पुरुषोत्तम अग्रवाल - कहानी: चौराहे पर पुतला | Purushottam Agrawal

हंसती खेलती सी दिखने वाली ये कहानी दरअसल हमारे समय के भयावह सत्य को उजागर करती है और अपनी रोचकता भी बनाये रखती है। पुरुषोत्तम जी ने एक साथ तीन-चार गंभीर मुद्दों को इस कहानी में उठाया है और हर मुद्दे के साथ पूरा न्याय किया है, इसलिए कहानी थोड़ी लम्बी है लेकिन... सफल है, रोचक है।

पुरुषोत्तम जी की हिंदी पर पकड़ को कुछ कहना बड़ी मूर्खता होगी, लेखक की अपनी भाषा के मुहावरे पर गज़ब की पकड़ है और यह पकड़ जाने-माने मुहावरों के अनोखे रचनात्मक प्रयोग में दिखती है । ये पढिये... “मुख्यमंत्री को बचपन में पढ़े अनेक मुहावरों का बोधार्थ और भावार्थ एक ही झटके में सिद्ध हो गया। उन्हें मालूम पड़ गया कि पाँव के नीचे से धरती कैसे खिसकती है, रीढ़ की हड्डी में ठंडक कैसे दौड़ती है, सर पर आसमान कैसे टूट पड़ता है, जबान कैसे तालू से चिपक जाती है। उनका चेहरा अपने ही नहीं, प्रधानमंत्री के कुर्ते से भी ज्यादा सफेद हो गया।"

कहानी प्रहार करती है “सुंदरी-सहानुभूति बटोरने के चक्कर में अकेलेपन के गीत अलापते कवियों-कलाकारों ...” और ये भी कहती है “प्रगतिशील हूँ, वामपंथी हूँ, नामर्द तो नहीं…” ऐसे अनेक हिस्से हैं कहानी में जहाँ भाषा और शब्द अपनी गुम हो रही सुन्दरता दिखाते हैं। 

हिंदी कहानियों आदि में भाषा पर संकरण का आक्रमण इतना व्यापक हो चला है कि यदि इस पर ध्यान ना दिया गया तो जिस तरह भाषाएँ लुप्त हो रही हैं वैसे ही शब्द भी एक दिन। यहाँ तीन और नाम ज़ेहन में आते हैं जो हिंदी की समृद्धता का महत्व समझते हुए, इसके लिए काम कर रहे हैं ओम थानवी, अभय दूबे राहुल देव। 

हिंदी ! शायद, हमारा वो कर्तव्य है - जिसे अब हमने अपना कर्तव्य मानना छोड़ दिया है। 

पुरुषोत्तम जी को आभार कि उन्होंने “नया ज्ञानोदय” में प्रकाशित अपनी यह कहानी “शब्दांकन” को उपलब्ध करायी।        

भरत तिवारी 
संपादक

चौराहे पर पुतला  

पुरुषोत्तम अग्रवाल
कलाकारों, बुद्धिजीवियों के बीच रवि संदिग्ध हुए जरूर, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री और गंगाधर दोनों की तीखी निन्दा करके फिर से कलाकार-बुद्धिजीवी समुदाय को अपनी मूल क्रांतिकारिता का विश्वास दिलाया। उधर, जैन साहब के साथ जा कर मुख्यमंत्रीजी से, और शुक्लाजी के साथ जा कर गंगाधरजी से मिलने में भी देर नहीं लगाई। बात दोनों नेताओं को जम भी गयी, तय हुआ कि यदि सरकार ऐसी कोई पहलकदमी करे तो गंगाधरजी सुनिश्चित कर लेंगे कि उनकी पार्टी भी पुतले को हटाने की जिद छोड़ कर उसे चड्डी पहनाने पर राजी हो जाए।


मुख्यमंत्री सिंह साहब और पंडित गंगाधर के कदम एकदम मिले हुए थे। दोनों महानुभावों का ताल्लुक परस्पर विरोधी राजनैतिक पार्टियों से था, लेकिन यहाँ दोनों नेता राजनैतिक मतभेदों से उसी तरह कोई छह इंच ऊपर उठ कर चल रहे थे जैसे कि ‘अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा’ वाली हरकत करने के पहले युधिष्ठिर का रथ चला करता था। दोनों के नेतृत्व में चलते जन-समूह में भी राजनैतिक जुलूसों वाला छिछोरा जोश नहीं, धार्मिक चल-समारोह सरीखा भावपूर्ण उत्सव था। दृश्य भी ऐन वैसा ही– सबसे आगे शहनाई बजाने वाले अपनी चमकीली अचकनों में, फिर बैंड वाले अपनी दमकीली पोशाकों में, रास्ते पर पुष्प-वर्षा करते युवक-युवतियाँ, मुख्यमंत्रीजी और गंगाधरजी साथ-साथ। फौजी लोग क्या कदम मिलाएंगे, जिस तरह गंगाधरजी मुख्यमंत्री से कदम मिलाए हुए थे। मामला संस्कृति का था, और गंगाधरजी की पार्टी तो जानी ही सांस्कृतिकता के लिए जाती थी। जिस विवाद का हल करने आज जा रहे थे, उसके प्रसंग में भी इन मुख्यमंत्री ने,जो विवाद आरंभ होने के समय विधायक ही थे, और इनकी पार्टी ने तो शुरु में दुष्ट तत्वों का ही साथ दिया था, और आज देखो, ऐसा जता रहे हैं, जेसे जन-भावनाओं का सारा बोध इन्हीं को है…याने, मेहनत गंगाधरजी और उनकी पार्टी के लोग करें, विवाद की आँच सुलगाएँ, भावनाओं के आटे को हौले-हौले भून-भून कर, उपयुक्त मात्रा में शब्दों की शर्करा और चतुराई का घृत मिला कर; सुनहरी, स्वादिष्ट पंजीरी बनाएँ और जब प्रसाद बँटने का समय आए तो मुख्यमंत्री ही बाँटने वाले भी बन जाएँ और पाने वाले भी—यह भला कैसे हो सकता है। इसीलिए उम्र में मुख्यमंत्री से आगे होते हुए भी, गंगाधरजी कटिबद्ध थे कि संस्कृति के इस प्रसाद-वितरण समारोह में मुख्यमंत्री को आगे न होने देंगे।

       प्रोफेसर रवि सक्सेना भी कोशिश तो जी-तोड़ कर रहे थे, दोनों नेताओं के साथ कदम मिला कर चलने की, लेकिन कामयाबी की राह में रोड़े बहुत थे। बरसों पहले वे इस नगर में लेक्चरर होकर आए थे। नौकरी तो एमए करते ही पा गये थे, लेकिन पीएचडी करने में बीस साल लगा दिये थे, सो भी वाइस-चांसलर के धमकाने पर ही की थी। पीएचडी के लिए समय निकालना मुश्किल यों था कि रविजी का अधिकांश समय पढ़ने-लिखने जैसे तुच्छ कामों में नहीं, छात्रों को क्रांति के लिए तैयार करने में गुजरता था या फिर साथी अध्यापकों को अपने ज्ञान से कायल करने और अपने प्रिय छात्रों से घायल करवाने में। दीगर सामाजिक दायित्व भी थे। मसलन, जो आज होने जा रहा था, उसे ही प्रगितशील शास्त्रसम्मता प्रदान करने में सक्सेनाजी ने पिछले कई साल लगा दिये थे। खूबी यह थी कि ऐसा करते समय वे मुख्यमंत्री और गंगाधरजी दोनों की पार्टियों की निंदा करके अपनी सत्ता-विरोधी छवि भी बनाए रखते थे। वे तथा उनके मौसेरे भाई अरुण काँख ढँकी रखते हुए ही मुट्ठी तनी दिखाने की कला में माहिर थे। अरुण तो मुख्यमंत्रीजी की पार्टी को भर मुँह गालियाँ देते देते ही, उन्हीं की कृपा से पिछले कई वर्षों से यूरोप में हिन्दी-सेवा कर रहे थे, दोनों बेटियाँ आईटी प्राफेशनल्स का पति-रूप में वरण कर आनंदपूर्वक अमेरिका में निवास कर रही थीं। रवि इस लिहाज से थोड़े पिछड़ गये थे, अभी तक यहीं इसी पिछड़े देश में पड़े थे। कलेजा फुँकता था, अपने इस पिछड़ेपन पर…करें क्या, यह नालायक जया…लाइफ वर्स करके रख दी है, अपने बेटर हाफ ने…अब इसी प्रसंग को लो…

       खैर, जया का उपचार तो बस कुछ देर में हुआ ही चाहता है, अभी तो यहाँ ध्यान लगाएं, चल-समारोह में। इसमें शामिल होने को लेकर काफी पशोपेश से गुजरे थे प्रोफेसर साहब, अब तक तो रणनीति एकांत में मुख्यमंत्री की मुसाहिबी करने और खुले में उनकी खिल्ली उड़ाने की ही रही थी, मैनेज भी बखूबी कर लेते थे। लेकिन पिछले कुछ दिन से मुख्यमंत्री कामना करने लगे थे कि जो सुखद अहसास रवि उन्हें एकांत में प्रदान करते हैं, उसकी सार्वजनिक प्रस्तुति भी हो ही जाए। अब रवि क्या करें? ‘कोई बात नहीं, अपना लक्ष्य महत्वपूर्ण है, और रणनीति स्पष्ट। अरुण की ही तरह का चक्कर चलाना है। अब मुख्यमंत्री चाहते हैं तो यही सही, एकांत-सेवा की सार्वजनिक प्रस्तुति ही सही। वैसे भी, जहाँ तक आज के आयोजन का सवाल है, आइडिया तो अपना ही था। बौद्धिक समर्थन देते ही रहे हैं, चलो, शामिल भी हो जाते हैं। काँख जरा सी और उघड़ेगी जरूर, कोई बात नहीं, मौका मिलते ही, फिर से ढाँप लेंगे। और फिर, चल-समारोह में मुख्यमंत्री के साथ चलते-चलते खिंचवाए गए फोटो काम तो आएंगे ही, थानेदार से ले कर वाइस-चासंलर तक’।

       लेकिन आज, जब रवि मुख्यमंत्री और गंगाधरजी के कदमों से कदम मिला कर, कैमरों के जरिए आमो-खास के आकलन में वीआईपी स्टेटस हासिल करने के चक्कर में थे, तब…मुख्यमंत्री की कनखियों की भाषा समझने वाले सुरक्षाकर्मियों ने प्रोफेसर साहब को उनकी उचित जगह पहुँचा दिया था, याने चल-समारोह के दोनों नेताओं से कोई बीस कदम पीछे।

       रवि सक्सेना को प्रेमचंद का अमर कथन बड़ी शिद्दत से याद आ रहा था, ‘साहित्य राजनीति के पीछे नहीं, आगे चलने वाली सचाई है…’ और उनका मन उपन्यास-सम्राट को जबाव भी दे रहा था, ‘होगी आपके ख्याल में जनाब, हकीकत हम तो जानते ही हैं, आप भी देख लीजिए’। प्रेमचंद पर खीझ के साथ, रविजी को जया पर भी एक बार फिर से गुस्सा आने लगा था—‘उसी की वजह से पिछले बीस साल तबाह हो गये…बनती है इंटेलेक्चुअल की औलाद… मुझ सरीखे फर्स्ट क्लास, लेफ्टिस्ट इंटेलेक्चुअल की अंडरस्टैंडिंग कामरेड होने तक की सांस्कृतिक जिम्मेवारी तो ठीक से निभा नहीं पाई… पुतला छाया रहता था देवीजी के ऊपर, ‘क्या होगा पुतले का? लोग क्यों पीछे पड़ गये हैं बेचारे के?’

