भरत तिवारी: एक ग़ज़ल | A Ghazal - Bharat Tiwari


बची हो जो गर थोड़ी ग़ैरत

एक ग़ज़ल - भरत तिवारी





न इंसानियत का निशाँ ही बचेगा
न काबा न मंदिर न गिरजा बचेगा


बची हो जो गर थोड़ी ग़ैरत कहीं कुछ
निकालो  उसे  वर्ना कुछ  न बचेगा

कहाँ से ये सीखी हैं नफ़रत की  बातें
मुहब्बत ही है जिससे आलम बचेगा

तू बनके खिलौना भुला  न ख़ुदी को
ख़ुदी  टूट  जायेगी  तब क्या  बचेगा

तू ताक़त से अपनी बचा गुलिस्तां को
गुलों  के   रहे   ही  गुलिस्तां  बचेगा


na insaniyat ka nishaN hi bachega
na kaba na mandir na girja bachega

bachi ho jo gar thodi ghirat kahin kuch
nikalo us'se varna kuch na bachega

kahan se ye siikhi hain nafrat ki baaten
muhabbat hi hai jis'se aalam bachega

tu banke khilouna bhula na khudi ko
khudi toot jayegi tab kya bachega

tu taqat se apni bacha gulistaN ko
guloN ke rahe hi gulistaN bachega

‪#‎faizabadi‬ ‪#‎ghazal‬
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