कहानी: एक रात जिंदगी - गीताश्री

मैं, निर्भय निर्गुण गाने वाली गीताश्री, पत्रकारिता के जरिए दुनिया में ताक-झांक कर लेती हूं। ब्लाग से लेकर फेसबुक तक आवाजाही करती हूं। सपने देखती हूं, सपने बुनती हूं, छोटी छोटी बातो पर खुश रहने की आदत सी है। साहित्य की दुनिया में भी घुसपैठ बना रही हूं। सकारात्मक विचारो के उजाले से भरी गठरी साथ लिए चलती हूं... बैर किसी से ठानती नहीं, दोस्ती किसी से तोड़ती नहीं. "फैमिली फर्स्ट" फार्मूले पर चलते हुए जिंदगी का सफर जारी है...

एक रात जिंदगी

गीताश्री

वह धीरे धीरे खुल रही थी और मेरी आंखें धीरे धीरे मुंद रही थी कि अचानक उसकी आवाज बिल्कुल पास से आती हुई सुनाई पड़ी।

      “आई अलसो  हैव ब्वायफ्रेंड...”

      “ हैं...” मेरी नींद झटके से गायब।

      “ यस..इसमें चौंकने की क्या बात है। आई एम नौट सिंगल...क्या मेरा नहीं हो सकता...” उसने उलाहना दिया।

      अब मैं क्या करती। उसने बात ही एसी कर दी थी कि मैं चौक पड़ी। मेरी नींद उड़ाने का सारा कसूर मैं उसे देने वाली थी कि उसे गंभीर देखा। मैं बेड पर अधलेटी सी थी, उठ बैठी। रात के तीन बज रहे थे। सारी रात इनके किस्से सुनते रहो, अंतहीन किस्से। मुझे इनसे मिलवाते हुए डिलाइला ने कहा था कि तुम्हे तोप के गोले से मिलवाना है। आज तक एसी दिलचस्प औरत नहीं देखी होगी। बस एक बार मिल ले, साथ छोड़ने का मन नहीं होगा। मेरी उत्सुकता जगी। चल मिल लेते हैं। जब जब पंजिम की शामें गर्म होती हैं, डिलाइला इसी तरह के कुछ किरदार ढूंढ लाती है, ताकि एसी में बैठकर कहानियां सुनें और सो जाएं। पता नहीं डिलाइला को नमूने मिल भी जाते हैं, कहां कहां से। कभी कभी तो मुझे लगता कि पूरा पंजिम रहस्यमयी औरतों से भरा पड़ा है। मुझ जैसे शुध्द व्यवहारिक दुनिया में जीने वाली लड़कियां इस विचित्र लोक में विचरते हुए गड़बड़ा जाती हैं। फिर मैं ऊबकर डिलाइला को हाथ जोड़ती..माफ कर दे बहन..इससे अच्छा तू दोनों पाउला ले जाकर अच्छी अच्छी फिश खिला दे..हकूना मटाटा रसियन रेस्टोरेंट में गाना सुनवा दे, फ्लोर पर थिरकवा दे..लेकिन ये किसिम किसिम की पुरातात्विक महत्व की एतिहासिक औरतो से मिलवाना छोड़ दे। हर शहर में अकेली औरतो का एक झुंड होता है जो एक वृत्त बनाकर एक दूसरे के साथ जीती मरती हैं। उनके लोक में किसी के ब्यायफ्रेंड की घोषणा किसी धमाके से कम नहीं है। डिलाइला इस तरह की खबर को ब्रेकिंग न्यूज कहती थी। आज अभी अभी ब्रेकिंग न्यूज मिली कि इस वृत्त की एक स्त्री के पास कोई पुरुष मित्र भी है। ये खबर फैल जाएगी कल तक। लेकिन फिलहाल मुझे इनकी पूरी कहानी सुनने के लिए रात खराब करनी होगी। डिलाइला को पता नहीं क्यों इतना मजा आता कि वह मुझे विचित्र किंतु सत्य की तरह इन सबसे मिलवाती चलती और मैं पक रही हूं, इस दिशा में इसने सोचना बंद कर दिया था।

