सोमवार, जून 12, 2017

गीताश्री — आ जाओ धड़कते हैं अरमां — कथा-शिविर कोलाज memory of a village #GeetaShree

मैंने राजवंती के गले में उस बूंदे को छूते हुए टोका — “ये बेटे के लिए पहना है न ?”
गीताश्री
गीताश्री

पराई पीर समझने का नतीजा है ‘परिवर्तन’ 

— गीताश्री

साथी कथाकार गीताश्री की, एक, गाँव को वापस जीने की गहरी इच्छा...और दो, फिर उसका पूरा हो जाना। इस कथा-शिविर कोलाज के इन्द्रधनुष के ये दो छोर हैं, एक लेखक के बचपन और अब के बीच की जद्दोजहद और दूसरा लेखन में आया उत्थान... इनके बीच उन्होंने जिस खास अंदाज में रंग भरे हैं और जो इन्द्रधनुष 'उगाया' है इस कला को, इस लेखन को क्या नाम दिया जाए, गीताश्री-का-क्राफ्टगीताश्री-का-क्राफ्ट में लगातार जुड़ रहे सुन्दर परिवर्तनों में यह संस्मरण अंडरलाइन किया जाने वाला है और किया जायेगा भी। शुक्रिया मित्र इतना खूबसूरत लिखने और पढ़ाने के लिए ! अपने आज से आप कल को इसी-तरह अपना बनाती चलिए

संजीवजी, वंदना और उषादी हमें भी जाना है कथा शिविर में, न सही शब्द तस्वीरें ले आऊंगा.

भरत तिवारी  



एक दिन उसने अपने कथा संसार में खोज लिया उन्हें...पता नहीं उसे कि उसके भीतर जो धक धक करता है, वह उसका लोक है, जिसकी धुन में ढोल मांदर सब समाहित है...पूरी कीर्तन मंडली गाती है उसमें। विरहा, चैती, झूमर, सोहर, नचारी सब उसके भीतर कटारी मारते हैं...। वह लोक को करीब से देखना चाहती थी...फिर से...अपनी अधेड़ होती हुई आंखों से...उनके बीच कुछ दिन रहना चाहती थी...उनके साथ जीना चाहती थी...उनकी गंध सूंघना चाहती थी...घूरन काकी की बीड़ी गंध जब तब उसे बेचैन करती है। बड़की चाची के हाथों से चूल्हें की गंध आती थी। चइला जलाते जलाते, फूंक मारते मारते हथेलियां चूल्हा गंध से भर गई थीं। स्मृतियों में जितने चेहरे थे, सबकी गंध अलग अलग थीं वे गड्डमड्ड हो रही थीं। — गीताश्री


कथा-शिविर कोलाज

एक बच्ची गर्मी की छुट्टी में शहर से गांव आई है। संयुक्त परिवार की छुट्टियां गांव के इस बड़ी-सी हवेली में बीतती है। पांच भाइयों के परिवार में यह अघोषित समझौता है कि आम, लीची अपनी ही गाछी का खाएंगे। व्यापारियों को नहीं बेचेंगे। बच्चों की चांदी हो गई है। गर्मी की तपती दोपहरिया में गाछी-गाछी फिरने वाली लड़की दालान पर ठिठक गई है। वह उदास है। पिता के तबादले के कारण उसकी सहेलियां दूसरे शहर में रह गई हैं। वह उन्हें सिर्फ चिट्ठी लिखा करती है और उदास अनमनी घूमा करती है। सातवीं क्लास में विरह पत्र लिखने की कला अपने आप आ गई। हर सप्ताह बड़े भइया दूसरे शहर अपने काम से जाते हैं, चिट्ठी का आदान प्रदान करना उनका परम कर्तव्य। वे लड़की और उसकी सहेलियों के बीच डाकिया बन गए हैं। रास्ते में समय काटने के लिए चिट्ठियां पढ़ लिया करते हैं और मुस्का देते हैं। उन्हें हंसी आती, जब छोटी लड़की प्रेमी की तरह अपनी सहेलियों को खत लिखती...

“कुशले कुशल हूं, कुशल चाहती हूं...दिल में लगन है मिलन चाहती हूं...”

गांव आने पर उदास लड़की को दालान पर दूसरी विरहिणी नायिका रोक लेती है। हाथ में सादा पोस्ट कार्ड लिए हुए…

घूरन काका को कोलकाता गए हुए दो महीने हो गए थे और वहां से अब तक कोई चिट्ठी नहीं आई थी। लड़की दालान में, खंबे से टिक कर पत्र लिखती है...

पहला शब्द “प्रिय प्राणनाथ ...”

कुछ भी अटपटा नहीं लगता...वह लिखती चली जाती है...अंत में “आपकी चरणों की दासी ” पर कलम रुकती है। बीच बीच में कुछ ख्वाहिशें, कुछ फरमाइशें...कुछ रिश्तेदारों की शिकायतें...बच्चों की जरूरतें...। इन सबके बीच एक स्त्री का अकेलापन...यह सब लिखते हुए एक उदास लड़की भीतर ही भीतर बदल रही थी। उसके भीतर करुणा जग रही थी। काकी का दुख धुँधुआते हुए उसके नसों में घुस रहा था। दुख का ऐसा रुप उसने नहीं देखा था। नया था सबकुछ...लिखवाती काकी थी, दुख वह अपना लिख जाती...पोस्ट कार्ड पर सहेलियों के अक्स उभरने लगते...वह शेर ओ शायरी लिख जाती...

लिखती हूं खत खून से...खत लंबे होने लगे तो लिफाफा पर उतर आई। ब्लू स्याही के रुलदार पन्ने पर मोतियों की तरह अक्षर लिखा करती...फूलों से सजा देती...तब दिल बनाने का चलन नहीं था और न दिल के आर पार तीर बनाने का शऊर आया था...बस रोती हुई आंखें, कुछ फूल...चिड़िया...बारिश...इनके चित्र बना देती...चित्रलिपियों में अभिव्यक्ति की शुरुआत तभी हो गई थी. अपनी रफ कॉपी के सारे पन्ने उसने किसी का दुख व्यक्त करने में खर्च कर दिए...

दो महीने की छुट्टियां चिट्ठी लिखते बीतीं। घूरन काकी की गीली आंखें उसे देर तक बींधती रही और उसे घूरन काका पर बेहद गुस्सा आया कि काकी को इस हाल में छोड़ कर गांव से क्यों चले गए। प्राणनाथ और चरणों की दासी का आपसी संबंध सालो तक पहेली बना रहा उसके लिए।

विरह कथा लिखना और दूसरे का दुख यानी परदुख कातरता की पहली पाठशाला थी। उससे पहले दुख रहा होगा, उसका अहसास नहीं। कई बार होने न होने के बीच अहसास बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

यह परदुख उसके जेहन में सदा के लिए दर्ज हो गया। वह उदास और अनमनी लड़की बड़ी होती गई...गांव छूटा, खेत खलिहान छूटे...गाछी और टिकोले छूटे...सामंती परिवेश में, तमाम बंदिशों के बीच वह चंचल, शोख और बेखौफ युवती में बदल गई थी। आंखों में छोटे-छोटे सपने, छोटी-छोटी ख्वाहिशें ऐसे लिपटी थीं कि बड़े लोग हंसते...”बस...? यही चाहिए...? इतना ही...और कुछ नहीं...? ये भी कोई ख्वाहिश हुई...? ये भी कोई सपना हुआ...? अरे सोचो तो बड़ा सोचो...सोचने में, सपने देखने में कुछ खर्च होता है क्या...?”

अगर खर्च होता तो...? सपने देखने के टिकट लगते तो...पूरा समाज सपनाविहिन होता आज...फिर दुनिया की शक्ल पहचानी न जाती...!

लड़की अपन छोटी-छोटी ख्वाहिशों और सपने के पीछे पड़ गई...उसे जिद थी कि वह हाथी को गिनती सिखा कर रहेगी...

“हम हाथी को गिनती सिखाएंगे...हम हाथी को गिनती सिखाएंगे...”