       पुतला…पुतला… काश कोई इस हरामजादे पुतले को बम से ही उड़ा देता, कलात्मकता के नाम पर पतनशील सामंती संस्कृति को चौराहे पर परोसता, बेहूदा, लुगाई-लुभावन कमीना पुतला…पति साले के सारे मूड का, उन प्रेम-पलों से लेकर जीवन के सारे पलों तक के लिए पटरा हो जाए, हमारी देवीजी तो अपनी कामना के पटरे पर पुतले को ही पधराए रहेंगी…कुछ कह दो तो समता-स्वाधीनता बखानने लगेंगी, स्टुपिड कहीं की.. मैं कब तक झेलता ऐन निजी पलों में होने वाला यह अनाचार; प्रगतिशीलता के चक्कर में कब तक उस हरामी पुतले को इजाजत देता कि वह मेरी लुगाई को लुभाता रहे.. प्रगतिशील हूँ, वामपंथी हूँ, नामर्द तो नहीं…’

       ‘धत्तेरे की, क्या हो रहा है यार मुझे, यह साला मेल शाविनिज्म मेरी चेतना में क्यों घुसा जा रहा है…नहीं, नहीं, नहीं… मर्द-नामर्द की बात नहीं, मैंने तो सार्वजनिक नैतिकता की रक्षा करने के जनवादी कर्तव्य का निर्वाह किया है। डिक्लास, वर्गच्युत तो अपने आप को न जाने कितने लोग करते आए हैं, इस साले पब्लिक एनेमी नंबर वन पुतले का उपचार करने के लिए, अपने ही नहीं न जाने कितनों के दांपत्य-जीवन की रक्षा करने के लिए मैंने तो स्वयं को विचारच्युत किया है। इतिहास-देवता मेरे इस बलिदान पर कितने खुश होंगे…’ इतिहास-देवता के भव्य दरबार में खुद को खिलअत पहनाए जाने की कल्पना करते ही रवि रोमांचित और पुलकित हो उठे, लेकिन इतिहास–देवता के सामने पेशी जब होगी तब होगी, अभी तो यहाँ फोटो खिंचाने तक के रास्ते में मुख्यमंत्री के दुष्ट सुरक्षा-कर्मी आ अड़े थे, लेकिन, कोई बात नहीं…जैसे अपन पब्लिक में मुख्यमंत्री से दूरी बरतने को मजबूर हैं, वैसे ही मुख्यमंत्री भी तो…

       मुख्यमंत्री की मजबूरी समझते ही प्रोफेसर रवि सक्सेना पूरमपूर क्षणजीवी हो गये। वर्तमान क्षण का सत्य तो यही है कि पुतले की बदमाशी का उपचार होने में बस कुछ ही पल की देर है। जया पड़ी दिखाती रहे, पुतले के प्रति करुणा, सराहना, चाहना और ना जाने क्या, क्या…विजय ने तो मेरा वरण कर ही लिया है। इस विजय-वरण के मनमोहक, मादक स्वरूप पर मोहित होते रविजी रोक नहीं सके खुद को जयकारा उछालने से, ‘सिंह साहब की जय हो, गंगाधरजी की जय हो…’

       दोनों जयकारे एक साथ लगाए जाएं यह उस अलिखित समझौते का केंद्रीय प्रावधान था, जिसके तहत सिंह साहब और गंगाधरजी के कदम मिल कर उठ रहे थे। विवाद का अंत करने की सद्भावना का ही प्रमाण यह फैसला भी था कि कोई राजनैतिक नारे इस जुलूस में नहीं लगेंगे सिवा सर्वमान्य नारे ‘भारत माता की जय’ के। और,मुख्यमंत्रीजी की जय या गंगाधरजी की जय को तो राजनैतिक नारा कहा नहीं जा सकता। आखिरकार, जिस विवाद के अंत का आज उत्सव मनाया जा रहा था, उसकी समाप्ति भारत माता की जय की सूचना तो देती ही थी; साथ ही दोनों महानुभावों की जय की भी। सो, चल-समारोह में शामिल भाव-विह्वल लोग बारंबार जयकारे कर रहे थे। तीनों स्वीकृत जयकारों–भारत माता की जय, मुख्यमंत्री सिंह साहब की जय और गंगाधरजी की जय—की बारंबारता के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता था कि जयकारे के असली पात्र सिंह साहब और पंडितजी ही थे, भारत माता तो बेचारी राजनीति और संस्कृति के गुरु-गंभीर पाठ के पन्ने पर छोटा सा फुटनोट थी। रवि सक्सेना तो भारत-माता की अवधारणा को सिद्धांतत: ही दक्षिणपंथी भ्रम मानते थे, सो उन्होंने पूरे चल-समारोह में यह फुटनोट एक बार भी नहीं लगाया; गले की सारी ताकत असली जय पर ही केंद्रित रखी।

       दोनों नेताओं के कानों में रवि सक्सेना के उछाले असली जयकारे सुख ढाल रहे थे। दोनों ने लगभग एक ही साथ पुचकारती निगाहों से रवि सक्सेना को देखा, लेकिन रविजी को बीस कदम का प्रोमोशन देकर अपने साथ चलने की अनुमति देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

       यह सचमुच उत्सव का दिन था। पिछले बीस सालों से नगर ही नहीं, सारा देश जो संताप झेलता रहा था, आखिरकार उसके अंत का दिन। हालाँकि कुछ लोग अभी तक संतप्त थे, संताप का अंत वे भी चाहते ही थे, हालाँकि किसी और विधि से। लेकिन विधि के विधान के बारे में तो बात वही पुरानी, ‘मेरे मन कछु और है विधना के कछु और’…। वक्त अपनी राह बढ़ता गया था; किसी और विधि की तलाश में लगे संतप्तों की तादाद घटती चली गयी थी। बचे-खुचे जो रह गये थे, वे और अधिक संतप्त थे, क्योंकि इन्होंने मुख्यमंत्री से उम्मीद बाँध रखी थी कि विवाद का अंत गंगाधर जैसे लोगों के दबाव में आए बिना, अच्छी तरह सोच-विचार कर किया जाएगा। बीस साल के अरसे में, गंगाधर तो वहीं के वहीं थे, लेकिन मुख्यमंत्री ये पाँचवें थे, और गंगाधर के विरोधियों को इन्हीं से सबसे ज्यादा उम्मीदें थीं। उम्मीद इन लोगों को विवाद पर विचार करने के लिए बनाए गये जस्टिस लेबयान आयोग से भी थी। लेकिन न्यायमूर्ति लेबयान ने भी फैसला अंत-पंत गंगाधरजी के मन-माफिक ही दिया था, और बचे-खुचे संतप्त ‘कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नजर नहीं आती’ की मनोदशा को प्राप्त हो गये थे। उनकी निराशा का आलम यह था कि अपना बचा-खुचा संताप किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के जरिए व्यक्त करने की भी न उनके पास हिम्मत बची थी, ना ख्वाहिश। जो भी ख्वाहिशें बची थीं, वे फेसबुक और ट्वीटर के जरिए निंदा, कुंठा, संत्रास आदि की सर्जनात्मक अभिव्यक्तियों तक सिमट गयी थीं। असली दुनिया के हाशिए पर धकेल दिये गये संतप्त आभासी दुनिया में अपना कल्पनालोक सँवार रहे थे, सारे घटनाक्रम को नींदते, मुख्य-धारा को दूषते पुण्य-श्लोक उच्चार रहे थे। आभासी दुनिया के भीतर भी जोखिम कम नहीं थे, क्या जाने किसको कौन सी बात किस कारण खटक जाए; और आभासी दुनिया में की गयी आभासी टीका-टिप्पणी पर बिल्र्कुल ठोस टिप्पणी करने इलाके का थानेदार, आईटी एक्ट की धारा 66-ए से लैस आपके सर आ धमके। लेकिन फिर भी…

       लेबयान आयोग की रिपोर्ट आने के बाद गंगाधरजी ने विजय-दर्प की हुंकार छोड़ी थी, और मुख्यमंत्रीजी ने पिंड छूटा वाली राहत की साँस। वे रिपोर्ट पर फौरन अमल करना चाहते थे। धनतेरस के दिन पुष्य-नक्षत्र का योग सोने की खरीदारी के लिए तो श्रेष्ठतम जाना ही जाता है, वैसे भी परम शुभ योगों में इसकी गणना होती है। मुख्यमंत्रीजी ने तय किया था कि यह शुभ काम पुष्य नक्षत्र में, धनतेरस के शुभ दिन ही संपन्न होगा। दुष्ट लोग भले ही सोने की खरीदारी से वोटों की खरीदारी की तुक मिलाते रहें, मुख्यमंत्री ऐसे तुक्क्ड़ों की परवाह करें तो हो चुका राज-काज। बीस सालों से चले आ रहे विवाद का निपटारा धन-तेरस के दिन होने का राजनैतिक संदेश यह था कि मुख्यमंत्री दिवाली का तोहफा दे रहे हैं। इसीलिए बाकी आयोगों की रपटों के लिए भले ही सचिवालय गुमनामी का कब्रिस्तान साबित होता हो, लेबयान आयोग की रपट पर अमल करने में सरकार ने एक महीना भी नहीं लगाया। मुख्यमंत्री ने राजधानी से घोषणा कर दी थी कि वे धनतेरस को नगर पधारेंगे और इस विवाद का अंत हो जाएगा।

       मुख्यमंत्रीजी और गंगाधरजी कदम से कदम मिलाते हुए, विवाद के अंत की ओर बढ़ रहे थे। सड़क किनारे खड़े और नाखड़े लोगों की ओर करबद्ध नमस्ते उछालने में भी दोनों के बीच पूरा तालमेल था। लग रहा था, दो सगे भाई इकलौती बहन को भात पहनाने जा रहे हैं। सुरक्षा-कर्मियों द्वारा अपनी सही जगह पर पहुँचा दिये जाने के बावजूद रवि सक्सेना मौका देखते ही मुख्यमंत्री और गंगाधर से चिपकने के गुंताड़े में पड़ जाते थे, हालाँकि जरा सी सफलता मिलते ही सुरक्षाकर्मी उन्हें फिर से पीछे धकेलने में पल भर की भी देर नहीं करते थे। लेकिन रवि क्या कम थे, समारोह के आगे-आगे उल्टे चल रहे फोटोग्राफरों के कैमरों में कम से कम दो-तीन बार तो मुख्यमंत्रीजी और गंगाधरजी के साथ दर्ज होने में कामयाबी उन्होंने पा ही ली थी। अपनी गुंताड़ेबाजी में रवि सक्सेना भात पहनाने जा रहे संपन्न सगे भाइयों के दरिद्र, दूर के रिश्ते के भाई जैसे लग रहे थे। सुरक्षा-कर्मियों को रवि की गुंताड़ेबाजी पर कभी खुंदक आती थी, कभी हँसी। इस तरह की हँसियों, खुंदकों, गुंताड़ों और बैंड-बाजों को साथ लिए हुए, यह जनसमूह वैसे ही जा रहा था जैसे भात पहनाने वाला भाई बहन को आश्वासन देने जाता है कि ब्याह की खुशी में भी बहन के साथ है और जोखिम में भी। मुख्यमंत्रीजी और देशप्रेमीजी चौराहे पर खड़े पुतले को आज बताने जा रहे थे कि उसके अकेलेपन और निर्वासन के दिन दूर करने में, तमाम राजनैतिक मतभेदों के बावजूद दोनों नेता साथ हैं। जैसे भात के चल-समारोह में सबसे आगे भात का सामान थालों में सजा कर ले जाया जाता है, वैसे ही इस चल-समारोह में मुख्यमंत्री और गंगाधरजी के ठीक पीछे-पीछे दो युवक विवाद-समाधान की सामग्री के थाल श्रद्धा और प्रेमपूर्वक हाथों में लिए चल रहे थे।

       विवाद-ग्रस्त पुतला संगमरमर का था, सो निर्जीव ही कहलाएगा। लेकिन इंसान की शक्ल में ढलते ही पत्थर में भी कुछ तो इंसानियत आ ही जानी चाहिए, और इंसान अकेलापन कितनी देर सह सकता है? एकांत के बड़े से बड़े साधक को भी किसी न किसी पल दूसरे की जरूरत पड़ती है। अकेलेपन की महिमा साधने वाले साधक और पैगंबर भी अनुयायियों की तलाश में निकलते हैं। इंसान तो इंसान, भई आखिर जब परब्रह्म को भी कहना पड़ा कि एकोहं बहुस्याम-अकेला हूँ, बहुतों में बदल जाऊँ—तो हमारी आपकी क्या औकात।