      मेरे सामने जो 55 साल की सांवली स्त्री बैठी है, इसको देखकर मुझे घोर अरुचि हुई। मैंने तय किया कि बेड पर पड़े पड़े इनकी बाते सुनते हुए सो जाना बेहतर रहेगा। मुझे क्या पता था कि नींद से बाहर एक रहस्यलोक मेरा इंतजार कर रहा है और जो मेरी नींद उड़ा देगा।

      डिलाइला भी चौंकी।

      “रियली  !!!“

      “इस उम्र में…? “ मेरे मुंह से निकला और उसने तत्काल मुझे घूरते हुए झाड़ दिया।

      “व्हाट डू यू मीन माई डियर...इस उम्र से क्या मतलब...?”

      “आई मीन...आपके बच्चे बड़े हो गए हैं, अभी आप उनके प्रेम किस्से सुना रही थीं...इसीलिए..”

      मैं हकलाने लगी।

      डिलाइला ने बात संभाली। “अरे छोड़ो यार..ये नया क्या बवाल है..सुनाओ..”

      मेकअप की परतो में अपनी उम्र को छिपाकर रखने वाली ये स्त्री थोड़ी देर पहले अपने आईपैड में कुछ तस्वीरें दिखा रही थी। हसीन लड़के के साथ हसीन लड़की थी। ये मेरा बेटा, ये उसकी गर्ल फ्रेंड...एक से एक फोटोज..दिखा दिखा कर गदगद थी। कैसे बेटा इस लड़की से मिला, कैसे दोनों शादी से पहले साथ रहकर एक दूसरे को समझ रहे हैं...कैसे लड़की बिंदास है, बेटा मस्त है। ये मेरी बेटी है, ये उसका ब्वायफ्रेंड है, दोनो लिव इन में हैं। शादी नहीं करेंगे, कहते हैं हम एसे ही अच्छे। मैंने गल्ती से पूछ दिया कि आपकी बेटी का व्वायफ्रेंड है और आप उसे सबको दिखाती है..वाह..खुल कर बताती भी हैं लिव इन के बारे में..।

      उनका मूड अचानक बदला-“आई अलसो हैव ...”

      माता जी तो दो कदम आगे निकली। मुझे पता नहीं क्यों, लगा कि वह अपने बारे में बताने का रास्ता तलाश रही थी इसलिए पहले बेटा बेटी से बात शुरु की और सीधा अपने ऊपर बात ले आई।

      मेरे मुंह से आंटी निकलते निकलते रह गया। हमारे बीच आधी उम्र का फासला तो था ही। अच्छा हुआ, नहीं तो मैं बहुत बड़े रहस्योदघाटन से वंचित रह जाती।

      वे आईपैड में अपने ब्वायफ्रेंड का फोटो निकाल रही थीं हमें दिखाने के लिए। डिलाइला को ये बात पहली बार पता चली। चौंकने की बारी उसकी भी थी। मैंने चुप्पी का ताला जड़ लिया था। बाद में मुझे अहसास हुआ कि मेरा फैसला अच्छा और समयानुकूल था।

      “ये हैं, मेरे साथ खड़े, हैंडसम गाए... मेरा ब्वाय फ्रेंड..”

      डिलाइला ने झुक कर फोटो देखा और जोर से चिंहुक पड़ी। मैंने उसके रिएक्शन पर ध्यान देते हुए फोटो देखा। खुले बालो वाली कमनीय स्त्री पैंट-शर्ट में थीं और साथ में गब्दू सा गंजे सिर वाला बुजुर्ग सा आदमी। चेहरे मोहरे से संभ्रांत दिखने वाले। दोनो पास पास खड़े थे लेकिन अंतरंग नहीं दिखे। एसा लगा जैसे दो पड़ोसी मुल्क, फोटोग्राफर को पोज देने के लिए साथ खड़े हों..। वह बोली—“बहुत शर्मीले हैं, पब्लिक प्लेस में थोड़ा परहेज..उनकी अपनी फैमिली भी तो है। बच्चे, बहू, पत्नी, भरापूरा परिवार...।“