और असंभव शब्द उसके शब्दकोश से तभी से गायब हो गया।

नरेंद्रपुर जीरो माइल से ही लाल रंग की छतें दिखाई देने लगीं थीं। निर्मल वर्मा की कहानी याद आई। कुछ दृश्य, कुछ रंग बड़ी स्मृति से जुड़ जाते हैं और कालजयी हो जाते  हैं। लाल टीन की छतें अमर हुआ करती हैं। शिमला की वादियों में जब छत-पाश में जकड़ते हैं तो लौट कर रिहाई नहीं मिलती। बार बार खींचकर शिमला ले जाती है। मुझे रिहाई मिल रही थी...कोई जकड़ छूट रही थी...कोई पाश ढीला हो रहा था. क्या पता था कि जहां वह छूट गई थी, वहां मिल जाएगी खुद को...। 



पढ़ाई, नौकरी और विस्थापन के दौर में वह अपने लोक से बिछुड़ गई थी और बचपन में देखे गए सपनों की जगह दूसरे किस्म के सपने आन बसे थे आंखों में। सपनों का स्थानापन्न सपने ही थे लेकिन वे ज्यादा चमकीले और चौंधिया देने वाले थे। आंखें रंगबिरंगी रोशनी से चौंधियाती रहती। सबकुछ हासिल किया, मिला...लेकिन जो पीछे छूट गया था उसकी वापसी कैसे संभव होती। वह विद्रोहिणी थी। अपने परिवेश से विद्रोह करके महानगर में भाग आई थी। लोक पीछे छूट गया था जहां उसकी वापसी संभव दिख नहीं रही थी। सालों तक अपने लोक के सारे प्रवेश द्वार बंद हो गए थे उसके लिए। दो दशक तक अघोषित प्रतिबंध-सा लगा रहा। उसके बाद उसे वैराग्य हो गया। उसने कहीं और लोक की खोज शुरु की...उसे अपनी जड़ो की तरफ लौटना था। अपनी रचनात्मकता के लिए अक्षय कोष की तलाश थी। वह अनजान शायरों के शेरों में खुद को हौसला देती और ढूंढती थी...

रफ्ता रफ्ता इन्हीं राहों से गुजर जाऊंगा
रफ्ता रफ्ता इन्हीं राहों से गुजर जाऊंगा
आहिस्ता आहिस्ता अपनी मंजिल पे पहुंच जाऊंगा


उसे कुछ आवाजें बुलाती थीं...

नदी के तट पर बंधी हुई बुन्नी सहनी की नाव लेकर भागती हुई लड़की और उसका ननका साथी...कीचड़ में सने पांव बुलाते थे उसे...चप्पू की चप चप...खींचती थी नदी की ओर...

इस पुकार में इतनी करुणा थी कि उसे पानी से डर लगने लगा था...उसके सपनों में पानी ही पानी भर गया था...जल प्लावन नहीं...लेकिन पानी का विस्तार...न ओर न छोर...सिर्फ पुकार...वो मठ, जिसके चबूतरे पर खेला करती थी...वो गाछियां जहां जोला-पाती खेलते-खेलते एक लड़की ऊपर ही टंगी रह गई थी...क्योंकि दादा जी नीचे गड़ांसा लेकर खड़े थे...

“लड़की जात...पेड़ पर चढेगी...उतर नीचे...काट के फेंक दूंगा...”

ये सारी आवाजें...उसका पीछा करती...अपने गांव की हवेली को वह रोज सपने में देखती और नीलकमल फिल्म की नायिका की तरह नींद में उठ कर जाने की सोचती...उसे भुतहा गाछी याद आती...उसे जिन्न याद आता...जो अक्सर सांझ ढले...पट्टीदारी में किसी न किसी औरत के ऊपर ही आता था...रंगबिरंगे किस्से देकर चला जाता।

ये सारी आवाजें पीछा करती थीं उसका...सपनों में...इच्छाओं में...कहां पाए उसे।

एक दिन उसने अपने कथा संसार में खोज लिया उन्हें...पता नहीं उसे कि उसके भीतर जो धक धक करता है, वह उसका लोक है, जिसकी धुन में ढोल मांदर सब समाहित है...पूरी कीर्तन मंडली गाती है उसमें। विरहा, चैती, झूमर, सोहर, नचारी सब उसके भीतर कटारी मारते हैं...। वह लोक को करीब से देखना चाहती थी...फिर से...अपनी अधेड़ होती हुई आंखों से...उनके बीच कुछ दिन रहना चाहती थी...उनके साथ जीना चाहती थी...उनकी गंध सूंघना चाहती थी...घूरन काकी की बीड़ी गंध जब तब उसे बेचैन करती है। बड़की चाची के हाथों से चूल्हें की गंध आती थी। चइला जलाते जलाते, फूंक मारते मारते हथेलियां चूल्हा गंध से भर गई थीं। स्मृतियों में जितने चेहरे थे, सबकी गंध अलग अलग थीं वे गड्डमड्ड हो रही थीं।

कच्ची बांस के दातून लेकर सुबह सुबह सब बच्चों को पुकारते दहाऊड़ काका और कच्चे बांस की खुशबू दोनों लोप हो रही थी...

फसलों के ऊपर पसरा हुआ घना कोहरा और स्मृतियों को ढंकने लगा था...कि एक सुबह कोहरे को चीरती हुई वह सदेह नरेंद्रपुर में थी।

फरवरी का तीसरा सप्ताह, बासंती-बासंती देहरी...। साथ में वरिष्ठ कथाकार ममता कालियाजी। सुबह-सुबह गांव का सूरज देख कर उनके मुंह से निकला —

“हम सूर्य को पकड़ रहे हैं, कल डूबते सूरज को पकड़ रहे थे, आज उगते सूरज को। ऐसा रेयर डे होता है।“

17 फरवरी की शाम हम पटना में थे। 18 फरवरी की सुबह हम भोरे-भोरे पटना से नरेंद्रपुर की तरफ निकल पड़े थे।

वो कहते हैं न जब किसी चीज को दिल से चाहो तो सारी कायनात उससे मिलवाने की कोशिश करती है। “अल्केमिस्ट” ( पाउलो कोइलो का बहुत पॉपुलर उपन्यास) और बाद में फिल्म “ओम शांति ओम” का यह संवाद अब बहुत घिसा होने के वावजूद अनमिट जुमला है। जाहिर है, जब जब ऐसी परिस्थितियां आएंगी, इस जुमले को दोहराया जाएगा। मेरे साथ घटित हुआ है जिसकी चर्चा होगी यहां...



सुविधाखोरी का आदत लग जाए तो सारी क्रांति घुसड़ जाती है

बिहार के किसी साधन संपन्न गांव में कुछ दिन बिताने का मन था। यह चाहत जोर मार रही थी। कुछ मित्रों के ऑफर भी मिले, लेकिन हर बार हिचक जाती...पता नहीं कैसी होगा, बीस साल पहले छूटे हुए गांव की तरह होगा तो मैं नहीं रह पाऊंगी। सुविधाखोरी का आदत लग जाए तो सारी क्रांति घुसड़ जाती है। मैं पूरी तरह दिल्ली-वाली जो अपनी जड़ो को देखने और जीने की ललक में जी रही थी। कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। मेरी ललक को देखते हुए हरियाणा से कुछ मित्रों का वीलेज टूरिज्म का जरूर प्रस्ताव आया था। एकाध गांव का चक्कर लगा आई...जो देखा...सारे दृश्य प्रायोजित थे। कोका कोला का सबसे पुराना विज्ञापन याद आया जिसमें नेपाली कांछा आमिर खान गाइड बने थे, जो पर्यटकों को ट्रेकिंग पर ले जाता है। वहां पर्यटक से वह कोल्ड ड्रिंक मांगता है तो उसे किसी दूसरी कंपनी का कोल्ड ड्रिंक पकड़ा देते हैं। फिर जब पर्यटक उससे पहाड़ पर बने मकान और भेड़ के बारे में पूछता है तो जवाब देता है...”ऊ देखो शाब... ताजमहल, ऊ देखो शाब टाइगर...।“ गाइड वहां कुतुब मीनार दिखाने की भी बात करता है। कुछ इसी तर्ज पर वीलेज टूरिज्म का जाल पनप रहा है। गांव जरूर है, जिंदगी नहीं है। ऐसे गांव विदेशी पर्यटकों को लुभाते हैं या उन्हें, जिन्हें गांव की जिंदगी से मतलब नहीं, जिनके लिए गांव दर्शन की चीज है। मैं गांव की ओर जाना चाहती थी कि मुझे वहां जिंदगी खोजनी थी। कई साल पहले जिसे वहीं छोड़ आई थी। उस लड़की की तलाश करनी थी जो अब भी किसी न किसी लड़की में जिंदा होगी।