       खुशी या ग़म या गुस्से के पलों में तो इंसान को दूसरों की जरूरत और भी ज्यादा महसूस होती है। इस विवाद में भी कोई इंसान अकेला नहीं था, विवाद में वह इस तरफ हो या उस तरफ। मौका खुशी का हो या ग़म का, जीत का हो या हार का…हरेक के साथ कोई ना कोई था, हरेक किसी ना किसी के साथ था। अकेला था तो वह पुतला था, जिसको लेकर सारा विवाद था। संगमरमर में ढला वह इंसान पिछले बीस साल से अकेला था। फैन-क्लब बनाने के चक्कर में, सुंदरी-सहानुभूति बटोरने के चक्कर में अकेलेपन के गीत अलापते कवियों-कलाकारों के विपरीत, यह संगमरमरी पुतला सचमुच अकेला था। दुनिया के सारे मजे लूटते, साल के अधिकांश दिन यूरोप के एग्जाटिक स्थानों में बिताते, फिर भी स्वयं को उत्पीड़ित, निर्वासित बताते; करुण की सृष्टि करने की कोशिशों में वीभत्स का संचार करते कथाकारों-लेखकों के आत्म-घोषित निर्वासन के विपरीत, यह पुतला सचमुच निर्वासित था। विवाद के केंद्र में वह जरूर था, लेकिन विचार के केंद्र तो क्या, हाशिए तक पर उसे कोई जगह हासिल ना थी।

       उसकी जगह थी, बरसों से चले आ रहे अकेलेपन और निर्वासन में। चौराहे पर कहा जाने वाला संगमरमरी पुतला, अपने निर्वासन में चौराहे के एक कोने पर खड़ा था, कुछ दिन उसने भी चौराहे की रौनक देखी भी, उसमें कुछ अपना योगदान भी किया। बनाने वाले कलाकार का ही था यह विचार कि पुतले को चौराहे के हरियाले गोलंबर में नहीं, बल्कि उसके बाहर जहाँ दो सड़कें मिल रही हैं, वहाँ खड़ा किया जाए; इस तरह पुतला लोगों के आने-जाने के बीच पड़ता नहीं, उनके साथ होता लगेगा। कुछ दिन तक सब ठीक-ठाक रहा, लोग पुतले को देख मुस्कराते थे, पुतला भी उन्हें मुस्कराते देख खुश हो लेता था। लेकिन, जल्दी ही विवाद शुरु हो गया और फिर उसे वहीं खड़े-खड़े निर्वासित कर दिया गया था। उसके खड़े होने की जगह को ईंटों की गोल दीवार से घरे दिया गया। इस दीवार में एक दरवाजा भी था, लेकिन ताला-जड़ा।

       पिछले बीस बरस से वह गोल दीवार के भीतर था, यहाँ तक कि उसके सर पर भी सीमेंट का चंदोवा तान दिया गया था, लक्ष्य यह था कि कोई उसे देख ना पाए—ना सड़क से, ना आस-पास के छज्जों और छतों से। पुतले का निर्वासन काला पानी भेज दिए गये बंदी का निर्वासन नहीं, अपने ही घर में नजरबंद कर दिये गये मनुष्य का निर्वासन था। उसका अकेलापन दीवार में जिन्दा चुनवा दिए गए इंसान का अकेलापन था। वह इस अकेलेपन को झेलते-झेलते थक चुका था, कभी-कभी तो वह स्वयं ही टूट जाना चाहता था, लेकिन विवाद का एक पक्ष कहता था, हम तुझे मरने नहीं देंगे; और दूसरा ताल ठोंकता था कि हम तुझे जीने नहीं देंगे।

       आज का दिन, विवाद की समाप्ति का ही नहीं गोल दीवारों में कैद, चंदोवे में कैद पुतले की यंत्रणा की समाप्ति का दिन भी था। विवाद समाप्त होने से लोग बेहद खुश थे, उम्मीद करनी चाहिए कि पुतला भी खुश ही रहा होगा। दीवार के बाहर आकर, खुला आसमान फिर से देखने का मौका पाकर भला कौन खुश नहीं होगा, इन्सान हो या जानवर या फिर पुतला।

       पुतले के अकेलेपन, संस्कृति के विलाप और नगर से देश तक फैलते संताप की यह कथा आरंभ होती है, बीस बरस पहले।

       पुतले का इस चौराहे के कोने पर खड़ा होना ऐसी कोई बड़ी बात नहीं थी। नगरपालिका ने अभियान चलाया था, नगर के सुंदरीकरण का; इसलिए किसी चौराहे पर पत्थर के मोर जड़े गये ताकि नयी पीढ़ी ‘एक जानवर ऐसा जिसके सिर पर पैसा’ वाली पहेली को बूझने के क्लू सड़क चलते-चलते हासिल कर सके; कहीं नर्तक-नर्तकी प्रतिमाएं खड़ी कर दी गयीं कि आते-जाते लोग स्वयं नृत्य करें ना करें, उनके मन-मयूर तो नृत्य कर ही लें। यह सब पुतले-प्रतिमाएं बनवाए गये बड़े-बड़े कलाकारों से, उन्हें कला-कल्पना की छूट भी दी गयी ताकि नगरपालिका को कलाप्रेमी और महापौर को संवेदनशील होने की प्रतिष्ठा हासिल हो सके। कुछ कलाकारों ने यह छूट इतनी लंबी भी खींच ली कि खुद बनाए, खुदा समझे। ऐसी एक कलाकृति थी काले ग्रेनाइट की वह आकृति जिसे साधारण जन तो खैर क्या खा कर समझते, अमूर्त कला के पारंगत पारखी भी जिसकी व्याख्या करने में चीं बोल जाते थे। किसी को यह ग्रेनाइट सीधा खड़ा प्रश्नचिन्ह लगता था तो किसी को उल्टा खड़ा मनुष्य। कलाकार से पूछा गया तो उन्होंने तिरस्कार और करुणा के समन्वित स्वर में आर्ट एप्रीशिएन कोर्स शुरु करने की सलाह नगरपालिका को नि:शुल्क दे डाली थी।

       अपने कथा-नायक पुतले के निर्माता ने ऐसी कोई अमूर्त कलाबाजी नहीं की थी। उन्होंने तो साँवले संगमरमर का यह पुतला बनाया था, कोई पाँच साल के बच्चे का वह साँवला पुतला वहाँ खड़ा नहा रहा था, सर पर लोटे से पानी ढालता हुआ। लोटे से पानी लगातार गिरता रहे, इसकी व्यवस्था कर ही ली गयी थी। पानी लोटे से गिर, पुतले के सर और शरीर से गुजरता हुआ नाली से निकल जाता था। पुतले के चेहरे पर, मम्मी की मदद के बिना खुद नहाने का आत्म-गौरव, नहाने से आ रहा ताजापन, सहज भोलापन तो साफ पढा ही जा सकता था; लेकिन कहीं वह शरारत भी थी उसके चेहरे में, खड़े होने के अंदाज में, जो अपनी शारीरिक उम्र से कुछ ज्यादा मानसिक उम्र से संपन्न बच्चों में आ जाती है।

       बच्चा नहा रहा था, लेकिन शरारती अंदाज में। हालाँकि सभी समझदार लोग मानते हैं कि बच्चा हो या जवान या बूढ़ा, औरत हो या मर्द, स्वास्थ्य के लिहाज से नहाना उसी तरह चाहिए जैसे कि पुतला नहा रहा था। शायद कलात्मकता के साथ-साथ यह स्वास्थ्य-परक सामाजिक संदेश भी देना कलाकार का मंतव्य ही था।

       सांवले संगमरमर का बना, निहायत भोला दिखता यह पुतला नंगा नहा रहा था, उसकी कमर में चड्डी या कच्छा या अंगोछा पहनाने की जरूरत कलाकार ने नहीं समझी थी।

       पुतले के पक्ष में यह जरूर कहा जाना चाहिए कि उसकी मुद्रा जान-बूझ कर कुछ दिखाने की नहीं थी, लेकिन फिर भी दुनिया देख तो रही ही थी, और दुनिया के कुछ सदस्य जो देख रहे थे उसके आकार-प्रकार; विश्वसनीयता-प्रामाणिकता आदि पर विमर्श भी कर रहे थे। आकार-प्रकार की प्रामाणिकता पर विमर्श के क्रम में यह प्रश्न भी उठा था कि पुतला पाँच वर्ष के बच्चे का है, या आठ-दस वर्ष के बच्चे का। कलाकार से पूछे जाने पर, वे प्रश्न की संवेदनहीनता और प्रश्नकर्ता की बुद्धिहीनता पर उखड़ गये थे, और स्वयं उत्तरहीन रहने का चुनाव कर लिया था। बहरहाल, पुतले की उम्र जो भी रही हो, यह तो था कि जो दुनिया पुतले को देख रही थी, उस दुनिया के कुछ सदस्यों को पुतला चुनौती देता प्रतीत हो रहा था, तो कुछ को आमंत्रण देता।

       पुतले की यह बहुलार्थक स्नान-भंगिमा आगे चल कर कविता और अन्य सर्जनात्मक तथा वैचारिक उपक्रमों की भी विषय-वस्तु बनी। लेकिन, पुतले के नग्न-नहान के छींटे उस चौराहे से शुरु हो कर, सारे देश पर पड़ती विवाद की बौछारों में तो कुछ ही दिन में बदल चुके थे।

       शुरु के दो-तीन सप्ताह तो खैरियत से ही गुजरे थे। पुतला नहाता रहा, पानी बहाता रहा, लोग आते-जाते, देखते-मुस्कराते रहे। धीरे-धीरे नगर के अश्लीलता-संवेदी राडारों ने अनुभव किया कि साइकिलों, मोटर-साइकिलों पर कालेज जाते लड़के पुतले के पास उतर न भी जाएं, तो रफ्तार जरूर कम कर लेते हैं। यह भी नोट किया गया कि पुतले के पास की पान-दुकानों का बिजनेस एकाएक वृद्धि को प्राप्त होने लगा है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह नोट की गयी कि कालेज जाती लड़कियों के झुंडों के कदमों की रफ्तार उस चौराहे पर ध्यातव्य ढंग से घटने लगी थी, और उनकी खी-खी का वाल्यूम बढ़ने लगा था। लड़के-लड़कियों की ही नहीं, अच्छे खासे सद्गृहस्थों की चाल में भी उस चौराहे पर धीमापन आने लगा था, वाहन चलाने वाले आपस में टकराने लगे थे। चाल पर पड़ने वाले ये कुप्रभाव चाल-चलन पर पड़ रहे कुप्रभाव के परिणाम भी थे और प्रमाण भी। नगर के गंभीर संस्कृति-प्रेमी लोग इस निष्कर्ष को प्रकाशित करने पर बाध्य हुए कि पुतले के कारण बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा है। अधिक सच्चे निष्कर्ष को अप्रकाशित रखने में ही बुद्धिमत्ता समझी गयी थी– पुतले के कारण बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा हो या न पड़ रहा हो, भाई-बापों के आत्म-विश्वास पर शोचनीय प्रभाव निस्संदेह पड़ रहा था।

       बात गंगाधरजी के नोटिस में लाई गयी। वे अपनी पार्टी के कदरन समझदार नेताओं में गिने जाते थे, उन्होंने बात का बतंगड़ बनाने में पहले तो कोई रुचि नहीं ली; लेकिन जब उन्हीं की पार्टी के घनश्याम महाराज को पुतले के नग्न-नहान में राजनैतिक तीर्थ-लाभ की संभावनाएं नजर आने लगीं, तो गंगाधरजी गंभीर होने पर विवश हुए। उन्होंने पुतले द्वारा फैलाई जा रही अश्लीलता की निंदा करते हुए एक बयान तो जारी कर ही दिया, अपनी पार्टी के पार्षदों को निर्देश भी दे दिया कि नगर-पालिका में पुतले को हटाने का प्रस्ताव फौरन पेश कर दें।

       तुरंत ही नगर के लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, कला-प्रेमियों, ललित-कला महाविद्यालय के छात्रों-अध्यापकों ने प्रतिक्रिया की। बयान जारी करके गंगाधरजी और उनकी पार्टी की इस माँग को फूहड़ और संस्कृति-द्रोही निरूपित किया, नगर-पालिका को ऐसे तत्वों के दबाव में ना आने की चेतावनी भी दे डाली। प्रोफेसर रवि सक्सेना भी इन लोगों में शामिल थे, बल्कि इस बयान की पहलकदमी करने वाले दो-तीन लोगों में से एक थे।

