कहानी: मिस रूबी - भूमिका द्विवेदी | Hindi Kahani 'Miss Ruby' by Bhumika Dwivedi


कहानी

मिस रूबी

भूमिका द्विवेदी

एक दिन झरना, नैना की बेटी अपने छोटे से कमरे की सफ़ाई कर रही थी। मां काम पर गई हुई थी। झरना ने कमरे में सलीके से झाड़ू मारी और कूड़ा समेट कर एक-एक सीढ़ी से उतारने लगी। उसके कमरे तक पहुंचने की कुल जमा आठ-दस सीढ़ियां ही थीं, जो नीचे अरविन्द के दरवाज़े के बाहर से ही और गलियारे को पार करते ही नीचे के फ़्लोर को मुड़ जाती थी। झरना हमेशा की तरह गलियारे से पहले ही अपने घर का कूड़ा, कूड़ेदान में डालकर वापस लौट आती थी। आज भी झरना कूड़ेदान उठाकर चली ही थी, कि कुछ देर से अपने दरवाज़े से घूर रही श्रीमती अरविन्द यानी कि रूबी, ने उसे रोका,

 “ऐई यू......... ये बाकी की सीढ़ी कौन साफ़ करेगा ?"

झरना को रूबी का बर्ताव वैसे ही बिल्कुल नापसंद था, वो अच्छी तरह से जानती थी, कि यही वो मिस रूबी है, जो हर वक़्त उसे और उसकी मां को बेइज़्ज़त करने का मौका खोजती फ़िरती है। झरना को उसकी बेमतलब की जिज्ञासायों, बेवजह की सलाहों और फ़िज़ूल की नसीहतों से सख्त नफ़रत थी।

झरना ने पलट कर जवाब दिया,

“ माइ नेम इज़ नौट यू। ओके? इट्स झरना। सो, नाओ कौल मी झरना।”

इसी समय रूबी की कामवाली भी आ गई और उसने अपनी मालकिन को पलट कर जवाब पाते देख-सुन लिया।

झरना ने बिना रुके आगे कहा, 

“ और ये जो आयी हुई है, क्या आप इसे तन्ख्वाह नहीं देतीं। ये ज़रूर साफ़ कर देती कर्नल-अंकल के मकान की बाकी सीढ़ियां। ओके।”

इतना झन्नाटेदार जवाब पाकर मिस रूबी बुरी तरह तिलमिला गई।

लेकिन बन्दी हार नहीं मानी,

“ यू जस्ट शटअप। ओके। खामोश रहो वरना इस घर में रह नहीं पाओगी, समझीं”

“ नाइदर यू आर माइ टीचर, नौर माइ पेरेन्ट्स। आए’म नोवन टु ओबे यू। सो नाओ यू शटअप मिस रूबी।”

दीदी की आवाज़ की तेज़ी सुनकर झरना का छोटा भाई भी वहीं आ खड़ा हुआ।

इधर कामवाली भी तीखी धारदार मुस्कान छुपाती हुई, वहीं खड़ी रही और रूबी की इज़्ज़त उतरने का जैसे इन्तज़ार करने लगी।

अब मिस रूबी ने तो जैसे आपा ही खो दिया हो। उसने पूरा ज़ोर लगा कर, अपना एकमात्र सबसे दमदार ब्रम्हास्त्र छोड़ दिया,

“ इसीलिये तो बाप ने घर से निकाल दिया है.. बेघर कहीं की.. मां-बेटी सब सड़क पर इसीलिये तो हैं...”