पिछले साल फरवरी में इन्हीं दिनों पटना जाते हुए एयरपोर्ट पर कथाकार वंदना राग मिल गई थीं। पहली बार उनके मुख से सुना कि सिवान के पास नरेंद्रपुर कोई गांव है जहां कथा शिविर हो रहा है, जिसमें वे शामिल होने जा रही हैं। एयरपोर्ट पर विस्तार से बताया। मैं कुरेद-कुरेद कर पूछती रही...कौन करवा रहा, कौन कौन आ रहा...क्या होगा...कितने सवाल थे। मन में धड़क हुई, काश, मैं भी जा पाती. मेरा भी चयन होता। संजीवजी को मैं अच्छी तरह से जानती थी। वंदना के माध्यम से एक बार मुलाकात भी हुई थी। ‘परिवर्तन’ के बारे में बहुत-सी जानकारियां वंदना से मिली। मैं रश्क करती रही वंदना से, कितने सुंदर प्रोजेक्ट पर जा रही है। रोमांच हुआ कि कथा शिविर...। पहले सुना नहीं, न कभी जाने का मौका मिला। कला शिविरों को कवर करने कई शहरों में गई हूं। उसका रोमांच अलग। साहित्य के शिविरों का पता नहीं थी। गांव में शिविर...पात्रों के बीच रह कर...खेत खलिहानों से गुजरना, कच्ची सड़को, पगडंडियों पर चलना...हल कुदाली...न जाने क्या क्या। बसंत में सरसों के पीले फूल बहुत बुलाते हैं झूम झूम कर।  वंदना कथा शिविर में गई, मेरा मन प्राण बसा रहा उसी खयाल में। उनके लौटने पर सब पूछा...

तमन्ना का क्या है...पलती रहती हैं, खाद पानी दो न दो...।

समय बीता...मन से कथा शिविर का खयाल न गया। एक दिन वरिष्ठ कथाकार ऊषा किरण खान दी और फिर संजीवजी और वंदना का क्रमवार फोन आया। सबसे पहले ऊषादी से खबर मिली और मैं बल्लियों उछल पड़ी। तब से इंतजार सा बना रहा। ऐसा लगा कि सारी परिस्थितियां मुझे कथा शिविर तक पहुंचाने के लिए जुट गई हैं। हो सकता है किसी और के लिए यह सामान्य उपलब्धि हो। मेरे लिए अपने लोक की वापसी जैसी अनुभूति थी। कुछ दिन गांव में...पात्रों के बीच...सचमुच का गांव...जो कई साल पहले छूट गया था...स्मृतियों में रेंगती हुई यादें थी...पुरातन आग की स्मृतियों की तरह...।

देश के कई हिस्से का गांव देखा-घूमा हुआ है लेकिन भावनात्मक लगाव तो अपने ही इलाके से होता है. मेरे लिए कथा शिविर खुद को खोजने का उपक्रम था। मुझे संशय था खुद को लेकर कि क्या मैं बिहार के गांव से अपना तादात्मय बिठा पाऊंगी...रम पाऊंगी तीन दिन...सुख सुविधाओं, शहरी कोलाहल से दूर...बदले हुए लैंडस्केप में ? लोक की रूमानियत खींच कर ले तो गई, क्या रोक पाएगी मुझे...फसलें मुझसे वैसे बातें करेंगी जैसे करती हैं बातें मिट्टी से, खेत से...ऐसे ही संशयों से भरी हुई मैं पटना से जिस सुबह नरेंद्रपुर के लिए निकली थी, वह सुबह रोज की तरह ही थी, रोमांच रोज की तरह नहीं, खास दिन की तरह था। कोहरे से ढंकी हुई सुबह में अति उत्साह से भरे भरे हमारा काफिला उधर जा रहा था जहां अनेक कथाएं हमारा इंतजार कर रही थीं। कुछ पात्र, कुछ बदलाव, कुछ आश्चर्य हमारा इंतजार कर रहे थे।  

 ...

सिवान से नरेंद्रपुर की तरफ जाने के लिए पक्की सड़क थी, सड़क के दोनों तरफ या तो हरे भरे खेत दिखाई दे रहे थे या चहल पहल से भरा छोटा मोटा बाजार...। कहीं तंग सड़क तो कहीं बहुत चौड़ी। मोड़ पर एक छोटी ट्रक भी दिख गई। नरेंद्रपुर जीरो माइल से ही लाल रंग की छतें दिखाई देने लगीं थीं। निर्मल वर्मा की कहानी याद आई। कुछ दृश्य, कुछ रंग बड़ी स्मृति से जुड़ जाते हैं और कालजयी हो जाते  हैं। लाल टीन की छतें अमर हुआ करती हैं। शिमला की वादियों में जब छत-पाश में जकड़ते हैं तो लौट कर रिहाई नहीं मिलती। बार बार खींचकर शिमला ले जाती है। मुझे रिहाई मिल रही थी...कोई जकड़ छूट रही थी...कोई पाश ढीला हो रहा था. क्या पता था कि जहां वह छूट गई थी, वहां मिल जाएगी खुद को...। कई आश्चर्य उसके इंतजार में होंगे। जैसे वह खुद होगी अपने इंतजार में। जैसे कोई पुनर्जन्म सा बोध हो...। लोक वही था, बस वाणी और पानी का अंतर था।

हमारी गाड़ी ग्रामीण सड़को से होती हुई एक भव्य गेट पर जाकर रुकी। दूर से जिसकी झलक मिल रही थी वह एक शानदार परिसर निकला। गेट पर कथा शिविर की भव्य होर्डिंग लगी थी जिस पर हम सब प्रतिभागियों का नाम लिखा था। बहुत अच्छा लगा। अंदर हमारे स्वागत की भव्य तैयारियां। हमें खास अहसास कराने के सारे इंतजाम। परिसर की सारी इमारतें अनोखी और खुला हिस्सा इतना हरा भरा कि कई बार लगे हम किसी रिजार्ट में आ गए हैं। कोई शोरगुल नहीं, सारे काम हो रहे हैं लेकिन शांति के साथ। मेरे बाहर भीतर का शोर थम चुका था। अब मैं रिफ्रेश थी।

फिर दौर शुरु हुआ


फिर दौर शुरु हुआ...सारे कार्यक्रम सुनियोजित थे। रुटीनबद्ध कि कब क्या और कहां।

हमें गांव भ्रमण कराने बाल पथिक आ गए थे। हमें सब सहयोगिनियां मिल गई थीं जो बता रही थीं कि वे ग्रामीण स्त्रियों की बेहतरी के लिए क्या क्या कर रही हैं और उन्हें इस काम में कैसी मुश्किलें आती हैं। मैं अधिकांश बातचीत का वीडियो बना रही थी। लिखते वक्त सुन रही हूं...

सहयोगिनी-1: “शुरु शुरु में हम दो दो की टीम में बंट गए थे, आठ पंचायत के एक एक घर में गए। हमलोग जा रहे थे तब हमें घर के बुजुर्गो को कंवींश करना पड़ता था। वे पूछते थे कि घर की महिलाओं से क्या बात करनी है। क्या कहना है, क्यों आए हो। एक दो लोग ऐसे थे जो दरवाजे पर खड़े नहीं होने देते थे। बोले — भागिए...हटिए...जल्दी यहां से...”