       नगर-पालिका में प्रस्ताव लाया गया। गंगाधरजी की पार्टी अल्पमत में थी, अधिसंख्य पार्षद और महापौर मुख्यमंत्री की पार्टी के थे, उसी पार्टी की सरकार दिल्ली में थी। गंगाधरजी को फिर भी विश्वास था कि उनके पार्षदों का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो ही जाएगा, एक नाकुछ से पुतले की ही तो बात है। महापौर ने उन्हें आश्वस्त ही नहीं कर दिया, बल्कि उस शाम नगर-पालिका से निकलते-निकलते अखबार वालों से कह भी दिया कि पुतला हटाने का प्रस्ताव कल पारित हो जाएगा।

       वह रात महापौर पर प्रेत-बाधा से भी ज्यादा भारी गुजरी। उन दिनों, अखबारों के दफ्तरों में टेलीप्रिंटर नामक जंतु पाया जाता था। उसी ने खबर महापौर के अपने निवास पहुंचने के पहले ही प्रदेश की राजधानी तक, मुख्यमंत्री के कार्यालय तक पहुँचा दी थी। महापौर घर में ठीक से घुस भी नहीं पाए कि पत्नी की बेहद खुश और किलकती आवाज कान में पड़ी थी, ‘सीएम ऑफिस से कई बार फोन आ चुका है, लगता है, अब महापौरी छोड़ राजधानी के बंगले में रहने के दिन आ ही गये, हे नहर वाली मैया चाँदी का सिंहासन, सोने का छतर चढ़ाऊंगी’…महापौर महोदय गद्-गद् हुए, लेकिन व्यक्तित्व की गंभीरता के तकाजे से महापौरनी को बस लाड़ भरी निगाह से देख कर, जरा सा मुस्करा कर ही रह गये, ‘ देखते हैं, कौन सा विभाग देते हैं, ऐरा-गैरा विभाग तो मैं लेने से रहा…’

       अपने महत्वपूर्ण विभाग के मद में अभी ठीक से प्रवेश कर भी नहीं पाए थे कि फोन फिर से घनघना उठा, महापौर स्वयं ही लपके, महापौरनी ने इशारा किया कि स्पीकर स्विच ऑन कर दें, महापौर ने आँखों-आँखों में ही ऐसे बचकानेपन से उन्हें बरजा, और रिसीवर कान से लगाया, ‘जी बोल रहा हूँ…’

       महापौर जिन बुद्धिमत्ताओं के लिए, उस पल के बाद ताउम्र खुद को बधाई देते रहे, उनमें से एक यह भी थी कि उन्होंने स्पीकर स्विच ऑन नहीं किया था। अब तक उन्होंने दूसरों से ही सुना था कि मुख्यमंत्री का गुस्सा बहुत खराब है, और यह भी कि गुस्से में आ जाएं तो कहनी-अनकहनी का कोई विवेक मुख्यमंत्री को नहीं रहता। आज फोन पर अपने कानों से उन्होंने जो सुना, उसके बाद मुख्यमंत्री के गुस्से के ही नहीं, वे मुख्यमंत्री की सर्जनात्मक गाली-क्षमता के भी जीवन भर के लिए कायल हो गये। गोपन-क्षणों की जो गतिविधियां उनकी कल्पना के भी परे थीं वे मुख्यमंत्री के मुख से नि:सृत गालियों में पूर्णतया संभाव्य बल्कि इतनी यथार्थ-परक लग रही थीं कि अब संपन्न हुईं कि तब हुईं। गोपन गतिविधियों को फौरन अंजाम देने की घोषणा करती इस कल्पना-सृष्टि के कर्ता पात्र मुख्यमंत्री स्वयं थे और भोक्ता की भूमिका उन्होंने गंगाधरजी के साथ-साथ महापौर को भी सौंप रखी थी। महापौर ने देवी-देवताओं को धन्यवाद दिया कि वे मुख्यमंत्री के साथ फोन-लाइन पर ही हैं, उनके शयन-कक्ष के एकांत में नहीं।

       फोन रख कर जब पलटे तो महापौरनी नहर वाली माता के पक्ष में की गयी सिंहासन-छत्र घोषणा तो वापस ले ही चुकी थीं, आशंका से काँप भी रही थीं, उन्होंने महापौरजी को फोन हाथ में लिए काँपते देखा जो था। कुछ पूछने की ना जरूरत थी, ना हिम्मत।

       महापौर बाहर वाले कमरे में आए, सचिव को बुलाया और बयान डिक्टेट करने लगे।

       अगले दिन महापौर की पार्टी ने नगर-निगम में पुतले को हटाने के प्रस्ताव का घोर विरोध किया, गंगाधरजी के पार्षद चीखे-चिल्लाए जरूर लेकिन न महपौर का कुछ बिगाड़ सके, न पुतले का।

       महापौर अब तक उस भयानक दु:स्वप्न का कारण जान चुके थे, जिससे वे कल शाम जागती आँखों ही गुजरे थे। इतनी सर्जनात्मक गालियाँ संभव कराने वाला गुस्सा मुख्यमंत्री को पुतले के प्रति प्रेम के कारण नहीं, इस कारण आया था कि उस नंगे, बेहूदे पुतले को बनाने वाला कलाकार कोई ऐरा-गैरा नहीं, प्रधानमंत्री का खास-उल-खास था, उनके पारिवारिक मित्रों में से था। उनसे जो झाड़ मुख्यमंत्री ने खाई थी, उसी का पृथुल विस्तार मय गालियों के उन्होंने महापौर तक पहुँचाया था।

       हंगामाखेज मीटिंग के बाद नगर-पालिका भवन की सीढ़ियाँ उतरते महापौर देख पा रहे थे कि अगले कुछ दिन झंझट में ही बीतने हैं।

       महापौर जहाँ तक देख पा रहे थे, झंझट की व्याप्ति उससे कहीं बहुत अधिक होने जा रही थी, यह दो ही दिन में साफ हो गया। उन दिनों चौबीसें घंटे खबरें तोड़ते रहने वाले चैनल और सर्वव्यापी सोशल मीडिया भले ना रहे हों, अखबार तो थे ही। प्रधानमंत्री और कलाकार की मित्रता के समाचार को लोक-वृत्त में स्थापित होने में कोई खास वक्त नहीं लगा। अब, मामला पुतले का कम, सरकारी काम में निजी संबंधों के कारण प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप का बनने लगा, ऊपर से, खोंचड़ यह कि नंगा पुतला बनाने वाले कलाकार का ताल्लुक गलत मजहब से था।

       गंगाधरजी की पार्टी के लिए मामला अब स्थानीय अश्लीलता से बहुत आगे बढ़ कर राष्ट्र भर की सांस्कृतिक अस्मिता का बन गया। कलाकार को प्रेस वाले प्रधानमंत्री की नाक का बाल बता रहे थे, मुख्यमंत्री और महापौर को वह जान का बवाल लग रहा था, लेकिन करते क्या? उधर, गंगाधरजी की पार्टी ने प्रधानमंत्री की नाक के इस बाल की खाल खींच डालने का पूरा मन बना लिया। प्रधानमंत्रीजी की पार्टी भी ताल ठोंक कर मुकाबिले के लिए तैयार हो गयी।

       उसके बाद की गर्मा-गर्मी में इतिहास-चक्र बड़ी तेजी से घूमा, जैसे गर्मी की दोपहर में छत का पंखा घूमता है। पुतले के निर्माता कलाकार महोदय प्रधानमंत्री के पारिवारिक मित्र तो थे ही, कलाकारों के जगत में भी उनका बहुत सम्मान था, दुनिया भर में नाम था। उनके बनाए पुतले को हटाए जाने की बात ने देखते-देखते कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रशन का ही नहीं, कला और साहित्य के प्रति लोकतांत्रिक राज्य-सत्ता की संवेदनशीलता और जिम्मेवारी के सवाल का भी रूप ले लिया। पुतले की हैसियत स्थानीय, प्रांतीय से बढ़ कर राष्ट्रीय हुई, फिर वैश्विक। गंगाधरजी की पार्टी को नंगा पुतला परंपरा और संस्कृति को अत्यंत अश्लील चुनौती अत्यंत द्रष्टव्य रूप में देता दिखने लगा, तो कलाकार समुदाय गंगाधरजी की पार्टी को नियमित रूप से कोणार्क और खजुराहो के चित्र दिखाने लगा। दोनों पक्षों की ओर से धरने-प्रदर्शन का दौर चलने लगा। जो बात हल्की-फुल्की सी लगती रही थी, धीरे-धीरे राष्ट्रीय ,समस्या का रूप लेने लगी। धरने-प्रदर्शन तनावपूर्ण बल्कि हिंसक होने लगे। कलाकार तो बेचारे क्या हिंसा करते, प्रधानमंत्रीजी की पार्टी भी जो करती थी, सो आधे मन से। हाँ, गंगाधरजी की पार्टी का सांस्कृतिक जोश पूरे उबाल पर था। उनके प्रदर्शनों में अश्लीलता के दुष्ट समर्थकों की शारीरिक समीक्षा करने और पुतला बना कर संस्कृति और शील को हानि पहुँचाने वाले, प्रधानमंत्री के सखा, कलाकार सरीखे परकीय तत्वों की तथाकथित कला-कृतियों का क्रिया-कर्म करने का उत्साह सक्रिय रूप से अभिव्यक्ति पाने लगा। उनके राष्ट्रीय नेता ने तो घोषणा कर दी कि वे देश के एक कोने से दूसरे तक, दूसरे से तीसरे तक पुतला-विरोधी, संस्कृति-रक्षक यात्रा निकालते हुए आएंगे, पुतले को उखाड़ेंगे फिर देश के चौथे कोने तक यात्रा ले जाकर पुतले को समुद्र में फेंक आएंगे। उनकी चुनौती थी कि ‘ हम तो पुतला ले जाएंगे; कोई रोक सके तो रोक ले…’

       कलाकार समुदाय तो भला क्या खा कर इस चुनौती को झेलता, लेकिन प्रधानमंत्री की नाक बीच में फँसी होने के कारण उनकी पार्टी को जरूर स्टैंड लेना पड़ा कि दुनिया इधर की उधर हो जाए, पुतला जहाँ है वहीं रहेगा, जैसा है वैसा ही रहेगा। पुतले की सुरक्षा के लिए केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात कर दिये गये।

       रवि पुतले के घोर समर्थक थे, नंगे नहाने के उसके लोकतांत्रिक अधिकार के पक्ष में पहला बयान जारी करने वालों में तो उनका नाम था ही, बाद में भी वे पुतले के पक्ष में लिखते-बोलते रहे थे। उधर, मामले के स्थानीय से राष्ट्रीय बनने के अनुपात में ही अश्लीलता-संवेदी राडारों और संस्कृति-प्रेमियों की चिंता भी बढ़ती जा रही थी, हिंसा भी। पुतला समर्थक होने के नाते एक दो बार गालियाँ तो रवि को भी खानी पड़ीं थीं, लेकिन हिंसा से साफ बच गये क्योंकि उस पार्टी में भी उनके अपने लोगों की कोई कमी नहीं थी। उन्हें गालियाँ देने वाले लौंडों को भी शुक्लाजी ने विभाग में रवि के सामने ही डाँटा, और निर्देश दिया था कि दुनिया भर मे आग भले ही लगा देना, लेकिन खबरदार, जो हमारे प्रो. रवि सक्सेनाजी की तरफ आँख उठा कर देखा। शुक्लाजी रवि के सहकर्मी थे, और उन्हीं की तरह लौंडों से जिस-तिस को पिटवा देने की प्रेरणादायक क्षमता में माहिर भी। रवि के प्रति उनके नरम रवैए का कारण था। रवि प्रगतिवाद-मार्क्सवाद आदि दिव्य अमूर्तनों का सार्वजनिक नाम-जाप एवं पूजा-पाठ करते हुए, असली साधना जातिवाद, क्षेत्रवाद और सर्वोपरि, समान-स्वार्थवाद जैसे मूर्त देवताओं की करते थे। इसी साधना की एक विधि यह थी कि हिन्दी के जातीय रूप के तौर पर खड़ी बोली के प्रचंड समर्थक रवि अपने क्षेत्र के किसी भी मनुष्य को देखते ही क्षेत्रीय बोली में शुरु हो जाते थे।