मिस रूबी के पास इससे कड़वा कुछ बोलने को था ही नहीं। वो अपनी तरफ़ से, अपना सर्वोत्तम दे चुकी थी।

झरना तो खून के घूंट पीकर चुप रह गई, लेकिन उसका दस बरस का छोटा भाई खुद को रोक नहीं पाया और वहीं फूट-फूट कर रोने लगा। झरना उसे गोद में उठा कर ऊपर अपने कमरे में चली आयी।

नैना शर्मा, करीब चालीस-पचास बरस की एक अर्ध-बुज़ुर्ग महिला थी। एक बहोत बड़े आलीशान मकान की बरसाती में तीन सौ रुपये महीने की किराये की दर से रहती थी। उसके दो बच्चे भी उसके साथ रहते थे। वो एक एडवरटाइज़िंग-कम्पनी में दिहाड़ी-मज़दूरी पर काम करती थी। क्योंकि वो पढ़ी-लिखी औरत थी, इसलिये एक मामूली क्लर्क का काम उसके हवाले किया गया था, आफ़िस का रजिस्टर वही अपडेट करती थी। लेकिन फ़िर भी तनख्वाह आम दिहाड़ी-मज़दूर के बराबर ही मिलती थी। रोज़ाना के आठ घन्टे की ड्यूटी के अस्सी रुपये, बस्स यही।

इसकी वजह उसकी बेइन्तिहां मजबूरी थी, आखिर दो मासूम बच्चों का पेट जो नैना शर्मा को पालना था। खुद का पेट तो बच्चों को खिलाकर ही भर जाता था।

कभी-कभी ये अस्सी रुपये सौ भी हो जाते थे, जब ओवर-टाइम के चार घन्टे और मिल जायें, जो कि महीने में एक या दो बार ही नसीब होते थे।

लेकिन ये औरत जिसका नाम श्रीमती नैना शर्मा था, इस काम से फ़िर भी खुश थी, क्योंकि वो यहां भले ही बेहद कमती में लेकिन नेकी और शराफ़त से कमा-खा पा रही थी। ये ’श्रीमती’ शब्द उसके नाम के साथ एक कलंक सा था, जो उसके माथे पर लाल बिन्दी जैसा चिपका हुआ था।

उसके पति चन्द्रशेखर शर्मा ने उसे उसके बच्चों सहित घर से निकाल कर दूसरी औरत रख ली थी। इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि उसे चार हज़ार गज की उस बड़ी सी हवेली से निकाला गया था, जो उसी के लिये ही खरीदी गयी थी, जिसे उसने ही सजाया था, जिसे उसने ही बसाया था। प्यार से, दुलार से, परिवार से, बच्चों से, गृहस्थी से।

नैना शर्मा के पास अब अपने और अपने बच्चों के लिये कानूनी लड़ाई लड़ने के सिवा कोई चारा नहीं था। ये उस महिला के लिये ना केवल खुद के और उसके बच्चों के हक का मुद्दा था, बल्कि आत्म-सम्मान का, सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार में उसके वर्चस्व के बुनियादी सघंर्ष का भी सवाल था।

नैना ने बी.ए. की पढ़ाई के दौरान परिवार वालों की मर्ज़ी के खिलाफ़, प्रेम-विवाह किया था, इसलिये मायके के दरवाज़े भी खटखटाने का विकल्प उसने नहीं स्वीकारा।

उसकी आत्मा की कमाल की शक्ति, उसका जुझारुपन, और उसका पढ़ा-लिखा होना ही इसकी मूल वजह थी, कि उसने कभी हार नहीं मानी, उसने कभी बच्चों सहित रेल की पटरियों पर बिछ जाने की कल्पना भी नहीं की। ना कभी उसने ज़हर खाने का विचार भी मन में आने दिया, उसके स्वाभिमान के चलते उसे भीख मांगना या बच्चों से मंगवाना भी गवारा ना हुआ। उसके मजबूत नैतिक मूल्यों ने उसे किसी रईस की रखैल भी नहीं बनने दिया, और अपने नेक इरादों के रहते वो ना ही किसी गलत धन्धे में ही लग सकी। वो सही, सच्चे और ईमानदार तरीके से बेहतरी की दिशा की ओर अपने बच्चों को ले जाने के लिये दृढ़-प्रतिज्ञ थी। यही उसकी इबादत थी, यही उसका धर्म था।