सहयोगिनी- 2: “जब हम लगातार उनके बीच गए तो उनका भरोसा हमारे ऊपर जमा। अब हमारे पास महिला उत्पीड़न के, पारिवारिक झगड़े के केस आते हैं और हम उन्हें निपटाते हैं। कुछ लोग हमारी बात मानते हैं और उनका घर बस जाता है...।“

“आपके घरवाले दिक्कत नही करते, दूर दूर जाने देते हैं, इतनी देर तक आप लोग घर से बाहर रहती हैं... ?”

“पहिले दिक्कत होता था...शुरु शुरु में...घर में बहुत मना करते थे...लेकिन अब ‘परिवर्तन’ के बारे में सब लोग जान गए हैं कि गांव की भलाई के लिए काम करते हैं, तब से हम लोगो को दिक्कत नहीं होता है...”

ये सब ‘परिवर्तन’ की सहयोगिनियां थीं, उत्साह से भरी हुई, चेहरे पर संकल्प और संघर्ष की घनी छायाएं थीं। गले में ‘परिवर्तन’ की सहयोगिनी का कार्ड आत्मविश्वास की तरह पहन रखा था। मैं बहुत प्रसन्न कि स्त्रियों में प्रतिरोधक क्षमता इतनी प्रबल है और उनके मुंह में जुबान भी है। ऐसा लगा कि मेरी आधी लड़ाई सफल।

कथा शिविर के आखिर दिन “नारी जुटान” होना था। उसकी तैयारियां भी शुरु हो चुकी थीं। सहयोगिनियों ने बताया कि पूरे जिला से लगभग एक हजार से ज्यादा महिलाएं आएंगी। जुटान की रौनक ‘परिवर्तन’ कैंपस में दिखाई दे रही थी।

मैं एक सहयोगिनी राजवंती के साथ परिसर का चक्कर लगाना चाहती थी ताकि उनके निजी सुख दुख समझ सकूं। मुझे क्या पता था कि वही मेरी कहानी की प्रेरणा बनेंगी और इतना कुछ दे जाएंगी कि मैं कई कहानी लिख सकूं...। वे मेरी पात्र थीं जिनसे मैं कहानी लिखने से पहले मिल रही थी। वे अपनी जिंदगी के पन्ने खोल रही थीं...। उनके गले में काले धागे में सोने के दो छोटे बूंदे लटक रही थीं। मैंने अपनी मां के गले में ऐसा तीन चांद सोने का देखा था। वे मेरे तीन भाईयों के लिए पहनती थीं, खास कर ज्यूतिया व्रत के दिन। वह खीझ भरी थी मेरे मन में कहीं न कहीं।

मैंने राजवंती के गले में उस बूंदे को छूते हुए टोका— “ये बेटे के लिए पहना है न ?”

“नहीं...दो बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी...दोनों के लिए पहने हैं...हम तो बेटी के लिए भी पहने सकते हैं...कोनो रोक नहीं मानते हम...सब बराबर है...मेरे लिए...”

यही सवाल मैं कभी अपनी मां से नहीं पूछ पाई। तब इतनी चेतना कहां...। लड़की जात को ऐसे सवाल सोचना भी नहीं चाहिए। तब मां जो जवाब देती, वह दिल दहलाने के लिए काफी होता। अच्छा है, मासूम लड़की इस सवाल से बच गई।

कुछ सवाल जो आज की बच्चियों को मथते हैं, वे पूछे न भलें लेकिन गाती तो हैं न। जब हम नरेंद्रपुर गांव और बगीचे का भ्रमण करने निकले, वहां मिल गई वो बच्ची जिसके भीतर सवाल और दर्द दोनों मौजूद है। बच्चे सामुदायिक खेल के बाद मनोरंजन के मूड में थे तब जब एक दस वर्षीय लड़की अपना प्रिय गाना गा रही थी, मैं उसका विडियो रिकार्ड कर रही थी। मैंने तब तक उसके गाने के बोल पर ध्यान नहीं दिया था। पास में खड़े शिवमूर्ति जी आवाज सुनाई पड़ी...

“सुना, क्या गा रही है ?”

वह गा रही थी—

“ममता के अनमोल खजाना ...कबो न दिल से तेजा...
धड़केला हरदम बेटा खातिर... माई के करेजा
काहे करेजा कहलस ममता
ऊ ममता तू जागअ...धड़केला हरदम...”

मैं नाम पूछना भूल गई। मैं छूटे हुए सिरे को पकड़ रही थी। थोड़ी देर पहले ही सामुदायिक खेल में बच्चों के संग मैं भी खेल रही थी, गाने गा गा के...

“हम हाथी को गिनती सिखाएंगे...हम हाथी को...
क्या तुम खाओगे या हम खाएंगे...बोलो क्या करेंगे,
अरे बोल हथिए...”

यह जिद्दी धुन और बोल...मेरे भीतर बज ही रही थी कि नरेंद्रपुर के बच्चों को गाते हुए सुना। उनमें छोटी बच्चियां भी शामिल थीं।

मुझे खेल खेल में कई बार आउट किया बच्चों ने, मैं तो उनकी अदाएं देखती रह गई। दो विरोधाभासी मनस्थितियां एक साथ जी रही थी उस पल।

स्पोर्टस फॉर डेलवपमेंट


सामुदायिक खेल का आयोजन ‘परिवर्तन’ ने ‘मैजिक बस इंडिया फाउंडेशन’ के साथ मिल कर करती है। “स्पोर्टस फॉर डेलवपमेंट” के तहत गांव के स्तर पर चयन किए गए किशोर बच्चे और बच्चियां कुछ निर्धारित बच्चों के साथ नियमित खेल सत्र कराते हैं। खेल किसी खुले स्थान पर होता है। खेल खेल में बच्चे ज्ञान की बातें भी सीखते चलते हैं। खेल कराने वाले कोच उनसे कई सवाल पूछते हैं कि इस खेल से तुमने क्या सिखा? फिर बच्चे उन्हें बताते हैं कि उन्होंने क्या सीखा। जब सारे बच्चे एक साथ कोच गुरु के सवालों का जवाब देते हैं तब दुनिया की हवा में सिंफनी बजने लगती है। बच्चों का सुरीला शोर आत्मा को भी सुरीला बना देता है।

बाद में हमने ‘परिवर्तन’ के परिसर में फुटबॉल मैच देखा। ‘स्पोर्टस फॉर एक्सीलेंस’ के लड़के लड़कियों का फुटबॉल टीम बनाया गया है। इनमें अधिकतर ऐसे लड़के लड़कियां हैं जिन्हें पहले कभी भी फुटबॉल खेलने का कोई अनुभव नहीं था और न ही इस बारे में उन्हें कोई दिलचस्पी या जानकारी थी। उन बच्चों को फुटबॉल खेलते देखना सुखद अनुभव था।

‘परिवर्तन’ परिसर में जैसे पूरा एक देश बसा हो। एकबारगी “किडजैनिया” का भीतरी संसार याद हो आया, कुछ फर्क के साथ कि किडजैनिया सिर्फ बच्चों का संसार है जहां एक देश की परिकल्पना की गई है। बच्चे ही वहां के नागरिक हैं, और सबकुछ वहां खेल हैं। ‘परिवर्तन’ परिसर में सबकुछ है, एक संपन्न देश के नागरिकों के लिए जो भी चीजें जरुरी हैं। जो परिसर में नहीं, वो परिसर से बाहर थोड़ी दूर पर है, जैसे अस्पताल, डाकघर इत्यादि।