       शुक्लाजी भी रवि के क्षेत्र के निवासी थे। उनसे रवि का निन्यानबे फीसदी संवाद खड़ी बोली हिन्दी के बजाय क्षेत्रीय भाषा में ही होता था। दोनों विद्वानों की परस्पर विरोधी विचार-धाराओं के अंदर-अंदर बहती व्यवहारिकता की धारा के बीच समान स्वार्थों का वह द्वीप भी था जहाँ हृदय का हृदय से गोपन, प्रिय संभाषण हुआ करता था। ऐसे गहन हार्दिक संबंध के चलते शुक्लाजी को करनी ही थी रवि सक्सेनाजी की सहायता। उस दिन के बाद से, नगर के न जाने कितने पुतला-समर्थकों की सांस्कृतिक ठुकाई हुई, लेकिन रवि का बाल तक नहीं बाँका नहीं हुआ। शुक्लाजी से प्राप्त हार्दिक सहायता पुतला समर्थक क्रांति करते करते प्रतिक्रियावादी ताकतों से सुरक्षित रहने में रवि के बहुत काम आई। काँख भी दबी रही, मुट्ठी भी तनी रही। दूसरी तरफ यही स्थिति मुख्यमंत्री की पार्टी के प्रसंग में थी। शुक्लाजी के जरिए रवि की पहुँच गंगाधरजी तक थी, तो जैन साहब के जरिए मुख्यमंत्री तक। सब कुछ आनंद से चल रहा था, प्रगतिशील बुद्धिजीवी का जीवन इस पिछड़े देश के सुख-भोग के साथ ही, अमेरिका में टीचिंग असाइनमेंट, और फिर ग्रीन-कार्ड प्राप्ति जैसे महत्तर सुखों के भोग की दिशा में भी निरंतर प्रगति कर रहा था। रवि मन ही मन पुतले के आभारी थे कि नंगे ने मुख्यमंत्री से चिपकने का बहाना दिया, लोक-परलोक सुधारने का अवसर दिया।

       इस बीच इंटरनेट, मोबाइल फोन और प्राइवेट टीवी चैनलों के जरिए इन्फोटेनमेंट क्रांति के युग का श्रीगणेश होने लगा था। अब, पुतले का नंगापन भी चौराहे तक ही न रह कर घर-घर पहुँचने लगा, और यहीं से रवि शुरु हुआ की आनंद-कथा में बिगूचन-तत्व का प्रवेश। उनके अपने ड्राइंग-रूम में बजरिए टीवी, पुतला जब पहली बार नजर आया तो उन्हें कुछ अजीब सा अहसास हुआ। टीवी पर चलती रिपोर्ट में रिपोर्टर सारे विवाद का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य दे रही थी, कैमरामैन विभिन्न कोणों से पुतले को दिखा रहा था…रवि की नजर पुतले के कोणों पर क्या होती, वह तो रिपोर्टर-सुंदरी की देह के कोणों पर ही थी। लेकिन, उसी पल, रवि को यह क्यों दिख रहा था कि जया पुतले की ओर कुछ ज्यादा ही देख रही है…

       उस वक्त तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन रात में जया के अनमनेपन से उनका माथा ठनका, इतना ठंडापन…इतनी उदासीनता जैसे कि बस बेमन से पत्नी-धर्म निभा रही हो…मामला क्या है…

       किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले उचित पड़ताल करना वैज्ञानिक मनोवृत्ति की माँग थी। रवि ने उन पलों को किसी तरह निबटाया, जया के ठंडेपन से आधे ठंडे तो वे हो ही गये थे, बाकी की खानापूरी किसी तरह कर, पीठ फेर कर सो गये…सो क्या गये, वैज्ञानिक मनोवृत्ति की माँग पर विचार करते रहे। अगले दिन, घूमने के लिए रवि जया को लेकर पुतले वाले चौराहे से ही गुजरे, जया की कनखियों, नजरों और चेष्टाओं पर वैज्ञानिक दृष्टि रखते हुए। रवि का शक यकीन में बदलने लगा… कहीं कुछ गड़बड़ है जरूर…लेकिन अभी धीरज से काम लेना ही बेहतर है, रात में देखते हैं…

       यह रात भी वैसी ही थी, जैसी कि पिछली रात…फर्क यह था कि इस रात, जया के ठंडे, निपटाऊ तरीके से बाहर निकल कर रवि मुँहफेरी नींद के हवाले होने की बजाय छज्जे पर आ गये, सिगरेट सुलगाई और सोचने लगे…

       शाम को पुतले पर पड़ी जया की नजर उचटती नजर थी, या कसकती? उचट कर वह नजर पुतले के चेहरे तक ही रुकी रह गयी थी या सरक कर कमर के नीचे तक भी गयी थी? और क्या फिर वहाँ से चुप सी चतुराई के साथ फिसलती हुई मेरी कमर के नीचे तक नहीं आई थी? पुतले की कमर पर जो नजर उमंग के साथ घूम रही थी, वह मेरी कमर तक आते-आते क्या उदासी को छुपाती सी नहीं लग रही थी ?

       और, अभी कुछ ही देर पहले, उन पलों में, वहाँ हाथ फेरते समय, क्या जया की हथेली ऐसी नहीं लग रही थी कि फिर वहाँ रही है, छू कुछ और रही है…चल वहाँ रही है, जा कहीं और रही है…आम तौर से बिटर-बिटर आँखें खोले रहने वाली जया पिछले कुछ दिनों से आँखें मूँद क्यों लेती है? मूँद भर लेती है, या मुँदी आँखों किसी और को देखती रहती है…

       और, वह हरामी पुतला…जया की नजरों के सफर को देखते-देखते क्या उसने मुझे आँख नहीं मारी थी?

       क्या बेहूदा बात करते हो यार, पत्थर का पुतला…

       बेहूदा बात का मतलब? जो बेहूदा खुलेआम सबको दिखा सकता है, वह और क्या बेहूदगी नहीं कर सकता?

       कैसी बातें कर रहे हो, इररेशनल….सीधे बात करो ना जया से…

       बेवकूफ हूँ क्या…बात करूँ…क्या बात करूँ…कौन मान कर देगी ऐसी बात…और फिर अपनी प्रगतिशील छवि में मर्दवादी होने का बट्टा मैं खुद ही लगाऊँ…किसी और तरह से सत्य का अंतिम निर्धारण करना होगा, करना ही होगा…और जल्दी से जल्दी…

       अगली रात समस्या और गंभीर हो गयी। साहित्यिक संस्कारों से संपन्न रवि और जया प्रेम करते समय कुछ कविताएँ आदि याद किया करते थे, स्वरचित भी, पररचित भी। जया ने विवाह के कुछ ही दिन बाद एक कविता रची थी—‘ मेरे पुरुष, मेरे अनूठे पुरुष, कितना मादक, मृदुल है तुम्हारा परुष स्पर्श…’ जया के अधरों से होने वाला इस कविता का अस्फुट उच्चार रवि को बहुत भाता और लुभाता था।

       लेकिन, उस रात, उन पलों में, वहाँ हाथ फेरते हुए, जया के मुख से जो अस्फुट स्वर निकले थे, उनकी टेक, ‘मेरे पुरुष’ थी या ‘मेरे पुत…’ जोकि समय रहते सँभाल ली गयी थी। जया उस समय रवि को सराह रही थी या पुतले को? आज जया के अनमने होने से पहले ही रवि पूरी तरह ठंडे हो गये। जया को ताज्जुब हुआ। उसकी ताज्जुब भरी, सवाल करती आँखो के जबाव में कहीं अपनी नफरत आँखों में उतर ना आए, इसलिए रवि ने फौरन मुँह फेर लिया।

       संदेह की कोई गुंजाइश अब बाकी नहीं बची थी। दोष जया का नहीं, उस हरामजादे पुतले का था, जिसकी नंगई का मैं मूर्खों की तरह समर्थन करता आया हूँ। वे उठे और छज्जे में जाकर सिगरेट के जरिए विचारक मुद्रा में प्रविष्ट हो गये। विचार का मुद्दा यह था कि यार कुछ भी कहो, पुतला है तो बच्चे का ही, तो, फिर…वह, साला प्रतिक्रियावादी, पतनशील आधुनिकतावादी फ्रायड…उसके कहने में कुछ दम भी था क्या? ये साले अपने स्थानीय दक्षिणपंथी…इनका कहना कि ‘बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव…’ इसमें भी कुछ…

       रवि को कुछ बरस पहले देखी फिल्म ‘चक्र’ का एक संवाद याद आने लगा, ‘दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ में या तो पेट है, या उसके नीचे वाला…’। फिल्म देखने के बाद रविजी ने मार्क्स और फ्रायड के इस प्रतिक्रियावादी घालमेल की, और अपनी प्रगतिशील छवि को धता बता कर, परदे पर यह संवाद बोलने के लिए नसीरुद्दीन शाह की भूरि-भूरि निंदा की थी। आज भी…वे स्वयं तो पूरी कोशिश कर रहे थे, इस घालमेल से बचने की; विचार-धारा के प्रति निष्ठा बनाए रखने की…लेकिन सच यही था कि विचारों की धारा भले ही पेट तक जा कर रुक जाए, अनुभव और अनुभूति का रेला पेट से नीचे की ओर ही खिंचा चला जा रहा था।

       सवाल फिर से वही कि पुतला है तो आखिरकार बच्चे का…एकाएक रवि के चित्त में गुत्थी का समाधान कौंधा, कहीं ऐसा तो नहीं कि जया की निगाह वर्तमान के बजाय भविष्य पर; यथार्थ के बजाय उसमें निहित संभावना पर रहती हो…?

       इस हृदय-विदारक प्रश्न की गहराई ठीक से मापने का एक ही तरीका था। रवि लपक कर कमरे में आए। बत्ती जलाए बिना ही, मेज की दराज से इंचीटेप निकाला, और उत्तेजना से काँपते हाथ लिए, आशंका में धड़कता दिल लिए बाथरूम में जा घुसे, नाप लेने लगे और इस ह्रदयविदारक सत्य से टकराए कि तीस साल की उम्र में भी आकार उस पाँच साल के बताए जा रहे पुतले के आकार से कुछ कम ही था। उनके सामने स्पष्ट हो गया कि वर्तमान के यथार्थ में निहित भविष्य का सत्य यही है कि आज से कुछ साल बाद ही, ‘इन दि मोमेंट ऑफ हीट, हिज थिंग इज बाउंड टु बी स्ट्रांगर, लांगर ऐंड थिकर…’ आगे मन में जो आया वह रवि से शब्दों में ढालते भी नहीं बन रहा था… ‘दैन माइन…’

       अर्थशास्त्र के ज्ञाता मित्रों से इकॉनामी ऑफ स्केल के बारे में सुना था। इस वक्त, रवि अपने भीतर फीयर ऑफ स्केल झेल रहे थे। हाथ में पकड़ा इंची-टेप उन्होंने घिन और गुस्से से भर कर एक तरफ उछाल दिया था; लेकिन स्केल, माप, पैमाना जैसे शब्दों और इनसे सूचित होने वाली वस्तुओं से जो भय, वितृष्णा और घिन वे महसूस कर रहे थे, उसे कैसे फेंकें? कहाँ फेंकें? ये तो अब जीवन भर ढोया जाने वाला बोझा है, पूर्व-जन्म के पापों की तरह…

       मैं कोई मूर्ख भाग्यवादी हूँ क्या?

       यह रवि के ह्रदय-परिवर्तन का पल था। उनके मन में साफ हो गया कि कलात्मक संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक जीवन में नग्नता का समर्थन करना निहायत जन-विरोधी हरकत है, ऐसी हरकत जो कि वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक आकलन की दृष्टि से प्रतिक्रियावादी तत्वों को ही मजबूत करती है। पुतले के नंगेपन का जो समर्थन करते आए थे, वह रवि को अपनी ऐतिहासिक भूल -‘हिस्टारिक ब्लंडर’- लगने लगा।

       सवाल यह था कि इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने की रणनीति और कार्यनीति क्या हो? जन्मजात रणनीतिकुशलता के कारण, आत्म-साक्षात्कार और भूल-साक्षात्कार के इस मार्मिक पल में भी यह वास्तविकता रवि की आँखों से ओझल नहीं थी कि बात जहाँ तक पहुँच चुकी है, प्रधानमंत्री की नाक जिस तरह पुतले के साथ बिंध चुकी है, उसे देखते हुए पुतले का हटा दिया जाना तो असंभव है। ‘मौजूदगी तो उस कमीने नंगे की झेलनी ही पड़ेगी, बंधु’, रवि ने स्वयं से कहा, ‘व्यावहारिक यही है कि जिस बेहूदगी से हरामजादा दिखा-दिखा कर मुझे चिढ़ाता और जया को लुभाता रहता है, उस बेहूदगी का इलाज करके ही संतुष्ट हो लिया जाए’।

       लेकिन वह इलाज हो कैसे?