उसके दोनों बच्चे उसके साथ थे, हर कदम पर। गरीबी में-अमीरी में। सुख में-दुख में। हर वक्त हर स्थिति में। शायद यही नैना की असली ताकत भी थे।

बेटी बड़ी थी, बेटा छोटा। दोनों स्कूल जाते थे। बेटी तेरह और बेटा दस बरस का था।

करीब डेढ़ साल से ये टूटा हुआ, लेकिन अन्दर से मजबूत बंधा परिवार इस मकान-मालिक की छ्त्रछाया में अपनी बिखरी ज़िन्दगी संवारने की जीजान से कोशिश कर रहा था। मकान-मालिक रिटायर्ड आर्मी अफ़सर था। जिस बरसाती यानी सबसे ऊपरी छ्त के एक कमरे में ये लोग रह रहे थे, उसमें पहले मकान-मालिक का सरकारी घरेलू नौकर रहा करता था। रिटायर्मेंट के बाद उस नौकर को छुट्टी मिल गई और वो ये टूटी-फ़ूटी गैलेरी छोड़कर चला गया और कर्नल के लिये मुफ़त में तीन सौ रुपये महीने की आमदनी बंधा गया। कर्नल नैना देवी और उसके बच्चों पर जो अहसान चढ़ा रहा था, वो अलग था। कर्नल मोहल्ले में सीना तान कर चलता था, कि गरीब बेसहारा को आश्रय दे रखा है। मूछों पर ताव दे देकर बताया करता था, “मुझसे मजलूम औरत और बच्चों का दु:ख देखा नहीं जाता है। भगवान के नाम पर कोई रकम भले ही मैं ना दूं, लेकिन जहां तक कर सकता हूं मैं मदद के लिये हमेशा सबसे आगे खड़ा रहता हूं।”

ये वही परोपकारी मददगार हैं जिनसे उस दस बाय दस की बरसाती के लिये नैना देवी ने केवल पचास रुपये कम करने को कहा था, और पूरे तीन सौ रुपयों में एक पाई भी कम नहीं की थी। ऊपर से ये अलग कहता था बिजली-पानी तो मुफ़्त दे रहा हूं। आज भी किराया बढ़ाने के लिये टोकता ही रहता है।

बहरहाल, इसी बीच इस मकान में एक और किरायेदार आये। अरविन्द और उसकी बीबी रूबी। और उनकी एक तीन साल की बच्ची प्रिया। जिन्होंने मकान का एक बड़ा हिस्सा यानी की पूरा दूसरा खण्ड, किराये पर ले लिया चार हज़ार रुपये प्रति महीने के हिसाब से, और आते ही मकान-मालिक को छ्ह महीने का अग्रिम किराया भी दे डाला। अरविन्द इनकम टैक्स विभाग में दूसरे दर्जे के अधिकारी थे, पास के ही शहर से तबादले के कारण यहां आ पहुंचे थे। अखबार में विज्ञापन देख कर किराये के लिये इस मकान का पता मिला था। दो नम्बर का पैसा बरसता था, इनके घर-आंगन। छ्ह-महीना क्या छह साल का किराया भी अदा करना इनके लिये कोई बड़ी बात नहीं थी।

मकान-मालिक इस दौलतमन्द दम्पत्ति को किरायेदार के रूप में पाकर धन्य-धन्य हुआ जाता था।

दो हज़ार गज में फ़ैला-पसरा ये मकान तीन खण्डों में बंटा था। सबसे नीचे शानदार बागीचे से सुसज्जित हिस्से में मकान-मालिक खुद रहा करता था, दूसरे खण्ड में, जहां तीन बड़े बेडरूम, दो बड़े हाल, सफ़ेद संगमरमर से सजी रसोई-बाथरूम वगैरह, और एक बड़ी सी खुली पक्की छ्त। तीसरा हिस्सा सबसे ऊपर की वो एक संकरी-सी गैलेरी, जिसे नैना देवी का परिवार ’कमरा’ कहता था, जहां हर मौसम की भरपूर मार एक बरसाती झेलती थी और खुली हुई आधी बनी, आधी कच्ची छ्त। इसमें रहने वालों का बाथरूम सबसे नीचे था। इन्हीं आधी-पूरी सुविधा के हिसाब से किराये भी नियत किये गये थे।