      “मुझे तो कोई समस्या नहीं, बेटा और बेटी जानते हैं, दे सपोर्ट मी...ये देखो, डायमंड रिंग, मेरे ब्वाय फ्रेंड ने दी है। मैं हमेशा पहनी रहती हूं।“

      वह बोलते हुए दमक रही थी। उम्र का फासला कब का मिट चुका था। उनकी सूखी आंखें पनिया गई थीं। वह एक युवा स्त्री में बदल चुकी थीं जो अपने प्रेम के किस्से सबको सुना सुना कर निहाल होना चाहती थी। लड़की जब भी प्रेम में होती है तो चुप नहीं रहना चाहती। वह चाहती है किसी को सबकुछ शेयर करे, बताए कि उसका प्रेमी उसे कितना चाहता है। तब उसे किसी बदनामी का भय नहीं होता। वह मादकता बौराए वाली स्थिति में पहुंच जाती है।

      “ मैं पिछले पांच साल से इनके साथ रिलेशनशीप में हूं... हम बहुत प्यार करते हैं एक दूसरे से। मेरे दुख सुख का भी खयाल रखते हैं। अक्सर घर आते हैं। जब भी फ्री होते हैं। मैं उनकी फैमिली के बारे में ज्यादा नहीं जानती। बस उनसे मिली और फॉल इन लव विद हिम...। ही इज अ वेरी रिचमैन।“

      “बहुत सपोर्ट है मुझे। इमोशनली एंड फाइनेंशियली, आई टोटली डिपेंड ऑन हिम। हम छुट्टियां बिताने बाहर भी जाते हैं...” वह लगातार बता रही थीं। वह डिलाइला से ज्यादा मुझे सबकुछ बताने पर आमादा थीं। हमारी सारी बातचीत उनकी प्रेमकहानी के आसपास सिमट गई थी।

      डिलाइला की आंखें फैली हुई थीं जैसे उसने कोई अनहोनी बात सुन ली हो। मैं उन्हें सुनना चाहती थी। बेड पर आराम से लेट गई। उन्होंने मेरी तरफ तकिया बढाया। उन्हें एक अच्छा श्रोता मिल गया था।

      मैं अपने हसबैंड के डेथ के बाद बेहद अकेली थी, “सुधा..यू नो..बच्चे अपनी दुनिया में और मैं एक बड़ी हवेली में अकेली। कोई दोस्त भी नहीं..अकेली रेस्तरां में जाकर गाने गाती या चुपचाप बैठकर गाने सुनती। लोगो को देखती और आनंद लेती।“

      “वे कहां मिले आपको ?”

      मेरे सवाल से वे मुस्कुराई। उनकी ऊंगलियां आईपैड के स्क्रीन पर लगातार थिरक रही थी। शायद कुछ तलाश रही थीं।

      “एक रेस्तरां में..जहां वे भी अक्सर अपने दोस्तों के साथ आते थे।“

      “ हम्म्म्म...क्या आपके रिश्तेदार नहीं है..यहां ..?”

      “ हैं भी, नहीं भी...कहने को हैं...मगर वे मुझे अपना नहीं मानते..मैं रिजेक्टेड माल हूं।“

      “ऐसा क्यों...?”