देश के लिए मनोरंजन भी बहुत जरूरी उपादान है। सिनेमा न सही, लोक कलाएं, थियेटर, गीत संगीत तो जिंदा है वहां। ‘परिवर्तन’ परिसर में बाकायदा रंगमंडल है। ‘परिवर्तन’ रंग मंडली में 10 गांव के 14 स्थानीय कलाकार हैं। ज्यादातर युवा कलाकार हैं जो दिन भर की अपनी व्यक्तिगत व्यस्तता के वावजूद प्रतिदिन नाटक का रिहर्सल करते हैं। कथा शिविर के दौरान हमने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी पर आधारित  नाटक “पंचलैट” का मंचन देखा। सारे कलाकार रंगमंडल से जुड़े थे और इसके नाट्य निर्देशक आशुतोष थे। आशुतोषजी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली (एनएसडी) के रंगमंडल से जुड़े रहे हैं। इन दिनों वे ‘परिवर्तन’ के साथ जुड़ गए हैं और स्थानीय कलाकारों के बीच रंगमंच का माहौल तैयार कर रहे हैं। नाटक पर उनकी निर्देशकीय कौशल का कमाल दिख रहा था। मुझे नाटक देखते हुए कई बार भ्रम हुआ कि मैं एनएसडी के “सम्मुख सभागार” में बैठ कर वहां के ट्रेंड छात्रों का नाटक देख रही हूं।  इतना शानदार अभिनय, वेशभूषा, प्रकाश व्यवस्था और संगीत। हम मंत्रमुग्ध होकर नायक देखते रहे, हंसते रहे। गंवई नायक नायिका का निर्दोष प्रेम हमें गुदगुदाता रहा। फिल्म आवारा के गाने “आ जाओ धड़कते हैं अरमां...अब रात गुजरने वाली है...” का बेहतर इस्तेमाल किया गया है। नाटक में बदले हुए संदर्भ के वावजूद यह गाना सुन कर अलग किस्म का नॉस्टालजिया जगता है। कलाकारों ने अपने अभिनय से जो समां बांधा, उस पर अलग से बात हो सकती है। “पंचलैट” की नायिका छोटी सी लड़की थी जो किरदार के साथ इतनी घुलमिल गई थी कि उसे अलगा पाना मुश्किल लगा मुझे। उस लड़की को लेकर बहुत उत्सुकता थी। इतनी देर रात तक कैसे नाटक कर पाती है। परिवार क्या सोचता होगा। कहीं भी आजाद स्त्री देखती हूं तो चैन की सांस लेती हूं, साथ ही चिंता से भी घिर जाती हूं, उसके परिवेश के बारे में सोच कर। बाद में मुझे प्रत्यक्षा ने उस कलाकार के बारे में बताया कि उस लड़की को गाना सीखने का मन था, पापा ने मना कर दिया। यह सुनते ही घड़ी की सुई तीन दशक पहले घूम गई।

प्रत्यक्षा


प्रत्यक्षा बता रही थीं कि बात करते करते लड़की की आवाज भर्रा गई थी। कला के लिए आज तक अपने परिवार की उपेक्षा झेल रही है। लड़की को आशुतोष सर ने नाटक करने का ऑफर दिया तो उसे लगा कि यही करना है। पापा नाराज। एक साल हो गए, पापा अपनी बेटी से बात नही करते। देर रात घर लौटती है तो घर में तनाव हो जाता है। फिर भाई और मां ने आकर देखा कि लड़की क्या काम करती है। जब लगा कि सही जगह पर सही काम कर रही है तो वे लड़की के सपोर्ट में आ गए। राहें थोड़ी आसान हुई लेकिन पूरी तरह नहीं। पितृसत्ता के चंगुल में दबी हुई मां का सपोर्ट किस काम का। बिना मिले मैं उस हिम्मती लड़की को सलाम भेज रही हूं।

गांव बदल रहा है, लोग बदल रहे हैं, क्या स्त्रियां बदल रही हैं। या स्त्रियों के प्रति लोग बदल रहे हैं। नरेंद्रपुर के रास्ते पर भटकते हुए कई स्त्रियों से मैंने बात की। कुछ जो खेतों से लौट रही थीं, कुछ जो ‘परिवर्तन’ में चरखे पर सूत की कताई करती हैं। कुछ जो सिलाई करती हैं। शाम को घर लौटते समय वे मिल मुझे। किसी को मिनी बस का इंतजार था तो किसी को उनके पति लेने आ रहे थे। वे सब खुश थीं कि उन्हें मन माफिक काम मिल गया है। वे रोज घर से निकलती हैं और शाम को लौटती हैं। उन्हें इस बात का संतोष हैं कि घर में वे भी एक कमाऊ सदस्य बन गई हैं। उनके प्रति घर वालों का रवैया बदल रहा है।

कोई भी बदलाव वक्त लेता है। इस बदलाव की आहट लेने हम गांव के और अंदर बाहर घुसते चले गए। हमने सोचा न था कि नरेंद्रपुर चौक पर हार्डवेयर की दुकान में खैनी चुभलाते, गंजी पहने बैठे मुकेश कुमार सिंह बता देंगे कि नरेंद्रपुर कितना संपन्न गांव हैं और ‘परिवर्तन’ के आने के बाद कितनी संपन्नता बढ़ी. खासकर नरेंद्रपुर निवासी, ‘परिवर्तन’ के सर्वेसर्वा संजीव कुमार जी के बारे में मुकेश कुमार के उद्गार बेहद ईमानदार लगे। हमने बताया नहीं कि हम उनके मेहमान हैं वहां। हम किसी रिपोर्टर की तरह उनसे पूछताछ कर रहे थे। उनके जवाब का मैं पूरा विडियो बनाकर लाई.

शिविर के दौरान अक्सर सुबह सुबह हम नरेंद्रपुर का पैदल ही भ्रमण कर आते थे और ग्रामीणों से खूब सारी गप्पें भी कर आते थे। कभी सत्या पटेल तो कभी प्रत्यक्षा भी साथ हो लेती थीं। रास्ते में आती जाती औरतें हों या कुदाल लेकर खेत की तरफ जाते किसान, चौक पर चाय बनाते रामदीन हों या हार्डवेयर की दुकान पर बैठे मुकेश कुमार सिंह। हमने सबसे खूब बातें की।

मुकेश कुमार सिंह से बात करते समय सत्या साथ में थे


मुकेश कुमार सिंह से बात करते समय सत्या साथ में थे। मुकेश जी का बयान सुनिए—

“ऊ जे संजीव बाबू हैं न...महान पुरुष हैं। ‘परिवर्तन’ बहुते काम कर रहा है इलाका के लिए। बड़ा आदर है । आ...काहे न होगा...जो भी गांव में उपकार का काम होता है, सामाजिक काम होता है उसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। जो गांव के लिए चाहिए, वो सब उपलब्ध कराते हैं।

“जैसे कि...? सत्या ने पूछा.

मुकेश जी ने खैनी थूक दी। वे बातचीत के लिए पूरी तरह उत्साहित हो गए।

“मान लीजिए कि यहां एक ही पोस्ट ऑफिस था। अब छह पोस्ट ऑफिस हो गया पूरे प्रखंड में। सब उन्हीं की देन है। अस्पताल भी उन्हीं के परिवार की देन है...।“

मुकेश कुमार भाव विभोर थे, हमें चाय पिलाई और बिस्कुट खिला कर भेजा। हम यहां से आगे बढ़ते ही रहे। प्राचीन शिव मंदिर गए, वहां अखंड पाठ हो रहा था। बरगद के नीचे बैठे कुछ ग्रामीण लोगो से हम खूब गपियाए। उनके सुख दुख पूछे। गांव के विकास पर उनकी खुशी छलक रही थी। ऐसा विकास जो गांव की संस्कृति को नष्ट नहीं कर रहा, उसे समृद्ध कर रहा है। हमने पूरा इलाका छान मारा। वहां संगीत का स्कूल भी देखा। यह सब मेरे लिए चौंकाने वाली बातें थी कि गांव में संगीत स्कूल। उदास और अनमनी लड़की तो अब भी तीन दशक पीछे थी जहां तबले की थाप और हारमोनियम की धुन सभ्य घरों से नहीं सुनाई देने चाहिए। संभ्रांत लड़कियों को इनसे दूर रहना चाहिए।



“नारी जुटान” का स्लोगन जो ‘परिवर्तन’ परिसर में टंगे एक पोस्टर पर लिखा था---

“मैं लिखना सीख रही हूं
ताकि
अपनी किस्मत बदल सकूं।“

तीन दशक पहले उस उदास अनमनी लड़की ने भी लिखना ही सिखा, तब उसे नहीं मालूम था कि उसके लिखने से किस्मत बदल जाएगी। फिर भी उसने लिखना सिखा, जिसने उसकी किस्मत बदल दी।

अब वह स्त्री कौम की किस्मत बदलने का सपना देखा करती है। ‘परिवर्तन’ हर हाल में जरुरी जो है।



