं... अर्ध्य देते रहते हैं। सत्येन्द्र भी यही कर रहे थे और एक दिन उन्हें बम्बई की ओर जाने वाली पहली गली दिखी। दूरदर्शन के लिए तैयार किए जा रहे इक्यावन एपीसोड के एक धारावाहिक में उन्हें एक रोल मिला। रोल सब्जी विक्रेता का था। कहाँ नायक बनने का स्वप्न और कहाँ सब्जी विक्रेता की भूमिका! लेकिन उन्होंने मन को समझा लिया - बूँद­बूँद से सागर भरता है... क्या पता, मेरा अभिनय देखकर कोई बम्बई से बुलावा भेज दे। उन्होंने सीरियल के टेलीकास्ट होने का बेसब्री से इंतजार किया और जब वह टेलीकास्ट हुआ तो उन्हें पता चला कि सिर्फ पाँच एपीसोड में तीन­तीन मिनट के लिए वे दिखाई दिए थे।

उनका वह अभिनय देखकर बम्बई से बुलावा तो नहीं आया पर अलका की एक चिट्ठी जरूर आई। चिट्ठी पढ़कर यह महसूस करना मुश्किल नहीं था कि वह दुःखी थी। उसने इस अवधि में न मिल पाने का अफसोस भी जताया था। उसकी चिट्ठी में एक संकेत भी था कि एम.बी.ए. के बाद वह शादी करेगी इसलिए सत्येन्द्र को कैरियर के बारे में सोचना चाहिए अन्यथा राहें अलग हो जाएंगी। उस रात सत्येन्द्र ने एक पूरा अद्धा पी लिया और फफक­फफक कर रोए उन्होंने मान लिया था कि यह चिट्ठी बस आँख का पानी है... राहें तो अलग हो चुकी हैं...। रोते­रोते उन्होंने जवाब लिखा -

“हम दानों ने मिलकर एक राह पर चलने का फैसला किया था। हालांकि मुझे समझना चाहिए था कि यह एक प्रकार का समझौता था। तुम एक्सप्रेसवे थीं और मैं गाँव की पगडण्डी। पगडण्डी एक्सप्रेसवे से जुड़ तो सकती है लेकिन समानांतर चल नहीं सकती। अच्छा किया जो बता दिया। अब मैं अपनी राह पर बढूँगा।  तुम्हारे साथ की कुछ अच्छी स्मृतियों के लिए सदा ऋणी रहूँगा। अलविदा।”

अगली सुबह वे विश्वविद्यालय नहीं गए। कमरे से उठकर सीधे हिमाचल भवन के सामने वाली मजार पर गए। माथा टेका और कुछ बुदबुदाए। फिर वापस आकर अटैची में कपड़े इत्यादि डालकर निकल गए। दोपहर में रेलवे स्टेशन पर ही कुछ खाया और शाम की ट्रेन से बम्बई रवाना हो गए।

उधर अलका को सत्येन्द्र का पत्र मिला तो वह भागी­भागी दिल्ली पहुँची लेकिन तब तक पंक्षी डाल से उड़ चुका था।

इस घटना को धीरे­धीरे कई वर्ष बीत चुके हैं। बम्बई मुम्बई हो गई है। सत्येन्द्र की कोई खबर किसी को नहीं है। इस बीच माया नगरी में बच्चन साहब को रिप्लेस करने का दावा करने वाले कई अभिनेता आ चुके हैं। यह और बात है कि बच्चन साहब की चमक दिनों­दिन बढ़ती जा रही है। सत्येन्द्र के कई साथी रंगकर्मी यहाँ­वहाँ भटक रहे हैं और कभी­कभी गोरखपुर के आस­पास फ़िलमाई जा रही भोजपुरी फिल्मों में छोटे­मोटे रोल कर लेते हैं। विवेक ने अपनी दुकान खोल ली है और रमेश बिहार में मानदेय पर शिक्षक हो गए हैं। अलका एक अच्छी नौकरी में हैं। उसने अभी शादी नहीं की है। बीच­बीच में सत्येन्द्र के गाँव आती है। जब वह पहली बार आई थी तो गाँव की लगभग सारी औरतें­लड़कियाँ उसे देखने आ गई थीं। वे आपस में बतिया रही थीं - इतनी सुंदर और इतने ऊँचे पद पर काम करने वाली लड़की... अभागा है सत्येन्द्र... न जाने कहाँ भाग गया मतिमंद... नचनियाँ बनने का शौक था उसे। हर बार जब वह आती है तो कुछ औरतें जरूर आती हैं और इसी प्रकार की बातें करती हैं। अलका हर बार चुपचाप सुनती है फिर शाम को चली जाती है। इन दिनों वह दिल्ली में नौकरी कर रही है। उसके पिता गोरखपुर में ही बस गए हैं इसलिए आना­जाना लगातार बना रहता है। वह जब भी गोरखपुर आती है उसकी कोशिश होती है कि यहाँ भी हो ले। हर बार मन का बोझ हल्का होने की जगह थोड़ा बढ़ जाता है। सत्येन्द्र के पिता गाँव में न के बराबर निकलते हैं और माँ अक्सर बीमार रहती हैं। लेकिन काफी दिनों के बाद आज उनके घर में सुगबुगाहट है। आज ही मुम्बई में व्हाइटवाश का काम करने वाले गाँव के ही कोमल का फोन आया है। उसका कहना है कि कल उसने फिल्मिस्तान स्टूडियो के बाहर एक ऐसे युवक को टहलते देखा था जो बिलकुल सत्येन्द्र की तरह दिखता था लेकिन पुकारने पर तेज­तेज कदमों से दूसरी ओर चला गया। आस­पास पूछने पर पता चला है कि वह अक्सर इस स्टूडियो में आता रहता है। इससे अधिक किसी को नहीं पता है। कोमल का फोन आते ही सत्येन्द्र के पिता ने बड़ी उम्मीद से तुरंत यह खबर अलका तक पहुँचा दी है। अब अलका के सिवा उनके पास कोई दूसरा आत्मबल नहीं है।

जितेन्द्र श्रीवास्तव
हिंदी संकाय, मानविकी विद्यापीठ
इग्नू, मैदान गढ़ी, नई दिल्ली­110068
मोबाइल: 9818913798

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