      “ मैं उनकी ब्याहता नहीं थी। मैं उनकी सेक्रेटरी थी। मैं तब 19 साल की थी और वे 53 के। सोचो कितना अंतर रहा होगा उम्र का हमारे बीच। उन्होंने मुझे अपने पास रख लिया। जब मेरी मां ने आपत्ति की तो उनका मन रखने के लिए हमने शादी कर ली। हम कन्वर्ट हो गए थे। इस्लाम कबूल कर लिया था। पहले मैं नताशा डायस थी, फिर मैं शाइस्ता ओबेराय बनी। मेरी मां कहा करती थी कि इस आदमी से शादी करने की उम्र तो मेरी है, तुम क्यों कर रही हो।“

      डिलाइला पता नहीं कब उठकर पानी लाने चली गई थी। मैं उनकी कहानी में डूब रही थी। ये कहानी कहीं पहले भी सुनी थी। ये सारी बातें सुनी हुई सी क्यों लग रही है...मेरी स्मृतियों में कुछ सरगोशियां सी जमी हैं..वह उबलने लगी। किसी की कहानी से मिलती जुलती है, उनकी कहानी..शायद मेरे बहुत करीब के लोगो से..। शाइस्ता बोल रही थी, और मैं स्मृतियों की सघन यात्रा पर थी।

      “ जानती हो, शादी तो कर ली, पर वे हमारे साथ कभी नहीं रहे। जब वे मरे तो मुझे दूर से देखने की इजाजत भर दी गई। जायदाद में एक पाई भी नहीं मिली। दो छोटे बच्चो के सिवा कुछ छोड़ कर नहीं गए। जब तक रहे, मैं बहुत एश में रही...उसके बाद मैंने जो जिया, जो भोगा...वह अकल्पनीय है, किसी के लिए..”

      “कहां खो गई...?”

      “आं हां...नहीं कहीं नहीं...बस सोचने लगी थी...आपके बारे में..कितना सब आपने भोगा..जिया..कैसे इनका सामना किया होगा..? “

      डिलाइला थोड़ी गंभीर दिख रही थी और उसकी रुचि जैसे शाइस्ता की कहानी से खत्म सी हो गई थी। वह कसमसा सा रही थी। मानो वह अचानक शाइस्ता की मौजूदगी से उकता गई हो। शाइस्ता इस वक्त जिंदगी के पन्ने खोलने में व्यस्त थी। उसे किसी के रिएक्शन की परवाह नहीं थी। ना रात की फिक्र ना हमारी नींद की। उसकी आंखों में जैसे बीते कई दशक करवटें ले रहे थे।

      वह 19 साल की युवा लड़की थी, जिंदगी से भरी हुई। जो अपने घरवालो की गरीबी दूर करने के लिए बीच में पढाई छोड़ कर नौकरी की तलाश में ओबेराय हाउस पहुंच गई थी। मां की चिठ्ठी मिली, पढाई वढाई छोड़ो, कमाने की सोचो। घर चलाना मुश्किल हो रहा है...छोटी सी जान, अचानक कॉलेज की पढाई अधूरी छोड़ कर निकल पड़ी रोजगार की तलाश में। उसके युवा स्वप्नों के मोहभंग का दौर शुरु हो चुका था। वह ठीक से जवान नहीं हुई थी, उसका इंतजार किसी और को था। सीने में अरमान दबाए, आंखों में उम्मीद लिए जब वह ओबेराय मेंशन पहुंची तो पहली बार जिंदगी की सच्चाई टकराई । वहां रिसेप्शन पर बैठे एक खड़ूस टाइप आदमी ने रोक दिया।

      “कहां जा रही हो, इंटरव्यू का टाइम खत्म है।“

      “सौरी..मैं देर हो गई। बस देर से मिली। प्लीज..एक बार मिलवा दें.. प्लीज..” वह गिड़गिड़ा रही थी।

      वह डांटने की मुद्रा में उसे टाल रहा था। पाश्चात्य परिधान वाली ये सांवली लड़की उसे अपने बॉस की सेक्रेटरी के लायक नहीं दिख रही थी। उसने सोचा होगा कि उसे तो नौकरी मिलेगी नहीं, टाल ही दो तो बेहतर।