       सवाल पर थोड़ी ही देर सोचने के फलस्वरूप रवि फिर से एकबार अपनी मौलिकता और सर्जनात्मकता पर मुग्ध होने का अवसर पा गये। इस मुग्धता के साथ वे बाथरूम से भी बाहर आए, और किसी हद तक ‘स्ट्रांगर, लांगर, थिकर’ वाली तुलना की मर्मांतक वेदना से भी। उन्होंने द्वंद्वात्मक पद्धति का सार्थक उपयोग कर, थीसिस-ऐंटी थीसिस के परस्पर अनुप्रवेश से गुजरते हुए सिंथेसिस की खोज कर ली थी। यह खोज भारतीय परंपरा की मूल समन्यवयात्मक जीनियस के भी सर्वथा अनुरूप थी।

       बाथरूम में चिंतन के पल बिताने के बाद रवि पुतले को एकदम हटा ही देने या उसे नंगा ही रहने देने के अतिरेकों के परे समाधान की दिशा में बढ़ गये थे। इंचीटेप लेकर बाथरूम में घुसने के पहले तक समाज में कला-संवेदना फैलाने की बात करते आए थे, इंचीटेप फेंक, बाथरूम से निकलते समय संवेदना फैलाने की बजाय, रवि पुतले को चड्डी पहनाने के समर्थक हो चुके थे।

       यही एकमात्र रास्ता था। नंगेपन की बेहूदगी से स्वस्थ संस्कृति को, विवाद से नगर बल्कि देश को, और पुतले की चिढ़ाऊ चुनौती से स्वंय रवि को राहत देने वाला रास्ता सिर्फ और सिर्फ चड्डी से हो कर जाता था। इसी में सबकी भलाई थी। यही वह पंथ था जिस पर महाजनों को चलना चाहिए। तुच्छ जन तो पीछे-पीछे स्वयं ही आ जाएंगे। सो, कोशिश महाजनों को पटाने की होनी चाहिए। मुख्यमंत्री और गंगाधरजी को मनाया जाना चाहिए कि अपनी-अपनी जिदें छोड़ कर पुतले को चड्डी पहना कर वहीं खड़े रहने देने के मध्य-मार्ग पर चल पड़ें। रवि की आँखें अपनी महानता पर स्वयं गद्-गद् होने के कारण भर आईं…कितना बड़ा काम, कितने घोर विवाद का निबटारा करा रहे हैं प्रभु…आई मीन इतिहास-प्रभु मुझ से…धन्य हो भगवन…आई मीन धन्य हो, इतिहास देवता…भरे कंठ के मौन शब्दों के जरिए रवि इतिहास-देवता को कृतज्ञता के पुष्प अर्पित कर रहे थे…

       यह कृतज्ञता का पल था, यह आत्म-साक्षात्कार का पल था, यह इतिहास के मंदिर में आत्मार्पण का पल था, यह ऐसा कुछ कर जाएं कि यादों में बस जाएं वाले जोश का पल था, यह दूरगामी सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान कर पाने के संतोष का पल था, यह ऐतिहासिक भूल को सुधारने के शुभारंभ का पल था।

       यह चड्डी-पल रवि सक्सेना के जीवन में लक्ष्य की स्फटिकवत् स्पष्टता का पल था।

       इस पल के बाद से, पुतले की नग्नता औरों के लिए जो हो, रवि के लिए नितांत निजी चुनौती थी; चड्डी औरों के लिए जो हो, रवि के लिए जीवन का लक्ष्य थी, शब्द और कर्म की एकता का प्रमाण थी। अब तो, बस, मन में ठान ली थी, सो ठान ली थी–हरामजादे पुतले को चड्डी ना पहनाई तो, ‘क्या किया, जीवन क्या जिया…’

       अब रणनीति सोचनी थी। पुतले को चड्डी पहनाने के सपने के साथ ही काँख और मुट्टी की नाजुक द्वंद्वात्मकता को भी तो साधे रखना था, पुतले के उपचार के साथ ही अपने और सपने भी पूरे करने थे। जरूरत थी सतत सावधान साधना की।

       रवि के जीवन के पिछले बीस साल इसी साधना के साल थे।

       धीरज और चतुराई के साथ रवि ने चड्डी-परियोजना पर अमल आरंभ किया। सबसे पहले तो लेख लिखा विवाद का समाधान संवाद के जरिए करने का आव्हान करते हुए। लोगों को, खासकर कलाकार समुदाय को बात अच्छी भी लगी, लेकिन जब संवाद-सभा में रवि ने बीच का रास्ता सुझाया कि पुतले को चड्डी पहना दी जाए तो कलाकार समुदाय उखड़ गया। इस तरह तो कलाकृति की ऐसी की तैसी हो जाएगी, यह तो वैसा ही है कि ललित कला अकादमी में टंगें न्यूड कैनवासों पर साड़ी पेंट कर दी जाए, या खजुराहो से लेकर आज तक के नग्न शिल्पों को निक्कर पहना दी जाए। यह कैसी बेतुकी और इनसेंसिटिव बात कर रहे हैं, रवि? सभा में मौजूद जया रवि का सुझाव सुन कर सनाका खा गयी। रवि उसकी ओर देख ही नहीं रहे थे कि वह आँखों-आँखों में रवि से इस तरह गुलाँट खाने की वजह दरियाफ्त कर सके।

       कलाकारों, बुद्धिजीवियों के बीच रवि संदिग्ध हुए जरूर, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री और गंगाधर दोनों की तीखी निन्दा करके फिर से कलाकार-बुद्धिजीवी समुदाय को अपनी मूल क्रांतिकारिता का विश्वास दिलाया। उधर, जैन साहब के साथ जा कर मुख्यमंत्रीजी से, और शुक्लाजी के साथ जा कर गंगाधरजी से मिलने में भी देर नहीं लगाई। बात दोनों नेताओं को जम भी गयी, तय हुआ कि यदि सरकार ऐसी कोई पहलकदमी करे तो गंगाधरजी सुनिश्चित कर लेंगे कि उनकी पार्टी भी पुतले को हटाने की जिद छोड़ कर उसे चड्डी पहनाने पर राजी हो जाए।

       समस्या थी, बेहूदे कलाकारों की ओर से। वह मोर्चा भी रवि ने ही सँभाला, उन्होंने सामाजिक दायित्व की उपेक्षा करने वाले, नग्नता को कलात्मक मूल्य का दर्जा देने वाले कलावाद के खिलाफ ताबड़तोड़ कड़े से कड़े लेख लिखे, लिखवाए, भाषण दिए, दिलवाए। कुछ बुद्धिजीवियों को मुख्यमंत्री की ओर से आश्वासन और पद-पुरस्कार भी दिलवाए। माहौल धीरे-धीरे चड्डी के पक्ष में बनने लगा। यह सब करते हुए रवि को पुतले पर इन दिनों गुस्से और नफरत का अहसास तो होता ही था, ईमानदारी के पलों में वे उस नंगे के प्रति कृतज्ञ भी होते थे। आखिर यह उस नंगे का ही कमाल था कि मुख्यमंत्री से रवि लगभग हर सप्ताह मिलते थे, यह उस बेहूदे का ही कमाल था कि रवि के लिए मुख्यमंत्री तक पहुँचने के वास्ते जैन साहब और गंगाधरजी तक पहुँचने के वास्ते शुक्लाजी अप्रासंगिक हो चले थे।

       लेकिन, चड्डी साधना इतनी आसान फिर भी नहीं थी। मुख्यमंत्री के लिए तो बिल्कुल ही नहीं थी। प्रधानमंत्री की नाक जहाँ फँसी हो, उस मामले में सरकार किसी भी तरह के समझौते का रुख दिखाए तो दिखाए कैसे?

       मुख्यमंत्री ने तय किया कि कलाकार से बात करके उन्हें चड्डी पहनने, माफ कीजिएगा, पुतले को चड्ड़ी पहनाने को राजी कर लें, फिर बाकी कलाकार, बुद्धिजीवी आदि तो मान ही जाएंगे। पहले तो, उन्होंने कलाकार महोदय से परवारे* ही बात करने की सोची थी, लेकिन लगा कि कहीं पीएम उखड़ गये तो? उधर पीएम भी अब विवाद से चट चले थे, जिसने उन्हें ना उगलते बने ना निगलते की दशा में ला छोड़ा था। सोचने लगे थे कि पुतला चड्डी पहन ही लेगा तो कौन सा आसमान टूट पड़ेगा? कभी कभी स्वयं को कोसते भी थे कि खामखाह नंगे पुतले को नाक का सवाल बना बैठे। ऐसे में, कलाकार स्वयं मान जाए तो क्या हर्ज है? वैसे भी, बात मुख्यमंत्री करेंगे, अपनी कला-प्रेमी और दृढ़ राजनेता की छवि तो बनी ही रहनी है। उन्होंने मौनम् स्वीकृतिलक्षणम् वाली मुद्रा अपना ली।

       कलाकार से बात करने का अनुभव मुख्यमंत्री के लिए बड़ा दुखदायी सिद्ध हुआ। एक तो, न जाने कितने बरस बाद, उन्हें भाषण देने की बजाय लेना पड़ गया। कलाकार सिद्धहस्त मूर्तिकार होने के साथ ही सिद्धमुख, अनथक बोलक भी थे, और अपने महत्व से अवगत भी। उन्होंने न मुख्यमंत्री के समय की परवाह की, न मूड की। पूरे पचास-साठ मिनट का क्लास-रूम लेक्चर दे डाला, सो भी कलाकृति की इयत्ता, उसके अस्तित्व की पावन स्वायत्तता, शरीर की समग्रता में हर अंग की अपनी समग्रता की अनुल्लंघनीय पवित्रता, कला में नग्नता की महिमा, स्नान में निर्वस्त्रता का महत्व सरीखी शब्दावली से लिथड़ा हुआ।

       कलाकार ने कला के प्रति संवेदनशीलता का मार्मिक उपदेश देते देते मुख्यमंत्री को लोक-कथा के उस पात्र की दशा में पहुँचा दिया था, जिसे प्याजों से बचने के लिए जूते खाने पड़े थे, और जूतों से बचने के लिए प्याज। मुख्यमंत्री के मन में बार-बार आ रहा था कि कलाकार का कुछ उपचार तो स्वयं उसी विधि से कर दें, जिस विधि की दूरभाष पर की गयी घोषणा मात्र ने महापौरजी को प्रेतबाधा की प्रतीति करा दी थी; बाकी के लिए साले को ऐसे उपचारों के लिए विख्यात, अपने विश्वस्त पुलिसकर्मियों के हवाले कर दें।

       काश, यह मूर्तिकार पीएम का मुँहलगा न होता… काश इतने सारे टीवी चैनल कुकुरमुत्तों की तरह उग ना रहे होते…काश नौजवानों के बीच इंटरनेट नामक बीमारी का इतना विस्तार ना हो रहा होता…

       इतने सारे काशों के आगे कुछ कर पाना मुख्यमंत्रीजी के लिए कठिन था। अब तो प्रधानमंत्री का मार्गदर्शन लेना ही पड़ेगा।

       प्रधानमंत्री मन ही मन पुतले से, पुतले के निर्माता कलाकार से, सारे माहौल से कुढ़े बैठे थे, लेकिन मुख्यमंत्री को कुढ़न की हवा तक नहीं लगने दी। उनकी सारी बात ध्यान से सुनी, उनके प्रदेश के और उनके स्वास्थ्य के हाल-चाल पूछे। पुतले के बारे में एक शब्द नहीं बोले। एपाइंटमेंट का समय समाप्त हो चला, मुख्यमंत्री बेचैन हो चले। क्या करें? एकाएक प्रधानमंत्री ही बोले, ‘चुनाव निकट आ रहे हैं, सोचता हूँ, आपकी प्रतिभा और क्षमता का उपयोग संगठन के लिए किया जाए…’