संगी साथी


शिविर में कथाएं और संगी साथी


पहले ही दिन शाम को कहानी पाठ का आयोजन था। यह सिलसिला रोज चलना था। संयोगवश पहले ही दिन कथा पाठ रखा गया था जिसमें वरिष्ठ कथाकार प्रियंवदजी के साथ मुझे भी कहानी पाठ करना था। सात साल से कथा लेखन करने और हंस स्कूल की छात्रा होने के वावजूद अपनी कहानियों को लेकर संकोच गया नहीं। वरिष्ठ लेखकों के सामने पाठ करते संकोच होता है। उनके प्रोत्साहन और सराहना के वावजूद मुझसे साहस का अभाव। प्रियंवदजी के साथ कथा पाठ और श्रोता में मौजूद दिग्गजों में ममता कालिया जी, ऊषा किरण खान दी, शिवमूर्ति जी, कवि सुमन केशरी दी, सत्या पटेल, प्रत्यक्षा, रंजन कुमार सिंह, और साहित्य मर्मज्ञ, ‘परिवर्तन’ के संजीवजी। मुख्य अतिथि के रुप में वरिष्ठ आलोचक, कथाकार पुरुषोत्तम अग्रवाल की उपस्थिति खास माहौल बना रही थी। इनके अलावा ‘परिवर्तन’ के साथी गण एवं कुछ ग्रामीण साथी। अच्छी खासी भीड़। शाम गहरा चुकी थी। ‘परिवर्तन’ कैंपस में बीचोबीच बने मंडपनुमा भवन में कथा पाठ के लिए हम सब जुटे थे।

प्रियंवदजी के साथ कथा पाठ करने का साहस जुटा कर छोटी कहानी निकाली। मेरे पास शहरी कहानियां ज्यादा हैं, ग्रामीण कहानी कम। मुझे लगा कि यहां ग्रामीण माहौल की छोटी कहानी पढूं तो सब खुद को जोड़ कर देख सकेंगे। वही हुआ। दूसरे कथा-संग्रह “स्वप्न साजिश और स्त्री” (सामयिक प्रकाशन) की एक कहानी “भूतखेली” का पाठ किया। मेरे बाद प्रियंवदजी को कथा पाठ करना था। कथापाठ के बाद प्रतिक्रियाओं का दौर चलता है। मिली जुली प्रतिक्रियाएं थीं। मैं भीतर से सहमी हुई थी मगर जी को कड़ा कर लिया था। सिर ओखल में डाल ही दिया था।

कुछ असहमतियां थीं, कुछ बेहतरीन सुझाव भी मिले। मुझे अपनी कहानी को लेकर कभी आत्ममुग्धता की स्थिति नहीं रही। इसलिए मैं अपनी आलोचना को बहुत सहज ढंग से लेती हूं और शुक्रगुजार होती हूँ कि कोई है जो गंभीरता से सुन कर, पढ़ कर सुझाव देता है। गैरलेखक ग्रामीण श्रोताओं ने जरूर स्वीकारा कि इस कहानी से खुद को कनेक्ट कर पा रहे हैं, क्योंकि भूत प्रेत बाधा, उसका पाखंड, उसके नाम पर छल प्रपंच गांव में खूब होता है। गांव से पलायन भी बढ़ा है, खेत बेच कर हमेशा के लिए लोग गांव छोड़ कर निकल जाते हैं। ये सारी बातें वहां मौजूद श्रोताओं ने स्वीकारी।

कई लिहाज से वह पहली शाम दिलचस्प थी। कथा शिविर का मेरा पहला अनुभव और एक कथाकार मित्र सत्या पटेल की आलोचकीय टिप्पणी।

मेरी कहानी के बाद प्रियंवदजी की ने कहानी पढ़ी- अपवित्र प्रेम। मेरी पसंदीदा कहानी है, बहुत पहले पढ़ चुकी थी। वहां मौजूद कुछ और लोगो ने भी पहले से पढ़ी होगी। कथा पाठ के बाद फिर सिलसिला शुरु हुआ प्रतिक्रिया का। सबने कुछकुछ कहा...मिली जुली प्रतिक्रियाएं इस बार भी थीं। सत्या पटेल की साहसिक प्रतिक्रिया याद रहीं। इसलिए कि उसके बाद से सत्या पटेल से मैं थोड़ी खुल पाई। उसके पहले मैं उन्हें लेकर कंफ्यूज थी, भीतर से खींची हुई-सी। यह दुनिया अभी तक अनजानी ही है। सत्या पटेल की प्रतिक्रिया लंबी होने के वावजूद दिलचस्प और थोड़ी कड़ी थी। मैं यहां स्मृति पर जोर डाल कर उल्लेख कर पा रही हूं—

प्रियंवद जी हमारे वरिष्ठ और सम्मानित कथाकार हैं। यहां मैं अपनी बात कहने से पहले बता दूं कि मैं उनका बहुत आदर करता हूं। लेकिन जहां तक उनकी कहानियों की बात है, उनकी कहानियों की भाषा बहुत महीन होती है। भाषा की धुंध इतनी सघन होती है कि कथानक कहीं गुम हो जाता है। कहानियां इतनी एकांतिक होती हैं कि संशय होता है कि किसी भारतीय पात्र की कहानी है। मैं भी इसी देश और समाज में रहता हूं। मुझे प्रियंवदजी की कहानियों वाला एकांतिक जीवन कहीं देखने को नहीं मिलता है। सुख हो कि दुख हो, जरा जरा-सी बात हम आपस में साझा कर लेते हैं। लेकिन प्रियंवद की कहानी का पात्र बहुत अकेला होता है और वह किसी भी परिवार की लड़की के साथ प्रेम कर लेता है। न लड़की के परिवार में कुछ हलचल होती है न लड़के के परिवार में। ऐसा चरित्र भारत के किस हिस्से में है। प्रियंवद जी खुद जहां से आते हैं, वह कानपुर जैसी जगह में ऐसे चरित्र कैसे संभव है। प्रियंवद जी की बूढ़े का उत्सव, अपवित्र पेड़ या ज्यादातर कहानियां गहरे अवसाद से भरी है. पात्र नज़र जो कुछ भी आते हैं, लेकिन उनके भीतर कुंठा भरी होती है. वे हमारे समाज और समय के पात्र नहीं लगते. 

मैं फिर कहूँगा कि प्रियंवद जी के पास बहुत अच्छी भाषा है, और उस भाषा में ईमानदार पात्र की कहानियाँ भी कही जा सकती है. ऐसी भाषा, ऐसा कथानक जो साधारण पाठक अवसाद के धुंधलके में धकेल दे.

इस प्रतिक्रिया का उल्लेख इसलिए जरूरी कि कुछ समीकरण बदल गए थे अगले दिन से। सत्या के साहस पर दंग थी और मैं जब तक रही, मैंने नए सिरे से उन्हें जाना। सत्या को लेकर मेरे मन में अलग छवि थी जो कथा शिविर में झटके से बदल गई। अन्य साथियों और वरिष्ठों का संग साथ उनकी छवि बदलने और बनाने में सहायक रहा। कुछ को करीब से जान पाई, कुछ का स्नेह बांह भर भर बांध लाई। ममता जी के साथ पटना से नरेंद्रपुर तक की यात्रा में खूब लाड़ मिला। प्रत्यक्षा के साथ रुम साझा करने के फायदे मिले कि उससे देर रात खूब बातें हुईं...उसकी रचनात्मकता पर, साहित्यिक दुनिया पर...लेखक समाज पर...कथाओं पर...यायावरी पर...हमारे शौक मिलते जुलते से हैं। हम दोनों को आवारगी से लगाव है जो हमें यायावर बनाती है।