      नताशा कहां हार मानने वाली...”प्लीज..पांच मिनट के लिए..क्या पता मुझे काम मिल जाए।“ नताशा वहां से बिना इंटरव्यू दिए जाने को तैयार नहीं थी। वह लगभग धरना देने के मूड में थी। उस आदमी का बस चलता तो नताशा को धक्के मार कर बाहर कर देता। दोनों की नोंकझोंक के बीच रिसेप्शन पर फोन बजा और चमत्कार हो गया। एक खड़ूस आदमी की मुद्रा अचानक दयालू जैसी हो गई।

      “जाइए मैडम जाइए...सर ने अंदर से आपको देख लिया है... जाइए... बुलाया है। “ नताशा को लगा वह आदमी दांत पीस रहा है। जब वह लौटी तो उसका जीवन बदल चुका था। वह आदमी रिसेप्शन से गायब था। शायद उसे पता लग गया था और वह नताशा का सामना नहीं करना चाहता था।

      “वाओ ! ...घबरा गया होगा स्साला...” मैं हंसी जोर से। रोमांच हो रहा था। बेहद दिलचस्प और फिल्मी सिचुएशन थी। एक पल में जिंदगी बदल गई एक लड़की की।

      “फिर क्या हुआ नताशा...? ”

      “अब मैं शाइस्ता हूं..” वह मुस्कुराई।

      “यस यस..आई नो..शाइस्ता जी..”

      “नो जी वी..कॉल मी शाइस्ता..इतना जी वी ना बुलाओ..बड़ा भारी भरकम होने का बोध होता है यार..”

      “ओके.. फाइन.. शाइस्ता...”

      उस जिद्दी सी स्त्री ने मनवा लिया। डिलाइला ऊंघने लगी थी। उसका झबरू कुत्ता रहरह कर कूं कूं कर रहा था। उसे अपनी उपेक्षा का अहसास हो रहा था। झबरु ने जोर से माथा झटका तो डिलाइला चैतन्य हुई।

      “चल यार...बाकी बातें कल कर लेंगे..सुबह होने को है..कल का दिन खराब हो जाएगा। हमें कल पंजिम की खाक छनानी है। मैंने छुट्टी ले ली है..नहीं तो कल दिन भर सोते रह जाएंगे..”

      डिलाइला को बीच में ही रोका शाइस्ता ने..

      “नहीं, अभी बात पूरी हुई कहां..कल किसने देखा है डार्लिंग..हां अगर चैताली सोना चाहे तो कोई बात नहीं..”

      “अरे नहीं... डोंट वरी डिलाइला... कल मैनेज कर लेंगे... इतनी दिलचस्प रात से मैं क्यों वंचित रहूं... अभी अभी तो परी कथा शुरु हुई है। “

      डिलाइला ने लेटे-लेटे हाथ बढाकर झबरु को सहलाया और मुझ पर रहम वाली नजर फिराई। उसे मेरी दिलचस्पी शायद फालतू की लग रही थी। या कहां फंस गई टाइप कुछ कुछ..। उन आंखों में भी कुछ था..बाहर आना चाहता था। शायद वह भी कुछ कहना चाहती हो... कभी कभी हमारी आंखें, जिंदगी का इनबॉक्स बन जाती हैं, जिसमें से कई कई ईमेल झांकते रहते हैं जो अनरेड, अनपढ़े रहते है। जिन्हें पढने का कई बार टाइम नहीं मिलता हमें..। शाइस्ता भी वैसा ही एक ईमेल थी, पढे जाने को लेकर बेचैन। वह पूरी दुनिया को पढवाने के लिए बेचैन है। क्यों सुनाना चाहती है सबकुछ। मेरे भीतर कई सवाल उठ रहे थे।