       मुख्यमंत्री को बचपन में पढ़े अनेक मुहावरों का बोधार्थ और भावार्थ एक ही झटके में सिद्ध हो गया। उन्हें मालूम पड़ गया कि पाँव के नीचे से धरती कैसे खिसकती है, रीढ़ की हड्डी में ठंडक कैसे दौड़ती है, सर पर आसमान कैसे टूट पड़ता है, जबान कैसे तालू से चिपक जाती है। उनका चेहरा अपने ही नहीं, प्रधानमंत्री के कुर्ते से भी ज्यादा सफेद हो गया। हे प्रभो…यह क्या…यह क्यों…

       प्रधानमंत्री मेज पर रखी फाइलें देखने लगे थे। मुख्यमंत्री ने किसी तरह अपने बिखरते तन-मन को समेटा, और कुर्सी से उठने की तैयारी करने लगे। एकाएक प्रधानमंत्री फाइलों पर निगाह टिकाए टिकाए ही आकाशवाणी सी करते हुए बोले– ‘लोकतंत्र में न्यायिक प्रक्रिया का भी तो महत्व है, आखिर, हम कानून का राज चला रहे हैं, किसी की मनमानी नहीं…’

       आकाशवाणी करके प्रधानमंत्री तो अपने मौन में, और फाइल में पुन: प्रविष्ट हो गये। इधर, आकाशवाणी से लाभान्वित मुख्यमंत्री को अब दूसरी तरह के मुहावरों का अर्थ सिद्ध होने लगा। दिखने लगा कि कैसे मन-मयूर नृत्य कर उठता है, कैसे अंधेरी सुरंग के सिरे पर रोशनी की किरण नजर आने लगती है।

       अपनी राजधानी वापस पहुँचते ही, मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व के लिए देश की ओर से कृतज्ञता प्रकट की, साथ ही, पुतला विवाद हल करने के लिए एक आयोग के गठन की घोषणा कर डाली। यह भी स्पष्ट कर दिया कि आयोग की रपट आने तक पुतले जहाँ है, वहीं रहेगा,जैसा है, वैसा ही रहेगा, लेकिन रहेगा लोगों की निगाह से दूर। इस तरह पुतले के एकांतवास और निर्वासन के दिन आरंभ हुए, उसे आनन-फानन में दीवार और चंदोवे में कैद कर दिया गया।

       आयोग की नियुक्ति में थोड़ा समय लगा। न्यायमूर्ति लेबयान जब इस एक सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए तो कलाकारों और पुतले के अन्य समर्थकों के बीच हर्ष की लहर दौड़ गयी और गंगाधरजी की पार्टी में अमर्ष की। लेबयान साहब खाँटी लिबरल थे, पुतला-विवाद में भी कला की स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वाधीनता आदि की बातें कर चुके थे। गंगाधरजी ने बयान जारी करके चेतावनी दे दी कि आयोग के अध्यक्ष लेबयान हों, या देबयान; नंगई किसी भी दशा में सहन नहीं की जाएगी। देश की सांस्कृतिक परंपराओं और नगर के चरित्र के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति कदापि नहीं दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सबको करना ही होगा। रहे कलाकार, लेखक आदि, सो उनमें से अधिकांश धीरे-धीरे मानने लगे थे कि यार, ‘और भी ग़म हैं, जमाने में पुतले के सिवा’।

       जस्टिस लेबयान ने भी बयान जारी किया कि अपनी सिफारिशें वे बहुत सोच-विचार कर, गहन और विशद अध्ययन के बाद ही देंगे। और, उन्होंने अपने इस बयान पर सचमुच ‘लेटर ऐंड स्प्रिट’ में अमल कर दिखाया। मामले की तह तक पहुँचने के लिए समाज, साहित्य, संस्कृति, कला और परंपरा के अंतस्संबंधों को समझना जरूरी था। कलाकारों, लेखकों का मानस समझने के लिए उनके उत्सवों के औपचारिक-अनौपचारिक हिस्सों में हिस्सेदारी भी जरूरी थी। सो, जस्टिस लेबयान अंतर्राष्ट्रीय साहित्य समारोहों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों तक में नियमित रूप से, सरकारी खर्चे पर मौजूद रहने लगे। लेबयान साहब पुतले के भाग्य का फैसला करने का गंभीर दायित्व निभाने अनेक बार बुकर एवार्ड की सेरेमनी में शामिल हुए, अनेक बार एकेडमी एवार्ड्स के फंक्शन में। कान भी गये, स्टाकहोम भी हो आए। देश में भी उन्होंने जयपुर लिटफेस्ट से लेकर मुंबई में फिल्मफेयर नाइट तक के समारोह खूंद डाले। यही नहीं, समारोह-धर्मिता के बाहर, दैनंदिन जीवन में संस्कृति की उपस्थिति का मर्म समझने के इरादे से जस्टिस लेबयान संसार के कोने-कोने में गये। अफ्रीका महाद्वीप में जरूर ईजिप्ट, मोरक्को, दक्षिण अफ्रीका और मारीशस को छोड़ किसी अन्य देश में कदम रखना लेबयान साहब ने जरूरी नहीं समझा, बाकी तो दुनिया का कोई देश लेबयान आयोग की रिपोर्ट के परिशिष्ट का हिस्सा बनने से बच नहीं पाया।

       काम इतना फैला-पसरा हो, तो समय-सीमा का क्या मतलब? जब भी आयोग की घोषित अवधि पूरी होती, लेबयान साहब एक्सटेंशन माँग लेते, जोकि फौरन मिल भी जाता। पुतले के सच्चे समर्थकों को लगने लगा था कि सारा मामला नूरा कुश्ती में बदल गया है। लेबयान आयोग की असली भूमिका विवाद को टालते-टालते ठंडा कर देने की है। लेबयान साहब ऐसी बातें करने वालों को समझाने की कृपा बीच-बीच में कर देते थे।उनका कहना था कि विवाद खड़ा करना आसान है, उसका स्थायी समाधान धीरज से ही खोजा जा सकता है। ऐतिहासिक महत्व की गतिविधियों को समय के अखबारी पैमाने पर मापना बेवकूफी है। आयोग सिफारिश देगा तो ऐसी कि सब मानें, अनंत काल तक के लिए मानें, यह नहीं कि आज सिफारिश दी, कल दूसरे आयोग की नियुक्ति की नौबत आ गयी।

       इतनी गंभीरता से लिया लेबयान आयोग ने अपनी संभावित सिफारिशों के स्थायित्व को कि उनका इंतजार करते करते, लेबयान आयोग की नियुक्ति करने वाले मुख्यमंत्री धरा-धाम से ही सिधार गये, सिफारिश नहीं आई। उन्हें आकाशवाणी के जरिए मार्गदर्शन देने वाले प्रधानमंत्री भी पीछे-पीछे चले गये, सिफारिश नहीं आई। पुतले के निर्माता कलाकार वृद्धावस्था को प्राप्त हो कर सिद्धहस्तता और सिद्धमुखता दोनों से वंचित हो चले, सिफारिश नहीं आई। गंगाधरजी अपनी पार्टी में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते स्थानीय से राष्ट्रीय नेता बन गये, सिफारिश नहीं आई। नयी पीढ़ी पुतले के बारे में स्थानीय इतिहास और विश्वव्यापी अंतर्जाल के जरिए ही जानने की अवस्था को प्राप्त हो गयी, सिफारिश नहीं आई। कुछ लोग तो यह तक भूल चले कि लेबयान आयोग का गठन हुआ किसलिए था, लेकिन सिफारिश नहीं आई तो नहीं ही आई।

      इन बीस सालों में पुतला-विवाद काफी कमजोर पड़ गया था। जस्टिस लेबयान जब इस सिलसिले में किसी नयी विदेश-यात्रा पर जाते या सरकार से एक्सटेंशन की माँग करते या कोई नेता बयान देते तब आ जाने वाली थोड़ी-बहुत गर्माहट को छोड़ दें तो बस ठंडक ही ठंडक थी। सबसे गहरी ठंडक आ गयी थी रवि और जया के संबंधों में, यहाँ तक कि दोनों को इस ठंडक की आदत सी पड़ गयी। पुतले के लोटे से बहता पानी जैसे नाली में बहने की बजाय बर्फ की नदी के रूप में रवि और जया के बीच जमने लगा था। बरस-दर-बरस मोटी होती जा रही इस बर्फ की परत यदि कभी पल-दो-पल के लिए दरकना भी चाहती तो, उन पलों में भी जया की मुस्कान में रवि को कहीं न कहीं पुतले की शरारती मुस्कान छुपी दिख जाती थी।

       जया कभी-कभी सोचती थी कि मुझे तो बस पुतले को देख कर हँसी आई थी, रवि को मेरे गालों पर लाज की लाली कैसे दिख गयी? मैं पुतले को देख कर कम हँसी थी, और रवि के भोले से बुद्धूपन पर अधिक। इस भोलेपन को बेवकूफी में किसने बदला? जिस प्यार से मैं हँसी थी, उसे बेतुकी तुलना में किसने बदला? दोस्ती की जिस जमीन पर खड़ी मैं हँस रही थी, उसमें निराधार ईर्ष्या की बारूदी सुरंग किसने लगाई?

       जया इन प्रश्नों के उत्तर भली भाँति जानती थी, लेकिन जानने का फायदा क्या था?

       कभी-कभी रवि के सामने भी आते थे इस तरह के सवाल। लेकिन, हमेशा सही होने की गलतफहमी तो उनकी चेतना के पोर-पोर में पैबस्त थी। उनकी चेतना अपने सदा सही होने के जिस अँधेरे कमरे में निवास करती थी, उसमें किसी और के सही होने की संभावना की किरणें कभी कभी ही झाँक पाती थीं। रवि का मन ऐसी झिर्रियों को बंद करने में देर भी नहीं लगाता था, जिनसे किसी और के सच के किरणें इस अँधेरे कमरे में घुस पाएँ। रवि अपने सतत प्रकाश के अँधकार में थे, और ऐसे अँधकार से निकल पाना…

       नामुमकिन नहीं, तो, बहुत, बहुत मुश्किल जरूर था।

       

       चौराहे पर नहाने का नाटक करता बदमाश पुतला रवि की जिन्दगी के हर कोने में घुस गया था। शतरंज की बिसात पर जैसे घोड़ा सब मोहरों को फलांगता चलता है, वैसे ही वह हरामी पुतला जब चाहता, ढाई घर की दुलत्ती मारता और रवि को जहाँ जी चाहे दबोच लेता। उसके लिए कोई क्षेत्र वर्जित क्षेत्र नहीं था। क्लास, स्टाफ-रूम, बाजार, सभा-सेमिनार…यहाँ तक कि रवि और जया के ऐन अपने पलों में भी कमीना बीच में आ घुसता। स्ट्रांगर, लांगर, थिकर की भवितव्यता के आंतक में रवि और सिकुड़ जाते, जया और मुरझा जाती।

       कभी-कभी रवि झल्लाते अपने आप पर, कभी रोते अपने भाग पर। तर्कशीलता का सहारा लेकर अपनी इस मनो-व्याधि से निकलने का यत्न करते, लेकिन विधिवत सायकाट्रिस्ट से मिलना उन्हें कतई मंजूर नहीं था, जया ने एक बार सुझाव दिया था तो संध्याकालीन सुरा-वंदन करते रवि के मुँह से गालियाँ निकलने लगी थीं। जया के लिए तय करना मुश्किल हो चला था कि वह इस बीमार इंसान पर दया करे या इस कूढ़मगज, जिद्दी पति में एक हाथ जमा दे। दोनों ही विकल्प असंभव से थे, जया ना तो ठीक से रवि नाम के इंसान पर दया कर पाती थी, और रवि नाम के पति का उपचार। जो कर पाती थी, उसे दया और घृणा, कृपा और क्रोध के बीच कहाँ रखा जाए, इस उलझन को जया कभी नहीं सुलझा सकी।

       रवि जल्दी ही अपनी झल्लाहट, अपने भाग्य पर रुदन से बाहर निकल कर अपनी मर्दानगी साबित करने पर उतारू मर्द, प्रतिशोध के लिए खड्ग-हस्त पुरुष-पुंगव में बदल जाते। स्वयं को सायास चड्डी-साधना में डुबो देते।