कहानी अब शुरु होती है, जब मिसेज़ अरविन्द, जो खुद को ’मिस रूबी’ कहलवाना पसंद करती है, जब उसने उनके साम्राज्य की पताकायें उस दो हज़ार गज के विस्तृत परिक्षेत्र में फ़ैलानी शुरु कर दी। मिस रूबी ये मानकर चल रही थी, कि न सिर्फ़ वो मकान, बल्कि मकान-मालिक भी उसकी सल्तनत का हिस्सा हो चुका है। वो ना केवल बेधड़क मकान के तीसरे खण्ड तक चहलकदमी के लिये पंहुच जाती थी, बल्कि वहां पंहुच कर गाहे-बगाहे नैना और उसके बच्चों पर सलाहें और नसीहतें भी उड़ेल आती थी। पूरे नीचे के बागीचे पर भी उसकी पुश्तैनी-मल्कियत का-सा अहसास होने लगा था। उस पूरी ज़मीन पर वो जहां, जो चाहे रखती-उठाती थी, दरअसल अब ये लगता ही नहीं था कि वो किरायेदार रह गई है।

रिटायर्ड कर्नल को इससे रत्ती भर का भी ऐतराज़ नहीं था। बल्कि वो तो मारे खुशी के झूम रहा था, कि उसके इस उजड़े दयार में किसी अफ़सर की जवान बीवी अपनी खुली-खुली टांगों की नुमाइश, हर महीना चार हज़ार रुपये देकर कर रही है। पश्चिमी सभ्यता के रहन-सहन-खाने-कपड़े से जबरदस्त प्रभावित मिस रूबी यदा-कदा केक और पुडिंग बना कर कर्नल को चाटने के लिये भी थमा आती थी। कर्नल उसे भगवान के प्रसाद से भी ज़्यादा अकीदत से, ऐहतराम से ग्रहण करता था, और केक/पुडिंग से कहीं ज़्यादा जमकर केक बनाने वाली की तारीफ़ों के पुल पर पुल बांधे जाते थे। कभी-कभी तो लगता था यदि कर्नल मकान-मालिक ना होकर मिस रूबी का यदि किरायेदार भी होता तो सम्भवत: खुद को अनुग्रहीत ही समझता, यहां तो खुद मिस रूबी किरायेदार थी, अब तो कहने ही क्या।

कर्नल की ये सब हरकतें कर्नल की बीवी को रास नहीं आती थी। वो एक शान्त, घरेलू, धार्मिक, सुलझी हुई ग्रामीण महिला थी। इधर-उधर से दबी ज़बान से नैना से कहा भी करती थी, “ इनकम टैक्स का अफसर है, अब अपनी मेहरारू को नंगा नचाये, मुझे क्या.. दुनिया में हंसी उसी बेसरम की होती है, वो जाने, उसका काम जाने.. कौन बोले इन लोगन के बीच में... सीख ना दीजे बानरा, जे अपनी हानि कराये..”