      शाइस्ता ने अपने लंबे बालों को धीरे से समेटा।

      “जानती हो चैताली..उसने मुझे बहुत चाहा। मेरी खातिर मुसलमान बना। मेरे परिवार को संभाला। मुझे दो प्यारे प्यारे बच्चे दिए..बस पारिवारिक जिंदगी में शामिल नहीं किया। मैंने राज किया है राज...! रानी सरीखी थी मैं... खूब पैंपर किया जाता था मुझे। मेरी खातिर वह मुंबई का साम्राज्य छोड़कर गोवा में शिफ्ट हो गया... पर वो सब छलावा था। खैर... ये बाद में कभी। मैं गाने की शौकीन थी, पेंटिंग करती थी... हम साथ रहने लगे, और मैंने गाना और पेंटिंग दोनों शुरु किया। दुनिया भर में मेरे सोलो शोज हुए... बाद में मैं आर्ट क्लेक्टर बन गई। आज मेरे पास देश के तमाम नामी कलाकारों की पेंटिग्स है। आई हैव अ गुड एंड रेअर कलेक्शन।“

      “अपने प्यार के किस्से तो सुनाइए...किसने किसको प्रपोज किया..?”

      “अरे उसने...और किसने...?”

      “अच्छा...!!!”

      “और क्या..मैं अपनी सीट पर बैठी हमेशा गुनगुनाती रहती थी... कागजो पर कुछ भी पेंट कर दिया करती थी... वो सब उन्होंने देख लिया था। मेरे लंबे बाल तब भी थे चैताली... खुला रखती थी... उन्हें बहुत पसंद थे। एक बार बांध कर आ गई तो टोक दिया। मुझमें बचपना था और उनमें गजब का धैर्य और सूझ... पता नहीं किसने किसको संपन्न किया... लेकिन मुझे नहीं पता कि कब उनके जीवन में दाखिल हुई। यू नो... वी लव इच अदर मैडली... बहुत सारे रंग है इसमें... मेरी पेंटिग्स जितने... मेरे जीवन का कैनवस बहुत बड़ा है।“

      “हां..लग रहा है...इसे देखने के लिए एक रात काफी नहीं है।“

      “अभी तुम कब तक हो गोवा में ?”

      “दो दिन और ... लेकिन हर शाम कहीं न कहीं बुक है..”

      “चैताली..तुम दिल्ली में रहती हो... सुना है, प्रभावशाली भी हो, कॉलेज में पढाती हो... तुम्हारी तो जान-पहचान बहुत होगी ना, बड़े बड़े प्रकाशको से ? मेरी डील करा दो..मैं अपनी कहानी बेचना चाहती हूं।“

      “मैं बात करके देखूंगी...पता नहीं प्रकाशको की दिलचस्पी होगी या नहीं.. ?”

      “होगी क्यों नहीं... जिस घराने ने एक जमाने में सरकार की नीतियां तक प्रभावित की, उन्हें अपने हक में बदलवाया, जहां षडयंत्रों की अनगिन दास्तानें हैं...जब खुलेंगी तब दुनिया चौंकेगी। मैंने तो तुम्हे कुछ भी नहीं बताया... ये तो सिर्फ हाउलाइटस है... मैं तो सबूत भी दूंगी।“

      “किस बात के...?”

      “ये तुम्हें नहीं... जो लिखेगा, जो खरीदेगा उसे बताऊंगी... मैं अपनी यातना के कुछ साल यूं ही गुमशुदा नहीं रहने दूंगी चैताली... मैं जवान तो हुई ही नहीं कभी... गरीब होना कितना बड़ा पाप है... मेरे परिवार को पैसों की जरुरत थी, उसे एक जवान देह की, जिसे वह अपनी मगरुर बीबी के सामने पेश कर सके... उसके सामने उस देह को भोग सके... ज्यादा ना पूछो... बस... सब उगलना है मुझे...”

      शाइस्ता के होठ थरथरा रहे थे। वह कांप रही थी हौले हौले, हवा के हल्के झोंके से कांपते पत्तो की तरह..। उसने अपने खुले बाल बांध लिए थे।

      “आपके बच्चों को ये अच्छा लगेगा क्या... आपका इस तरह दुनिया के सामने..?” मैंने आद्र स्वर में पूछा।

      “अब मुझे किसी की परवाह नहीं... बच्चे कबके मेरी दुनिया से बाहर जा चुके... उन्होंने ओबेराय होने से इनकार कर दिया है... लेकिन मैं हूं... ओबेराय... शाइस्ता ओबेराय...”