       आज इस साधना की सार्थकता का दिन था।

       लेबयान साहब ने रिपोर्ट दे दी थी। इस बीच तीन मुख्यमंत्री और बदल चुके थे, वर्तमान का नंबर पाँचवाँ था। प्रधानमंत्री भी तीसरे चल रहे थे, हालाँकि केंद्र और राज्य में शासक पार्टी वही थी, इसलिए पुतले और लेबयान दोनों के प्रति कमिटमेंट भी ऐन वैसा भले ना हो, तो भी था जरूर। रिपोर्ट ने कलाकारों को भी निराश किया और पुतले के आम समर्थकों को भी। कुछ दुष्टों ने तो लेबयान आयोग की दीर्घकाय रिपोर्ट को ‘खोदा पहाड़, पाई चुहिया’ की संज्ञा भी दे डाली। दुनिया भर की सभ्यताओं में कला की स्थिति का विस्तृत विवेचन करते हुए; कला, समाज,राज्य और कानून के संबंधों पर गंभीर विमर्श करते हुए लेबयान साहब इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि, यों तो, पुतले की कलात्मक स्वायत्तता और समग्रता, उसकी सहज नग्नता में ही है; किंतु, समाज और कला के संबंधों की नजाकत को देखते हुए; व्यापक जन-भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, पुतले को चड्डी पहना देना ही उचित होगा।

       लेबयान साहब ने यह सिफारिश भी लगे हाथ कर दी कि पुतले की चड्डी को बेगार की तरह से न लिया जाए। ऐसा नहीं कि गंदी सी रबड़ या प्लास्टिक की चड्डी पहनाई, और छुट्टी पाई। चड्डी रोजाना बदली जानी चाहिए, पर्याप्त संख्या में चड्डियो की व्यवस्था होनी चाहिए, सारी चड्डियाँ एक ही रंग और एक ही डिजाइन की नहीं होनी चाहिएँ। चड्डी पहना दिए जाने के बावजूद पुतले से छलकते ताजगी और नवीनता के अहसास पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

       आज का चल-समारोह इन सिफारिशों पर अमल का ही समारोह था। आगे-आगे चल रहे नौजवानों के हाथ में जो थाल थे, उनमें पूरी तीस चड्डियाँ थीं। आज पहनाई जाने वाली, शांति और सद्भावना के सफेद रंग की चड्डी एक अलग थाल में अकेली सुसज्जित थी। केयरटेकर की नियुक्ति हो चुकी थी, आज मुख्यमंत्री और गंगाधरजी द्वारा संयुक्त रूप से पहली चड्डी पहनाई जाने के बाद, नियमित रूप से पुतले की चड्डियाँ बदलना, धुलवाना, उनकी सार-सँभाल करना केयरटेकर का ही काम होने वाला था।

       सारी व्यवस्थाएँ ठीक थीं, बस पुतले का आवरण हटना था। उसके पहले नेताओं का माल्यार्पण से स्वागत, फिर उनके भाषण और दूसरे रीति-रिवाज हस्बमामूल होने ही थे…इस सब के बाद, गोल दीवार के दरवाजे पर बरसों से जड़ा ताला खोला गया…

       पुतले का आवरण अंतत: हटा, और हटते ही…

       गंगाधरजी को पुराणों का कलि-काल वर्णन याद आने लगा, कभी विष्णुपुराण के श्लोक याद आएं, तो कभी अग्निपुराण के। कलिकाल में वस्तुएँ अपना धर्म त्याग देती हैं, आग जलना बंद कर देती है, पानी बहना…सब कुछ उलटा-पुलटा हो जाता है, यहाँ तक कि मनुष्यों का कद छोटा होने लगता है, लोग बौने होने लगते हैं…चौंक पड़े गंगाधरजी…कलियुग यानी बौना समय, बौनों का समय…याने हमारा समय…लेकिन, गंगाधरजी किसी भी पुराण के कलियुग वर्णन में वैसा कुछ होने का संकेत याद नहीं कर पा रहे थे जैसा उनके सामने इस पल था…

       उधर, मुख्यमंत्री का पुराण-बोध तो प्रधानमंत्री के वंश-पुराण तक ही सीमित था, हालांकि उस पुराण में भी चमत्कारों की कोई अभाव नहीं था, लेकिन ऐसी अनहोनी के संकेत तो वहाँ भी नहीं थे।

       प्रो. रवि सक्सेना की प्रतिक्रिया दोनों महानुभावों से कुछ कुछ मिलती-जुलती; कुछ-कुछ अलग थी…जो देख रहे थे उसे देख कर मन में अचंभा भी था, क्रोध भी, लेकिन खुद के सही साबित होने के संतोष का बोध भी…मैं तो पहले से ही जानता था कि हरामी कुछ अनहोनी करेगा ही करेगा, जिस दिन साले ने मुझे सताया था, बरसों से चले आ रहे, अच्छे-खासे दांपत्य-जीवन के बावजूद इंचीटेप हाथ में उठवाया था, मैं तो उसी दिन भाँप गया था इस कमीने का हरामीपन….यार लोग मुझे ही पागल समझने लगे थे, परम-प्रिया जया जी तो चोरी-छुपे सायकाट्रिस्ट से कंसल्ट भी कर आई थी, साली गंदी-गंदी फैंटेसी खुद पालती थी, सायकिक केस मुझे बताती थी, अब यहाँ लेके आ अपने उस फ्रायड की नाजायज औलाद सायकाट्रिस्ट को…देख, देख इस साले पुतले की हरकत…

       सही साबित होने के संतोष के अजीब से क्रुद्ध बोध के साथ ही रवि हताश भी बहुत थे…चकित तो वे क्या सारा जन-समूह था, टीवी पर लाइव कवरेज देख रहा सारा देश था…

       जो लोग पुतले को उसके निर्वासित एकांत में भेज उसकी नियति पर विमर्श, विवाद, संवाद और संग्राम करते रहे थे, आज उनके चकित होने का ही दिन था। नहीं, पुतला गायब नहीं हुआ था, वह अपनी उसी जगह पर था जिसे उसकी जेल में बदल दिया गया था। लेकिन आज पुतले ने जेल को चुपचाप अपनी जगह में फिर से बदल डाला था, अपने निर्वासित एकांत को अपने होने की खामोश मुनादी में बदल डाला था।

       पुतला वहीं था, नहा वैसे ही रहा था, लेकिन था वैसा ही नहीं, जैसा कि बीस साल पहले। उसे निर्वासित करने वालों ने सोचा था कि सड़ता रहेगा, विवाद का निपटारा होने तक; पुतला निर्वासन में सड़ने की बजाय एकांत में बड़ा हो गया था। थाल में भात की सामग्री की तरह सजा कर लाईं गयीं चड्डियाँ तो पाँच साल के बच्चे के लिए थीं, और यहाँ भतैयों के सामने नहा रहा था–पचीस साल का सजीला, सांवला, संगमरमरी नौजवान…वैसे ही भोले शरारतीपन के साथ, अकेले नहा सकने के आत्म-विश्वास के साथ, निर्वस्त्र नहा सकने के सुख के साथ…पुतले के भोले शरारतीपन के सामने गंगाधरजी को याद आ रहे पुराणों का कलि-काल-वर्णन उलटा हो गया था। गंगाधरजी को समझ नहीं आ रहा था कि इस उलटबाँसी का क्या अर्थ निकालें कि जीवित होने का दावा करने वाले मनुष्य जिस कलिकाल में बौने होते जा रहे हैं, उसी कलिकाल में पत्थर का यह जड़ पुतला अपने कद में बढ़ता चला गया था।

       जो चड्डियाँ पुतले को पहनाने के लिए लाईं गयी थीं, वे उसकी निर्वस्त्रता के आगे छोटी पड़ गयीं थीं, और उसे चडडी पहनाने पर आमादा अक्लें उसकी हिमाकत के सामने बौनी हो गयीं थीं। पथरीले पुतले की खामोशी के आदी लोग खुद पथरीली खामोशी में चले आए थे। कलियुग-वर्णन सटीक उतर रहा था। सभी वस्तुएँ अपना-अपना स्वधर्म त्याग रहीं थीं। बैंड वाले बैंड बजाना भूल गये थे, नारे लगाने वाले नारे लगाना। चीख-चीख कर खबरें तोड़ने वाले, हरेक इंसान से तुके-बेतुके सवाल पूछने वाले और खुद को देश भर की आवाज बताने वाले टीवी एंकर तक हकबका कर चुप हो गये थे।

       इस खामोशी में, यह मंजर यह नजारा सीधे या टीवी के जरिए देख रहे अंतर्जालजनित-ज्ञान-संपन्न महानुभवों और देवियों की स्मृतियों में यूरोप के विभिन्न म्यूजियमों में संरक्षित निर्वसन पुतले प्रकट होने लगे थे… स्मृतियाँ तो यूरोप की सैर कर रही थीं, वर्तमान पल में महानुभावों की चेतना में कुंठा और ईर्ष्या सक्रिय हो चली थी और देवियों की चेतना में जिज्ञासा और कामना…

       सारा देश स्तब्ध था, मौन था, लेकिन प्रोफेसर रवि सक्सेना के भीतर, संगमरमरी चट्टान के इस दुष्ट टुकड़े, साँवले पुतले को देख कर चट्टानें तोड़ने वाले डायनामाइट के विस्फोट हो रहे थे… अपनी जन्मजात प्रगतिशीलता को साथ लिए दिए ही उन्हें, इस पल धार्मिक अंधविश्वासों पर विश्वास ही नहीं उन्हें जीने की अदम्य कामना भी हो रही थी। वे एक पल अपनी कल्पना किसी राक्षस के रूप में कर रहे थे कि इस दुष्ट को कच्चा ही चबा जाएँ, अगले पल किसी अगियाबैताल ऋषि-मुनि के रूप में कि शाप उच्चारें और पुतला अपने अंग-प्रत्यंग-उपांग सहित खंड-खंड हो जाए। लेकिन पुतला तो खड़ा था, पुतला तो बड़ा था, अपने अंग-प्रत्यंग-उपांग सहित बड़ा। एक पल के लिए ही सही, रवि को इस घोर कुंठा के क्षण में भी अपनी तारीफ करने का मन हो आया, ‘देखा, मेरा सहज कवि-स्वभाव। पुतले की कमीनगी तक कविता बन कर ही, खड़ा और बड़ा के अनुप्रास में ही, दर्ज हो रही है मेरे मन में…’

       लेकिन, अगले ही पल उनके क्रोध का लावा जया की ओर बह निकला था—तिरिया चरित्तर, तिरिया चरित्तर साला…

       फिर पालिटिकली इनकरेक्ट मुहावरा…

       ऐसी की तैसी पालिटिकल करेक्टनेस की…तिरिया-चरित्तर नहीं तो और क्या है कि पहले पुतले के नंगेपन का खुलेआम समर्थन किया, फिर मेरा लिहाज करने का नाटक करके बाहर तो चुप रहने लगी, लेकिन घर में… तिरिया-चरित्तर, तिरिया-चरित्तर…शुद्ध तिरिया-चरित्तर… साजिश थी दोनों की। यह साला पुतला यहाँ चुपचाप खड़ा-खड़ा बड़ा होता रहा, वहाँ वो कमीनी मेरी धरम की पत्नी सब जानते हुए चुप्पी साधे रही…मेरा कार्टून बनाती रही…मिल कर किया है दोनों ने….इस साले का तो क्या करें, लेकिन इस लुगाई को ठीक नहीं किया तो मैं वाकई…साला और कुछ नहीं, शुद्ध कोल्ड ही रहा…

       कुछ ही देर पहले तक सिंह-गर्जना के अंदाज में उछाले गये जयकारों के जरिए जया की पराजय का उत्सव मनाते रवि, इस पल कूं-कूं तक ठीक से नहीं कर पा रहे थे। वे इस हृदय-विदारक वेदना को और उसे सारे जीवन झेलने के अभिशाप को ऐन आँखों के सामने देख रहे थे कि कद-काठी में ही नहीं; जया के मन में उसके और खुद के बीच चलने वाली जिस तुलना की आशंका में रवि पिछले बीस साल में लगातार कमजोर, बौने और दुबले होते चले गये थे, उस तुलना में भी, पुतला निश्चय ही, स्ट्रांगर, लांगर और थिकर हो गया था।

*परवारे: अलग से , उदा०: मुख्यमंत्री ने कलाकार से परवारे ही, बिना प्रधानमंत्री को बताये, बात कर ली ।

‘नया ज्ञानोदय’ फरवरी' 2013 में प्रकाशित
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