अगले दिन फिर वही गहरा अंधेरा और मीठी मीठी पीली रोशनी में कथा पाठ का आयोजन था।

दूसरी शाम को ममता कालिया, प्रत्यक्षा, अवधेश प्रीत ने कहानी पाठ किया और सुमन केशरी दी ने लंबी कविता सुनाई। यह लंबी शाम थी। प्रतिक्रियाओं के लिए वक्त ज्यादा नहीं था। इन पर बोलना था, एक ही बार में। सबने बोला...मैंने भी बोला। अवधेश प्रीत ने “छतरी” कहानी सुनाई । इसका ऐसा असर हुआ कि छतरी एक विराट रुपक में बदल कर दिलोदिमाग पर छा गई। हम कथा पाठ के बाद उन्हें छतरी को लेकर चिढ़ाते भी रहे...। मैं छेड़ती उनको कि इतनी बार छतरी कथा में आती है, इतने फोर्स के साथ कि हर तरफ छतरी ही छतरी दिखाई दे रही है। वह भी मजे लेते रहे। उनकी स्नेहिल हंसी अब भी वैसे ही है...जैसी मैंने अपने कॉलेज डेज में देखी और मेरे हिस्से आई थी। मैं विश्वविधालय में पढ़ रही थी और अवधेश जी स्थापित पत्रकार-साहित्यकार थे। हम नवोदितों को जो आत्मीयता उन्होंने तब दी, वो आज तक बरकरार है। सो उनसे इतनी छूट ले लेती हूं कि छेड़छाड़ कर सकूं। इसके पहले रस्किन बॉंड की नीली छतरी ( कहानी-ब्लू अंब्रेला) ही दिमाग में अटकी हुई थी। मेरी समकालीन, जादुई भाषा वाली प्रत्यक्षा की कहानी “फूलपुर की फुलवरिया मिसराइन” का जादू कुछ कुछ वैसा ही जैसा किसी मशहूर पेंटिंग को औचक देख लें किसी दिन और देर तक अवाक रहें। प्रत्यक्षा शब्दों से चित्र बनाती है, छोटे छोटे वाक्य...कोई पेंटर हो तो कथा सुनते सुनते पेंट बना ले। मुझे मिसराइन को पढ़ते हुए रांगेय राघव की “गदल” कहानी याद आई। अपनी मनोकांक्षाओं और दैहिक कामनाओं के बारे में सोचने वाली दोनों साहसिक नायिकाएं साथ चलती हैं मेरे।

कथा पाठ के बाद सबको कुछ बोलना था...संक्षिप्त बयान ही दिया सबने। ऊषादी के कहानीकार रुप से इतर पहली बार उनका आलोचकीय रुप देख रही थी। सबकी कहानी पर वे सबसे सटीक टिप्पणी और खरी खरी उनकी लगी मुझे। यहां तक कि सुमन केशरी दी की लंबी कविता “बीजल से एक सवाल” को मैंने जब काव्य कथा कहा और इच्छा जताई कि सुमनदी कहानी की दुनिया में आ जाएं, कहानी लिखें तो ऊषादी ने अपने वक्तव्य में मेरे इस प्रस्ताव को अपनी मजेदार दलील से खारिज कर दिया। मुझे इस कविता में कथा के सूत्र मिले और एक रेप विक्टिम और उसके परिवार की मनोदशा का मार्मिक चित्रण, सवालों से भरी हुई, समाज और उसकी कुंठित सोच पर चोट करती हुई कविता में कथा तत्व मिले। ऊषादी ने सुमनदी को सलाह दी कि वे कविता में ही रहें, कहानी में बहुत भीड़ है और कथाकाव्य को ही समृद्ध करें। यह शाम ज्यादा संपन्न थी। कई कहानियां और सब पर आलोचकीय टिप्पणी से भरी हुई शाम थी। जो रात अधिक न होती, भूख जोर न मारती तो हम सब उन कहानियों पर लंबी चर्चा कर सकते थे। ममता कालिया जी की कहानी “सफर में” रिपोर्ताज और यात्रा संस्मरण का आस्वाद पैदा कर रही थी। बिहार की ट्रेन में पूरी कथा चलती है और सामान्य बातचीत से बड़े कैनवस पर जाकर खड़ी होती है।

शिवमूर्तिजी, ऊषादी, रंजन कुमार सिंह, सत्या नारायण पटेल ऊर्फ सत्या का कहानी पाठ कुछ कारणों से मैं नहीं सुन पाई। बाद में सुना कि शिवमूर्ति जी ने बहुत लंबी कहानी पढ़ी। शिविर में इस बात को लेकर रोमांचित थी कि शिवमूर्ति जी से थोड़ा परिचय और गाढ़ा होगा। कुछ दिन उनके साथ रहने का मौका मिल रहा है। लेकिन यह हो न सका। उनके स्वास्थ्य ने उनका साथ न दिया और मैं बहुत धुलमिल नहीं पाई। जबकि उनसे उनकी विवादास्पद कहानी “कुच्ची के कानून” पर कुछ बातें करनी थीं।

ऊषादी की कहानियां मेरे लोक की कहानियां हैं, खोजखाज कर पढ डालती हूं...

“हमको ओढ़ा दे चदरिया, चलले के बेरिया ” ऊषादी ने इसी कहानी का पाठ किया था। कहानी को पढ़ते हुए मैं कब उसका हिस्सा हो गई नहीं मालूम...वह लड़की जो बहुत पहले गांव में कहीं छूट गई थी, वह अचानक बैलों के पास जा खड़ी हुई...उसकी घंटियां सुनने लगी. ये ऐसी कहानी है जिसे पढ़ते हुए मुझे यह अहसास न हुआ कि कहानी किसी स्त्री लेखिका की है। यह बोध खत्म कर देती है ये कहानी। मैं इस बोध को कहानी की सफलता और सार्थकता के रुप में देखती हूं। कहानीकार खुद को कहानी से कैसे अलग कर लेता है, यह कला है या साधना...।

सत्य नारायण पटेल ने जिस कहानी “पर पाजेब न भींगे” का पाठ किया, उसे पढ़ गई। शिविर में सत्या का संग साथ इतना वाचाल रहा कि लगा नहीं मैं कहानी पढ़ नहीं रही, ऐसा लगा, लोक की खुशबू का दीवाना कहानीकार चाय के ठीहे पर बैठ कर कहानी सुना रहा है और मैं बंजारन अपना पड़ाव वहीं डाल देती हूं। नानी-दादी की कहानियों जैसी सुरमई जादू बुनती हुई कहानी मेरे भीतर की उस नन्हीं लड़की को वहां तक ले गया जहां छूट गया था कोई सिरा। ऊपर से गंभीर दिखने वाले सत्या के स्वभाव में जो खास चुहल है, मजे लेने और पंगा लेने की अदा है, वहीं कहानी की भाषा में है।

कथा शिविर के संयोजक, वरिष्ठ पत्रकार-कथाकार रंजन कुमार सिंह की कहानी सुनी तो नहीं, लेकिन वापसी में उनकी कहानियों जखीरा ले कर आई थी और सारी पढ़ गई। छठ पर्व को लेकर हमेशा मैं सोचती थी कि किसी कहानी में उसे ऐसे गूंथूंगी कि थोपा हुआ न लगे। उनकी एक कहानी छठ को केंद्र में रख कर अद्भुत ढंग से बुनी गई है, भले वह 30 साल पुरानी कहानी हो, बिहारी संवेदना के साथ ऐसे रची बसी है कि यह कहानी अविस्मरणीय बन गई है।
यादों के फोटोशॉप



यादों के फोटोशॉप पर तस्वीर की धुंध छांटी जा सकती है

इतना सबकुछ समेट कर, जी कर वहां से लौटे हुए दो महीने ही हुए हैं, याद करते हुए ताजा तरबूजे की ठंडक-सी महसूस हो रही है। क्या क्या भूलूं और क्या क्या याद करुं। यह समस्या बड़े रचनाकारों के साथ भी रही होगी कि लिख गए...क्या भूलूँ क्या याद करुं. ‘नरेंद्रपुर कथा शिविर’ यादों का मेला है...अधूरा है गर जिक्र न करुं कि हम जीरादेई गए थे, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का पुश्तैनी घर देखने। कैसे भूलूं कि हमें दालान में रखी उस चौकी (तख्त) पर नहीं बैठना था जिस पर कभी गांधी जी बैठा करते थे। उनका घर आंगन सब रोमांचित करता रहा। गांव के कुछ लोग भी आ गए थे जिनसे उनके परिवार के बारे में बातें होती रहीं। उनके घर की देख रेख करने वाले लोग भी मिले जिन्होंने चाव से पूरा घर घुमाया। राजेन्द्र प्रसाद की भव्य मूर्ति के सामने सेल्फी लेने की बहुत कोशिश की, मगर हर बार बौनी नजर आई और फिर कोशिश छोड़ दी।