      उसकी आंखें हिस्र् हो रही थीं। गालों पर लुढके आंसू को पोंछा... ”आएम सौरी... मैं रोना नहीं चाहती... उम्र भर रोई हूं... अब मैं अकेली, अपने पास हूं... अब मेरे होने का वक्त है, रोने का नहीं... रोएंगे अब वो लोग... सड़क पर ला दूंगी उन्हें... कैदी नहीं हूं मैं अब किसी की... मैं आजाद हूं... आजाद...”

      “आपने पहले मुक्ति के बारे में क्यों नहीं सोचा... मैं होती तो कब की निकल जाती..।“

      उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए मैंने हौले से कहा।

      “उनके जीते जी संभव नहीं था..वह कभी नहीं छोड़ते मुझे..और ना मैं... मुझे पर पूरे परिवार का दायित्व था... एक एक कर मां समेत दोनों भाइयों को सेटल करने का... किया... और मेरी मां... कैसे बताऊं... वे उनके साथ थीं..। और मैंने मौत के लिए प्रार्थनाएं शुरु की...सफल रही..पहली आजादी मां की मौत ने दी, दूसरी उनकी...आखिरी आजादी मेरे बच्चों ने... आह... अब मैं आजाद हूं..!“

      वह सुबक रही थी, रात के आखिरी पहर में..शायद सुबह होने को है। मैंने रोने दिया। चुप कराने की कोशिश नहीं की। उम्र भर की तकलीफ आसूंओं में धुलती कहां है फिर भी रो लेना, पीड़ा से बाहर निकलने का तात्कालिक समाधान तो है ही।

      “आप खुद क्यों नहीं लिखतीं..अपनी आत्मकथा...? “ उसे शांत देखकर मैंने पूछा।

      “नहीं... मुझे लिखना नहीं आता... मैं बस कहानी बेच सकती हूं... प्रकाशक लिखवा लें किसी से और मुझे पैसे दे दे... कितने में बिक जाएगी ?”

      डिलाइला की नींद उड़ चुकी थी। झबरु चुपचाप सो चुका था। मैं निरुत्तर थी, पौ फट चुकी थी। हल्का उजाला बाहर फैला था। खिड़की के परदे से छनछन कर हल्का उजाला रुम में आ रहा था, जैसे पुरानी स्मृतियां जबरन घुसी चली आती हैं कई यादों की परतो को उधेड़ते हुए।

      ओबेराय ग्रुप के स्कूल में कुछ टाइम मैं पढा चुकी थी। उस ग्रुप को तबाह होते देखा था। स्कूल प्रबंधन को दूसरे बड़े ग्रुप ने खरीद लिया था। सुना था, ओबेराय परिवार में जलजला आ गया है... कहीं से अचानक बड़े भाई का एक और परिवार निकल आया है जिसने जायदाद पर दावेदारी जता दी है ।

      “ शाइस्ता... लिसन... ये जो तुम्हारे नए प्रेमी हैं... यू नो, हू इज ही... तुम ठीक से उनके फैमिली बैकग्राउंड के बारे में जानती हो ?” डिलाइला ने बेचैनी से पूछा।

      “ नॉट मच... मुझे जानना भी नहीं है। मेरे लिए इतना काफी है कि ही जेनुइनली लव मी, सपोर्ट मी। हां, मुझे वक्त कम देता है... बट ही इज वेरी वेरी केयरिंग..”