लेकिन कर्नल था कि, मिस रूबी से ये कहने में भी कभी नहीं चूकता था कि वो उसे अपना ही घर समझ कर रहे, उसे अमीरी-गरीबी या मकान-मालिक और किरायेदार जैसे भेदभाव पर ज़रा भी यकीन नहीं।

लेकिन साथ ही साथ दूसरी तरफ़ यही वो शख़्स था जो नैना शर्मा के साथ पूरी अमीरी और गरीबी रेखा का साफ़-साफ़ विभाजन करके ही व्यवहार तय करता था।

नैना इस बात का पूरा ध्यान भी रखती थी, उसने अपने बच्चों को बाकायदा सख्त हिदायत दे रखी थी, कि वे नीचे किसी के भी हिस्से में ना जायें, किसी भी काम से नहीं, खेलने भी नहीं। किराया भी वो पूरी कोशिश करती थी कि समय से एक दिन भी देरी से ना दे, भले ही उसे और उसके बच्चों को एक दिन फ़ांके करने पड़ जायें। उसके पति के अलगाव के बाद आज उसे ये दिन देखने पड़ रहे थे, वरना तो कर्नल के इस मकान से कहीं विशाल कोठी की तो वो खुद मालकिन रही थी। शर्मा-परिवार अपने मोहल्ले का, खासा जाना-माना, रईस और रुतबेदार परिवार था।

खैर, “रहिमन चुप हो बैठिये, देख दिनन के फ़ेर...” नैना किसी बेवजह की बहस-मुबाहिसा से खुद को अलग किये, सिर्फ़ बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और श्रीमान शर्मा से अपनी लड़ाई के सिवा खुद को कहीं उलझाती ही नहीं थी। आस-पास क्या हो रहा है, क्यूं हो रहा है, उसे कुछ लेना-देना नहीं था। अड़ोस-पड़ोस में कौन आया कौन गया, किसकी सगाई, किसका ब्याह-मुंडन-जनेऊ हुआ है कि होने वाला है, उसे कुछ खबर ही नहीं होती थी।

उसका राबेता था तो बस अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से, होम-वर्क से, स्कूल और स्कूल के टाइम-टेबेल से, और सबसे ज़रूरी उन प्यारे बच्चों की स्कूल-फ़ीस से था। उसकी बची हुई ज़िन्दगी दफ़्तर में गुज़रती थी।

यही दिन, यही रात, यही जाड़ा-गर्मी-बरसात और यही कुल जीवन की गति थी, नियति थी।

लेकिन दुनिया और दुनियावालों को ये सब गवारा नहीं होता। उन्हें मजबूर को सताने में मज़ा आता है। उन्हें दुखी को दुख पहुंचाने में सुख मिलता है। इन दुनियावालों में मिस रूबी जैसे व्यक्ति बहुतायत में शामिल होते हैं। और इन जैसों का इलाज भी कठिन होता है।

शाम होने पर मां आयी, तब तक यूं तो बच्चा चुप हो गया था। लेकिन मां को देखकर वो फ़िर रो पड़ा।

मां ने पूरी बात सुनी और गुनी। वो दोनों बच्चों के साथ अरविन्द के दरवाज़े तक आयी और कौल-बेल बजायी।

अरविन्द ने ही दरवाज़ा खोला, वो भी अपने दफ़्तर से लौट आया था।

“ अरविन्द भाईसाहब, मुझे आपसे दो मिनट बात करनी है, क्या थोड़ा-सा वक्त है आपके पास?” नैना देवी ने अपने हमेशा की तरह सधे से हुये स्वरों में कहा।

“ हां हां मिसेज़ शर्मा, कहिये। आइये अन्दर आकर बात करते हैं।” अरविन्द अपने विभाग में चाहे जितना दो नम्बरी पैसा बनाने वाला हो, घूसखोर हो, चाहे जैसा भी बर्ताव रखता हो, लेकिन यहां वो एक सभ्य और पढ़े-लिखे, भद्र-पुरुष की तरह पेश आ रहा था। वैसे भी उसकी तेज आवाज़ भी कभी किसी ने सुनी नहीं थी।

नैना फ़िर पूरे सन्तुलित रवैये से आगे बोलीं,

“ नहीं भाईसाहब अन्दर आने का कोई औचित्य ही नहीं। मैं यहीं ठीक हूं, आप अभी ही आफ़िस से आये होंगे, इसलिये पानी-चाय पी लीजिये, फ़िर आपसे दो मिनट मुझे चाहिये.. क्या आप दे सकेंगे ?”