कैसे न याद करुं कि जब हम गांव में बच्चों का खेल देखने गए थे तब कथाकार अवधेश प्रीत ताश खेलने बैठ गए। वहां पहले से कुछ ग्रामीण ताश खेल रहे थे। कितना चैन, कितना सुकून था उस पल। जमीन पर ही बैठ कर ताश का दौर चलता रहा और मैंने मोबाइल से फोटो खींच लिया। फोटो तो बहुतों की उतारी। कुछ फोटो की याद कैसे न करुं जब कोहरे की भोर में हम पात्रों से मिलने और कहानी खोजने की बेचैनी में परिसर में टहल रहे थे, गांव की तरफ जाने को सोच रहे थे तो संजीवजी आ गए और उनसे साथियों की बातों का दौर शुरु हो गया। यह तस्वीर धुंधली सही मगर यादों में चमकती है। यादों के फोटोशॉप पर तस्वीर की धुंध छांटी जा सकती है।

याद तो हमेशा रहेगी वह अकेली नाव, जो छोटी सी कृत्रिम झील के बाहर खड़ी किसी कविता सी लग रही थी। उसके सामने बना छोटा सा कॉटेज, जहां हम रोज दोपहर का भोजन करते थे। उसके दरवाजे, उसके फर्नीचर सब इतने नक्काशीदार, इतने कलात्मक कि हम खाएं कम निहारे ज्यादा। दरवाजे पर बीचोबीच खड़ी संजीवजी की बेटी सेतिका और फिर मेरी तस्वीर तो सदा के लिए यादगार बन गई है। देखे तो लगे कि प्राचीन समय से बाहर निकल कर वर्तमान की तरफ झांकने चले आए हम।

याद तो इसे भी करना चाहिए कि भरोली गांव के बच्चों ने कैसे प्रियंवदजी से कहानी सुनी और उस पर पेंटिंग बनाई।

और अंत में सबसे मजेदार...नरेंद्रपुर के आसपास भटकन कितने...कितनी नहीं...कितने।

पांच या सात भटकन। यानी छोटे छोटे गांव के नाम...मियां के भटकन, तिवारी के भटकन, बाबू के भटकन, लाला के भटकन...अन्य भी भटकन होंगे। यह भटकने से संबंधित हरगिज न होगा। नामों का इतिहास भी लिखा जाना चाहिए। कितने किस्से होंगे।

कैसे न याद करुं कि जब ‘परिवर्तन’ परिसर के एक भवन में कई स्त्रियां चरखा पर सूत कात रही थीं तो मुझे वर्धा आश्रम और पुणे के म्यूजियम में संरक्षित करके रखी हुई कस्तूरबा की साड़ियां याद आईं और गांधी की प्रार्थना कहीं दूर से सुनाई देने लगी...

“वैष्णव जन तो तेने कहिए...”

पराई पीर समझने का नतीजा ही तो है यह ‘परिवर्तन’।

कितना कुछ भूल रही हूं...यादों से आग्रह के बावजूद कि उजालों को साथ रहने देना, ताकि साफ साफ देख सकूं बीता हुआ कल, स्याह परतें चढ़ीं रहीं।

शायद लोक फिर वापस बुलाए...स्मृति तुझसे होड़ रहेगी मेरी।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर वृतांत... दो ताबीज का सच..बहुत प्रभावित करने वाला.. ताकि अपनी तकदीर बदल सकूं ������

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  2. बढ़िया रिपोर्ताज है। भाषा भी अच्छी है। यद्यपि किसी को इससे भी शिकायत हो सकती है कि इसमें गांव के यथार्थ की कठोरता की जगह भ्रमण की मृदुता है। सुखद स्मृतियों की ही आत्मीयता है। खैर,

    सत्यनारायण पटेल की प्रियंवद की कथा भाषा और कथानक के संबंध में टिप्पणी आपको भले साहसिक लगी हो लेकिन मुझे लगता है वह सत्यनारायण जी की समझ की रूढ़ि है।

    भाषा को लेकर और कहानी के पात्रों को लेकर ऐसी ना समझी बड़ी मुखर रही हैं। इसमें सत्यनारायण जी ने केवल अपना हाथ उठाया है।

    वास्तव में कहानी के संबंध में यह एक धारणा है। और काफ़ी हद तक जितनी साहित्य में हो सकती है गणितीय है।

    हिंदी कथा साहित्य में दबे पांव एक ऐसा एक्टिविज्म चलाया जाता है जिसके शिकार निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, कृष्णा सोबती आदि हमेशा रहते हैं।

    मज़ेदार यह है कि पहले कहा जाता है कि प्रियंवद की कथा स्थितियां कृत्रिम हैं। फिर धीरे से बोल दिया जाता है प्रियंवद कहाँ से लाएंगे सरोकार? वे बिजनेस मैन हैं। यह एक बड़ी गहरी समस्या है।

    यदि इसके शिकार न हों तो प्रियंवद दार्शनिक कथाकार हैं। उनके यहां यथार्थ न केवल काव्यात्मक है बल्कि रागात्मक स्फीति में हमारी चेतना के बहुत निकट है।

    कुछ साल हुए प्रियंवद का उपन्यास आया था 'धर्मस्थल' न्याय व्यवस्था पर इससे अच्छा उपन्यास मुझे हिंदी में नहीं मिला।

    भाषा में ही साहित्य संभव होता है। साहित्य भाषा की ही बुलंदी है। और अर्थ केवल पंक्तियों के बीच ही नहीं होता देशकाल के अनुरूप भी होता है।

    लेकिन जिस तरह की वाचालता और यथातथ्य वर्णन की प्रवृत्ति इन दिनों हावी है उसमें प्रियंवद ऐसी ही महीन ना समझी के शिकार होते रहेंगे। इसका प्रतिवाद होना चाहिए। प्रियंवद की कहानियों की एक लंबी फेहरिश्त है। उनके यहां प्रेम, राजनीति, साम्प्रदायिकता, इतिहास से लेकर दर्शन और कलाओं के अन्तर्सम्बन्ध तक सब बड़े सघन हैं। इतनी व्याप्ति के कथाकार बहुत बहुत कम हैं इन दिनों। प्रियंवद की एक कहानी पर फ़िल्म भी है। 'अनवर' नाम से। एक लंबी कहानी आयी थी वर्षों पहले 'कलंदर'।

    इस वक़्त की एक बड़ी साहित्यिक ख़ासियत यह भी है कि बहसें नहीं होती। या तो समर्थन होते हैं या नाराज़गी।

    जो अच्छा है, रागात्मक है और सुंदर है उसकी रक्षा करना और उसे दर्ज़ करना भी साहित्य का बड़ा सरोकार है।

    प्रेम केवल प्रेम ही नहीं है कि उसमें स्त्री पुरुष ही तो मिलते है । प्रेम सामाजिक मुक्ति का भी उदघोष है। प्रियंवद ने जो जीवन जिया है और जैसी उनकी गहरी दृष्टि है तो वही प्रेम की मुक्ताकाशीय कहानी लिख सकते हैं। वातारण निर्माण में उलझे बिना प्रेम की संवेदना, करुणा और ममता को कहानी बना देना प्रियंवद से ही हो सकता था।

    एक प्रेम से कितना बदलता और टूटता है इसे किसी प्रेम कहानी को बचाकर भी दिखाया जा सकता है। जब कोई प्रेम कहानी पढ़ता है तो वह भी विद्रोह है।

    गुरुदत्त और अक्षय कुमार का फ़र्क़ समझा जाना चाहिए। गुरुदत्त ने किसी फ़िल्म में उतना सरोकार नहीं दिखाया जितना अक्षय कुमार ने।

    उत्तर देंहटाएं

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