      “ओह...ओके... बी केयरफुल्ल... फिर उसी तकलीफ में ना पड़ जाना, जहां से मुक्ति पाई है।“

      शाइस्ता उठी, बिना कोई जवाब दिए, हम दोनों के गले लगी और शाम को मिलने का वादा लेकर लौट गई।

      मुझ पर शाइस्ता की पीड़ा का गहरा असर था। मैं उनींदी सी बेड पर लुढक गई। एक स्त्री को एक रिश्ते से आजाद होने में इतना वक्त क्यों लगा... कितने सवाल और कितने जवाब... कमरे के वायुमंडल में तैर रहे हैं... कितने फैक्टर काम करते हैं एक स्त्री की आजादी में। कितने लोग मिलकर तय करते हैं उसकी कैद। क्या मौत ही आजादी का एकमात्र रास्ता होती है..ये तो क्रूर एप्रोच है, हम क्यों नहीं, साहस जुटाते..

      मैं कंपकंपा गई। अनगिन स्त्रियों के चेहरे तैरने लगे। कई आवाजें आने लगीं... नहीं यार, कैसे छोड़ दूं इस आदमी को, बाहर में सौ कमीने को झेलने से अच्छा है, घर में एक को झेलना... अरे यार... अब वो वैसा ही है... क्या करे, कहां जाएं... सारे रास्ते तो बंद है, अब उम्र भी नहीं रही... उसे तो किसी भी उम्र में लड़कियां मिल जाएंगी, हमारा क्या होगा... बच्चों को लेकर कहां जाऊं... बच्चों को उनकी जरुरत है... मैं नौकरी भी तो नहीं करती... ये जीवन तो गया... जाने दो... काट लेंगे जीवन... मैं उसके दायरे में रहकर तलाश रही हूं अपना लक्ष्य... मेरा नियंत्रण उनके हाथ में... पूछना पड़ेगा जी... नहीं तो घर में तांडव हो जाएगा...

      आवाजों का कोलाज, उनका कोलाहल बढ़ता जा रहा था... मैं उठकर बैठ गई। घर के दरवाजे सलाखों में तब्दील हो गए थे।

      डिलाइला कुछ कह रही थी-

      “यू नो चैताली, शाइस्ता किसके चक्कर में है। वहां भी धोखा खाएगी, मरेगी, ही इज माई फादर इन लॉ... वे लोग बास्को में रहते हैं। मैं अपनी सास को बहुत प्यार और सम्मान करती हूं... वह अक्सर बीमार रहती है... चल फिर नहीं सकतीं। अब समझीं वो बीमार क्यों रहती हैं... ओह...। मेरे पति से तलाक के बावजूद मैं उनके पास आती जाती रहती हूं... बिकौज शी अंडरस्टैंड माई प्राब्लम एंड हमेशा मेरे पक्ष में लड़ी। लेकिन मेरे ससुर और पति ने अब तक मुझे अपनी अपनी जायदाद से एक फूटी कौड़ी भी नहीं दी... जो पुरुष अपनी पत्नी के नहीं होते, वे बाहरवालियों के क्या होंगे। ये बात औरतों को समझ में क्यों नहीं आती... क्यों वे शादीशुदा पुरुषों के चक्कर में... कब अक्ल आएगी... ओह...

      झबरु उधर से भौंकता हुआ आया और डिलाइला के पैरो के पास आकर कूं कूं करने लगा। मैं घबराई हुई उठी, कमरे की खिड़की के पास गई। परदा हटाया। समंदर की नमी हवा में थी। नारियल के पेड़ जोर जोर से हिल रहे थे। एक फल टूट कर नीचे धप्प से गिरा। मैंने अपनी दोनों बाजुओं में ताकत जुटाई और भड़ाम से खिड़की के जंग खाए दोनों पल्ले खोल दिए। नींद पूरी तरह जा चुकी थी, ऐसा लगा मानों सदियों के बाद जागी हूं।

      “मत खोल...तेज हवा है, सब उधिया जाएगा... रेत भर जाएगी अंदर...”

      डिलाइला चीखती हुई मेरे पास आई। उसने खिड़की के पल्लों की तरफ हाथ बढाया, मैं उससे लिपट गई। ये सिर्फ झबरु बता सकता है कि हवा का शोर तेज था या दो स्त्रियों का रुदन...।

बहुवचन से साभार
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