“ जी आप कहिये.. मैं एकदम आपको सुनने के लिये ठीक हूं। आप बताइये... प्लीज़..”

“ देखिये अरविन्द भाईसाहब, मुझे आपसे महज इतना कहना है, कि इन बच्चों के पिता से, यानि मेरे पति से मेरा मुकदमा चल रहा है। उनका मुकदमे में कहना है, कि मेरी पत्नी मेरे बच्चों को लेकर घर छोड़ कर चली गई है। और इसी मुकदमे में मेरा कहना है, कि उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया है। वो एक बड़े वकील हैं और मेरा मुकदमा कमज़ोर है, आपकी पत्नी भी यही कहती हैं कि वकील-साहब ने हम लोगों को घर से निकाल फ़ेंका है... आज मेरी ग़ैरहाज़िरी में उन्होंने मेरे बच्चों से भी यही कहा है। अब यदि आप अपनी पत्नी को अनुमति दे दें और वो मेरे मुकदमे में मेरी तरफ़ से गवाही दे दें, तो आप और आपकी बीवी के सहयोग से मेरा मुकदमा मजबूत हो जायेगा। बस मुझे आपसे इतनी ही दरख्वास्त करनी है।”

नैना देवी ने आधे मिनट में अपनी मुख्तसर-सी गम्भीर बात पूरी की पूरी कह दी।

अरविन्द बड़ा हतप्रभ हुआ,

“ आप क्या कह रहीं हैं भाभी जी.. रूबी ने ऐसा कहा... ?” वो बात बीच में रोककर रूबी को ज़ोर से पुकारने लगा, “ रूबी... रूबी.. यहां आओ “

मिस रूबी प्रगट भईं ..

पूरी तरह से अन्जान बनकर बोली, “क्या हुआ?”

अरविन्द बिना एक भी क्षण गंवाये बोला, “ तुमने इनके बच्चों से आज क्या कहा है? तुमने इनके फ़ैमिली-मैटर पर कोई भी बात क्यूं कही है?”

“ मैंने क्या कहा.. मेरा वो मतलब नहीं था... बस ” रूबी अभी भी बात की नाज़ुकी नहीं समझ रही थी।

लेकिन अरविन्द फ़िलवक़्त बहोत गम्भीर था, “सच सच कहो, तुमने क्या कहा?”

“ ओ अरविन्द, यू डोन्ट नो, हाओ अनऐजुकेटेड दीज़ पीपल आर...मैंने तो बस इतना ही कहा कि इन्हें इनके घर से इस बदतमीज़ लड़की की बदज़बान के कारण निकाला गया है...”

“ इनके या किसी के भी पारिवारिक-मामले में दख़ल देने का तुम्हें कोई हक़ नही पंहुचता। तुम इनसे इसी वक़्त माफ़ी मांगो.. ये उम्र में तुमसे बड़ी हैं, इस बात का ख़्याल तुम्हें खुद होना चाहिये... जस्ट से सौरी,” अरविन्द नाराज़ होकर एक रौ में बोलता गया,

“ सौरी, माइ फुट्ट...मैं क्यूं सौरी बोलूं.. इस रूड लड़की ने मुझे मेड के सामने शटअप बोला।”

अब नैना देवी ने फ़िर सौजन्यता से कहा,

“ भाईसाहब रहने दीजिये, छोड़िये.. बात बढ़ाने की मेरी कोई मन्शा नहीं.. बस बच्चों से कुछ ना कहें, इतनी ही गुज़ारिश थी मेरी.. वरना तो ये आपकी बात भी नहीं मानतीं..”

अरविन्द इस पूरे प्रकरण से दुखी हुआ था और अपनी बीवी से उखड़ गया था,

“ रूबी मैं तुमसे कह रहा हूं, जस्ट से सौरी। राइट नाओ।”

नैना देवी फ़िर अरविन्द को समझाने लगीं, “ देखिये आप परेशान ना होईये। बस इनसे कह दीजियेगा इन्हें भला-बुरा जो कहना है मुझसे कहें.. बच्चों को बीच में लाने का कोई मतलब नहीं। वो नादान हैं, उनका दिल दुखता है। बस भाईसाहब मुझे इतना ही कहना था, मैं अब जा रही हूं।”

अरविन्द ने आखिरी बार रूबी से पूछा, “ तो तुम माफ़ी नहीं मांगोगी.. इज़ दिस योर फ़ायनल डिसीज़न ?”

जवाब में रूबी ने नैना देवी की ओर देखकर तकरीबन चिल्लाते हुये कहा,

“ सौरी” और वो तुनक कर, पैर पटकते हुये, घर के भीतर चली गई।

अरविन्द ने बेहद धीमे स्वर में नैनादेवी से क्षमा-याचना की,

“ भाभी जी मैं आपसे मेरी बीवी की तरफ़ से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता हूं। मैं आपकी दिल से बेहद इज़्ज़त करता हूं.. आप बड़ी हैं, आपका दिल बड़ा है, आप मुझे ज़रूर माफ़ कर देंगी। मैं आपके संघर्ष की इज़्ज़त करता हूं। आप अकेले अपने बच्चों की सिंगल-पेरेन्ट बनकर बड़ा कर रही हैं। मेरी नज़र में आपका बड़ा सम्मान है, मुझे प्लीज़ माफ़ कर दीजिये, हमारे कारण आपको बहोत दुख पंहुचा है। बस मैं और कुछ कहने लायक नहीं। कुछ और कहने का मेरा मू ही नहीं छोड़ा इस औरत ने..” इतना कहकर अरविन्द दुखी मन से सिर झुका कर वहीं खड़ा रह गया।

नैना देवी भी नमस्कार करके अपने बच्चों सहित अपने कमरे में लौट आयीं।

इस वाक़ये के बाद रूबी इन शर्मा-परिवार के सामने पड़ने से बचने लगी।

संयोग से अगर मां-बेटी किसी से आमना-सामना हो भी गया, तो नज़र नहीं मिलाती थी। उसकी कामवाली भले ही गाहे-बगाहे मुस्कुरा देती थी।

पता नहीं रूबी को कोई अपराध-बोध जैसा कुछ था, या कुढ़न थी, या शर्मिन्दगी थी, नाराज़गी थी, या फ़िर उसमें कुछ सुधार था, पता नहीं क्या था लेकिन रूबी का तेवर अब बहोत बदला हुआ था।

उसकी तेज़ आवाज़ जैसे पहले यहां-वहां-जहां-तहां सुनायी दिया करती थी, अब सुनने में नही आती थी। अब तो वो कर्नल के साथ गार्डेन में भी कम दिखती थी। अब उसकी बेटी की किलकारियां ही सुनने में आती थी।

बहरहाल उस घटना के करीब बारह-बीस दिन बाद कर्नल साहब के फ़ाटक पर एक ट्रक रुका और अरविन्द उसमें मज़दूरों के साथ अपने सामान रखता हुआ दिखायी दिया। आज मिस रूबी बेहद झल्लाई हुई थी और अपनी कामवाली को जाने से पहले भरपूर झिड़कियां परोस रही थी।

मिस रूबी रुख़सत हुईं।

कर्नल अपने मकान का विज्ञापन देने फ़िर लोकल-अखबारों के दफ़्तर निकल गया। बेचारे का आई-टौनिक तो जो गया सो गया ही, केक-पुडिंग भी छिन गया।

इस पूरे ऐपिसोड में जो सबसे प्रसन्न प्राणी था, वो कर्नल की बीवी थी, जिसकी मनचाही मुराद बिना किसी प्रयास के ही पूरी हो गई थी।

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